सुर्यवंशभुषण महाराणा प्रताप
सुर्यवंशभुषण महाराणा प्रताप सुर्यवंशभुषण महाराणा प्रताप
आर्य वीरों के जिन नेताओं ने भारतवर्ष में मुसलमान प्रभुता के विरुद्ध प्रतिक्रिया प्रारम्भ की उन में सुर्यवंशभुषण क्षत्रिय शिरोमणि महाराणा प्रताप का स्थान बहुत ऊँचा है ।
(१) डाॅ. भवान सिंह राणा अपने पुस्तक "महाराणा प्रताप" में लिखते हैं :
" देशप्रेम , त्याग , बलिदान , संघर्ष आदि गुणों के प्रतीक महाराणा प्रताप भारतवासियों के लिए श्रध्दा तथा अभिमान का विषय बन गये है । उनका नाम लेते ही मुगल साम्राज्य की सत्ता पे चुनौती देने वाले वीरता के ओज से परिपूर्ण एवं अप्रतिम वीर योध्दा का बिम्ब हमारे मस्तिष्क में अनायास ही मूर्त रूप धारण कर लेता है । स्वतन्त्रता हेतु विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने जो कार्य किया , उसकी सामान्य लोगों में कल्पना भी नहीं की जा मकती । मेवाड़ नरेश होते हए भी उनके जीवन का अधिकांश भाग वनों और पर्वतों में इधर से उधर भटकने हुए व्यतीत हुआ । अपनी अदम्य इच्छा शक्ति और अपूर्व रण कौशल से वह मेवाड़ को स्वाधीन कराने में समर्थ हुए । "
(२) इतिहासकार #श्रीराम_शर्मा ने "महाराणा प्रताप" के पृ. 122 पर लिखा है "शताब्दियों से हिन्दू लोग (विशेषतः मराठा) मुसलमान स्वामियों के सामने सिर झुकाते आए थे । यत्र तत्र कुम्भ और सांगा, जैसे बहुत थोड़े नर पुंगव ही ऐसे निकले , जिन्होंने अपने दूसरे मनुष्य - बंधुओं से ऊपर उठकर शासकों का विरोध किया था । दिल्ली की बादशाही शक्ति की पराधीनता राजपूतों ने प्रायः एकदम स्वीकार कर ली थी । प्रताप को उन शूर योद्धाओं में से ऊंचा मानने का रिवाज सा हो गया है जिन्होंने बहु - संख्यक शत्रुओं से निरन्तर युद्ध किया , और किसी की प्रभुता स्वीकार नहीं की । हमारा विश्वास है कि पहले इस संस्कार का संशोधन हो गया होगा ।"
(३) डाॅ. गौरीशंकर ओझा के "राजपुताना का इतिहास" जिल्द-2 में पृ. २२५-२६ पर लिखा है :
" हल्दीघाटी की लडाई में दोनों पक्ष वाले अपनी - अपनी विजय होना लिखते हैं । उदयपुर के जगदीश के मन्दिर के वि० सं० १७०६ ( ई० सन् १६५२ ) के राजपूताने का इतिहास शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस युद्ध में महाराणा की ही जीत हुई । अकबर की सेना महाराणा आक्रमण से डरती थी । उन्हें ये हर दम भय था कि महाराणा पहाड़ों में किसी जगह घात लगाये बैठे हैं और न जाने का कब उनपर आक्रमण कर देवें । इस युद्ध के बाद शाही सेना गागून्दे पहुँधी परन्तु पहाड़ी इलाके में अन्न का प्रबंध न होने से सेना को आपत्ति झेलनी पड़ी । इधर महाराणा ने राजपूत सैनिकों और वीर भीलों की सहायता से सब पहाड़ी नाके और रास्तों को रोक लिया ताकि शाही सेना को खाने को मिल न मिल सके । इस प्रकार शाही सेना चार मास बड़ी दुर्दशा से गोगूदे में पड़ी रही , परन्तु महाराणा का कुछ न बिगाड़ सकी ।और अंत में अजमेर लौट गयी तब अंत में महाराणा ने शाही थाने उठाकर अपने थाने बिठाए। "
(४) #मुंशी_देवीप्रसाद कृत 'महाराणा प्रताप सिंह का जीवन चरित्र' पृ. 23 पर लिखा है :-
" अकबर ने बारम्बार महाराणा पर सेना भेजी परन्तु उसे सफलता नहीं मिली । क्योंकि मौका पाते ही महाराणा पहाड़ों से निकल कर फिर शाही थानों पर कब्जा कर लेते थे । उन्होंने शत्रु सेना का आगरे तक का रास्ता बंद कर दिया था । उदयपुर गोगले के शाही थाने उठा दिये थे और मोही का थानेदार भी मारा गया ।"
(५) इसी संदर्भ में डाॅ. ओझा लिखते हैं :
