युनानी इतिहास में उल्लेखित सेंड्रोकोट्टस को चंद्रगुप्त मौर्य मानना एक भ्रांत धारणा है।

#युनानी_इतिहास_में_उल्लेखित_सेंड्रोकोट्टस_को___चन्द्रगुप्त_मौर्य_मानना_एक_भ्रांत_धारणा

(भारतीय इतिहास का विकृतिकरण-भाग:01)

🔮पुराण

पुराण भारतीय जन-जीवन के ज्ञान के प्राचीनतम स्रोतों में से हैं। इन्हें भारतीय समाज में पूर्ण सम्मान दिया जाता रहा है। पुराणों को श्रुति अर्थात वेदों के समान महत्त्व दिया गया है - ‘‘श्रुति-स्मृति उभेनेत्रे पुराणं हृदयं स्मृतम्‘‘ अर्थातश्रुति और स्मृति दोनों ही नेत्र हैं तथा पुराण हृदय। मनुस्मृति में श्राद्ध के अवसर पर पितरों को वेद और धर्मशास्त्र के साथ-साथ इतिहास और पुराणों को सुनाने के लिए कहा गया है। पुराणों की कथाओं का विस्तार आज से करोड़ों-करोड़ों वर्ष पूर्व तक माना जाता है। इनके अनुसार सृष्टि का निर्माण आज से 197 करोड़ से अधिक वर्ष पूर्व हुआ था। पहले इस बात को कपोल-कल्पित कहकर टाला जाता रहा है किन्तु आज तोविज्ञान भी यह बात स्पष्ट रूप में कह रहा है कि पृथ्वी का निर्माण दो अरब वर्ष से अधिक पूर्व में हुआ था। दूसरे शब्दों में पुराणों में कही गई बात विज्ञान की कसौटी पर सही पाई गई है। अतः इनकी प्रामाणिकता स्वतः सिद्ध हो जाती है। पुराणों से सृष्टि रचना, प्राणी की उत्पत्ति, भारतीय समाज के पूर्व पुरुषों के कार्य की दिशा, प्रयास और मन्तव्य के ज्ञान के साथ-साथ विभिन्न मानव जातियों की उत्पत्ति, ज्ञान-विज्ञान, जगत के भिन्न-भिन्न विभागों के पृथक-पृथक नियमों आदि का भी पता चलता है। इनमें देवताओं और पितरों की नामावली के साथ-साथ अयोध्या, हस्तिनापुर आदि के राजवंशों का महाभारत युद्ध के 1504 वर्ष के बाद तक का वर्णन मिलता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि पुराणों की रचना महाभारत के 1500 वर्षों के बाद हुई है। विभिन्न भारतीय विद्वानों का कहना है कि पुराण तो प्राचीन हैं किन्तु उनमें राजवंशों के प्रकरण समय-समय पर संशोधित किए जाते रहे हैं। यही कारण है कि अलग-अलग पुराणों में एक ही वंश के राजाओं की संख्या में अन्तर मिल जाता है, क्योंकि यह वंश के प्रसिद्ध राजाओं की नामावली है वंशावली नहीं।

उदाहरण के लिए- सूर्यवंश के राजाओं की संख्याविष्णु पुराण में 92, भविष्य में 91, भागवत में 87 और वायु में 82 दी गई है। लगता है संशोधनों केही समय इनमें कुछ बातें ऐसी भी समाविष्ट हो गई हैं जिनके कारण इनकी कुछ बातों की सत्यता पर ऊँगली उठा दी जाती है।

