मुसलमान और आर्य शास्त्र
जिसको इन बातों के जानने की न तो फुरसत है न ज़रूरत है , उसे नहीं मालूम कि हमारी वास्तविक दशा क्या है , हमारा प्राचीन वैदिक धर्म क्या है और हमारा प्राचीन आर्य आदर्श क्या है । किस प्रकार शास्त्रों में आसुरी बातों का प्रक्षेप किया गया है यह भी ज्ञात नहीं है।
इन आक्रमण जातियों के अतिरिक्त हिंदुओं की अन्य शाखाओं ने भी शास्त्रविध्वंस की हत्या से अपने को पाक नहीं रक्खा । ब्राह्मण , क्षत्री , वैश्य और शूद्रों ने मनमाना साहित्य रचा है और पुराने साहित्य में मिश्रण किया है । सबके सामने देखत देखते ५० वर्ष के अन्दर ही तुलसीकृत रामायण में इतना अधिक क्षेपक घुस गया है कि , असली पथ पहिले से दूना हो गया है और सात कांड के नो दश कांड हो गए हैं ।
तीन सौ वर्ष में एक हिंदी पुस्तक का जब यह हाल है , ता हजारों वर्ष की पुरानी संस्कृत की पुस्तकें जिनका सम्बन्ध धर्म , इतिहास और स्वास्थ्य आदि से है और जो आर्यजाति का जीवन हैं , कितनी दूषित की गई होंगी , कोन जान सकता है ?
इन हिंदू नामधारी शास्त्रविध्वंसको के अतिरिक्त मुसलमानों का राज्य इस देश में बहुत दिन तक रहा है । उन्होंने भी इस देश के हिंदुओं में अत्याचारीयों के साथ इसलाम गिरोह के प्रचार का बहुत प्रयत्न किया है । उनका धर्मप्रचार अत्याचार और जुल्म के साथ था । पर उनका जुल्म बहुत प्रचार नहीं कर सका ।
#अलताक_हुसेन_हाली कहते हैं कि
वो दिने हुजाज़ी का बेबाक बेड़ा निशॉ जिसका अक़साय आलम में पहुँचा ।
न जैहूं में अटका न फुलज़म में झलका मुकाविल हुआ कोई खतरा न जिसका ।
किये पै सिपर जिसने सातों समन्दर वो हूबा दहाने में गंगा के आकर ।
#अर्थात् इसलाम ने तलवार के ज़ोर से सातों समुद्रों को फ़तेह कर लिया , पर वह इस लाम का बेड़ा गंगा के निकास में आकर डूब गया ।
सच है , इसलाम की तलवार ने जिस देश में प्रवेश किया , उस देश को इसलाम करके ही छोड़ा । काबुल , ईरान , अरब , तुर्क , पोर्तुगाल , स्पेन , मिश्र , अफ़रीना , रूस और चीन तक जहाँ कहीं प्रचार हुआ , बस देश का देश इसलाम में आ गया । किंतु यह एक भारतवर्ष ही है , जहाँ सैंकड़ों वर्षों तक लगातार तलबार चली , पर सिवा थोड़ी सी नीच कौमों के भले आदमी अधिक मुसलमान नहीं हुए ।
जब जुल्म से काम न चला , तो वही पुराना सिद्धान्त काम में लाया गया । अर्थात् कुछ बातें इधरउधर की लेकर नये नये रूप से मुसलमानों ने हिंदू साहित्य को गन्दा करना शुरू किया और खुद उनके गुरु बनकर उनमें अपने विचार स्थापित करने का प्रयत्न करने लगे ।
