किसने किया था अग्नि का अविष्कार
(१) हे अग्नि , ऋषि अथर्वन् ने कमल से मन्थन करके पुरोहित विश्व के सिर से तुम्हारा आविर्भाव किया ।
---------- - - - - - ऋ० 6 . 16.13
(२) #अथर्वन् द्वारा प्राविर्भूत हे अग्नि , पाप सभी स्तवनों के ज्ञाता हैं । पाप विवस्वत् के दूत हैं , यम के प्रिय सुहृद् हैं । यह स्तवन मापकी प्रसन्नता के लिए है । आप समर्थ हैं ।
--------------------- ऋ० 10 . 21 . 5
(३) हे अग्नि , विद्वान् अापका मन्वन करते हैं , जैसा कि अथर्वन् ने किया था । रात्रि के अन्धतमस् से , अनिश्चित रूप से विचरण करने वाले अग्नि का आविर्भाव वे विस्मयान्वित हुए बिना करते हैं ।
---------------------- ऋ- 06 . 15 . 17
#अथर्वन् , जिनको #अंगिरस् या #अथर्वाङ्गिरस भी कहा जाता है , अग्नि के पहले आविष्कारक हैं ।
(४) अगर मानव को सचमुच ही किसी आविष्कार पर गर्व हो सकता है , तो यह अग्नि का ही आविष्कार है । सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इस आविष्कार का ठीक - ठीक मूल्यांकन आज कठिन है , जब अग्नि आज सर्वसाधारण हो चुकी है और उसे पैदा करने के हमारे साधन इतने आसान हैं । किन्तु जरा उन दिनों की बात सोचिए , जब इस धरती पर अग्नि का आविर्भाव नहीं हुआ था और जब प्रकाश और ऊष्मा केवल सूर्य से ही प्राप्त होती थी ।
(५) अथर्वन् पहले प्राविधकर्ता के जीवन संबंधी ब्योरे हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं । हम उसके कई नामों से परिचित हैं । इनमें अथर्वन् या अथर्वा उनका निजी नाम है और अग्नि का आविष्कर्ता होने के कारण उनका नाम अंगिरस भी पड़ गया ।
(६) उनके नाम पर अग्नि का मन्थन करने वालों की पूरी की पूरी जाति प्रांगिरस नाम से विख्यात हुई , जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद की विभिन्न ऋचाओं से है । आगे चलकर हम उनका विस्तृत उल्लेख करेंगे । प्रोमैथ्यूज की कथा ग्रीक आख्यानों में एक प्रोमध्यज़ का उल्लेख मिलता है , जो अग्नि को स्वर्ग से चुराकर मत्युलोक में लाया था ।
(७) प्रोमैथ्यूज़ पुराणों या आख्यानों का नाम है , जब कि अथर्वन इतिहास पुरुष हैं । यह विश्वास करने का अाधार है कि प्रोमथ्यूज के नाम से संबद्ध पुराण - कथा का उद्भव भी भारत से ही हुआ और यहीं से वह कथा विदेशों में फैली ।
(८) स्वयं प्रोमैथ्यूज शब्द का उद्भव संस्कृत पद ' प्र + मन्थ ' से हुआ है , क्योंकि अग्नि का आविर्भाव पहले मन्थ की प्रक्रिया से किया गया था । इस सिलसिले में हम चम्बसं विश्वकोप से एक उद्धरण देंगे ' अग्नि के उद्भव - उत्पादन की अपेक्षा उसका धार्मिक इतिहास कहीं ज्यादा प्रच्छन्न है , यद्यपि हम देखते हैं कि सर्वत्र इस विषय के चारों घोर समृद्ध पुराण - कथाओं का ताना - बाना वुन दिया गया है ।
(1) प्राकृतिक शक्तियों के सभी प्रमुख उपादानों की भांति ही अग्नि को प्रारम्भिक दिनों में व्यक्तिस्वरूप मान कर उसकी पूजा की गई तथा व्यक्ति - स्वरूप या साकार मानकर देवत्व का पारोप करने की यही प्रक्रिया हमें अग्नि के पहले प्राविष्कर्ता के नाम के साथ ग्रीक प्रोमैथ्यूज , प्रारम्भिक पायों के ' प्र - मन्य ' और उनके चीनी समकक्ष मुय - जिन के साथ संबद्ध मिलती है । ' -