✴️राजाओं और राजवंशों के वर्णन अतिरंजित एवं अवास्तविक :
महाभारत युद्ध के 200-250 वर्ष के पश्चात ही भारत की केन्द्रीय सत्ता हस्तिनापुर से निकल कर मगध राज्य में चली गई और मगध की गद्दी पर एक के पश्चात दूसरे वंश का अधिकार होता चला गया। इन सभी वंशों के राजाओं की सूचियाँ ‘वायु‘, ‘ब्रह्माण्ड‘, ‘मत्स्य‘, ‘विष्णु‘, ‘श्रीमद्भागवत्‘ आदि पुराणों में मिलती हैं। साथ ही ‘कलियुग राज वृत्तान्त‘ और ‘अवन्तिसुन्दरीकथा‘ में भी इन राजवंशावलियों का उल्लेख किया गया है। इन सभी ग्रन्थों में वर्णित राजाओं के नामों तथा उनकी आयु और राज्यकालों में कहीं-कहीं परस्पर अन्तर मिलता है किन्तु यह अन्तर ऐसा नहीं है जिसेठीक न किया जा सके। जबकि जोन्स आदि ने उनके सम्बन्ध में पूर्ण विवेचन किए बिना ही निम्नलिखित कारणों से उन्हें अतिरंजित, अविश्वसनीय और अवास्तविक कहकर नकार दिया-

�सभी राजवंशों का अन्त लगभग समान रूप से हुआ है।
�एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं।
�* राजाओं की आयु और राजवंशों की राज्यावधि बहुतअधिक दिखाई गई है।

🔮सभी राजवंशों का अन्त लगभग समान रूप में हुआ है 

महाभारत के बाद मगध के प्रथम राजवंश बार्हद्रथ के पुत्र-विहीन अन्तिम नरेश रिपुंजय जो 50 वर्ष तक अशक्त रहकर राज्य चलाता रहा था, को उसके मंत्री ने मारकर राजगद्दी अपने पुत्र को दे दी। दूसरे राजवंश प्रद्योत के अन्तिम राजा नन्दिवर्धन को काशी के नरेश शिशुनाग ने मारकर गद्दी हथिया ली। नन्दवंश के अन्तिम राजा को चाणक्य ने मरवाकर चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी दिला दी। मौर्य वंश के अन्तिम सम्राट वृहद्रथ जो 87 वर्ष तक राज्य करते रहने के कारण अत्यन्त अशक्त, दुर्बल और अकुशल हो चुका था, को उसके सेनापति पुष्यमित्र ने मारकर गद्दी पर अधिकार कर लिया। पुष्यमित्र के वंश के श्रीविहीन अन्तिम राजा देवभूति को उसके मंत्री ने मारकर कण्व वंश का शासन स्थापित किया। इस वंश केअन्तिम राजा सुशर्मा को उसके सेवक श्रीमुख ने मारकर राज्य संभाल लिया। आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री को और बाद में उसके पुत्र को मारकर आन्ध्रभृत्य वंश अर्थात गुप्त वंश के चन्द्रगुप्त प्रथमने सत्ता संभाल ली। इसमें सन्देह नहीं कि उक्त सभी राजवंशों का अन्त अन्तिम राजा को मारकर ही किया गया है किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं हो सकता कि ये सब वृत्त झूठे हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि एक दो को छोड़कर अधिकांश राजाओं की मृत्यु का कारण उनकी दुर्बलता और निष्क्रियता रहा है, जो कि राजाओं के लिए विनाशकारी होती

✴️एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं  

एक ही राजा के अलग-अलग पुराणों में नाम अलग-अलग हैं- भारत के प्राचीन राजवंशों के कई राजाओं के नाम अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग मिलते हैं। इससे सन्देह होता है सही नाम कौन सा है और वह व्यक्ति हुआ भी है या नहीं। नामों मेंअन्तर कई कारणों से हुआ है, यथा-

(1) भिन्न-भिन्न पुराणों की प्रतिलिपियाँ तैयार करतेसमय अनजाने में ही नामों के अक्षर आगे-पीछे हो गए हैं या कहीं-कहीं ग्रन्थ की प्रति अधिक प्राचीन होने से लिखावट पढ़ पाने में कठिनाई के कारण अथवा कहीं-कहीं ध्वनि साम्य के कारण भी नामों के अक्षरों में अन्तर आ गया है, जैसे- सोमाधि और सोमापि, अयुतायु और अयुनायु, सूर्यक और सुबक या अजक या जनक, दर्भक और दर्शक, उदयन और उदायी आदि।

(2) कहीं-कहीं स्मृति-भेद के कारण भी नाम अलग-अलग हो गए हैं, जैसे- द्रुर्हसेन का द्रुदसेन या दृढ़सेन, उदयन का उदयाश्व या उदायी, आदि।

