कुतुबमीनार का इतिहास

#कुतुबमीनार

कुतुबमीनार के सम्बन्ध में भी पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं जिनसे सिद्ध होता है कि कुतुबमीनार एक ऐसा हिन्दू - स्तम्भ है जो कुतुबुद्दीन से सैकड़ों वर्ष पूर्व भी विद्यमान था , और इसलिए , इस स्तम्भ का निर्माण - श्रेय कुतुबुद्दीन को देना गलत है ।

(१) कुतुबमीनार के पार्श्व में बसी हुई नगरी महरौली कहलाती है । यह संस्कृत शब्द ' मिहिरावली ' है । यह उस नगरी का द्योतक है जहाँ सम्राट विक्रमादित्य के दरबार का विश्वविख्यात ज्योतिषी मिहिर अपने सहायकों , गणितज्ञों और तकनीक विशेषज्ञों के साथ रहा करता था । वे इस तथाकथित कुतुबमीनार का उपयोग नक्षत्र - विद्याध्ययन के लिए वेध - स्तम्भ के रूप में किया करते थे । इस स्तम्भ के चारों ओर हिन्दू राशिमण्डल के 27 तारकपुञ्जों के मण्डल बने हुए थे । कुतुबुद्दीन एक ऐसा उत्कीर्ण अंश छोड़ गया है जिसके अनुसार उसने इन 27 मण्डपों को ध्वस्त किया । किन्तु उसने ऐसा कहीं नहीं कहा कि उसने किसी स्तम्भ का निर्माण भी किया था । _ _ _

(२) इस तथाकथित कुतुबमीना से वि - स्थान हुए पत्थरों की एक ओर हिन्दू देवमूर्तियों और दूसरी ओर अरबी के अक्षर खुदे हुए हैं । उन पत्थरों को अब संग्रहालय में ले जाया गया है । यह स्पष्ट रूप में दर्शाता है कि मुस्लिम आक्रमणकारी लोग हिन्दू भवनों की प्रस्तर - सज्जा को हटाकर उसके ऊपर  अंकित चित्रादि को भीतर की ओर मोड़कर , बाहर की ओर दिखने वाले अंश पर अरबी भाषा के अक्षरों की खुदाई कर दिया करते थे ।

(३) अनेक खम्बों और दीवारों पर संस्कृत शब्दावली अभी भी परिलक्षित की जा सकती है । यद्यपि विद्रूप हो चुकी है तथापि भित्ति - शृंग में अभी भी अनेक देवमूर्तियाँ शोभायमान हैं ।

(४) यह स्तम्भ चहुँ ओर की गई निर्माण - संरचनाओं का एक अंश निश्चित रूप में ही है । ऐसी बात नहीं है कि पूर्वकालिक हिन्दू - भवनों के बीच में पर्याप्त खुला स्थान इसलिए था कि कुतुबुद्दीन आए और एक स्तम्भ बनाए ।

(५) इसकी दर्शनीय अलंकरण हिन्दू शैली सिद्ध करती है कि यह एक हिन्दू स्तम्भ है । मस्जिद की मीनारों का धरातल सपाट होता है । जो लोग यह तर्क देते हैं कि इस स्तम्भ की रचना तो मुस्लिम निवासियों को प्रार्थना के लिए बुलाने के उद्देश्य से आवाज़ देने के लिए हुई थी , उन लोगों ने कदाचित् ऊपर जाकर नीचे खड़े व्यक्तियों को पुकारने का भी प्रयत्न किया हो , ऐसा लगता नहीं । यदि उन्होंने ऐसा किया होता , तो उनको स्वयं ही ज्ञात हो जाता कि उस ऊँचाई से कोई भी व्यक्ति , जो पृथ्वी पर खड़ा हो , वह शब्द सुन ही नहीं सकता ।

(६) पूर्वकालिक हिन्दू - भवनों को मुस्लिम - निर्माण - कृति ठहराने के लिए ऐसे बेहदा दावे किए जा रहे हैं ! एक अन्य महत्त्वपूर्ण विचारणीय बात यह है कि स्तम्भ का प्रवेश - द्वार उत्तर की ओर है न कि पश्चिम की ओर जैसाकि इस्लामी मान्यता और अभ्यासानुसार आवश्यक रहा है । प्रवेश - द्वार के दोनों ओर ही प्रस्तुत पुष्प - चिह्न है ; ये भी सिद्ध करते हैं कि यह हिन्दू - भवन है । मध्यकालीन भवनों की हिन्दू - निर्माण संरचना में प्रस्तर पुष्पों की विद्यमानता एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण लक्षण है ।

(७) अपनी बनाई हुई इमारतों में मुस्लिम लोग ऐसे पुष्प कभी नहीं रखते । . स्तम्भ के ऊपर कार्निस के ठीक नीचे के भाग में नमूनों पर तोड़ फोड़ , अकस्मात् समाप्त करने अथवा असंगत पंक्तियों को असम्बद्ध रूप में मिला देने के स्पष्ट चिह्न हैं । अरबी - शब्दावली क्षतिग्रस्त अधोमुखी कमल शाश्वत वाणी की कलियों से अन्त : कीर्णित है ।

