अयोध्या में मिला भारतीय संस्कृति का प्रतीक चिन्ह कमलचक्र


अयोध्या_में_मिला_भारतिय_संस्कृति_का_एक_प्रतिक_प्राचीन_कमल_चक्र..... 

अयोध्या राम जन्मभूमि में खुदाई में मिला एक कमल चक्र।

" आउटर व्होरल में 29 समान पंखुड़ियां हैं और आंतरिक में 13 और केंद्र में 7 हैं। सूत्र 7-13-29 है।  ये तीन 'प्राइम' नंबर हैं और 360 ° सर्कल 7, 13 या 29 से विभाज्य नहीं हैं। "प्राइम नंबर" का आकर्षक प्रयोग।"

हमारे प्राचीन सुल्बसूत्रों ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है कि शुलबा यानी रस्सी का उपयोग करके, एक वृत्त को किसी भी संख्या में भागों में विभाजित किया जा सकता है।

संभवतया, 7 सप्ताह के 7 दिन इंगित करते हैं, 13 पंखुड़ियां 13 चंद्र महीने (एक अंतरा मास सहित) और 29 पंखुड़ियां एक चंद्र महीने के 29 दिनों का संकेत देती हैं। 

#गणितीय_मत

कोई गणितज्ञ ही कल्पना कर सकता है की इन अबसोलुट ( अविभाज्य ) संख्या से वृत्त की परिधि को कैसे विभाजित करें।

अविभाज्य संख्याओं और वृत्त की परिधि संबंधित गणितिय ज्ञान हमारे पूर्वजों को हजारों सालों से है , कम से कम दो हज़ार वर्ष पूर्व बना ये शिलालेख इस बात का प्रमाण है।

भारत में हजारों ऐतिहासिक धरोहरों की रचना प्राचीन भारत के उत्कृष्ट गणितिय-तकनीकी ज्ञान तथा ज्योतिष का जीवंत प्रमाण है।

◼️अब जानेंगे की कमल चक्र पर भारतीय वैदिक और पौराणिक शास्त्र ग्रंथों में क्या क्या लिखा है :

भारतीय संस्कृति में प्रतीकों का अत्यधिक महत्व है । यहाँ प्रतीकों के माध्यम से अपने इष्ट एवं लक्ष्य कि उपासना - आराधना का विधान है । इस क्रम में कमल चक्र एक शाश्वत - सांस्कृतिक प्रतीक है । कमल भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही तयों का प्रतीक माना गया है । यह श्रृंगार एवं वैराग्य तथा सृष्टि व प्रलय के रूप में वर्णित होता है । यह असीम -अनंत आकाश के साथ प्राणी के सूक्ष्म अन्तः कारण का भी प्रतीक है । इसे जल , पृथ्वी , आकाश , अग्नि , सूर्य , चंद्रमा एवं ब्रह्माण्ड के तत्व के रूप में भी स्वीकारा गया है ।

शास्त्रकारों के अनुसार यह पवित्रता , निर्मलता , कोमलता , सृजन जीवन , सौंदर्य , सुरभि एवं अमरता का प्रतीक है । इसके गुण शोभा , स्नेह , आकर्षण दिव्यता , प्रेम , ज्ञान , ऊर्जा , मंगलिता , भव्यता , शीतलता आदि है । कमल के इन्हीं गुणों के कारण उसे विभिन्न धर्मों में सम्मानपूर्वक प्रतिष्ठा मिली है । यही वजह है कि इसकी महत्त्व वैदिक काल से लेकर समय तक अक्षुण्ण है ।