(3) नामों के अन्तर का एक कारण विभिन्न पुराणों कावर्णन कविता में होना भी है। कविता में छन्द, अलंकार, शब्द, मात्रा, वर्ण आदि के बन्धनों के कारण व्यक्तियों तथा स्थानों के नाम के खण्डों की मात्राओं और अक्षरों को आगे-पीछे कर दिया गया है और कहीं-कहीं समानार्थक शब्दों का प्रयोग भी कर दिया गया है, यथा- महाबल और महाबाहु, रिपुंजय और शत्रुंजय आदि।

🔷राजाओं की आयु और राजवंशों की राज्यावधि बहुत अधिक दिखाई गई है 

इस संदर्भ में सबसे मुख्य बात तो यह है कि उस समय सामान्य लोगों कीआयु ही अधिक होती थी। फिर राजाओं की, जिन्हें सब प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं, अधिक आयुहोना अस्वाभाविक नहीं था। वैसे जितना ज्यादा शोर आयु और शासनकाल की अधिकता का मचाया गया है उतना है कुछ नहीं। बार्हद्रथ वंश से आन्ध्रवंश तक 8 वंशों के 97 राजाओं की कुल राज्यावधि 2811 वर्षके हिसाब से प्रति राजा के शासन की औसत 29 वर्ष बनती है। इनमें से 50 या अधिक वर्षों तक राज्य करने वाले केवल 17 राजा हुए हैं, जिनमें से 10 तो अकेले बार्हद्रथ वंश के ही हैं। इस स्थिति में यह औसत ठीक ही है। यह भी उल्लेखनीय है कि बार्हद्रथ और शुंग वंशों के राजाओं को छोड़कर अन्य वंशों में जिन राजाओं की आयु अधिक रही है, उनसे पहले और बाद वाले राजा की आयु कम रही है। स्पष्ट है कि पहले वाला राजा जल्दी मर गया और उसके कम आयु वाले पुत्र को गद्दी जल्दी मिल गई और वह ज्यादा समय तक राज्य करता रहा तो उसके पुत्र को शासन करने के लिए कम समय मिला। इंग्लैण्ड में विक्टोरिया को गद्दी छोटी आयु में मिल जाने से और अधिक वर्षों तक जीवित रहने के कारण उसके पुत्र एडवर्डअष्टम को राज्य करने के लिए केवल 7-8 वर्ष ही मिले थे।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि राजाओं की आयु और शासन अवधि की अधिकता के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं है कि पूरी की पूरी सूचियों को अतिरंजित, अस्वाभाविक और अप्रामाणिक करार दे दिया जाए।

🔶सिकन्दर का भारत पर आक्रमण 327 ई.पू. में हुआ और सेंड्रोकोट्टस (चन्द्रगुप्त मौर्य) 320 ईसापूर्व भारत का सम्राट बना 

भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने की दृष्टि से कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने यद्यपि आवश्यक सामग्री जुटाने के लिए पहले भारतीय ग्रन्थों की ओर ध्यान दिया तो अवश्य किन्तु लक्ष्य भिन्न होने से वे ग्रन्थ उन्हें अपनी योजना में सहायक प्रतीतनहीं हुए। अतः उन्होंने भारत के संदर्भ में विदेशियों द्वारा लिखे गए ऐसे साहित्य पर निगाह डालनी प्रारम्भ कीजो उनके उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग दे सके। इस प्रयास में उन्हें यूनानी साहित्य में कुछ ऐसे तथ्य मिल गए जो उनके लिए उपयोगी हो सकते थे किन्तु वे तथ्य अपूर्ण, अस्पष्ट और अप्रामाणिक थे। अतः पहले तो उन्होंने सारा जोर उन्हें पूर्ण रूप से सत्य, स्पष्ट और प्रामाणिक सिद्ध करने में लगाया। अपनी बातों की युक्तिसंगत बनाने के लिए उन्हें कई प्रकार की नई-नई कल्पित कथाएँ बनानी पड़ीं। यह कल्पना भी उन्हीं में से एक है।

