नितीकार श्रीकृष्ण

कौटिल्य ने कूटनीति में शुक्राचार्य की श्रेष्ठता की है किन्तु शुक्राचार्य अपने नीतिसार ' में लिखते हैं कि “ कृष्ण के समान कोई कूटनीतिज्ञ इस पृथ्वी पर नहीं हुआ " देखिये

 " न कूटनीतिरभवत् श्रीकृष्ण सदृशोनृपः "
____( शुक्रनीति ४-१२ - ९ ७ )

( १ ) जरासंध वध के समय देवर्षि नारद द्वारा महाराज युधिष्ठिर को राजसूय रचने के परामर्श पर उन्होंने कृष्ण की राय जाननी चाही | कृष्ण ने दो टूक उत्तर दिया कि " . महान पराक्रमी जरासंध को पराजित किये बिना राजसूय यज्ञ अधूरा रहेगा " । युधिष्ठिर जरासंध के नाम से अत्यन्त आतंकित हुए और उन्होंने राजसूय यज्ञ का विचार ही त्याग दिया । कृष्ण ने रक्तपात बिना जरासंध के वध का आश्वासन दिया तथा अर्जुन - भीम के साथ स्नातक वेश धारण कर वे जरासंध के महल में गिरिश्रृंग तोड़कर पहुँचे । जरासंध ने इनका उचित स्वागत किया । कृष्ण ने बताया कि ये दोनों मौनव्रत धारण किये हुए हैं तथा अर्द्धरात्रि को ही ये दोनों इस मौनव्रत को तोड़ेगें |

जरासंध ने इन्हें यज्ञशाला में ठहराया और अर्द्धरात्रि में इनके पास पहुँचा । इसी बीच जरासंध को गिरिश्रृंग तोड़ने का समाचार मिल चुका था । इनकी भुजाओं पर धनुष.चढ़ाने की डोरी का निशान देखकर उसे यह समझते देर न लगी कि ये लोग क्षत्रिय हैं । उसने इनसे वेष परिवर्तन , मौन धारण करने , द्वार से न आकर गिरिश्रृंग तोड़कर आने का कारण पूछा । कृष्ण ने उत्तर दिया कि ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य तीनों ही स्नातक हो सकते हैं अतः हमें क्षत्रिय स्नातक जानो । मौन इसलिये है कि क्षत्रिय कर्मवीर होते हैं , वाक्सूर नहीं " क्षत्रियो बाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्य वीर्यवान् "
_( सभापर्व २१-५१ )

द्वार से न जाने का प्रयोजन यह कि शत्रु के घर में द्वार से प्रवेश नहीं किया जाता , आगे देखिये ' अद्वारेण रिपोर्गेहं द्वारेण सुहृदोगृहान् " ॥ ( सभापर्व २१-५३ )

इसी से हमारे आने का प्रयोजन समझ लीजिये । जरासंध द्वारा यह पूछने पर कि मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया फिर मुझसे शत्रुता क्यों ? कृष्ण ने कहा तूने ८६ राजाओं को बन्दीग्रह में डाल रखा है और उनकी बलि चढ़ाना चाहता है । यह नृशंसता का कार्य है । मैं कृष्ण हूँ , ये अर्जुन तथा भीम हैं । या तो तू इन राजाओं को मुक्त करके हमारी मित्रता प्राप्त कर अन्यथा द्वन्द्व - युद्ध स्वीकार कर | जरासंध वीर था । उसने भीम के साथ द्वन्द्व
युद्ध स्वीकार किया । चौदह दिनों तक दोनों में युद्ध हुआ , और जिसके परिणाम स्वरूप जरासंध मारा गया । कृष्ण ने ८६ राजाओं को कैद से निकाला तथा जरासंध के पुत्र सहदेव को राजसिंहासन प्रदान किया | मुक्त हुए राजाओं ने युधिष्ठिर की मित्रता स्वीकार की ।

( २ ) जब कृष्ण दुर्योधन की सभा में शान्ति सन्देश लेकर गये थे तब दुर्योधन ने उनसे भोजन करने का आग्रह किया । कुटिल दुर्योधन के यहाँ भोजन करना कृष्ण ने निरापद न समझा और नीतियुक्त उत्तर दिया - राजन् किसी के घर अन्न दो ही कारणों से खाया जाता है या तो प्रेम के कारण या आपत्ति पड़ने पर । प्रीति तो तुममें नहीं है और आपत्ति में हम नहीं हैं ।

( ३ ) दूतकर्म में शान्ति स्थापनार्थ कृष्ण को प्रत्यक्षतः सफलता नहीं मिली । अप्रत्यक्षतः उन्होंने भीष्म , द्रोण , धृतराष्ट्रादि की हार्दिक सहानुभूति पाण्डव पक्ष के लिये अर्जित की । दुर्योधन को भारी सभा में डांटकर उसका मनोबल तोड़ा तथा कौरव पक्ष के लिये समुद्यत राजाओं के सम्मुख पाण्डवों का औचित्य प्रस्तुत करने में वे पूर्णतः सफल हुए । विदा होते समय कृष्ण ने कर्ण को रथ में बिठाया और अन्तिम प्रयास के रूप में उसे पाण्डवों के पक्ष में मिलाने का प्रयास किया । विजय के बाद सम्राट तक बनाने का लालच उसको दिया तथा पाण्डवों के प्रति भ्रातृभाव भी कुरेदा । कर्ण ने कौरवों का साथ देना न छोड़ा किन्तु नैतिक रूप से यह स्वीकार अवश्य किया कि इस युद्ध में पाण्डवों की ही विजय होगी । कर्ण को अपने रथ में बैठाकर वार्ता करने में कृष्ण की एक और गूढ़ कूटनीतिज्ञता यह थी कि कौरवों में कर्ण के प्रति परोक्षतः शत्रु से मिलने का सन्देह उत्पन्न कर दिया जाये ।