कमल शब्द संस्कृत की श्कम धातु से बना है । श्कम का तात्पर्य है जल और अल का अर्थ है - अकलंक कृत करे वह कमल है । पदम् इसका प्रसिद्ध पर्याय है । जल से उत्पन्न होने के कारण जल कि पर्यायवाची शब्दों के साथ ज , जात अथवा जन्य प्रत्यय लगाने से कमल का पर्याय बन जाता है । इसी तरह रुह प्रत्यय का अर्थ है , अंकुरित और विकसित होना । इसी विशेषता के कारण इसे जलोरुह , सरसीरह आदि नाम से जाना जाता है । कमल के अनेक अर्थ एवं अनेक नाम है ।

महाप्रलय के जलप्लावन के पश्चात् विष्णु की नाभि से सृष्टि का सृजन माना जाता है । यह पृथ्वी के सृजन का एक मूर्तिमान रूप हैं । श्रीमद्भागवत पुराण , मत्स्यपुराण तथा हरिवंशपुराण में नारायण कि नाभि से कमल कि उत्पत्ति का वर्णन विभिन्न अलंकारिक रूपों में हुआ है ।

(१) #ऋग्वेद में कई स्थानों पर नीलोत्पल का उल्लेख आया है । #यजुर्वेद के एक मन्त्र के अनुसार बालक के माता पिता उसे कलो कि माला पहनाकर आचार्य कुल में प्रवेश करने ले जाते है । अथर्ववेद में कमल कि दो जातियाँ पुष्कर ( नीलकमल ) और पुण्डरीक ( स्वेत कमल ) का उल्लेख आया है ।

(२)#ऋग्वेद में जल से कमल भूमि कि उत्पत्ति का वर्णन है ।

(३) #वाजस्नेयी_संहिता में कमल पृथ्वी का द्योतक है ।

(४) #शतपथ_ब्राह्मण के अनुसार :-

"आयो वै पुष्कर तारस्मियम पर्ण यथा हवाइदम पुष्करम पर्णम्प्स्वध्याहित्मेव - मियम्स्याम्हिता सेयं योनि रानेरियम , ...।" 

#अर्थात् जल कमल है और पृथ्वी कमलपत्र है । जैसे जल पर कमलपत्र रखा रहता है उसी प्रकार जल पर पृथ्वी ठहरी हुई है ।

(५) #छान्दोग्य_उपनिषद् में आचार्य उपकोसल को यह शिक्षा मिली ,

"यथा पुष्कर पलाश आपो न शिल्स्यन्तेमेव विदि पापं कर्म न शिल्स्प्नती इति ।"

#अर्थात्

"जैसे कमल के पत्रों पर जल नहीं रुकता वैसे ही ब्रह्मा को जानने वाले पाप कर्म में लिप्त नहीं होते ।"

(६) छांदोग्य उपनिषद् के अष्टम अध्याय में कमल को हृदय का प्रतीक माना गया है ।

(७) #आत्म्बोधोनिषद में हृदय कमल के सम्बन्ध में कहा गया है - इस हृदय के ब्रह्मपुत्र कमल में प्रकाशित होने वाले दीपक या विद्दुत के समान देवकी पुत्र , मधुसूदन पुंडरीकाक्ष तथा अच्योत विष्णु ब्रह्म ज्ञानियों के हितैषी है ।

(८) हृदय कमल में रहने वाला ब्रह्मा ही प्रज्ञा स्वरूप प्रज्ञा - मन्त्र तथा प्रज्ञा में ही रहने वाला है ।

(९) #कैब्ल्योतिसाद में भी कमल का वर्णन आया है इसमें एकांत में पवित्र होकर , सुखासन में बैठकर भक्तिपूर्वक गुरु को नमन करके शोकरहित हृदय कमल का चिंतन करने का उल्लेख है ।

(१०) #ब्राह्मणोपनिषद् के मतानुसार लोगों को कर्मफल तथा सौभाग्य देने वाले भगवान वामदेव उनके हृदय के अष्टदल कमल में रहते है ।

