धर्म और विज्ञान

◼️ #धर्म_और_विज्ञान_में_विरोध_नहीं_है - यह स्पष्ट करने के लिए आइए , कुछ उदाहरण लें ।

▪️विज्ञान की एक महत्वकाँक्षा है महान एकीकरण सिद्धांत की व्युत्पत्ति जिससे विश्व में घटने वाली प्रत्येक प्राकृतिक घटना की समुचित व्याख्या मिल सकेगी । एक ही सिद्धांत में सभी प्रकार की ऊर्जा शक्तियों , सबल एवं दुर्बल परमाणु ऊर्जा शक्तियों , विद्युत चुंबकीय शक्ति एवं गुरुत्व शक्ति का एकीकरण - यह आइंस्टाइन के मस्तिष्क की उपज थी । अत्यधिक कार्य हो रहा है इस पर कि सिद्ध हो जाए कि ये सभी एक ही ऊर्जा के विभिन्न रूप हैं ।

▪️ सफलता भी मिली है , परंतु गुरुत्व के अन्यों से एकीकरण का लक्ष्य अभी प्राप्त नहीं हो सका है । फिर भी आशा कर सकते हैं कि भविष्य में कभी न कभी यह सफलता भी अवश्य मिलेगी और तब हम भारतीयों को लगेगा कि हमारे ऋषियों ने तो यह पहले ही जान लिया था । ज्ञातव्य है कि #ईशोपनिषद में कहा गया है :

 " विश्व के प्रत्येक कण में एक ही ऊर्जा विद्यमान है । "

▪️ इसी प्रकार , ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महाविस्फोट से होने की आधुनिक वैज्ञानिक धारणा को लें । 1969 में स्टीफेन हॉकिंग ने सिद्ध किया कि यह विस्फोट एक श्याम विवर ( black hole ) की इस विलक्षणता से हुआ कि उसमें द्रव्यमान विस्फोट की सीमा तक संघनित हो गया था ।

▪️ इसी विचार को आज अलंकारिक रूप में cosmic egg भी कहा जाता है । ऋग्वेद में कथन है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति #हिरण्यगर्भ से हई । द्रष्टव्य है कि आज के विज्ञान का cosmic egg इस वैदिक हिरण्यगर्भ से बहुत अलग नहीं दिखता ।

▪️आज के भौतिक विज्ञान में देश और देश के बाहर जैन स्यादवाद की अत्यधिक चचा है । स्यादवाद कहता है कि सत्य बहुमुखी होता है और इसीलिए उसकी व्याख्या एक से अधिक हो सकती है ।

▪️ आज की भौतिकी में यह किस प्रकार प्रासंगिक है , इसका उदाहरण देखें - #इलैक्ट्रॉन , जो परमाणु का एक मूलभूत कण है , ऊर्जा भी है ( डी . बोग्लाई ) ।

▪️यह विचित्र बात है ! इलेक्ट्रॉन कण या पदार्थ है और ऊर्जा भी । समझ में न आने वाली बात है । ऐसा संभव नहीं लगता यद्यपि है ऐसा ही । इसी के आधार पर महान वैज्ञानिक #हाइसेनबर्ग ने एक अन्य सिद्धांत दिया है , जिसका नाम ही है #अनिश्चितता_का_सिद्धांत ।

▪️ ' आप या तो इलेक्ट्रॉन की गति का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं या उसकी स्थिति का , दोनों का एक साथ ज्ञान असंभव है । बात और उलझ जाती है । परंतु स्यादवाद की दृष्टि से इसमें कुछ भी अनोखा नहीं है क्योंकि सत्य तो बहुमुखी होता है , जिसकी व्याख्या एकाधिक हो सकती हैं । इस प्रकार एक ही क्षण में आध्यातिमक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का अंतर्विरोध समाप्त हो जाता है ।'