पाश्चात्य इतिहासकारों की इस कल्पना की पुष्टि न तो पुराणों सहित भारतीय साहित्य या अन्य स्रोतों से ही होती है और न ही यूनानी साहित्य कोछोड़कर भारत से इतर देशों के साहित्य या अन्य स्रोतों से होती है। स्वयं यूनानी साहित्य में भी ऐसे अनेक समसामयिक उल्लेखों का, जो कि होने ही चाहिए थे, अभाव है, जिनसे आक्रमण की पुष्टि हो सकती थी। यूनानी विवरणों के अनुसार ईसा की चौथी शताब्दी में यूनान का राजा सिकन्दर विश्व-विजय की आकांक्षा से एक बड़ी फौज लेकर यूनान से निकला और ईरान आदि को जीतता हुआ वह भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र केपास आ पहुँचा। यहाँ उसने छोटी-छोटी जातियों और राज्यों पर विजय पाई। इन विजयों से प्रोत्साहित होकर वह भारत की ओर बढ़ा, जहाँ उसकी पहली मुठभेड़ झेलम और चिनाव के बीच के छोटे से प्रदेश के शासक पुरु से हुई। उसमें यद्यपि वह जीत गया किन्तु विजय पाने के लिए उसे जो कुछ करना पड़ा, उससे तथा अपने सैनिकों के विद्रोह के कारण उसका साहस टूट गया और उसे विश्व-विजय के अपने स्वप्न को छोड़कर स्वदेश वापस लौट जाना पड़ा।

यूनानी इतिहासकारों ने इस घटना को जहाँ बहुत बढ़ा-चढ़ा कर चित्रित किया है वहीं भारत के इतिहास को आधुनिक रूप में लिखने वाले पाश्चात्य इतिहासकारों द्वारा भी इसे इतना महत्वपूर्ण मान लिया गया कि इसके आधार पर 327 ई. पू. में सिकन्दर के आक्रमण के समय सेंड्रोकोट्टस के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवित मानकर आक्रमण के पश्चात 320 ई. पू. को उसके राज्यारोहण की तिथि घोषित करके उसके भारत सम्राट बनने की भी बात कर दी। यही नहीं, इस तिथि के आधार पर भारत के सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास के तिथिक्रम की भी कल्पना कर डाली किन्तु यह युद्ध हुआ भी है या नहीं, इस विषय में विभिन्न विद्वानों के मत अलग-अलग हैं। यदि यह युद्ध हुआ ही नहींतो 320 ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य का भारत सम्राट बनना कैसे संभव हो सकता है?

✴️इस आक्रमण की स्थिति भारत तथा भारतेतर देशों के साक्ष्यों से इस प्रकार बनती है-

🔮भारतीय साक्ष्य 

1️⃣ऐतिहासिक - भारत के इतिहास का जो ब्योरा विभिन्न पुराणों तथा संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के अनेक ग्रन्थों में दिया हुआ है उसमें इस आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अतः भारत के इतिहास की दृष्टि से इसे प्रामाणिक मानना कठिन है।

2️⃣साहित्यिक- भारत की तत्कालीन साहित्यिक रचनाएँ, यथा- वररुचि की कविताएँ, ययाति की कथाएँ, यवकृति पियंगु, सुमनोत्तरा, वासवदत्ता आदि, इस विषय पर मौन हैं। अतः इस प्रश्न पर वे भी प्रकाश डालने में असमर्थ हैं। यही नहीं, पुरु नाम के किसी राजा का भारतीय साहित्य की किसी भी प्राचीन रचना में कोई भी उल्लेख कहीं भी नहीं मिलता और मेगस्थनीज का तो दूर-दूर तक पता नहीं है। हाँ, हिन्दी तथा कुछ अन्य भारतीय भाषाओं के कतिपय अर्वाचीन नाटकों में अवश्य ही इस घटना का चित्रण मिलता है।

3️⃣साहित्येतर ग्रन्थ - साहित्यिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य विभिन्न विषयों, यथा- आयुर्वेद, ज्योतिष, राजनीति, समाजनीति आदि के ग्रन्थों में भी, जिनमें भारत के अनेक ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं, इसका उल्लेख नहीं मिलता। चाणक्य का अर्थशास्त्र, पतंजलि का महाभाष्य आदि ग्रन्थ भी इस विषय पर मौन हैं।