(११)#अथर्ववेद में गर्भाशय को कमल के समान चित्रित किया गया है ।

(१२) सूक्ष्म जगत में हृत्कामल का उल्लेख #योगशास्त्र में विश्वतकिया रूप में हुआ है । #श्रीमद्भागवत्_गीता में कमल कि निर्मलता एवं अलिप्तता को इस प्रकार प्रकट किया गया है -

"#ब्रम्हान्थ्यकर्मन्शंड_त्वष्वत्वकरोतियह_लिप्यते_न_स_पापेन_पद्मपत्रं_मिवभ्सा ।"

अर्थात् जो व्यक्ति अपने को ईश्वर में समर्पित करते हुए आशक्ति कि त्याग कर कार्य करता है , वह पाप से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जिस प्रकार जल में रहते हुए कमल पात्र लिप्त नहीं होता ।

(१३) श्री सूक्त में लक्ष्मी को पद्मिनी पथिता , पढ्वानो , पसम्भ्वा आदि नामों से वर्णन किया गया है ।

(१४) गोस्वामी तुलसीदास ने भगवान राम के लिए नवकंज लोचन कंजमुख , करकंज पद कंजारुणं के रूप में चित्रित किया है ।

(१५) महाकवि सूरदास ने कृष्ण के सौंदर्य का बखान करते हुए कहा है सुन्दर श्याम कमल दल लोचन सूरदास सुखदाई ।

(१६) मीराबाई कि भावाभिव्यक्ति सुभग शीतल कमल कोमल त्रिविध ज्वालाहरण के रूप में हुई है । कमल कि गणना सात्विक आयुधों में की जाती है ।

(१७) ब्रह्मा , लक्ष्मी , गायत्री , भगवान् बुद्ध , शिव आदि देवता कमलासन कहलाते है , मत्स्यपुराण के अनुसार गणेश जी कमल पुष्प को हाथों में धारण करने वाले माने जाते है ।

(१८) श्री शारदा तिलक में भी गणेश जी को कमल से सम्बंधित दर्शाया गया है । शिल्पराज , अष्टभुजी , हेरंब तथा श्री तत्वनिधि ग्रन्थ में भी गणेश जी के हाथों में कमल लिए चित्रित किया गया है ।

(१९) भविष्यपुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख आता है कि गरुड़ के छोटे भाई अरुण अपने ललाट पर अर्धचन्द्राकार कमल धारण किये भगवान सूर्य के सारथी का कार्य करते हैं । देवताओं में से सूर्य ही एकमात्र देवता है , जिनके दोनों हाथों में कमल हैं ।

(२०) सूर्य को कमलबन्धु कमल्वाल्ल्भ आदि कहा जाता है । सूर्य के साथ कमल का विशेष संबंध है । सूर्योदय के साथ कमल खिलता है और सूर्यास्त के समय संकुचित होता है ।

(२१) मत्स्यपुराण व शारदातिलक में सूर्य भगवान् को लाल कमल के आसन पर स्थिर बताया गया है ।

(२२) वास्तुविद्द्यदिपन्व में १ पृथक आदित्य बताये गए हैं । इनमें से आदित्य गौतम , भानुमान , शाचित , भूमकेतु , संतुष्ट , सुवार्णकेतु के हाथों में कमल है ।

(२३) बृहत् संहिता में भी ऐसा ही वर्णन प्राप्त होता है । मिश्र , तिब्बत , चीन जापान तथा अन्य अनेक देशों तथा भाषाओं में सूर्य देवता और कमल के संबंधों पर प्रकाश मिलता है । ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं ।

(१४)  मत्स्यपुराण के अनुसार ब्रह्मा का वर्ण कमल के भीतरी भाग के समान अरुण है ।

(१५) #बृहत्संहिता में ब्रह्मा को कमलासन पर स्थिर कमण्डलु लिए हुए दो भुजो तथा चार मुख वाला दर्शाया गया है ।

(१६) विष्णु धर्मोत्तर पुराण में ब्रह्मा को कमलासन पर तथा विष्णु पुराण में विष्णु की नाभि का वर्णन है ।