" इन पहाड़ी युद्धों में महाराणा का व्यवहार शत्रु के साथ धर्मपूर्वक था । एक बार के आक्रमण में महाराणा प्रताप के हाथों शाही सेनापति मिर्ज़ाखाँ की औरतें आ गई । तब महान महाराणा प्रताप सिंह ने उनको बहन बेटी की तरह सम्मानित किया और आदर पूर्वक उनको मिर्ज़ाखाँ के पास पहुंचा दिया ।"
(६) प्रसिद्ध कृति " #वीरांगना " में 'राणा का स्वप्न' (डा० रामगोपाल शर्मा दिनेश ' कृत ) कविता में राणा समस्त देश की पराधीनता की पीड़ा अनुभव करता हुआ स्वप्न मे मृत चेतक की यह बोली सुनता है :
वह अरि जो भारमाता को बघन मे जकड़े बैठा है ,
जो दिशि - दिशि से ऊपर के सब अंबर को पकडे बैठा है ,
हिल जाय गगन उसका भय से ऐसी हुकार सुनाओ तो ।
उठ प्रलयपयोधर से गरजो असि से ज्वाला चमकाओ तो। ।
(७) प्रसिद्ध कवि #हरिकृष्ण_प्रेमी ने समस्त देश की स्वतंत्रता के लिए प्रताप को वन वन भटकता हुआ देखा है :
भारत के सारे बल को जब , कसा बेडियो ने अनजान ।
तब केवल तुम ही फिरते थे , वन वन पागल सिंह समान॥
(८) श्यामनारायण पाण्डेय महाराणा प्रताप के सर्व प्रथम प्रबन्धकार हैं । ' #हल्दीघाटी ' नामक प्रबन्ध काव्य सन् १९३६ में लिखा गया । इसमें मेवाड़ केसरी राणा प्रताप के युद्ध - वृतान्तो को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है । यह वीररस प्रधान कृति है । इसके नायक प्रताप हैं । भूमिका में ही कवि ने प्रताप का गुण गान इन शब्दो में किया है :
" महान् ! इन्हीं कतिपय घटनाओं को मैंने कविता का रूप दिया है । यह खण्ड काव्य है अथवा महाकाव्य , इसमें सन्देह है , लेकिन तू तो निःसन्देह महाकाव्य है । तेरे जीवन की एक - एक घटना संसार के लिए आदर्श है और हिन्दुत्व के लिए गर्व की वस्तु । "
(९) महाराणा प्रताप की वीरता उस भावना की प्रतीक है जिससे अधीन जातियां अन्यायियों की सत्ता के विरुद्ध बगावत करती हैं और मनुष्य जुल्मों के आगे गर्दन झुकाने से इन्कार कर देता है ।
_______ कविवर रामधारीसिंह ' दिनकर '
(१०) "प्रताप ! हमारे देश का प्रताप ! हमारी जाति का प्रताप ! दृढता और उदारता का प्रताप । तू नहीं है , केवल तेरा यश और कीर्ति है । जब तक यह देश है और जब तक संसार में दृढता , उदारता , स्वतन्त्रता और तपस्या का आदर है तब तक, हम ही नही, सारा संसार तुझे आदर की दृष्टि से देखेगा । संसार के किसी भी देश में तू होता तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्यौछावर करते ।"
---------------( स्व० ) गणेश शंकर विद्यार्थी
(११) डाॅ० पुरुषोत्तमलाल मेनारिया , (एम . ए ; पी . एच . डी.) का मन्तव्य "महाराणा प्रताप स्मृति" ग्रंथ में इस प्रकार मिलता हैं :
(1) एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ मे महाराणा प्रतापसिंह सम्बन्धी कतिपय नवीन ज्ञातव्य प्राप्त हुए हैं । विद्वज्जगत् की जानकारी और विचार हेतु इन उल्लेखों को यहां प्रस्तुत किया जाता है ।
(2) सुप्रसिद्ध #हल्दीघाटी_युद्ध मे ग्वालियर के राम शाह तंवर द्वारा अपने पुत्रों सहित महाराणा प्रताप के पक्ष में मुगल सेना से लड़ते हुए काम पाना सम्बद्ध समस्त इतिहास ग्रंथों से विदित होता है ।
(3) #प्रस्तुत_ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि #रामशाह , महाराणा प्रताप से रु . ८०० - ०० आठ सौ रुपये रोकड प्रतिदिन प्राप्त करते थे । अवश्य ही राम शाह के साथ निश्चित संख्या में सैनिक भी ये जिनके व्यय हेतु उक्त द्रव्य उन्हे प्रतिदिन प्राप्त होता था ।
(4) #निष्कर्ष : इस उल्लेख से महाराणा प्रताप की तत्कालीन सम्पन्नता प्रकट होती है ।
(5) वह #प्रमाण_ग्रंथ : "राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान , जोधपुर में सुरक्षित , हस्तलिखित ग्रन्थ , क्रमांक ३५४६४ ."