🔮भारतेतर देशों के साक्ष्य 

1️⃣साहित्यिक 

🔸पड़ोसी देशों का साहित्य पड़ोसी देशों का साहित्य -

 उस समय के भारतवर्ष के वाङ्मय में ही नहीं, तत्कालीन त्रिबिष्टक (तिब्बत), सीलोन (श्रीलंका) तथा नेपाल के ग्रन्थों मेंभी भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के बारे में ही नहीं स्वयं तथाकथित विश्व-विजय के आकांक्षी सिकन्दर के बारेमें भी कोई उल्लेख नहीं मिलता।

2️⃣यूनानी साहित्य - विभिन्न यूनानी ग्रन्थों में उपलब्ध मेगस्थनीज के कथनों के अंशों में तथा टाल्मी, प्लिनी, प्लूटार्क, एरियन आदि विभिन्न यूनानी लेखकों की रचनाओं में सिकन्दर के आक्रमण के बारे में विविध उल्लेख मिलते हैं। इन्हीं में सेंड्रोकोट्टस का वर्णन भी मिलता है किन्तु वह चन्द्रगुप्त मौर्य है, इस सम्बन्ध में किसी भी ग्रन्थ में कोई उल्लेख नहीं हुआ है। यह तो भारतीय इतिहास के अंग्रेज लेखकों की कल्पना है। यदि वास्तव में ही सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य होता और उसके समय में ही यूनानी साहित्य लिखा गया होता तो उसमें अन्य अनेक समसामयिक तथ्य भीहोने चाहिए थे, जो कि उसमें नहीं हैं। इससे चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में आक्रमण हुआ था, इस पर प्रश्नचिन्ह् लग जाता है। इस दृष्टि से निम्नलिखित तथ्य विचारणीय हैं-

3️⃣नन्द का कोई उल्लेख नहीं नन्द का कोई उल्लेख नहीं-

 सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत सम्राट के पद पर महापद्मनन्द का नाम लिया जाता है किन्तु उस नन्द के बारे में यूनानी साहित्य में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता। सभी लेखकों की रचनाएँ इस विषय पर मौन हैं।
जैन्ड्रेमस (Xandrammes) का उल्लेख अवश्य मिलता है किन्तु इस शब्द का नन्द से न तो ध्वनि-साम्य है और न ही किसी और प्रकार से समानता है।
इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि भले ही जोन्स आदि ने यह माना हो कि सिकन्दर के आक्रमण के समय मगध की गद्दी पर नन्द बैठा हुआ था किन्तु इलियट के ‘भारत का इतिहास‘, भाग-1, पृ. 108-109 के अनुसार सिकन्दर के हमले के समय ‘हल‘ नाम का राजा गद्दी पर था। भारतीय पौराणिक तिथिक्रम के अनुसार हल का राज्यकाल लगभग 490ई. पू. में बैठता है। अतः इस सम्बन्ध में निश्चय से नहीं कहा जा सकता कि सिकन्दर का हमला कब हुआथा ?
टी. एस. नारायण शास्त्री का सिकन्दर के आक्रमण के सम्बन्ध में कहना है कि यद्यपि स्मिथ और उनके अन्य प्रशंसकों ने सिकन्दर के झेलम तक आने का उल्लेख किया है किन्तु वह वास्तव में तक्षशिला से आगे भारत में कभी आया ही नहीं। वहीं उसके सिपाहियों ने रोना-धोना शुरू कर दिया था। अतः उसके सतलुज तक आने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता (‘एज ऑफ शंकर‘ (1917 ई.), भाग-1, पृष्ठ 96-97)

4️⃣चाणक्य का कोई उल्लेख नहीं- भारतीय स्रोतों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी अपने गुरु चाणक्य के प्रयत्नों के फलस्वरूप मिली थी। वह चन्द्रगुप्त मौर्य का गुरु, महामंत्री और देश की राजनीति की धुरी था लेकिन तत्कालीन यूनानी साहित्य में चाणक्यका कहीं भी, किसी भी प्रकार का और कोई भी उल्लेख नहीं मिलता।
उक्त समसामयिक तथ्यों का यूनानी साहित्य में उल्लेख न होने से यह सन्देह होता है कि क्या ये वर्णन चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बंधित हैं? यदि सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य था तो चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बंधित इन महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख यूनानी साहित्य में क्यों नहीं किया गया ?