▪️ हमारे वेदों और उपनिषदों बल्कि कहें कि संपूर्ण प्राचीन आध्यात्मिक साहित्य में ऐसे दृढ़ वक्तव्य क्यों मिलते हैं ? उनका आधार क्या है ? निश्चित रूप से ऐसे वक्तव्य वही दे सकता है , जिसने उसमें निहित सत्य को अच्छी तरह से ठोक - बजाकर परख लिया हो और उसे उसके बारे में कतई कोई भ्रम न हो ।

▪️ आज का वैज्ञानिक ऐसे वक्तव्य देने में वर्षों का अनुसंधान समय लगाएगा , प्रयोगशाला में सैंकड़ों बार उसे दाहेराएगा । कारण है कि आज के वैज्ञानिक एवं वैदिक विज्ञानी को कार्यशैली में मूलभूत अंतर है । आज के वैज्ञानिक का ज्ञान प्रयोगाश्रित है और इसीलिए वस्तुपरक है । ऐसा इसलिए कि इसमें उसकी अपनी कमियों कम से कम व्यवधान डालती हैं , जो निष्कर्ष पूर्ण जाग्रतावस्था में पाँच ज्ञानेंद्रियों की सहायता से प्राप्त किया गया हो , उसमें अशुद्धि की गुंजाइश कम से कम होगी ।

▪️ परंतु क्या ऐसा वानिक ज्ञान संपूर्ण होगा ? क्या सत्य के उद्घाटन में व्यक्तिपरकता का कोई स्थान नहीं है ? वैदिक विज्ञानियों ने प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए न केवल पाँच ज्ञानेंद्रियों बल्कि #छटी_इंद्रिय ( sixth sense ) का भी प्रयोग किया और यह भी ज्ञान के उच्चतर स्तरों , ध्यान एवं समाधि , पर जिनकी उन्हें पूर्ण समझ थी । इसीलिए उनके निष्कर्ष इतने सटीक रहे ।

▪️ कह सकते हैं कि आज के वैज्ञानिक की ज्ञानयात्रा बहिमुखी है जबकि वैदिक विज्ञानियों की अंतर्मुखी थी । स्मरणीय है कि ध्यान एवं समाधि जहाँ अन्वेषक ( साधक ) का नाता बाहा संसार से तोड़ देते हैं , वहीं जाग्रत अंतर्मन के माध्यम से समय एवं ज्ञान के विशाल अर्तींद्रिय विश्व के कपाट खोल देते हैं । यही कारण है कि आज के वैज्ञानिकों को ज्ञान के वर्तमान स्तर तक पहुँचने में बहुत लंबा समय लगा जबकि ऋषियों ने उसे हजारों वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया था ।

▪️ ऋषियों का ज्ञान और विज्ञान संपूर्ण या holistic है । उनमें कहीं अंतर्विरोध नहीं झलकता और न ही कहीं कोई भ्रांति है । तभी वे इतने ahs0 lute statements दे पाए , जिनमें से अनेकों आज के विज्ञान के लिए दिशा निर्देशक सिद्ध हो रहे हैं ।

▪️स्मरणीय है कि आइंस्टाइन जैसे वैज्ञानिक ने आज के विज्ञान की इस कमी को पहचाना था और कहा था :

 _ Pure logical thinking cannot yield any knowledge of empirical world . Such knowledge will he completely empty aas regards reality .

 या यों कहें कि शुद्ध वस्तुपरक तर्कों से इस विश्व की वस्तुस्थिति का बिल्कुल सही ज्ञान प्राप्त करना असंभव है ।

▪️ तो जानी हुई बात है कि अधूरा जान मनुष्य को भी अंतत : संपूर्णता प्राप्त करने दे सकता और तभी निष्कर्षों में भ्रांतियां बनी रहती है उदाहरण , श्याम विवर ( ब्लैक होल ) , इलेक्ट्रॉन , प्रोटॉन , फोटॉन , विद्युत क्षेत्र , चुंबकीय क्षेत्र अथवा गुरुत्व क्षेत्र - इनमें से किसी को भी तो आप पाँच ज्ञानेंद्रियों से नहीं देख पाते आप केवल देखते है उनके द्वितीयक प्रभावों को और फिर वस्तुपरक तर्कों के आधार पर उन्हें विश्लेषित और व्याख्यायित करते हैं जिनके फलस्वरूप निष्कर्षों में असहजता और भ्रांति के बीज पड़े रह जाते हैं ।