(१२) भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर ओझा ने महाराणा प्रताप के जन्म पर लिखा है :
"वीर शिरोमणि , स्वतंत्रता के पुजारी , अपने कुल गौरव के रक्षक , आत्माभिमान के अवतार , प्रात स्मरणीय प्रताप वि० स० १५६७ ज्येष्ठ सुदि ३ रविवार ( ६ मई सन् १५४० स० १५६७ ज्येष्ठ सुदि ३ ) का सूर्योदय से ४७ घडी १३ पल गये उत्पन्न हुए थे और जिस समय उनके पिता ( महाराणा उदयसिंह ) की मृत्यु हुई उस समय उनकी अवस्था ३२ वर्ष की थी ।"
यह अधिक उचित होगा यदि कहा जाय कि प्रताप उस बड़ी वीर - माला के मोतियों में से एक था - नहीं , नहीं उस माला का पहला मोती था जिस ने दक्षिण में शिवाजी और पंजाब में रणजीतसिंह पैदा किया । उसने न केवल मेवाड़ में अकबर के मनसूबे का ही विरोध किया , वरन् उनके विरुद्ध विरोध को संगठित भी किया । सामान्य राजपूत राजाओं के विपरीत वह सदा बहुत ही प्रसन्न रहता था । उसे मुगल आक्रमणकारियों से बच निकलने में उतनी प्रसन्नता न होती थी , जितनी कि राजपूताने में मुगलों के विजय - प्रवाह को बढ़ने से रोकने के लिए राजाओं को एकत्र करने में । किसी एक या दूसरे समय में उस ने सरोही के क्रूर देवरों , युद्ध - वीर राठौर , ईदर के शासक , डूंगरपुर के राजों , बूंदी के हाड़ों , और रणथम्भोर के चौहानों को एकत्रित किया था । जब राजाओं का एक संघ टूट जाता तो वह दूसरा बना लेता और इस प्रकार मुग़लों को ललकारता रहता था ।
इन भांति भाँति के वीरों को इकट्ठा करने में वह अपने साथ भी कभी रियाअत न करता था । राव सुर्तान देवरा ने उसके नियुक्त किये हुए शासक को सरोही से निकाल भगाया था । परन्तु बजाय इसके कि वह इस छोटे कारण से उसके साथ अनन्त शत्रुता की शपथ लेता उसने उसका सहयोग मांगा , और बादशाही शक्ति के साथ युद्ध में उस को अपना सहा यक बनाया । जोधपुर का राव मालदेव और राणा उदय सिंह अपने समय में उसके शत्रु रह चुके थे । एक बूढ़े कट्टर पंथी राजपूत को पारवारिक कलह जारी रखने और उसमें अपनी ही शक्ति को निर्बल करने से बढ़कर और कोई बात प्रसन्न न करती थी ।
परन्तु जब राव मालदेव का पुत्र और उत्तराधिकारी , राव चन्द्रसेन , कुम्भल गढ़ में प्रताप को उसके राज्याभिषेक पर बधाई देने आये , तो उस समय महाराणा ने पिछले झगड़ों को भुला दिया और दोनों १५८१ में चन्द्रसेन की मृत्यु तक एक दूसरे के सहायक बने रहे । दूसरी सब बातों से अधिक वह इस लिए भी हमारे सम्मान का पात्र है कि उसने युद्ध की उस प्रणाली का आरम्भ किया जिसका श्रेय अभी तक शिवाजी तथा मराठों को ही मिलता रहा है।
चातुर्वर्ण्य - विभाग ने देश की रक्षा का भार राजपूतों के ही कन्धों पर फेंक रक्खा था और राजपूत किसी बड़े पैमाने पर युद्ध का संगठन करने के बजाए रणभूमि में लड़ कर मर जाने का ही यत्न करते थे । प्रताप इस राजपूत प्रथा के अनुसरण में केवल वहीं डट कर संग्राम करता था जहां उसके लिए ऐसा करना अनिवार्य हो जाता था । परन्तु उसे सब से अधिक खुशी मुग़लों को कुत्ते का सा जीवन व्यतीत कराने में और जहां तक हो सके सभी अवसरों पर उन्हें तंग करने में , इस पर भी लड़ने और भाग जाने में होती थी , ताकि वह किसी दूसरे दिन लड़ाई कर सके
प्रताप के मुगलों का प्रतिरोध करने का आधार यहाँ गुरिल्ला - युद्ध प्रणाली ही थी । इसका परिणाम यह हुआ कि मुग़ल आक्रमण उस लाठी के सदृश निष्फल हो गये जो जल को पीटने का निरर्थक काम करती है । आगे चल कर मरहटों के साथ भी युद्ध में ऐसा ही हुआ । लाठी के गिरते ही जल अलग हो जाता परन्तु उसके हटते ही फिर एक हो जाता था । उसने न केवल इस युद्ध - प्रणाली का प्रारम्भ ही किया वरन् सफलतापूर्वक इसका उपयोग भी किया ।