इस प्रकार न तो भारतीय साक्ष्य और न ही यूनानी साहित्य सहित अन्य भारतेतर देशों के साक्ष्य यह सिद्ध करने में समर्थ हैं कि विश्व-विजय के स्वप्नद्रष्टासिकन्दर ने चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में भारत पर आक्रमण किया था और सेंड्रोकोट्टस चन्द्रगुप्त मौर्य था, विशेषकर इसलिए कि भारतीय पौराणिक आधार पर चन्द्रगुप्त मौर्य 320 ई. पू. से काफी समय पूर्व अर्थात 1534 ई. पू. में मगध की गद्दी पर बैठा था और वही भारत का सम्राट बना था। दूसरे शब्दों में किसी भी आधार पर न तो सिकन्दर के 327 ई. पू. में हुए आक्रमण की और न ही चन्द्रगुप्त मौर्य के 320 ई. पू. में भारत का सम्राट बनने की बात की पुष्टि होती है। अतः यह भी मात्र एक भ्रान्त धारणा ही सिद्ध होती है किन्तु भारत के इतिहास को विकृत करने में इसका बहुत बड़ा हाथ है।

5️⃣यूनानी साहित्य में वर्णित सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्त मौर्य 

यूनानी साहित्य में बताया गया है कि सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के समय यहाँ सेंड्रोकोट्टस नाम का एक बहुत वीर, योग्य और कुशल व्यक्ति था, जो सिकन्दर के भारत से चले जाने के बाद 320 ई.पू. में प्रस्सी की गद्दी पर बैठा था और भारत का सम्राट बना था। जोन्स ने उसे ही चन्द्रगुप्त मौर्य मानकर 28 फरवरी, 1793 को सगर्व यह घोषणा कर डाली कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में सेंड्रोकोट्टस को पाकर भारत के इतिहास की सबसे बड़ी, सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे कठिन समस्या का निदान पा लिया।

इस प्रश्न पर कि क्या सेंड्रोकोट्टस ही चन्द्रगुप्त मौर्य है, विचार करने के लिए यह जान लेना उचित होगा कि सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में प्राचीन यूनानी साहित्य में जो कुछ लिखा मिलता है, क्या वह सब चन्द्रगुप्त मौर्य पर घटता है ? यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के संदर्भ में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें लिखी हुई मिलती हैं-

(1) सेंड्रोकोट्टस 6 लाख सेना लेकर सारे भारत में घूमा था और अनेक राजाओं को अपने अधीन किया था।

(2) सेंड्रोकोट्टस ने मगध के पहले सम्राट को मारकर साम्राज्य प्राप्त किया था।

(3) सेल्युकस ने युद्ध में हारने के पश्चात अपनी पुत्री का विवाह सेंड्रोकोट्टस से किया था।

(4) जिस क्षेत्र में पालीबोथ्रा स्थित है, वह भारत मेंबड़ा प्रसिद्ध था। वहाँ के राजा अपने नाम के साथ पालीबोथ्री उपनाम अवश्य लगाते थे।

उक्त बातों को भारतीय स्रोतों, यथा- पुराणों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य के संदर्भ में आए उल्लेखों से मिलान करने पर पाते हैं कि उसके सम्बन्ध में ये बातें तथ्यों से परे हैं, क्योंकि-

(1) चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत में इतने विशाल सैनिक अभियान करने की आवश्यकता हुई ही नहीं।

(2) यूनानी लेखकों की इस स्थापना की पुष्टि में किसीभी अन्य स्रोत से कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता। ऐसा लगता है कि यह यूनानी लेखकों की अपनी ही कल्पना है। कारण मगध के सम्राट नन्द को तो चाणक्य ने अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति हेतु मरवाया था।