#चैम्बर्स_विश्वकोश :
' #फायर ' प्रोमैथ्यूज ग्रीक पुराण कथाओं का महान् सांस्कृतिक नायक है , जो टिटन पायापेटस और क्लाईमीन का पुत्र और एटलस मेनोहटस और एवीमैथ्यूज़ का भाई था ।
(2) #हैसोइड ने उसकी कथा इस प्रकार कही है : ' एक बार ज्यूस के शासन के अधीन देवताओं और मनुष्यों के बीच आपस में मैकोन में यह विवाद उठा कि बलि - पत्रों का कौन सा अंश देवताओं को अर्पित किया जाए । प्रोमैथ्यूज ने ज्यूस की परीक्षा की दृष्टि से एक बैल को काट कर उसके अंग के सर्वोत्तम अंश गोबर से ढांक कर एक ओर रख दिए , और दूसरी ओर हड्डियों को चर्बी से ढांक कर रख दिया । ज्यूस से चुनाव करने को कहा गया , किन्तु उसने जब यह कपट - जाल देखा , तो उसने मांस पकाने के लिए जरूरी अग्नि से जीवधारियों को वर्जित करके बदला लिया ।
तब प्रोमैथ्यूज ने अग्नि को एक खोखली नलिका में चुरा लिया और उसे उनके पास ले आया । ' ग्रीक प्रोमैथ्यूज ' का शब्दार्थ है ' पूर्व दृष्टि ' और एपीमथ्यूज ( प्रोमैथ्यूज का विपरीतार्थक शब्द ) का अर्थ है ' पश्चात् दृष्टि ' ।
(3) #अथर्वन् इस पर फैसिनेट की यह यापत्ति है कि ये लडरोन द्वीपवासी युरोपवासियों के आने से पहले पकाए हुए बर्तन बनाया करते थे और उनकी बोली में लपट , आग , चूल्हा , कोयला , पकाने और सेंकने के पर्यायवाची शब्द भी थे , हम यह भी कह सकते हैं कि उस देश में बहुत सी का और दूसरे अवशेष मिले हैं , जो वहां की पुरानी संस्कृति के निदर्शक मालूम पड़ते हैं ।
इसलिए यह प्रश्न अनिश्चित ही रहता है । हालांकि आग को न जानने वाली जाति की कल्पना में कोई बात असम्भव नहीं मालूम पड़ती , फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि इस तरह की किसी जाति का पता लगा लिया गया है । आग की पहली धारणा इस बात की जांच करना निरर्थक है कि किस तरह से आदमी ने आग का पता लगाया , उसे अपने नियंत्रण में लिया और समुचित साधनों से उसे पैदा करना भी सीखा । उसके प्राकृतिक तत्व और विभिन्न पहलुओं से वह शीघ्र ही परिचित हो गया होगा ।
(९) ज्वालामुखी से रात के अंधेरे में प्रकाश फैल जाता था और उसकी राख या उसका लावा नीचे मैदानों में दूर - दूर तक फैल जाता था । बिजली या उल्का पेड़ से टकराते थे और सारे जंगल में प्राग लग जाती थी , या किसी दूसरे कम प्रत्यक्ष कारण से कहीं न कहीं कुछ कम मात्रा में पाग जल उठती थी । हो सकता है कि कुछ समय तक प्रकृति का यह महान् स्वरूप लोगों में भय और शंका की ही भावना जागृत करता रहा हो , लेकिन आदमी में सतर्कता और सम्मान की भावनाओं के साथ - साथ उतनी ही जिज्ञासा की भावना भी है और चिर - परिचय ने आग के प्रति शीघ्र ही अवज्ञा नहीं तो विश्वास की भावना को तो जन्म दिया ही होगा । यह मान लेना बिल्कुल जरूरी नहीं है कि आग की व्यावहारिक खोज एक ही जगह पर और एक ही तरीके से की गई होगी , वस्तुतः यह ज्यादा संभव है कि विभिन्न जातियों - प्रजातियों ने आग का ज्ञान तरह - तरह से प्राप्त किया होगा ।
