हमारे देश में अनेक गौरवपूर्ण सूक्तियों का स्रोत मनुस्मृति नामक महान ग्रन्थ है।

हमारे देश में अनेक गौरवपूर्ण सूक्तियों का स्रोत मनुस्मृति नामक महान ग्रन्थ है ।
 
➡️जैसे , #धर्मो_रक्षति_रक्षितः । लोग इसे इस संक्षिप्त रूप में ही जानते हैं । जबकि इसका पूरा श्लोक और भी गम्भीर अर्थ रखता और कालजयी साबित हआ है ।
पूरा श्लोक इस प्रकार है -

#धर्म_एव_हतो_हन्ति_धर्मो_रक्षति_रक्षितः ।
#तस्माद्धर्मो_न_हन्तव्यो_मा_नो_धर्मो_हतोऽवधीत ॥

अर्थात मरा हआ धर्म मारने वाले का नाश , और रक्षित किया हआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है इसलिए धर्म का हनन कभी न करो , ताकि मारा हआ धर्म हमें न मार डाले ।

 यह कोई अकेला श्लोक नहीं , #मनुस्मृति के आठवें अध्याय में सभी श्लोक इसी बिन्दु पर हैं , जिन्हें पढ़कर कोई स्वयं देख सकता है कि उनमें से किसी एक की भी मूल्यवत्ता आज भी कम नहीं हुई है । उसे आज बेकार मानना तो दूर रहा ।

➡️उसी तरह , मनुस्मृति की एक अन्य प्रसिद्ध उक्ति है  -

#यत्र_नार्यस्तु_पूज्यन्ते_रमन्ते_तत्र_देवता।

पुनः यह श्लोक , बल्कि इस विषय पर भी पूरी श्लोक - श्रृंखला जिस उदात्त दर्शन की झलक देती है , वह पश्चिमी चिन्तन में आज भी नहीं मिलेगी । आज के किसी भी #फेमिनिस्ट लेखन - दर्शन में जो बातें आती हैं , उससे कहीं बढ़कर मनुस्मृति में नारियों के सम्बन्ध में चिन्ता और व्यवस्था दी गई है ।
➡️उदाहरण के लिए , इसी उक्ति का पूरा श्लोक पढ़कर देखें , जिसे कम ही लोग याद करते हैं । उसकी अगली पंक्ति है ,
#यत्रैतास्तु_न_पूज्यन्ते_सर्वास्तत्राफलाः_क्रियाः
'अर्थात् , जहाँ उनका आदर नहीं होता , वहाँ किए गए कार्य सफल नहीं होते ।'

➡️स्त्रियों को नीचा समझने या निरादर करने के विरुद्ध क्या इससे बढ़कर कोई #चेतावनी या #भर्त्सना हो सकती है ?

➡️ मनुस्मृति ऐसी अनमोल शिक्षाओं से भरी पड़ी है । पर स्वतन्त्र भारत का दुर्भाग्य , कि इसे पढ़ने - गुनने के बदले केवल और केवल इसकी भर्त्सना की जाती है !

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घोरी के आदेश पर पृथ्वीराज के मन्त्री #प्रतापसिंह ने पृथ्वीराज को 'इस्लाम्' धर्म का अङ्गीकार करने के लिये समझाया। "घोरी का वध करना चाहता हूँ" ऐसा पृथ्वीराजः ने प्रतापसिंह को कहा। पृथ्वीराज ने आगे कहा कि, मैं शब्दवेध बाण चलाने को सक्षम हूँ। मेरी उस विद्या का मैं प्रदर्शन करने के लिये सज्ज हूँ। तुम किसी भी प्रकार घोरी को मेरी विद्या का प्रदर्शन देखने के लिये तत्पर करो। तत्पश्चात् राजसभा में शब्दवेध बाण के प्रदर्शन के समय घोरी कहाँ स्थित है ये मुझे कहना। मैं शब्दवेधी बाण से घोरी का वध करअपना प्रतिशोध लूँगा।