यहाँ हम वही सब बातें सारांशरूप से दिखलाने का यत्न करते हैं । हम यह नहीं लिखना चाहते कि मुसलमान ज़ालिमों ने अपने शासनकाल में इस देश के निवासियों के साथ क्या क्या व्यवहार किया । हम तो यहाँ केवल यह दिखलाना चाहते हैं कि , उनके प्रभाव से यहाँ का संस्कृत साहित्य किस प्रकार नष्ट हुआ और वैदिक धर्म में कितना धक्का पहुँचा ।
सभी जानते हैं कि संस्कृत के लाखों ग्रंथ वर्षों तक मुसलमानों के हम्मामों में जलते रहे हैं और उदन्तापुरी आदि के नौ नौ मंजिल ऊँचे पुस्तकालय बात की बात में भस्म कर दिये गये हैं , पर यह समग्र वृत्तान्त लिखकर हम ग्रंथ को बढ़ाना नहीं चाहते । क्योंकि पाठकों से कुछ छिपा नहीं है और न सब कागजपत्र और इतिहास कहीं चला ही गया है । इसलिए हम यहाँ केवल यही दिखलाना चाहते हैं कि , मुसलमान जाति ने जब अपने कठोर शासन से भी हिंदुधर्म का नाश न कर पाया , तो उसने अपने सिद्धान्त संस्कृत भाषा में लिखवाना शुरू किया और अपना एक दल अपने से अलग करके हिंदुओं का गुरु बनने के लिए कायम किया ।
एक तरफ तो मुसलमान अपने प्रचार के लिए इस तरह साहित्य नष्ट करने लगे और दूसरी तरफ़ हिंदुओं ने मुसलमानी अत्याचार से पीड़ित होकर उनसे बचने के लिए खुद भी नवीन नवीन रचना करके शास्त्रों में मिश्रण करना शुरू कर दिया । इस तरह से इन दो तीन मार्गों के द्वारा हिंदुओं का साहित्य बिगड़ने लगा ।
यहाँ हम पहिले नवीन रचना के प्रमाण उपस्थित करते हैं । नवीन रचना में #अल्लोपनिषद् विशेष उल्लेखनीय है । क्योंकि यह सभी जानते हैं कि अल्लोपनिषद् मुसलमानों की ही रचना है । यहाँ हम उसे ज्यौ का त्यो उद्धृत करते हैं :
"अस्माल्लां इल्ले मित्रावरुणा दिव्यानि पसे । इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्ददुः । हयामित्रो इल्ला इल्लल्ले इल्लां वरुणो मिनस्तेजस्कामः ॥ १ ॥
होवारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महा सुरिन्द्राः । अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्ण ब्रह्माणं अल्लाम् ॥२ ॥
अल्लो रसूल महामदरकबरस्य अल्लो अल्लाम् ॥३ ॥
आदल्ला बूक मेककम् । अल्लबूक निखादकम् ॥४ ॥
अलो यझेन हुत हुत्वा । अल्ला सूर्यचन्द्रसर्वनक्षत्राः ॥५ ॥ अल्ला ऋषीणां सर्वदिव्यां इन्द्राय पूर्व माया परममन्तरिक्षा ॥६ ॥
अल्लः पृथिव्या अन्तरिक्षं विश्वरूपम् ॥७ ॥
इल्लांकबर इल्लांकबर इल्लां इल्लल्लेति इल्लल्लाः ॥८ ॥
ओम् अल्ला इल्लल्ला अनादि स्वरूपाय अथर्वणा श्यामा दुह्री जनान पशून सिद्धान जलचरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट ॥९ ॥
असुरसंहारिणी हूं ही अल्लो रसूल महमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम् इल्लल्लेति इल्लल्लाः ।।१० ॥
#इति_अल्लोपनिषत् ॥"
इसको पढ़कर कौन कह सकता है कि , यह मुसलमानों की रचना नहीं है अथवा यह बिना उनकी प्रेरणा के बना है !