बादशाही सेनाओं ने चाहे जैसे भी आक्रमण किए हों परन्तु मेवाड़ के स्वामी बनने में उन्हें कभी सफलता नहीं हुई । वे देश में लूट - पाट मचा सकती थीं , परन्तु उसे कभी जीत नहीं सकती थीं । उसने सीसोदियों के हृदयों में अपनी प्रबल अजेय इच्छा का संचार कर दिया । मुगलों ने और चाहे जो भी किया वे उसके अपने आदमियों की उसके प्रति भक्ति को शिथिल न कर सके ।
कोई जगमल या कोई शक्त बल्कि कोई सागर भी भले ही चला जाय और सीसोदिया वंश की प्रतिष्ठा को बादशाही दर्बार में किसी पदाधिकारी के बदले बेच दे , परन्तु फिर भी उसके अपने सहचरों में से , जिन में एक राजा , तीन राव और सात रावत थे , हम कभी किसी के द्वारा उसको छोड़ कर चले जाने का समाचार नहीं सुनते ।
यद्यपि मेवाड़ पर कई बार चढ़ाइयाँ हुई थीं , और विश्वासघात कर के लोगों के छोड़ जाने के अवसर भी असंख्य निकले होंगे । _ _ _
उस का मेवाड़ को अकबर से दुबारा जीत लेना उस की विधियों की सफलता का प्रबल प्रमाण है । सांगा बड़ा था , पर प्रताप को उस से भी बड़ा मानना चाहिये , क्योंकि वह सीसोदियों की कीर्ति को अम्लान रख सका , उस ने राजपूतों को यह पाठ पढ़ाया कि यदि वे अन्त को सफलता लाभ कर सके तो लड़कर भाग जाना वैसा ही वीरतापूर्ण कार्य है जैसा कि लड़ कर युद्ध - क्षेत्र में प्राण दे देना । उस ने एक संघ के बाद दूसरे संघ का संगठन किया और इस प्रकार राजपूतों को एकता का वह पाठ पढ़ाया । जिस की उन में बहुत अधिक कमी थी ।
जब मानसिंह और भगवान दास ने , कल्याणमल और रायसिंह ने , जगमल और दूदा ने अकबर के यहां नौकरी स्वीकार की , तो प्रताप ने चिरन्तन विरोध का प्रण लिया और अपने प्रण को निभा कर इस कार्य में अपने विरोधियों से प्रशंसा लाभ की । _ _ _
खेद है कि उस के समय की दशा ने उसे शासन सुधार का कार्य करने के लिये समुचित अवसर न दिया । अकबर की शक्ति के विरुद्ध विजय लाभ की व्यवस्था करना एक भागीरथ प्रयत्न था । इस से वह अवश्य ही बहुत थक गया होगा , क्योंकि इस के लिए कुछ नागरिक पुनर्सङ्गठन भी करना पड़ता था । इस पर प्रताप कभी धर्मोत्तम न था । यदि वह मुगलों के विरुद्ध उठा , तो इस लिए कि वह उनको देश की स्वतन्त्रता पर कुठार चलाने वाले समझकर उनसे हार्दिक घृणा करता था । बस इतनी ही बात थी । शत्रुओं की व्यक्ति गत प्रतिष्ठा उसके हाथों उतनी ही सुरक्षित थी जितनी कि उनके अपने हाथों हो सकती थी ।
जब अब्दुलरहीम 100 स्त्रियों को पकड़ कर अमरसिंह मन ही मन प्रसन्न हो रहा था , उस समय उसने अमरसिंह को झिड़का और स्त्रियों को सम्मानपूर्वक वापिस भेज दिया । यदि वह चाहता तो रात्रि में छापा मारकर मानसिंह कछवाहे की सारी महत्त्वाकांक्षा को मिट्टी में मिला देता । परन्तु सिंह प्रताप ने ऐसा करना पसन्द नहीं किया ।
हमने कभी ऐसी कोई बात नहीं सुनी कि उसने किसी भी ऐसे प्राणी के प्रति किसी प्रकार की करता दिखलाई हो जो दुर्भाग्य से किसी भिन्न धर्म में , उत्पन्न हुआ हो । अपनी मातृ - भूमि की स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने की धुन में , वह धार्मिक पक्षपात से सदा बहुत दूर रहता था । यही कारण था कि उसके पक्ष में होकर मुसलमान सेनापति और मुसलमान सिपाही अकबर के भी विरुद्ध लड़ते थे । वह राजपूती आतिथ्य सत्कार को पूरी तरह निभाता था । जो कोई भी प्रारब्ध का मारा और मुगलों का सताया सीसोदिया दरवार में आता , उसको वहां घर जैसा सुख मिलता । कितने ही राजाओं ने , जिन में से प्रथम ग्वालियर का रामशाह सब से प्रमुख था , उसके यहां शरण लाभ की । _ _ _
जहाँ जहाँ भी गुणग्राही सज्जन हैं , वहाँ वहाँ इस महान सेनापति , वीरयोद्धा , सफल संगठन कर्ता , मनुष्यों में राजा , उदार शत्रु , प्रताप का नाम सदा सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ लिया जायगा ।
