संबंध कैसे रखे...
1.1.2021
*जिसके साथ भी संबंध रखें, सच्चा संबंध रखें, दिखावा न करें। तभी आनंद होगा।*
*कुछ तो जन्म से हमारे निकट संबंधी होते हैं, जिनके साथ हम एक ही घर परिवार में रहते हैं। वे संबंध ईश्वर द्वारा स्थापित किए गए हैं। जैसे माता-पिता भाई-बहन दादा-दादी इत्यादि।* कुछ दूसरे लोग भी हमारे संबंधी होते हैं, परंतु वे एक घर परिवार में कभी रहते भी हैं और दूर भी रहते हैं। वे संबंध भी ईश्वर द्वारा ही स्थापित किए गए हैं। जैसे चाचा चाची मामा मामी बुआ फूफा मौसी मौसा आदि।
*परन्तु कुछ और लोगों के साथ भी हमारे संबंध हो जाते हैं, जो ईश्वर द्वारा नहीं बनाए जाते, बल्कि हम स्वयं बनाते हैं। जैसे मित्र, पति पत्नी, गुरु, आचार्य, पड़ोसी आदि।* इन सब लोगों के साथ मिलजुल कर हम अपना जीवन जीते हैं। एक दूसरे का सहयोग लेते हैं और एक दूसरे को सहयोग देते भी हैं। क्योंकि अल्पशक्ति वाले होने से हमें एक दूसरे का सहयोग लेना देना पड़ता है। जब सहयोग लेना देना पड़ता है, तो उनसे संबंध भी रखना पड़ता है। *जब हम इन से संबंध रखते हैं, तो पूरी ईमानदारी, प्रेम श्रद्धा समर्पण के साथ सच्चा संबंध रखना चाहिए। केवल दिखावा नहीं करना चाहिए।*
अनेक बार इन सब संबंधियों में से कुछ लोग शुद्ध विचार वाले पूरे ईमानदार नहीं भी होते। जो लोग शुद्ध विचार वाले ईमानदार होते हैं, उनके साथ तो शुद्ध संबंध रखने में कठिनाई नहीं होती। *परंतु जिनका आचरण शुद्ध नहीं है, वे झूठ छल कपट का प्रयोग करते हैं, धोखाधड़ी करते हैं, उनके साथ संबंध रखने में कठिनाई आती है, क्योंकि वे हमारे लिए अनेक प्रकार के दुख और समस्याएं उत्पन्न करते हैं।*
ऐसे लोगों के साथ हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर है, कि *ऐसे लोगों को सावधान करना चाहिए, उन्हें प्रेम पूर्वक बताना चाहिए कि आपका व्यवहार ठीक नहीं है, कृपया अपने व्यवहार में सुधार करें.* दो चार पांच सात बार उन्हें चेतावनी देनी चाहिए। यदि वे आप की चेतावनी से सावधान होकर अपने दोष छोड़ दें, तो उनके साथ प्रेम पूर्वक आगे संबंध बनाए रखना चाहिए।
यदि समझाने पर भी वे अपना सुधार न करें, तो घर परिवार के 2 / 4 व्यक्तियों को बीच में बिठाकर उनके साथ चर्चा करनी चाहिए, ताकि वे लोग भी उस दोषी संबंधी को समझाएं। फिर भी कोई यदि न सुधरे, तो उसके दोषों पर ध्यान न देकर, गुणों पर ध्यान देना चाहिए, और संबंध चालू रखना चाहिए। *बहुत बार उसे सावधानी सूचना संकेत देने पर भी, जब वह न सुधरे और उसके दुर्व्यवहार के कारण आपका जीवन बिगड़ने लगे, आपका तनाव बढ़ने लगे, आपको डिप्रेशन आने लगे, सारा दिन आपको अशान्ति सताने लगे, तो ऐसी स्थिति में उस दुष्ट संबंधी के साथ संबंध तोड़ देना चाहिए। अन्यथा आप जीवन भर दुखी रहेंगे, डिप्रेशन में जाएंगे, अत्यंत रोगी हो जाएंगे, आपका जीवन नष्ट हो जाएगा, सारा आनंद उत्साह समाप्त हो जाएगा और शीघ्र ही आप मृत्यु को प्राप्त हो जाएंगे।* इन सारे दुष्परिणामों से बचने का यही उपाय है कि ऐसे दुष्ट संबंधी के साथ संबंध समाप्त कर दिया जाए, तभी आपके जीवन की रक्षा हो पाएगी।
फिर वह दुष्ट व्यवहार करने वाला संबंधी चाहे अपने ही घर का सदस्य क्यों न हो? आपने इतिहास में देखा होगा, कि *श्रीकृष्ण जी महाराज ने किसी भी दुष्ट का लिहाज नहीं किया। सगे मामा अत्याचारी कंस को मार दिया। और शिशुपाल आदि जो भी उनके पारिवारिक संबंधी थे, उन सब दुष्ट लोगों में से किसी को भी माफ नहीं किया। महाभारत के युद्ध में अन्यायकारी कौरवों की ईंट से ईंट बजाई। उन्होंने किसी भी अन्यायकारी दुष्ट को नहीं छोड़ा।* वे तो राजा और क्षत्रिय थे। इसलिए उन्हें दंड देने का अधिकार प्राप्त था। *आप राजा नहीं हैं। इसलिए सीधा दंड देने का अधिकार आपको प्राप्त नहीं है, न सही। कम से कम संबंध तोड़ने का अधिकार तो प्राप्त है ही।* वेदो में ऐसा विधान किया गया है। इसलिए जब अपने जीवन की सुरक्षा का प्रश्न हो जाए, तब वेदानुकूल पद्धति को ही अपनाना चाहिए। *अर्थात यदि संबंधी ईमानदार हों, तो पूरी श्रद्धा प्रेम समर्पणपूर्वक उनके साथ बढ़िया संबंध निभाएँ। यदि संबंधी दुष्ट हों, तो उनसे संबंध तोड़कर अलग हो जाएँ। यही वैदिक रीति है। यही सुखदायक और सुरक्षित है।*
- *स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक।*
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