परन्तु प्रतापसिंह ने #पृथ्वीराज की सहयता करने के स्थान पर पृथ्वीराज की योजना के सन्दर्भ में घोरी को सूचित कर दिया। पृथ्वीराज की योजना के विषय में जब घोरी ने सुना, तो उसके मन में क्रोध के साथ कौतूहल भी उत्पन्न हुआ। उसकी कल्पना भी नहीं थी कि, कोई भी अन्ध व्यक्ति ध्वनि सुनकर लक्ष्य भेदन करने में सक्षम हो सकता है। परन्तु मन्त्री ने जब बारं बार पृथ्वीराज की निपूणता के विषय में कहा, तब घोरी ने शब्दवेध बाण का प्रदर्शन देखना चाहा। घोरी ने अपने स्थान पर लोहे की या पथ्थर की एक मूर्ति स्थापित कर दी थी। तत्पश्चात् प्रतापसिंह ने सभा में पृथ्वीराज के हाथ में धनुष्काण्ड ‍‌(धनुष और तीर) दीये। घोरी ने जब लक्ष्य भेदने का आदेश दिया, तब अनुक्षण ही पृथ्वीराज ने बाण चला दिया। उस बाण से उस मूर्ति के दो भाग हो गये।

देशद्रोह होने से सम्राट #पृथ्वीराज का अन्तिम प्रायस भी अपि विफल हो गया। हसन निजामी के वर्णन अनुसार, उसके पश्चात् क्रोधित घोरी ने पृथ्वीराज की #हत्या कर देने का आदेश दिया। उसके पश्चात् एक मुस्लिम सैनिक ने रत्नजडित सुवर्णयुक्त एक असि ‍‌(तलवार) से पृथ्वीराज की हत्या कर दी। इस प्रकार अजयमेरु ‍‌(अजमेर) में पृथ्वीराज की जीवनलीला समाप्त हो गई । उसके पश्चात् उनका और्ध्वदैहिक संस्कार ‍‌(अन्तिम संस्कार) अजयमेरु में ही उनके अनुज ‍‌(छोटे भाई) हरिराज के होथों हुआ ।

“ एक एव सुहृद्धर्मो निधानेऽप्यनुयाति यः ।
शरीरेण समं नाशं सर्वं अन्यद्धि गच्छति । । ८.१७ । । #मनुस्मृतिः”

अर्थात्, धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मरण के पश्चात् भी साथ जाता है। अन्य समस्त वस्तूएँ शरीर के साथ नष्ट हो जाती है।

डॉ बिन्ध्यराज का मत है कि, पृथ्वीराज ने उक्त श्लोक का अपने अन्तिम समय पर्यन्त बहुधा पालन किया। इस तरह हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने भी मनुस्मृति से महान प्रेरणा लेकर उस अनुसार अपना चरित्र की रचना की। 