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✍️जय मां भारती 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
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आर्य वीरों के जिन नेताओं ने भारतवर्ष में मुसलमान प्रभुता के विरुद्ध प्रतिक्रिया प्रारम्भ की उन में सुर्यवंशभुषण क्षत्रिय शिरोमणि महाराणा प्रताप का स्थान बहुत ऊँचा है ।
(१) डाॅ. भवान सिंह राणा अपने पुस्तक "महाराणा प्रताप" में लिखते हैं :
" देशप्रेम , त्याग , बलिदान , संघर्ष आदि गुणों के प्रतीक महाराणा प्रताप भारतवासियों के लिए श्रध्दा तथा अभिमान का विषय बन गये है । उनका नाम लेते ही मुगल साम्राज्य की सत्ता पे चुनौती देने वाले वीरता के ओज से परिपूर्ण एवं अप्रतिम वीर योध्दा का बिम्ब हमारे मस्तिष्क में अनायास ही मूर्त रूप धारण कर लेता है । स्वतन्त्रता हेतु विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने जो कार्य किया , उसकी सामान्य लोगों में कल्पना भी नहीं की जा मकती । मेवाड़ नरेश होते हए भी उनके जीवन का अधिकांश भाग वनों और पर्वतों में इधर से उधर भटकने हुए व्यतीत हुआ । अपनी अदम्य इच्छा शक्ति और अपूर्व रण कौशल से वह मेवाड़ को स्वाधीन कराने में समर्थ हुए । "
(२) इतिहासकार #श्रीराम_शर्मा ने "महाराणा प्रताप" के पृ. 122 पर लिखा है "शताब्दियों से हिन्दू लोग (विशेषतः मराठा) मुसलमान स्वामियों के सामने सिर झुकाते आए थे । यत्र तत्र कुम्भ और सांगा, जैसे बहुत थोड़े नर पुंगव ही ऐसे निकले , जिन्होंने अपने दूसरे मनुष्य - बंधुओं से ऊपर उठकर शासकों का विरोध किया था । दिल्ली की बादशाही शक्ति की पराधीनता राजपूतों ने प्रायः एकदम स्वीकार कर ली थी । प्रताप को उन शूर योद्धाओं में से ऊंचा मानने का रिवाज सा हो गया है जिन्होंने बहु - संख्यक शत्रुओं से निरन्तर युद्ध किया , और किसी की प्रभुता स्वीकार नहीं की । हमारा विश्वास है कि पहले इस संस्कार का संशोधन हो गया होगा ।"
(३) डाॅ. गौरीशंकर ओझा के "राजपुताना का इतिहास" जिल्द-2 में पृ. २२५-२६ पर लिखा है :
" हल्दीघाटी की लडाई में दोनों पक्ष वाले अपनी - अपनी विजय होना लिखते हैं । उदयपुर के जगदीश के मन्दिर के वि० सं० १७०६ ( ई० सन् १६५२ ) के राजपूताने का इतिहास शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस युद्ध में महाराणा की ही जीत हुई । अकबर की सेना महाराणा आक्रमण से डरती थी । उन्हें ये हर दम भय था कि महाराणा पहाड़ों में किसी जगह घात लगाये बैठे हैं और न जाने का कब उनपर आक्रमण कर देवें । इस युद्ध के बाद शाही सेना गागून्दे पहुँधी परन्तु पहाड़ी इलाके में अन्न का प्रबंध न होने से सेना को आपत्ति झेलनी पड़ी । इधर महाराणा ने राजपूत सैनिकों और वीर भीलों की सहायता से सब पहाड़ी नाके और रास्तों को रोक लिया ताकि शाही सेना को खाने को मिल न मिल सके । इस प्रकार शाही सेना चार मास बड़ी दुर्दशा से गोगूदे में पड़ी रही , परन्तु महाराणा का कुछ न बिगाड़ सकी ।और अंत में अजमेर लौट गयी तब अंत में महाराणा ने शाही थाने उठाकर अपने थाने बिठाए। "
(४) #मुंशी_देवीप्रसाद कृत 'महाराणा प्रताप सिंह का जीवन चरित्र' पृ. 23 पर लिखा है :-
" अकबर ने बारम्बार महाराणा पर सेना भेजी परन्तु उसे सफलता नहीं मिली । क्योंकि मौका पाते ही महाराणा पहाड़ों से निकल कर फिर शाही थानों पर कब्जा कर लेते थे । उन्होंने शत्रु सेना का आगरे तक का रास्ता बंद कर दिया था । उदयपुर गोगले के शाही थाने उठा दिये थे और मोही का थानेदार भी मारा गया ।"
(५) इसी संदर्भ में डाॅ. ओझा लिखते हैं :