(3) चन्द्रगुप्त मौर्य का विवाह किसी यूनानी लड़की से हुआ था, इसका उल्लेख भी किसी भारतीय स्रोत में नहीं मिलता। पं. भगवद्दत्त ने भी अपनी पुस्तक ‘भारतवर्ष का बृहद् इतिहास‘, में माना है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी लड़की के साथ विवाह का कोई भी ऐतिहासिक आधार उपलब्ध नहीं है।

चन्द्रगुप्त मौर्य के विदेशी कन्या के विवाह के सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सिकन्दर का आक्रमण 327 ई. पू. में हुआ था और उस समय चन्द्रगुप्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था। यदि उस समय चन्द्रगुप्त 24-25 वर्ष का भी रहा होगा तो 320 ई. पू. में गद्दी पर बैठने के समय वह 31-32 वर्ष का अवश्य हो गया होगा। सिकन्दर के आक्रमण के 25 वर्ष बाद सेल्युकस ने भारत पर आक्रमण किया था। युद्ध में हारने के पश्चात यदि उसनेअपनी पुत्री की शादी चन्द्रगुप्त से की होगी तो उस समय उसकी आयु 57-58 वर्ष की अवश्य रही होगी। सामान्यः यह आयु नए विवाह करने की नहीं होती। इसके लिए कुछ विद्वानों का यह कहना है कि राजनीतिक विवाह में आयु का प्रश्न नहीं होता।

दूसरी ओर कुछ नाटकों आदि में चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्युकस की पुत्री हेलन या कार्नेलिया की सिकन्दर के आक्रमण के समय यूनानी शिविर में प्रणय चर्चा का उल्लेख किया गया है किन्तु क्या यहाँ से जाने के 25 वर्ष बाद तक वह चन्द्रगुप्त के लिए प्रेम संजोए अविवाहित बैठी रही होगी ? यह बात असंभव न होते हुए भी जमती नहीं।

इस संदर्भ में भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेशचन्द्र मजूमदार द्वारा ‘प्राचीन भारत‘ के पृष्ठ 84 पर कहे गए ये शब्द भी उल्लेखनीय हैं कि- ‘‘चन्द्रगुप्त सेल्युकस की लड़ाई का विस्तृत वर्णन यवन लेखकों ने नहीं किया है। फलतः कुछ लोगों ने तो यह भी सन्देह प्रकट किया है कि उन दोनों में कोई युद्ध हुआ भी था ?‘‘ यदि युद्ध हुआ ही नहीं तो सेल्युकस की लड़की से विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता।

(4) यूनानी साहित्य में सेंड्रोकोट्टस के सम्बन्ध में यह भी लिखा मिलता है कि जिस क्षेत्र में ‘पालीबोथ्रा‘ स्थित है वह भारत भर में बड़ा प्रसिद्ध है और वहाँ के राजा अपने नाम के साथ ‘पालीबोथ्री‘ उपनाम भी लगाते थे। उदाहरण के लिए जैसे सेंड्रोकोट्टस ने किया था। इस सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने ‘मौर्य‘ तो अपने पारिवारिक नाम केरूप में लगाया था, उपनाम के रूप में नहीं।

ऐतिहासिक दृष्टि से विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि उक्त बातों का मौर्य वंश के पश्चात मगध साम्राज्य पर आने वाले चौथे राजवंश ‘गुप्त वंश‘ के राजाओं के साथ कुछ-कुछ मेल हो जाता है। जैसे, जहाँ तक बड़ी सेना लेकर भारत-विजय करने और विदेशी राजा की पुत्री से विवाह करने की बात है, तो यह दोनों बातें गुप्त राजवंश के दूसरे राजासमुद्रगुप्त से मेल खाती हैं। समुद्रगुप्त ने विशाल सेना के बल पर भारत विजय करके अश्वमेध यज्ञ किया था। उसके सम्बन्ध में हरिषेण द्वारा इलाहाबाद में स्थापित स्तम्भ पर खुदवाए विवरण से उसकी विजय आदि के अलावा यह भी ज्ञात होता है कि पश्चिमोत्तर क्षेत्र में युद्ध-विजय के पश्चात उसे किसी विदेशी राजा नेअपनी कन्या उपहार में दी थी।