कितना दुःखद है कि सन् 1947 के बाद पहले तो हमने      #मनुस्मृति को अपने महान शास्त्रों को शिक्षा  से ही बाहर कर दिया । फिर उस पर विदेशियों , कम्युनिस्टों या राजनीतिक एक्टिविस्टों की नासमझ निन्दा से प्रभावित हो उसे त्याज्य बना लिया । यहाँ तक कि कुछ लोगों द्वारा मनुस्मृति जलाने का मूर्खतापूर्ण अनुष्ठान चलता है । प्रश्न है , कि ऐसा करने के बदले या पहले कभी उस पर गम्भीर , आलोचनात्मक विचार - विमर्श क्यों नहीं हुआ ? वस्तुतः इस महान पुस्तक को जलाने वाले , तथा उसे जलता देखने वाले , दोनों तरह के भारतीय भारी अज्ञानी और असावधान हैं । वे शत्रुओं के हाथों खेल रहे हैं । जितने भी आलोचकों , निन्दकों से पूछे कि क्या उन्होंने मनुस्मृति स्वयं उलट कर पढ़ी है , और उसमें कोई गन्दी , उत्तेजक या अनुचित बात पाई है ? तथा , दूसरों द्वारा भी बताया गया ऐसा कोई अनुपयुक्त श्लोक या सन्दर्भ उन्हें याद है , जिससे वे पुस्तक को निन्दनीय समझें ? लगभग सभी उत्तर ना में देंगे । मगर कहेंगे कि , ' सुना है उसमें शूद्रों या स्त्रियों के बारे में कुछ आपत्तिजनक है । ' सच्चाई यह है कि यदि शीर्षक हटाकर मनुस्मृति को किसी भी शिक्षित , विचारवान समूह को पढ़ने दिया जाए , तो अधिकांश उसे महान ग्रन्थ मानेंगे । मनुस्मृति में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है । न वह कभी , किसी राजा का ' कानून ' था , जो प्रायः मान लिया जाता है । भारतीय मनीषा में वह उसी प्रकार ज्ञान , धर्म , विचार और चिन्तन का एक समादृत ग्रन्थ रहा है जैसे वेद , उपनिषद् , महाभारत , आदि दर्जनों और भी रहे हैं । उनकी बातें कभी , किसी पर बाध्यकारी न थीं । लोग उनकी उपयोगिता से उनका आदर करते रहे , पढ़ते - पढ़ाते रहे । आज भी वही स्थिति है । फिर भी तर्क के लिए , यदि मान भी लिया जाए कि मनुस्मृति में कोई अनुपयुक्त बात है , तब भी उसकी समालोचना पर्याप्त होती । आखिर वह कम - से - कम चार हजार वर्ष पुरानी पुस्तक है ! उस काल में इतना गहन चिन्तन पूरे विश्व में कहाँ था ? यूरोप , अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया तब जंगली अवस्था में थे , जब यहाँ ऐसे शास्त्र रचे गए , जिनकी बातें आज भी चमत्कृत करती हैं ।
➡️ जरा ' मनुस्मृति ' पढ़कर तो देखें ! वैसे भी , आज के नजरिए से किसी पुरानी पुस्तक में कोई नापसन्द बात मिलने पर भी उसे अपमानित करना हर हाल में गलत है । इसीलिए ' ओल्ड टेस्टामेंट ' या ' कुरान ' जैसे प्राचीन ग्रन्थों को सम्मान दिया जाता है , जबकि उसमें अनबिलीवर , पगान या दूसरे धर्म - विश्वासियों के लिए अत्यन्त अपमानजनक बातें लिखी मिलती हैं । उस दृष्टि से आज दुनिया में कम - से - कम चार अरब लोग अनबिलीवर , पगान , काफिर , आदि हैं ।

➡️तो क्या इन चार अरब अनबिलीवरों , पगानों , काफिरों को उन पुस्तकों को जलाने का अधिकार है ? हर संजीदा व्यक्ति कहेगा । बिल्कुल नहीं । तब वही संजीदगी मनुस्मृति के लिए क्यों नहीं दिखाई जाती ? जिसमें किसी के लिए भी वैसा कुछ लिखा भी नहीं है । यह कोई पाठक स्वयं देख सकते हैं ।

➡️मनुस्मृति के 12 अध्यायों में कुल 1214 श्लोक हैं । इनमें क्रमशः सृष्टि , दर्शन , धर्म - चिन्तन , सामान्य जीवन के विधि - विधान , गृहस्थ - जीवन के नियम , स्त्री , विवाह , राज्य - राजा सम्बन्धी परामर्श , वैश्य - शूद्र सम्बन्धी कर्तव्य , प्रायश्चित , कर्मफल विधान ,मोक्ष और परमात्मा चिन्तन है ।

➡️ कुछ प्रकाशनों में मनुस्मृति में इसके दुगने से भी अधिक श्लोक मिलते हैं । किन्तु इनमें कई स्पष्टतः प्रक्षिप्त माने गए हैं , यानी जो मूल श्लोकों से टकराते हैं । आधिकारिक विद्वानों के अनुसार अनेक प्रकाशनों में आधे से अधिक श्लोक मूल मनुस्मृति के नहीं हैं । इसके अलावा यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्वामी दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानन्द की तमाम शिक्षाओं , सेवा और जीवन - कर्म का आधार वेद , उपनिषद् और मनुस्मृति हैं ।