" इन पहाड़ी युद्धों में महाराणा का व्यवहार शत्रु के साथ धर्मपूर्वक था । एक बार के आक्रमण में महाराणा प्रताप के हाथों शाही सेनापति मिर्ज़ाखाँ की औरतें आ गई । तब महान महाराणा प्रताप सिंह ने उनको बहन बेटी की तरह सम्मानित किया और आदर पूर्वक उनको मिर्ज़ाखाँ के पास पहुंचा दिया ।"
(६) प्रसिद्ध कृति " #वीरांगना " में 'राणा का स्वप्न' (डा० रामगोपाल शर्मा दिनेश ' कृत ) कविता में राणा समस्त देश की पराधीनता की पीड़ा अनुभव करता हुआ स्वप्न मे मृत चेतक की यह बोली सुनता है :
वह अरि जो भारमाता को बघन मे जकड़े बैठा है ,
जो दिशि - दिशि से ऊपर के सब अंबर को पकडे बैठा है ,
हिल जाय गगन उसका भय से ऐसी हुकार सुनाओ तो ।
उठ प्रलयपयोधर से गरजो असि से ज्वाला चमकाओ तो। ।
(७) प्रसिद्ध कवि #हरिकृष्ण_प्रेमी ने समस्त देश की स्वतंत्रता के लिए प्रताप को वन वन भटकता हुआ देखा है :
भारत के सारे बल को जब , कसा बेडियो ने अनजान ।
तब केवल तुम ही फिरते थे , वन वन पागल सिंह समान॥
(८) श्यामनारायण पाण्डेय महाराणा प्रताप के सर्व प्रथम प्रबन्धकार हैं । ' #हल्दीघाटी ' नामक प्रबन्ध काव्य सन् १९३६ में लिखा गया । इसमें मेवाड़ केसरी राणा प्रताप के युद्ध - वृतान्तो को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है । यह वीररस प्रधान कृति है । इसके नायक प्रताप हैं । भूमिका में ही कवि ने प्रताप का गुण गान इन शब्दो में किया है :
" महान् ! इन्हीं कतिपय घटनाओं को मैंने कविता का रूप दिया है । यह खण्ड काव्य है अथवा महाकाव्य , इसमें सन्देह है , लेकिन तू तो निःसन्देह महाकाव्य है । तेरे जीवन की एक - एक घटना संसार के लिए आदर्श है और हिन्दुत्व के लिए गर्व की वस्तु । "
(९) महाराणा प्रताप की वीरता उस भावना की प्रतीक है जिससे अधीन जातियां अन्यायियों की सत्ता के विरुद्ध बगावत करती हैं और मनुष्य जुल्मों के आगे गर्दन झुकाने से इन्कार कर देता है ।
_______ कविवर रामधारीसिंह ' दिनकर '
(१०) "प्रताप ! हमारे देश का प्रताप ! हमारी जाति का प्रताप ! दृढता और उदारता का प्रताप । तू नहीं है , केवल तेरा यश और कीर्ति है । जब तक यह देश है और जब तक संसार में दृढता , उदारता , स्वतन्त्रता और तपस्या का आदर है तब तक, हम ही नही, सारा संसार तुझे आदर की दृष्टि से देखेगा । संसार के किसी भी देश में तू होता तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्यौछावर करते ।"
---------------( स्व० ) गणेश शंकर विद्यार्थी
(११) डाॅ० पुरुषोत्तमलाल मेनारिया , (एम . ए ; पी . एच . डी.) का मन्तव्य "महाराणा प्रताप स्मृति" ग्रंथ में इस प्रकार मिलता हैं :
(1) एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ मे महाराणा प्रतापसिंह सम्बन्धी कतिपय नवीन ज्ञातव्य प्राप्त हुए हैं । विद्वज्जगत् की जानकारी और विचार हेतु इन उल्लेखों को यहां प्रस्तुत किया जाता है ।
(2) सुप्रसिद्ध #हल्दीघाटी_युद्ध मे ग्वालियर के राम शाह तंवर द्वारा अपने पुत्रों सहित महाराणा प्रताप के पक्ष में मुगल सेना से लड़ते हुए काम पाना सम्बद्ध समस्त इतिहास ग्रंथों से विदित होता है ।
(3) #प्रस्तुत_ग्रन्थ से ज्ञात होता है कि #रामशाह , महाराणा प्रताप से रु . ८०० - ०० आठ सौ रुपये रोकड प्रतिदिन प्राप्त करते थे । अवश्य ही राम शाह के साथ निश्चित संख्या में सैनिक भी ये जिनके व्यय हेतु उक्त द्रव्य उन्हे प्रतिदिन प्राप्त होता था ।
(4) #निष्कर्ष : इस उल्लेख से महाराणा प्रताप की तत्कालीन सम्पन्नता प्रकट होती है ।
(5) वह #प्रमाण_ग्रंथ : "राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान , जोधपुर में सुरक्षित , हस्तलिखित ग्रन्थ , क्रमांक ३५४६४ ."