इसके अतिरिक्त यूनानी वैद्यक को भी संस्कृत में लिखवाकर हिंदू जनता में मुसलमानी हिकमत के प्रचार का उद्योग किया गया है । यहाँ हम उसका मी एक नमूना दिखलाते हैं । वैद्यक का एक ' अभिनव निघण्टु ' नामी ग्रंथ है । यह ग्रंथ बंबई में पं ० दत्ताराम रामनारायण चौबे के तत्त्वविवेक प्रेस में छपा है इसके श्लोक इस प्रकार है
दोषः खिल्त इति प्रोक्तः स चतुर्द्धा निरूप्यते ॥ सौदासफरा तथा बलगम् तुरीयं खून उच्यते ॥
तबियत् कैफियत कुब्वत खामियच्च चतुष्टयम् ।
निखिलं द्रव्यसंज्ञेयमल्यं किंवाप्यनल्पकम् ॥
अपरामुसहिलनाम्नी इसहालरेचनं विशः ।
नौमनिद्रा ममाख्यात मुनक्कम तद्विधायनी ॥
खुशी ईत् प्रसाद ; स्यान्मनसौदेहपाटबम् ।
उभयं विदधात्येषा मुफ़रह सा प्रकीर्तिता ॥
दिमाग दिल जिरं मादा एतदंगचतुष्टयम् ।
आज़ाय रईस इत्युक्तं श्रेष्ठ , देहे शरीरिणाम् ।।
यहाँ इनके अर्थ करने की आवश्यकता नहीं है । इनके शब्दों से ही ज्ञात हो रहा है कि , इनमें यूनानी हिकमत की बातें भरी हुई है और इनके प्रचलित करनेवाले मुसलमान हैं । जिस तरह वैद्यक में हिकमत का मिश्रण किया गया है , उसी तरह ज्योतिष में भी इसनमी तत्त्व दाखिल करने का प्रयत्न हुआ है ।
खोज करनेवाले जानते हैं कि फालित ज्योतिष् का प्रचार विदेशी है । वह इस देश में यूनान से ही आया है । पारसियों और मुसलमानों का उस पर अधिक विश्वास है । लखनऊ के नवाब तो विना ज्योतिष का मुहूर्त दिखलाए छोटे छोटे काम भी नहीं करते थे - झाड़ और पेशाब को भी नहीं जाते थे । उसी फलित को मुसलमानी भाषा में संस्कृत मिलाकर किस प्रकार हिंदुओं में दाखिल किया गया है , उसका भी एक नमूना यहाँ हम दिखलाते हैं ।
नवाब खानवान की ' खेटकौतुक ' नामी एक छोटीसी पुस्तिका है । उसको पं ० गमग्न वाजपेयी ने लखनऊ में छापा है । उसमें लिखा है कि
यदा माहतायो भवेत्माल खाने मिरीखोथवा मुश्तरी वख्तखाने । अतारिद्विलग्ने भवेदख्श पूर्ण भवहानदारोथवा वादशाहः ॥ १ ॥
भवेद्दाफतायो यदा षष्टखान पुनदैत्यपीरोथ केन्द्र गुरुवा । सुजातः शुतुफलताज्यो हय ढ्या जरी जर्जरावश्यदात : चिरायुः ॥ २ ॥
यदा चश्मखारा भवेद्देस्त खाने ततो मुश्तरी दोस्त खाने बिलग्नात् । अतारिद्धनस्थो बृहत्माहियी स्यात् बृहत सूर्य मखमल खजानाश्वपूर्णः ॥५ ॥
तृतीय भवद्दाखतायस्य पुत्रो यदा महाताबस्य पुत्रो विलग्ने । भवन्मुश्तरी केन्द्रखाने नराणां बृहत साहिबी तस्य तालेरुजु स्यात् ॥ ४ ॥
यदा मुश्तरी पंजबाने मिरीखो यदा बख्नखाने रिपो आफ़ताबः । नरो बाबकूफो भवत्कुंजरेशो बृहद्रोसनोवाहिनी वारणाढ्यः ॥ ६ ॥
अताारद् विलने सुख माहताबो गुरुस्स्वपर्खाने तमो लाभवाने जहानस्य धूरी भवन्नेकवख्तः खजानागजाव्यो मुलुक साहित्री स्वात् ॥७ ॥ यदा देवपीरी भवन्दख्तखाने पुनदैत्यपीरोथवा स्वपरखाने । बातरिद्विलनं तृतीये मिरीखः शनिलाभखाने नरः काबिलः स्यात् ॥ ८ ॥
महल माहताबो व्यये अफताबो यंदा मश्तरी केन्द्रखाने त्रिकोणे । भवेन्मानवो देवतेजस्कराख्या बृहत् साहियो बख्तखूबी कमालः ॥ खजानागजाच्या भवेल्लश्कर व्यः महानप्रियो मुश्तरी जायखाने । मिरीखोथ लाभे बुध : पंजखाने शनिः शत्रुखाने नरः काबिलः स्यात् ॥९ ॥
कमर केन्द्रखाने शनिः शत्रुखान त्रिकोणेथवा मुश्तरी पश्मखोरी । स जाता नरो साविस सद्गुणज्ञो भवेत् शायरो मालदारोथ खूबी ॥ १० ॥