(८) कट्टर मुस्लिम और विद्वान् सर सैयद अहमद खान ने स्वीकार किया है कि यह स्तम्भ हिन्दू - भवन है ।

(९) पार्श्वस्थ तथाकथित कुवत - उल - इस्लाम का मेहराबयुक्त प्रवेशद्वार गुजरात के मन्दिरों के अलंकृत मेहराबों से युक्त द्वारों से किसी भी प्रकार भिन्न नहीं है । इस भवन के स्तम्भ के ऊपर कार्निस के ठीक नीचे के भाग में नमूनों में भी तोड़ - फोड़ के चिह्न स्पष्ट हैं जो सिद्ध करते हैं कि पूर्वकालीन मन्दिरों को मुस्लिमों के उपयोग में लाने के लिए मस्जिदों का रूप देने में पत्थरों को इधर - उधर करने में मुस्लिम शासकों को बड़ी हार्दिक शान्ति मिलती थी ।

(१०) स्तम्भ का घेरा ठीक 27 मोड़ों , चापों और त्रिकोणों का है । ये एक के बाद दूसरा , दूसरे के बाद तीसरा , तीसरे के बाद पहला - - इस क्रम से हैं । यह प्रकट करता है कि इस क्षेत्र में 27 के अंक का विशेष महत्त्व तथा उसकी प्रधानता रही है ।

(११) पहिले ही वर्णित 27 तारकपुंजों के मण्डपों के साथ इस पर विचारोपरान्त कोई सन्देह शेष नहीं रह जाता कि यह स्तम्भ भी नक्षत्रीय वेधस्तम्भ ही था ।

(१२)  ' कुतुबमीनार ' अरबी शब्द नक्षत्रीय ( वेधशास्त्र ) स्तम्भ का द्योतक है । सुल्तान कुतुबुद्दीन से इसको सम्बद्ध करने और दरबारी पत्राचार में इसके नामोल्लेख की यही कहानी है । समय व्यतीत होते - होते कुतुब - स्तम्भ के साथ कुतुबुद्दीन का नाम अनायास ही संलग्न हो गया , जिसने यह भ्रम उत्पन्न कर दिया कि कुतुबुद्दीन ने कुतुबमीनार बनवाई ।

(१३) स्तम्भ की संरचना में शिलाखण्डों को दृढ़ता से एक स्थल पर रखने के लिए लौह - पट्टियाँ प्रयुक्त की गई हैं । आगरा - दुर्ग की प्रस्तर - प्राचीरों में भी इसी प्रकार की लौह - पट्टियाँ प्रयुक्त हुई हैं । पुस्तक ' ताजमहल राजपूती राजप्रासाद था ' में  क़िले के मूल के सम्बन्ध में विशद विवरण प्रस्तुत किया है और यह सिद्ध किया है कि यह मुस्लिम - पूर्व काल में भी विद्यमान था । इस प्रकार यह स्पष्ट है कि बड़े - बड़े भवनों में विशाल शिलाखण्डों को सुदृढ़तापूर्वक एकत्र रखने के लिए हिन्दू लौह - पट्टियाँ
उपयोग में लाना हिन्दू प्राकार था । उस प्राकार का दिल्ली की तथाकथित कुतुबमीनार में उपयोग होना इस स्तम्भ को मुस्लिम - पूर्वकाल का सिद्ध करने वाला एक अन्य प्रमाण है ।

#निजामुद्दीन_दरगाह :

जिसे आज फ़कीर निजामुद्दीन की दरगाह समझा जाता है , यह वास्तव में एक पुराना मन्दिर है , जो मुस्लिम आक्रमणों में क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद हज़रत निजामुद्दीन की दरगाह बन गया , क्योंकि उस फ़कीर को उसकी मृत्यु के पश्चात् वहीं दफना दिया गया था । इस दरगाह के चारों ओर अगणित मात्रा में अन्य मण्डप , प्राचीरें , कळ , दुर्ग की दीवार के उभड़े हुए भाग , स्तम्भ , स्तम्भपीठें अभी भी देखी जा सकती हैं । ये वस्तुएँ सिद्ध करती हैं कि यह किसी समय समृद्ध नगरी थी जो पदाक्रान्त हुई और विजित हुई । ऐसे तहस - नहस किए गए क्षेत्रों में मुस्लिम फक़ीर जा बसते थे । बाद में उनको वहीं गाड़ दिया जाता था , जहाँ वे रहते रहे थे । इस प्रकार मुस्लिम फ़कीरों को दफ़नाने के स्थान मूल कब्रिस्तान नहीं हैं , अपितु वे पूर्वकालीन राजपूत भवन हैं जो बाद में मुसलमानों द्वारा बलात् इथिया लिये गए ।

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