स्वराज का संविधान बनाम् वर्तमान संविधान..!!
✍️ ले. ए। एम। गौतम (BSc.MIT)
हमारे वर्तमान संविधान में छत्रपति शिवाजी द्वारा रक्षित व पुनर्व्यवस्थित स्वराज अर्थात् सनातन वैदिक राष्ट्र स्वीकृत जब तक नही हो जाता तब तक ये राष्ट्र परतंत्र है ।
वर्तमान सन्विधान की तुलना शिवछत्रपती महाराज के संविधान से होनेपर ही स्वराज को साकार करने वाली वैदिक राष्ट्र की सनातन अवधारणा जिसका वेदों से प्रादुर्भाव हुआ है उसका ग्रहण हो सकेगा। इस विस्मृतता को सत्य इतिहास के अध्ययन व प्रचार द्वारा सनातन जागरूकता हेतु उपयोग करना आवश्यक है। वर्तमान संविधान व शिवछत्रपती के संविधान की तुलना जनजागृति लाएगी। परतंत्रता को उजागर करेगी। दास को दासत्व का आभास कराना ही दासत्व से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। आज परतंत्र जनता को परतंत्रता का आभास ही नहीं है। इस तुलनात्मक अध्ययन से यह समझ आएगा कि कैसे आज सनातन धर्म का वैदिक सनातन स्वराज विलुप्त है व हिंदूत्व की राजनीति कैसे छद्म हिन्दू नेता है। जो कार्य जो कानून जो दशा जो स्थिति शिवछत्रपती के व्यवस्था में थी, प्रशासन मे थी राज्य में थी वो वर्तमान व्यवस्था में नदारद है। इसके विपरीत सेक्युलर शब्द प्रस्तावना मे डालकर सेक्युलरिज्म सनातनी जनता पर थोपकर इस राष्ट्र का विराष्ट्रियकरण किया गया है। भारत कहलाने वाले आर्यावर्त कहलाने वाले मनु, भरत से लेकर चंद्रगुप्तादि अन्यान्य राजाओ चक्रवर्तीयो समेत विक्रमादित्य, महाराणा, शिवाजी तक समृद्ध इस राष्ट्र का मूल ढांचा आज ध्वस्त कर दिया गया है। राष्ट्र की मूल संरचना को समाप्त किया जा रहा है व उसके रक्षार्थ वर्तमान संविधान प्रतिबध्द नही है। वो तो माइनॉरिटी के आरक्षण रक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं। हिंदू नष्ट हो रहा है। राष्ट्र का विराष्ट्रियकरण हो रहा है। गजवाएहिंद की ओर राष्ट्र बढ रहा है। हिंदू 11 से अधिक राज्यों में माइनॉरिट को प्राप्त हो चुके हैं। हिंदू रक्षा कथित हिन्दूवादी बीजेपी के काल में भी नह हो पा रही है।
शिवछत्रपती के Governance के राजव्यवहारकोष मे लिखा है -
कृते म्लेच्छोच्छेदे भुवि निरवशेषं रविकुला-
वतंसेनात्यर्थं यवनवचनैर्लुप्तसरणिम् |
नृपव्याहार्थं स तु विबुधभाषां वितनितुम्
नियोक्तोभूद्विद्वान्नृपवर शिवच्छत्रपतिना ||
या पृथ्वीतलावरून म्लेंच्छांचा पूर्ण उच्छद केल्यानंतर सूर्यवंशाला ललाभूत ठरलेल्या त्या छत्रपती शिवाजी राजांनी यवनांच्या भाषेने लोपून गेलेल्या राजव्यवहार पध्दतीचा संस्कृत भाषेतून प्रसार करण्यासाठी (रघूनाथ) पंडिताची नियुक्ती केली.
(इसका संदर्भ :- राजकोश. रघुनाथ नारायण हणमंते. संपादक :- अ.द. मराठे)
उपरोक्त संदर्भ में उद्धृत "पृथ्वीतलावरून म्लेंच्छांचा पूर्ण उच्छद केल्यानंतर" का आशय यह है कि शिवछत्रपती ने पृथ्वी पर से सभी म्लेच्छों का विनाश किया। इससे स्पष्ट है कि शिवछत्रपती महाराज मलेच्छक्षयदिक्षित के विरूद से विभूषित है। और उनके ऐसी अद्भुत संविधान उनकी नितीमत्ता, राष्ट्र रक्षा यह सबकुछ आज जीवंत है? आज का संविधान हमे हमारा तंत्र प्रदान करता है? संविधान भारत की राष्ट्र अवधारणा का रक्षक है कि भक्षक है? इसलिए संविधान आएंगे जाएंगे लेकिन ये राष्ट्र रहना चाहिए। अतः राष्ट्र की अवधारणा राष्ट्र का महत्व सर्वोच्च है। संविधान राष्ट्र के व्यवस्था व राष्ट्र के तंत्र की स्थापना द्वारा राष्ट्र रक्षार्थ रचा जाता है। जब संवैधानिक व्यवस्था द्वारा राष्ट्र का विराष्ट्रियकरण हो रहा हो, तब तो राष्ट्र परतंत्र है यह बताने की आवश्यकता किसी मुर्ख को ही होगी। बहोत ही सरलता से स्पष्ट है कि वर्तमान संविधान शिवछत्रपती का संविधान नही है। इसलिए स्वराज के मतवाले ये समझ जाए कि उनका स्वराज विनष्ट है। वे उसे पाने के लिए पुनः संविधान सभा बनाकर स्व + तंत्र की स्थापना करे। यही सनातन वैदिक राष्ट्र वा स्वराज का विचार है।
तुलनात्मक अध्ययन गुलाम को गुलामी का साक्षात्कार करा सकता है व छद्म वैदिक राष्ट्र की राजनीति को उजागर कर सकता हैं। यथार्थ मे ये प्रश्न हर सनातन राष्ट्रवादी के लिए आवश्यक है।
क्या वर्तमान संविधान में छत्रपति शिवाजी द्वारा रक्षित व पुनर्व्यवस्थित स्वराज अर्थात् सनातन वैदिक राष्ट्र मान्य है?
स्वयं को यह प्रश्न पुछे। फिर छत्रपति शिवाजी पर राजनीति करनेवाले शान्त क्यो? स्वयं को शिवभक्त बताने वाले वर्तमान व्यवस्था को शिवाजीकृत स्वराज मानते हैं?
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