उंचा योगी...
8.9.2024
वेद में लिखा है, कि "उपह्वरे गिरीणां संगमे च नदीनां धिया विप्रो अजायत।" अर्थात "जो व्यक्ति ऊंचा योगी बनना चाहता है, उसे पहाड़ों की गुफाओं में नदियों के संगम पर गुरुकुलों आश्रमों आदि एकांत स्थानों में जाकर योगाभ्यास करना चाहिए, और एक जीवित शरीरधारी योग्य विद्वान व्यक्ति को अपना गुरु आचार्य स्वीकार करना चाहिए।" "क्योंकि बिना जीवित गुरु जी के कोई भी विद्या आती नहीं।"
जैसे स्कूलों कॉलेजों गुरुकुलों आदि में विद्यार्थी, गुरु जी को समर्पित होकर विद्या पढ़ते हैं। जैसा गुरुजी पढ़ाते हैं, वैसा पढ़ते हैं। उनके साथ व्यर्थ की बहस नहीं करते। तू तड़ाक नहीं करते। सभ्यता और नम्रता से पढ़ते हैं। अपने गुरुओं अध्यापकों आचार्यों को अपने से अधिक बुद्धिमान स्वीकार करते हैं। अपनी बुद्धि को उनकी बुद्धि से कम मानते हैं। उनके आदेश निर्देश का पालन करते हैं, तभी वे ऊंचे विद्वान बन पाते हैं, अन्यथा नहीं।"
"इसी प्रकार से यदि कोई व्यक्ति ऊंचा योगी बनना चाहता हो, तो इस योग विद्या को भी वह तभी सीख सकता है, जब उसका कोई जीवित शरीरधारी गुरु हो।" "यदि बिना गुरु जी के पढ़ाए, पुस्तकों को केवल स्वयं पढ़ने से विद्या समझ में आ जाती, तो स्कूल कॉलेज और गुरुकुलों की कोई आवश्यकता नहीं थी।" परंतु सभी जानते हैं, कि "इन शिक्षा संस्थानों के बिना उत्तम योग्य विद्वान अध्यापकों आचार्यों के बिना कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में ऊंचा विद्वान नहीं बन सकता।"
ऐसे ही जीवित शरीरधारी गुरु जी से योग विद्या पढ़े सीखे बिना भी कोई व्यक्ति ऊंचा योगी नहीं बन सकता। "साक्षात शरीरधारी गुरु चाहिए, जो उसे कदम-कदम पर समझाएगा, कि यह आपका चिंतन विचार वाणी व्यवहार या कार्य सही है, इस कार्य को कर लो। और यह गलत है, इस कार्य को मत करो।" "इस प्रकार से जो साधक, किसी जीवित गुरु जी के निर्देश में चलेगा, समर्पित भाव से चलेगा, वही सफल होगा, वही ऊंचा योगी बनेगा।"
इसके अतिरिक्त मनमानी करने वाले लोग निश्चित रूप से भटकेंगे। वे कभी भी ऊंचे योगी नहीं बन पाएंगे। सदा भ्रांतियों में ही जिएंगे, कि "मैं अपने जीवन में ठीक चल रहा हूं, और ठीक प्रगति कर रहा हूं।"
"क्या कोई भी विद्यार्थी यूनिवर्सिटी के प्रमाण पत्र के बिना स्वयं को डॉक्टर इंजीनियर पायलट वकील स्वयं घोषित कर सकता है?" नहीं कर सकता। "यदि वह स्वयं को डॉक्टर इंजीनियर पायलट वकील आदि स्वयं ही घोषित करता है, तो उसकी घोषणा व्यर्थ है। उसका कोई मूल्य नहीं है। वह मान्य नहीं होता।" "यूनिवर्सिटी अथवा समाज में प्रतिष्ठित कोई विद्वान जिसे प्रमाणित करता है, उसी का मूल्य होता है। वही प्रमाणित विद्वान मान्य होता है।"
"ऐसे ही कोई भी साधक यदि स्वयं को स्वयं ही योगी घोषित करेगा, तो वह भी व्यर्थ है, जब तक कोई जीवित शरीरधारी गुरु जी उसको परीक्षा करके प्रमाणित न करें।"
"इसलिए किसी जीवित शरीरधारी योग्य गुरु जी के निर्देश आदेश में रहकर एकांत स्थानों में जाकर योगाभ्यास करें, तभी आप ऊंचे योगी बन पाएंगे, अन्यथा नहीं।" "और समाज भी आपको ऊंचा योगी तभी स्वीकार करेगा, जब कोई उच्च स्तर का प्रतिष्ठित योगी व्यक्ति आपको योगी के रूप में प्रमाणित करेगा।"
---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."
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