जहाँ तक मगध के सम्राट को मारकर राज्य हथियाने की बात है तो यह बात तो गुप्त वंश के प्रथम पुरुष ‘चन्द्रगुप्त‘ से मेल खाती है। उसने ही पहले आन्ध्र वंश के अन्तिम राजा चन्द्रश्री या चन्द्रमस को और बाद में उसके पुत्र को मारकर गद्दी हथियाई थी।

नाम के साथ उपनाम जोड़ने की जहाँ तक बात है तो यहप्रथा भी गुप्त वंश के राजाओं में थी, जैसे-

क्र.सं. -- राजा का नाम -- उपनाम

1. चन्द्रगुप्त प्रथम—विजयादित्य

2. समुद्रगुप्त -- अशोकादित्य

3. चन्द्रगुप्त द्वितीय -- विक्रमादिव्य

4. कुमारगुप्त प्रथम—महेन्द्रादित्य आदि

सूची से स्पष्ट हो जाता है कि इस वंश के हर राजा ने अपने नाम के साथ उपनाम ‘आदित्य‘ जोड़ा है। गुप्त वंश के राजा सूर्यवंशी थे। उनमें सूर्य के लिए ‘आदित्य‘ शब्द उपनाम में जोड़ने की परम्परा थी अर्थात नाम के साथ उपनाम जोड़ने की बात भी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ मेल नहीं खाती।

#स्पष्ट_है_कि_सेंड्रोकोट्टस_चन्द्रगुप्त_मौर्य_नहीं_है,जिसे #जोन्स ने जबरदस्ती बनाया है।

भारत की ऐतिहासिक घटनाओं की तिथियों में अशुद्धता, मुख्यतः विंटर्निट्ज जैसे पाश्चात्य लेखकों केस्पष्ट रूप में यह मान लेने पर कि भारत के इतिहास के संदर्भ में भारतीयों द्वारा बताई गईं तिथियों की तुलना में चीनियों द्वारा बताई गई तिथियाँ आश्चर्यजनक रूप से उपयुक्त एवं विश्वसनीय है, अर्थात भारतीय आधारों का निरादर करके उनके स्थान पर चीन, यूनान, आदि देशों के लेखकों द्वारा भारत के संदर्भ में लिखे गए ग्रन्थों में उल्लिखित अप्रामाणिक तिथियों के अपनाने से आई हैं। इसी कारण जोन्स आदि को भारत के ऐतिहासिक तिथिक्रम में ऐसी कोई तिथि नहीं मिली, जिसके आधार पर वे भारत के प्राचीनइतिहास के तिथिक्रम का निर्धारण कर पाते। यह आश्चर्य की बात ही है कि भारतीय पुराणों में उल्लिखित एक ठोस तिथिक्रम के होते हुए भी जोन्स ने यूनानी साहित्य के आधार पर 327 ई. पू. में सेंड्रोकोट्टस के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य को जीवित मानकर 320 ई. पू. में उसके राज्यारोहण की कल्पना कर डाली और इसी तिथि को आधार बनाकर भारत का एक ऐसा पूरा ऐतिहासिक तिथिक्रम निर्धारित कर दिया जो कि भारतीय स्रोतों के आधार पर कहीं टिक ही नहीं पाता।इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि एक देश विशेष का इतिहास लिखते समय विदेशी साहित्य का सहयोग लेना तो उचित माना जा सकता है किन्तु उसके आधार पर उस देश का ऐतिहासिक तिथिक्रम तैयार करना किसी भी प्रकार से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। 320 ई. पू. के आधार पर भारत के ऐतिहासिक तिथिक्रम का निर्धारण करके और वह भी भारतीय स्रोतों को न केवल नकार कर वरन उसे कपोल-कल्पित तथा अप्रामाणिक बताकर पाश्चात्य लेखकों ने भारत की भावी संतति के साथ अन्याय ही नहीं किया, वरन विश्वासघात भी किया है।

विदेशी आधारों पर पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीयइतिहास की घटनाओं की जो तिथियाँ निर्धारित की गईं, उनकी पुष्टि किसी भी भारतीय स्रोत के आधार पर नहीं हो पाती।

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