( ४ ) कर्णवध के समय युद्धक्षेत्र में अर्जुन एवं कर्ण का साम्मुख्य होने पर अत्यन्त रोमांचकारी युद्ध हुआ । दोनों एक - दूसरे के प्राणों के भूखे , दोनों शस्त्र पारंगत अपने - अपने कौशल दिखला रहे थे । अवसर पाकर कर्ण ने एक सर्पाकार बाण का प्रहार अर्जुन पर किया । सर्वत्र हाहाकार मच गया । कृष्ण ने अत्यन्त स्फूर्ति से घोड़ों को झटका देकर घुटनों पर बैठा दिया । रथ कुछ नीचा हुआ और कर्ण का बाण अर्जुन के किरीट को बेधता हुआ निकल गया । दूसरे ही क्षणं अर्जुन के प्रहार से कर्ण के रथ का पहिया पृथ्वी में धंस गया । कर्ण जैसे ही पहिये को निकालने के लिये उतरा , कृष्ण का संकेत पाकर अर्जुन ने प्रत्यंचा पर अपना बाण चढ़ाया ही था कि कर्ण ने कहा- " अर्जुन निहत्थे पर प्रहार करना धर्म के विरूद्ध है । अर्जुन रूक गया किन्तु कृष्ण ने अर्जुन को उद्बोधित करते हुए कर्ण से कहा- " अरे कर्ण ! आज जब तेरे प्राण संकट में हैं , तुझे धर्म की याद आ ही गई ! सारे जीवन भर तू धर्म का तिरस्कार ही करता रहा " ।

कृष्ण ने कर्ण को याद दिलाया कि
( क ) जब भीम को विषयुक्त भोजन दिया गया था तब तुम्हें धर्म का उद्बोध क्यों नहीं हुआ था ?
( ख ) जब लाक्षागृह में पाण्डवों को भस्म करने का षड्यंत्र रचा गया था उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ था ?
( ग ) जब एक वस्त्रा द्रौपदी को घसीटकर तुम भरी सभा में लाये थे उस समय तुम्हें धर्म स्मरण क्यों नहीं हुआ ?
( घ ) तेरह वर्ष बीतने पर भी पाण्डवों को राज्य न देना किस धर्म संहिता के अनुसार उचित है ?
( ड ) जब सात - सात महारथियों ने मिलकर निहत्थे अभिमन्यु की हत्या की थी उस समय तुम्हारी धर्मबुद्धि कहाँ थी ?

देखिये - यदाभिमन्यु बहबोबुद्धे जहनुमहारथाः । परिवार्यरथे बालं क्वते धर्मस्तदागताः ॥
 __( कर्णपर्व ९०-१० )

कृष्ण ने कहा - " हे ! कर्ण , जो जीवन भर धर्म की रक्षा करता है , धर्म भी उसी की रक्षा करता है किन्तु जो जीवन भर धर्म को मारता है - मारा गया धर्म हन्ता को भी मार देता है , ऐसा शास्त्र का वचन है देखिये -

 " #धर्म_एव_हतो_हन्ति_धर्मो_रक्षति_रक्षितः"
__( मनुस्मृति )

यह कहकर कृष्ण ने अर्जुन को आदेश दिया कि - " हे अर्जुन ! धर्म तुझे कर्ण वध के लिये ललकार रहा है ।" 

लेकिन आज कुछ जिहादी कथावाचक तो ऐसी कायरता सिखा रहे हैं जैसे कि कुरान के सुनाई देने पर भागवत रोक दिया जाय... यह क्या बात हुई? क्या वह हमारे लिए रूकते हैं। निती विरूद्ध किसी गिरोह को आप धर्म कह रहे हो और उसको जाने बिना ही उसकी पैरवी कर रहे हैं यह तो असली शत्रु है हमारे धर्म के जिन्हें यह भी नहीं पता कि सनातन का अर्थ क्या है? और सनातन क्या है? गीता में वेदों को ईश्वरीय ज्ञान कहाँ है। सनातन वह है जो अपौरुषेय है और वेद ही अपौरुषेय तथा सनातन है न की
 भागवत! हर युग में भागवत बदलते रहेगा किंतु वेद वह है जो अनादि है और अनंत काल तक अपौरुषेय है, ईश्वरीय ज्ञान है। निर्माण, पालन और विनाश के त्रिगुणी प्रकृति का ज्ञान देकर चिन्मय ब्रह्म का ज्ञान देने वाला है।

🙏विचार प्रसार🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
✍️जय मां भारती 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏


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