▪️जरा निष्कर्षों का अंतर्विरोध देखें ।

_______" त्वरण प्राप्त इलैक्ट्रॉन बराबर इलैक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण उत्सर्जित करता है परंतु तब नहीं जब वह परमाणु में नाभिक के चारों एक कक्षाविशेष में घूम रहा हो । ऐसा क्यों ? मुश्किल पड़ती है समझने में असहजता है निष्कर्ष में । यह तभी दूर हो सकती थी जब वैज्ञानिक उच्चतर चेतना - स्तर तथा छठी इंद्रिय का प्रयोग करने में सक्षम होता जैसा कि हमारा वैदिक विज्ञानी था ।
   इसीलिए , 1977 में भौतिक शास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता #इलिया_प्रियोजिन ने मत व्यक्त किया कि प्रकृति के बारे में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए विज्ञान और दर्शन का एकीकरण मुख्य शर्त है ।"

▪️ #विज्ञान - जिसका आधार सौ प्रतिशत वस्तुपरकता है और दर्शन - जिसका आधार है व्यक्तिपरकताः । यह विज्ञान का चेतना के उच्चत्र स्तरों पर प्राप्त ज्ञान ही था कि हमें अध्यात्म में दैत का सिद्धांत प्रतिपादित करने में कुछ भी अजूबा नहीं लगा जबकि #डी०बोरलाई के इलैक्ट्रॉन की तरंग - कण प्रकृति का वर्णन आज भी आसानी से विद्यार्थी को पच नहीं पाता ।

▪️ विज्ञान और धर्म के संबंधों की चर्चा करते - करते मैं वेदों और उपनिषदों विज्ञान ढूँढने लग गया था अब यदि हम फिर से शुद्ध धर्म की और लौटें - ऐसा कोई भी धर्म जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास करना सिखाता है - तो भी धर्म और विज्ञान में टकराव नजर नहीं आता । मैं एक बार फिर उद्धृत करूंगा पिछली शताब्दी के महानतम वैज्ञानिक #अल्बर्ट_आइंस्टाइन को -

 " कोई भी वैज्ञानिक जिसमें प्रकृति के रहस्यों को जानने की उत्कंटा है - दीर्घकाल तक कार्य करते - करते एक हो निष्कर्ष पर पहुँचता है कि प्रकृति की प्रत्येक घटना के पीछे एक अदृश्य शक्ति का हाथ है जो मानवीय शक्ति से कहीं अधिक समर्थ और शक्तिशाली है और जिसके आगे अंततः वह मस्तक झुका देने को विवश हो जाता है । "

▪️ संभवतः इसीलिए वैज्ञानिकों ने जय - जब इस शक्ति से टकराव का मार्ग चुना - विनाश ही पल्ले पड़ा । आज तक बने कोई भी प्रतिरूप आदर्श नहीं बने , वे बने तो पर रहे रोगी , बीमार और अनेक विकृतियों से ग्रस्त । इसी प्रकार , प्रकृति पर विजय प्राप्ति की लालसा ने पर्यावरण - विनाश का सर्वग्रासी दानव खड़ा कर दिया । और भी उदाहरण मिल जाएंगे । दूसरी और वैज्ञानिक यदि धर्म से संस्कारित हो तो ए. पी. जी. अब्दुल कलाम जैसा व्यक्ति बनकर खड़ा होता है , जिसने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भुट्टो के लाख लालच देने पर भी वहाँ के परमाणु बम प्रोजेक्ट में कार्य करने से साफ इनकार कर दिया था ।


#संदर्भ : book of the Dr. Om p. Agrawal
"प्राचीन भारत : अध्यात्म और विज्ञान".
#विचार_प्रसार 🚩🚩🚩🚩🚩
✍️जय मां भारती 🙏🙏🇮🇳🇮🇳

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