(१२) भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर ओझा ने महाराणा प्रताप के जन्म पर लिखा है :
"वीर शिरोमणि , स्वतंत्रता के पुजारी , अपने कुल गौरव के रक्षक , आत्माभिमान के अवतार , प्रात स्मरणीय प्रताप वि० स० १५६७ ज्येष्ठ सुदि ३ रविवार ( ६ मई सन् १५४० स० १५६७ ज्येष्ठ सुदि ३ ) का सूर्योदय से ४७ घडी १३ पल गये उत्पन्न हुए थे और जिस समय उनके पिता ( महाराणा उदयसिंह ) की मृत्यु हुई उस समय उनकी अवस्था ३२ वर्ष की थी ।"
यह अधिक उचित होगा यदि कहा जाय कि प्रताप उस बड़ी वीर - माला के मोतियों में से एक था - नहीं , नहीं उस माला का पहला मोती था जिस ने दक्षिण में शिवाजी और पंजाब में रणजीतसिंह पैदा किया । उसने न केवल मेवाड़ में अकबर के मनसूबे का ही विरोध किया , वरन् उनके विरुद्ध विरोध को संगठित भी किया । सामान्य राजपूत राजाओं के विपरीत वह सदा बहुत ही प्रसन्न रहता था । उसे मुगल आक्रमणकारियों से बच निकलने में उतनी प्रसन्नता न होती थी , जितनी कि राजपूताने में मुगलों के विजय - प्रवाह को बढ़ने से रोकने के लिए राजाओं को एकत्र करने में । किसी एक या दूसरे समय में उस ने सरोही के क्रूर देवरों , युद्ध - वीर राठौर , ईदर के शासक , डूंगरपुर के राजों , बूंदी के हाड़ों , और रणथम्भोर के चौहानों को एकत्रित किया था । जब राजाओं का एक संघ टूट जाता तो वह दूसरा बना लेता और इस प्रकार मुग़लों को ललकारता रहता था ।
इन भांति भाँति के वीरों को इकट्ठा करने में वह अपने साथ भी कभी रियाअत न करता था । राव सुर्तान देवरा ने उसके नियुक्त किये हुए शासक को सरोही से निकाल भगाया था । परन्तु बजाय इसके कि वह इस छोटे कारण से उसके साथ अनन्त शत्रुता की शपथ लेता उसने उसका सहयोग मांगा , और बादशाही शक्ति के साथ युद्ध में उस को अपना सहा यक बनाया । जोधपुर का राव मालदेव और राणा उदय सिंह अपने समय में उसके शत्रु रह चुके थे । एक बूढ़े कट्टर पंथी राजपूत को पारवारिक कलह जारी रखने और उसमें अपनी ही शक्ति को निर्बल करने से बढ़कर और कोई बात प्रसन्न न करती थी ।
परन्तु जब राव मालदेव का पुत्र और उत्तराधिकारी , राव चन्द्रसेन , कुम्भल गढ़ में प्रताप को उसके राज्याभिषेक पर बधाई देने आये , तो उस समय महाराणा ने पिछले झगड़ों को भुला दिया और दोनों १५८१ में चन्द्रसेन की मृत्यु तक एक दूसरे के सहायक बने रहे । दूसरी सब बातों से अधिक वह इस लिए भी हमारे सम्मान का पात्र है कि उसने युद्ध की उस प्रणाली का आरम्भ किया जिसका श्रेय अभी तक शिवाजी तथा मराठों को ही मिलता रहा है।
चातुर्वर्ण्य - विभाग ने देश की रक्षा का भार राजपूतों के ही कन्धों पर फेंक रक्खा था और राजपूत किसी बड़े पैमाने पर युद्ध का संगठन करने के बजाए रणभूमि में लड़ कर मर जाने का ही यत्न करते थे । प्रताप इस राजपूत प्रथा के अनुसरण में केवल वहीं डट कर संग्राम करता था जहां उसके लिए ऐसा करना अनिवार्य हो जाता था । परन्तु उसे सब से अधिक खुशी मुग़लों को कुत्ते का सा जीवन व्यतीत कराने में और जहां तक हो सके सभी अवसरों पर उन्हें तंग करने में , इस पर भी लड़ने और भाग जाने में होती थी , ताकि वह किसी दूसरे दिन लड़ाई कर सके
प्रताप के मुगलों का प्रतिरोध करने का आधार यहाँ गुरिल्ला - युद्ध प्रणाली ही थी । इसका परिणाम यह हुआ कि मुग़ल आक्रमण उस लाठी के सदृश निष्फल हो गये जो जल को पीटने का निरर्थक काम करती है । आगे चल कर मरहटों के साथ भी युद्ध में ऐसा ही हुआ । लाठी के गिरते ही जल अलग हो जाता परन्तु उसके हटते ही फिर एक हो जाता था । उसने न केवल इस युद्ध - प्रणाली का प्रारम्भ ही किया वरन् सफलतापूर्वक इसका उपयोग भी किया ।