(१७) ब्रह्मपुराण एवं पद्मपुराण में पुष्कर तीर्थ का संबंध भी कमल से किया गया है ।

(१८) स्कंदपुराण में ततो अंगुष्ठ मात्रस्तु पुरुषो दृश्यते जनैः अर्थात् कमल के मध्य में परम पुरुष अंगुष्ठ परिमाण में दृश्यमान होता है ।

(१९) विष्णु पोषण के देवता है । विष्णु के पद्म का नाम पुण्डरीक है । भगवान विष्णु के सहस्र नामों के अंतर्गत पुष्कराक्ष , पद्मनाभ , पुंडरीकाक्ष का वर्णन आता है । इसके अलावा भगवान विष्णु को कमलाकार , कमलनयन आदि भी कहा जाता है ।

(२०) रूप मंडल ग्रन्थ में विष्णु की सभी चौबीस मूर्तियों की भुजाओं में कमल दर्शाया गया है ।

(२१) वैश्नवजन बुद्ध को भगवान विष्णु का अवतार मानते है । बृहत्संहिता में भगवान बुद्ध को पद्मासन पर बैठे हुए वर्णित किया गया है । विष्णु धर्मोत्तर व अग्निपुराण में भी भगवान बुद्ध को पद्मासन वर्णित किया गया है ।

(२२) पुराणों में शिव कल्याण के प्रतिक है । शंकरजी जी के हाथों में भी कही कही कमल दर्शाया गया हैं ।

(२३) कमल से अत्याधिक सम्बन्धित देवी महालक्ष्मी है । ये कमल के आसन पर उपस्थित है , उनके हाथों में कमल है , उनके गले में कमलों की माला है और उनके सब अंगों की उपमा कमल से दी जाती है ।

(२४) श्री मदभगवत् पुराण , मार्कडेय पुराण , दुर्गा सप्तशती तथा अन्य अनेक ग्रंथों में लक्ष्मी को कमल से अलंकृत किया गया है ।

(२५) देवमूर्ति प्रकनम में द्वादश सरस्वती स्वरूपों का वर्णन है । इन सभी स्वरूपों के चारों हाथों में कमल है ।

(२६) इसी तरह दुर्गा एवं गायत्री आदि अनेक देवियों को कमल से विभूषित किया गया है ।

(२७) तांत्रिक विद्या के सबसे प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय यंत्र श्रीयंत्र है ।

(२८) भगवान शंकराचार्य की सौंदर्य लहरी के अनुसार श्रीचक्र या यंत्र में दो पद्दचक्र है एक अष्टदल कमल और दूसरा खोस्दल कमला सर्वतोभाद्र चक्र में २८ ९ कोष्ठक है जिसके मध्य में अष्टदल कमल की स्थिति है ।

(२९) महानिर्वाण तंत्र में १६ पंखुड़ियों वाला कमल बताया गया है ।

(३०) अग्निपुराण में उल्लेखनीय दो रक्षापंक्तियों में भी कमल का स्थान है ।

(३१) एक अन्य यंत्र कमल यंत्र नाम से प्रसिद्धि है ।

(३२) स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए तथा बंध्या स्त्रियों को पुत्रलाभ हेतु कमल यंत्र धारण कराया जाता है । इस यंत्र में एक वृत्त और अष्टदल कमल बनाया जाता है ।

(३३) कमल आकार से युक्त असंख्य यंत्रों में से कुछ यंत्रों में आकारों साथ साथ कमलों का स्वरूप इस प्रकार है ।