➡️अर्थात् , सम्पूर्ण भारतीय समाज की जो सेवा इन महापुरुषों ने की , जिसके लिए देश उन्हें कृतज्ञता से नित्य स्मरण करता है , उसकी प्रेरणा उन्हें वेदान्त और मनुस्मृति से ही मिली है ।
➡️स्वामी दयानन्द का सत्यार्थ #प्रकाश_मनुस्मृति के उदाहरणों से भरा पड़ा है । तो स्वामी दयानन्द और स्वामी विवेकानन्द ने मनुस्मृति को अधिक समझा था या आज के हमारे नासमझ #एक्टिविस्ट , जो समाज को तोड़ने , लड़ने के लिए ( बिना पढ़े ! ) मनुस्मृति पर नियमित कालिख पोतते रहते हैं ?

➡️स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मनुस्मृति को अपने उपदेश और समाज - सुधार का आधार बनाया था । यदि मनुस्मृति जातिवादी , शूद्र - विरोधी या स्त्री - विरोधी होती , तो वे सम्पूर्ण भारत में इतना बड़ा आधुनिक , समतामूलक , प्रभावशाली सुधार और चेतना का अखिल भारतीय गौरवशाली आन्दोलन चलाने में कैसे सफल हुए होते ? याद रहे , उनके कार्य को ही आधुनिक भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन का बुनियादी आधार माना जाता है । उनकी संस्था आर्य समाज ने जितनी बड़ी संख्या में निःस्वार्थ स्वतन्त्रता सेनानी दिए , उतने काँग्रेस ने भी नहीं दिए ।
➡️ अमर बलिदानी #भगत_सिंह का परिवार भी आर्य समाजी था । यह सब प्रामाणिक इतिहास भुलाकर , केवल विदेशी मिशनरियों के दुष्प्रचार से प्रभावित होकर यहाँ अनेक लोगों ने भ्रमवश या जान - बूझकर मनुस्मृति को निशाना बना रखा है । यहाँ तक कि ' मनुवाद ' नामक एक गाली तक गढ़ ली ! वे कभी नहीं सोचते कि मनुवाद क्या कोई वाद भी है या कभी भी था ?

➡️उदाहरण के लिए , क्या किसी हिन्दू राजा या सम्राट ने मनुस्मृति को कभी अपने शासन या कानून का आधार बनाया था ? तब मनुस्मृति को ' हिन्दू कानून ' क्यों कहा जाता है ? निस्सन्देह , मनुस्मृति की निन्दा करने वाले शायद ही उसे पढ़ने , उसकी व्याख्याएँ या अन्य जानकारी पाने , सोच - विचार करने की कोशिश करते हैं । यदि ऐसा करें , तो उसके प्रति नकारात्मक धारणा वैसे भी बदल जाएगी । केवल राज्य - शासन सम्बन्धी उसके तीन अध्यायों के 574 श्लोक अत्यन्त गम्भीर ज्ञान - भण्डार हैं । उनमें अधिकांश आज भी मूल्यवान प्रतीत होते हैं । मनुस्मृति की अधिकांश निन्दा मनमानी कल्पनाओं , सुनी - सुनाई और गढ़े गए तों पर चलती है । यह स्वतन्त्र भारत की वह दुर्दशा है जो अंग्रेजों , मुगलों के शासन में भी नहीं थी । हिन्दू ग्रन्थों की निन्दा करने वाले उसे शायद ही पढ़ते हैं । पर किसी वाक्य या शब्द को पुस्तक के सन्दर्भ से अलग कर , और बिना अर्थ समझे , निन्दा करना नासमझी या धूर्तता ही है। 

#संदर्भ:-

* प्रोफेसर , राजनीतिशास्त्र , राष्ट्रीय शैक्षिक शोध एवं प्रशिक्षण परिषद् , नई दिल्ली । सम्पर्कः 4 / 44 , एन . सी . ई . आर . टी . आवास , अरविन्दो मार्ग , नई दिल्ली - 110016 चिन्तन - सृजन , वर्ष - 15 , अंक - 3.
* मनुस्मृति और मनुवाद - डॉ. शंकर शरण. पृ. ७-९.
* पृथ्वीराज चौहान और उनका युग, डॉ. विन्ध्यराज चौहान, २०१२.पृ.२६५.

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