बादशाही सेनाओं ने चाहे जैसे भी आक्रमण किए हों परन्तु मेवाड़ के स्वामी बनने में उन्हें कभी सफलता नहीं हुई । वे देश में लूट - पाट मचा सकती थीं , परन्तु उसे कभी जीत नहीं सकती थीं । उसने सीसोदियों के हृदयों में अपनी प्रबल अजेय इच्छा का संचार कर दिया । मुगलों ने और चाहे जो भी किया वे उसके अपने आदमियों की उसके प्रति भक्ति को शिथिल न कर सके ।
कोई जगमल या कोई शक्त बल्कि कोई सागर भी भले ही चला जाय और सीसोदिया वंश की प्रतिष्ठा को बादशाही दर्बार में किसी पदाधिकारी के बदले बेच दे , परन्तु फिर भी उसके अपने सहचरों में से , जिन में एक राजा , तीन राव और सात रावत थे , हम कभी किसी के द्वारा उसको छोड़ कर चले जाने का समाचार नहीं सुनते ।
यद्यपि मेवाड़ पर कई बार चढ़ाइयाँ हुई थीं , और विश्वासघात कर के लोगों के छोड़ जाने के अवसर भी असंख्य निकले होंगे । _ _ _
उस का मेवाड़ को अकबर से दुबारा जीत लेना उस की विधियों की सफलता का प्रबल प्रमाण है । सांगा बड़ा था , पर प्रताप को उस से भी बड़ा मानना चाहिये , क्योंकि वह सीसोदियों की कीर्ति को अम्लान रख सका , उस ने राजपूतों को यह पाठ पढ़ाया कि यदि वे अन्त को सफलता लाभ कर सके तो लड़कर भाग जाना वैसा ही वीरतापूर्ण कार्य है जैसा कि लड़ कर युद्ध - क्षेत्र में प्राण दे देना । उस ने एक संघ के बाद दूसरे संघ का संगठन किया और इस प्रकार राजपूतों को एकता का वह पाठ पढ़ाया । जिस की उन में बहुत अधिक कमी थी ।
जब मानसिंह और भगवान दास ने , कल्याणमल और रायसिंह ने , जगमल और दूदा ने अकबर के यहां नौकरी स्वीकार की , तो प्रताप ने चिरन्तन विरोध का प्रण लिया और अपने प्रण को निभा कर इस कार्य में अपने विरोधियों से प्रशंसा लाभ की । _ _ _
खेद है कि उस के समय की दशा ने उसे शासन सुधार का कार्य करने के लिये समुचित अवसर न दिया । अकबर की शक्ति के विरुद्ध विजय लाभ की व्यवस्था करना एक भागीरथ प्रयत्न था । इस से वह अवश्य ही बहुत थक गया होगा , क्योंकि इस के लिए कुछ नागरिक पुनर्सङ्गठन भी करना पड़ता था । इस पर प्रताप कभी धर्मोत्तम न था । यदि वह मुगलों के विरुद्ध उठा , तो इस लिए कि वह उनको देश की स्वतन्त्रता पर कुठार चलाने वाले समझकर उनसे हार्दिक घृणा करता था । बस इतनी ही बात थी । शत्रुओं की व्यक्ति गत प्रतिष्ठा उसके हाथों उतनी ही सुरक्षित थी जितनी कि उनके अपने हाथों हो सकती थी ।
जब अब्दुलरहीम 100 स्त्रियों को पकड़ कर अमरसिंह मन ही मन प्रसन्न हो रहा था , उस समय उसने अमरसिंह को झिड़का और स्त्रियों को सम्मानपूर्वक वापिस भेज दिया । यदि वह चाहता तो रात्रि में छापा मारकर मानसिंह कछवाहे की सारी महत्त्वाकांक्षा को मिट्टी में मिला देता । परन्तु सिंह प्रताप ने ऐसा करना पसन्द नहीं किया ।
हमने कभी ऐसी कोई बात नहीं सुनी कि उसने किसी भी ऐसे प्राणी के प्रति किसी प्रकार की करता दिखलाई हो जो दुर्भाग्य से किसी भिन्न धर्म में , उत्पन्न हुआ हो । अपनी मातृ - भूमि की स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने की धुन में , वह धार्मिक पक्षपात से सदा बहुत दूर रहता था । यही कारण था कि उसके पक्ष में होकर मुसलमान सेनापति और मुसलमान सिपाही अकबर के भी विरुद्ध लड़ते थे । वह राजपूती आतिथ्य सत्कार को पूरी तरह निभाता था । जो कोई भी प्रारब्ध का मारा और मुगलों का सताया सीसोदिया दरवार में आता , उसको वहां घर जैसा सुख मिलता । कितने ही राजाओं ने , जिन में से प्रथम ग्वालियर का रामशाह सब से प्रमुख था , उसके यहां शरण लाभ की । _ _ _
जहाँ जहाँ भी गुणग्राही सज्जन हैं , वहाँ वहाँ इस महान सेनापति , वीरयोद्धा , सफल संगठन कर्ता , मनुष्यों में राजा , उदार शत्रु , प्रताप का नाम सदा सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ लिया जायगा ।
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