इस श्लोकों का भी अर्थ करने की आवश्यकता नहीं है । इनमें आये सुए फारसी शब्दों से ही ज्ञात हो रहा है कि , इनमें मुसलमानों के नजूम का वर्णन है ।
इसके अतिरिक्त इस्लाम प्रचार के लिए उमिश्रित अन्य लाक भी ऐसे ऐसे बनाये गये हैं , जिनसे उनके अल्लाह की भक्ति की जा सके । यहाँ हम नमून के लिए इस तरह का भी एक श्लोक लिखते है
हेच फिक्रमत्कर्तव्यं कर्तव्यं ज़िकरे खुा । खुदातालाप्रसादेन सर्वकार्य फतह भवेत् ।
इस तरह से मुसलमानों ने संस्कृत भाषा के द्वारा अपने भाव , अपने विचार और अपने विश्वासों को हमारे भावों , विचारों और विश्वासों में भरा है और हमारी संस्कृति में सोम पैदा कर दिया है । इसी तरह उनके दूसरे दल ने गुरु बनकर और देशी भाषा में नये नये अन्य रचकर भी हिन्दुओं के विश्वासों में बहुत सा अन्तर पैदा कर दिया है ।
मुमलमानों का दल जो हिंदुओं का गुरु बनने चला था , वंशपरंपरा से अब तक मौजूद है । बंबई निवासी सर आगा.खा उसी गद्दी के वर्तमान आचार्य आर इस समय भी कई लाख हिन्दुओं के गुरु हैं । गुजगत , सिंध और पंजाब में लखो अआदमी उनके चेले हैं आर हर साल कई लाख रुपया दशांश के नाम मे उनक पास पहुंचाते हैं ।
उनके ग्रन्थ सिन्धी , पंजाबी और गुजराती भाषा की एक मिश्रित भाषा में लिख गये हैं । उन ग्रथों में लिखा है कि , अथर्ववेद से हमारा धर्म चला है । उन्होंने इस अथर्ववेद का सिलसिला अगे चलकर कुरान मे जोड़ दिया है । इसी तरह उम आदि मुसलमान को कलकी अवतार माना गया है , जिसकी गद्दी पर इस समय सर अग़ खा साहब विराजमान हैं । इनका सिलसिला किमी तरह हज़रत मुहम्मद से भी जा मिलाया गया है । इस धर्म मे ' गाय खाना और पाल्ना दोनों लिखा है ।
इस प्रकार कयी सारे उदाहरण दिए जा सकते हैं लेकिन इस पोस्ट में इतना ही.... यदि और ऐसी जानकारी चाहिए तो कमेंट बॉक्स में अवश्य बताए। जय आर्यावर्त 🚩
(❌ref. :- I don't mean to say that forgeries are not sometimes com mitted ; or that books are not counterfeited , in whole or in part . Sir W. Jones and Mr. Bluquiere and myself have detected interpolations . Many greater forgeries have been attempted ; rome have for a time succeeded and been ultimately discovered ; in regard to others detection has immediately overtaken the fraudulent attempt . A conspicuous instance of systematic fabrication by which Captain Wilford was for a time deceived , has been brought to light as has been fully stated by the gentleman . But though some attempts have been abortive , others may doubtless have succeeded . Soune fabricated works , some interpolated pages will be detected by the sagucity of critics in the progress of researches into the learning of the East , but I don't doubt that the Vedas will appear to be of this description .)
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✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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