(१०) हम आज भी देखते हैं कि दुनिया के कई हिस्सों में लोग आज भी गरम सोतों , नाफया या पेट्रोल के कुओं और ज्वालामुखी की गम्य केटरों का लाभ उठाते हैं । उदाहरण के लिए तन्ना द्वीप में पोर्ट रिजोल्यूशन से पश्चिम में एक पहाड़ है , जिसके ज्वालामुखी पहाड़ होने के काफी प्रमाण मिलते हैं - जैसे दरारें , भाप के जैट , गरम सोते आदि ।
(११) रैवरेंड जार्ज टर्नर का कहना है कि वहां के निवासी इस खतरे से बिलकुल ही नहीं डरते और उनके घर इस तरह बने हैं कि उनका ' मुरुम ' या सार्वजनिक चौक पहाड़ की एक गरम जगह पर है , जहां वे उठते - बैठते हैं और धरती के भीतर की गरमी का लाभ उठाते हैं । कुछ सोतों का पानी तो उबाल आने जितना गरम होता है । कुछ जगहों पर पुरुष और लड़के चट्टानों पर खड़े होकर भालों से मछलियां फांस लेते हैं और उनको पीचे गरम सोतों में लटका देते हैं । न्यूजीलैंड के माओरियों और न्यू हैब्राइड्स के नीग्रो लोगों के बारे में भी ऐसे ही विवरण मिलते हैं ।
(१२) आग की खोज से पहले मनुष्य निर्धन और असहाय था । इस असहाय और निराश अवस्था के बीच यजुर्वेद की इस आशापूर्ण वाणी में किसी की आवाज गूंज उठी स्वर्ग तुम्हारी पीठ पर है , घरती तुम्हारा , माधार है , वायु तुम्हारी मात्मा है और समुद्र तुम्हारी योनि है ।
____( यजु० 11 . 20)
उसने यह सलाह सुनी । आदमी ने न केवल लकड़ी से आग का मन्थन अथर्वन किया , उसने उसे धरती से खोदकर , पत्थरों में से , वज ( चकमक पत्थर ) से भी निकाला ।
(१३) इस प्रसंग में यजुर्वेद के नीचे लिखे मंत्र महत्वपूर्ण हैं :
(1) जब हम धरती को खोदकर उसकी गोद से अग्नि निकालें तो वह हमारे अनुकून हो।
______________( यजु 11 . 21)
(2) वहाँ से हम अग्नि को खोदें , जो देखने में सुन्दर है , और हम उच्चतम आधार तक , स्वर्ग तक चढ़ ।
______ ________(यजु० 11 . 22)
(3) जैसा अंगिरस् करते थे , वैसे ही हे पुरीष्य अग्नि , मैं धरती से तुमको खोदकर निकालता हूं ।
__________ यजु० 11 . 28
(4) इस प्रकार अंगिरस न केवल लकड़ी से अग्नि पैदा करते थे , बल्कि वे उसे पत्थरों से या धरती से भी निकालते थे । दोनों स्रोत इन दो शब्दों से जुड़े ( एक ) #अग्निमन्यन या रगड़ द्वारा आग पैदा करना - जब आग लकड़ी से पैदा की जाती थी ।
(5) ( दो ) अग्निखनन धरती से आग को खोदकर निकालना - जब आग पत्थर , सख्त मिट्टी या चकमक पत्थर से पैदा की जाती थी ।
आगे चलकर हम खुदाई के उन साधनों को देख सकते हैं , जो वैदिक युग में मुख्यतः जड़ी - बूटियों के खोदने के ही लिए प्रचलित थे ।
अंगिरसों सम्बन्धी इस विवरण के अन्त में मैं ऋग्वेद के ऐसे कई मंत्रों का उल्लेख करूगा , जो अंगिरसों के कार्य क्लाप से सम्बद्ध अनेक घटनाओं के बारे में हैं । हम नहीं जानते कि इन मन्त्रों का असली अभिप्राय क्या है , क्योंकि मुल वैदिक शब्दावली के साथ आज हमारा कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं रहा है । व्याख्याकारों ने जगह - जगह पर अनेक कथासूत्रों से इनको जोड़ा है , जो कई जगह पर असली अर्थ से जरा भी संगत नहीं मालूम पड़ते।
इस प्रकार ऋषि अंगीरस द्वारा ही अग्नि की उत्पत्ति करने का सफल प्रयास हुआ था।
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