(३४) श्यामयंत्र में भीतर अष्टदल कमल है और बाहर चौबीस दल कमल है ।

(३५) कालीयंत्र , धूमवतीयंत्र एवं छिन्नमस्तायंत्र में आठ पंखुड़ियों वाला कमल है ।

(३६) #भुवनेश्वरीयंत्र में भीतर अष्टदल कमल और बाहर शोदासदल कमल है ।

(३७) शम्भुयंत्र में बत्तीस दल वाला कमल है रामयंत्र में दो अष्टदल , एक द्वादश दल , एक षोडशदल और बत्तीस पंखुड़ियों वाला एक पाँच कमल है ।

(३८) दुर्गायंत्र में एक अष्टदल और चौबीस दल कमल है। इस प्रकार शतचक्र कमल की भाँति रूपायित है ।

(३९) मूलाधार में चतुर्भुज कमल है ये चारों पंखुड़ी लाल रंग की है ।

(४०) स्वाधिष्ठान चक्र में छह पंखुड़ी वाला कमल है । सिंदूरी जैसी गुलाबी है ।

(४१) मणिपुर चक्र दस पंखुड़ी वाले कमल की रूप में है । इनका रंग मेघ के समान नीलवर्ण का है ।

(४२) अनाहत चक्र में द्वादश दल कमल है । विशुद्ध चक्र षोडशदल कमल तथा आज्ञाचक्र दो पंखुड़ी वाले कमल के रूप में है ।

(४५) सहस्र चक्र सहस्रदल कमल स्वरूप है ।

(४६)  जैन पुराण , पद्मपुराण के अनुसार तीर्थकार की प्रतिमा की सुवर्ण के समान कमलों से पूजित प्रदर्शित करनी चाहिए । जैन परम्परा में १ देवियाँ है । उनमें से काली , गांधारी , मानवी , बिदेवी का वाहन कमल है । जैन राजाओं में इक्वाक्षुवंशीय राजाओं और इक्वाक्षुवंशीय तिर्थकरों का वर्णन भी मिलता है।

(४७) वज़ श्रृंखला और गौरी देवी की भुजाओं में कमल है । भगवान् महावीर की माता द्वारा अपने गर्भकाल में देखे गए स्वप्नों में तीन तथा चौदह में से चार का संबंध कमल से है । सुंदरता , कोमलता , कामनीयता तथा सौरभ के प्रतीक के रूप में कमल को सभी देशों में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है ।

(४८)  ""शतपथ ब्राह्मण"" में कमल को अग्नि का पर्याय माना गया है ।

(४९) तैत्तिरीय संहिता में उल्लेख है , हे कमल ! तुम जल से ऊपर रहने वाले हो और अग्नि के जन्मदाता हो । तुम समुद्र को बढ़ाते हो । सर्वत्र वृधि को प्राप्त होते हुए जल में सभी प्रकार स्थित हो । धुलोक के तेज से और पृथ्वी की विशालता से चारों ओर विस्तृत हो । कुछ भी हो , पर यह सनातन सत्य है कि कमल कीचड़ में उत्पन्न होकर भी उससे अंशमात्र भी नहीं छुआ है । सदा पवित्र एवं पावन बना रहता है ।

यह लगभग कुछ ४९ तथ्य है किन्तु और भी कई बातें तथा तथ्य है जो कमल चक्र का पाखण्ड अर्थात् तांत्रिक युग से भी संबंधित बताती हैं तो वहीं वैदिक काल से भी.... इस प्रकार यह तो दोनों ही तरीके से एक ही बात को सिध्द करता है। 

अतः कमल का प्रतीक मनुष्य को भी सांसारिक मोहपक में रहते हुए भी उससे अलिप्त बने रहने की सीख देता है ।

इस प्रकार यह पंखुड़ियों से युक्त कमलचक्र चक्रवर्ती कोशल साम्राज्य और सुर्यतेज देदीप्यमान सनातन परंपरा का ही द्योतक है। और इससे यह सिध्द हो जाता है कि अयोध्या में प्राचीन काल से आर्य ही थे और हिंदू मंदिर ही था। जय आर्यावर्त 🚩

#Ref. 📖 may 1999.Aj.mag.

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