क्या है मनुस्मृति और कौन है महर्षि मनु ?

#क्या_है_मनुस्मृति_और_कौन_है_महर्षि_मनु ⁉️

ऐसा देखने में आया है कि मनु एवं मनुस्मृति का विरोध करने वालों में प्रमुखतः तीन प्रकार के व्यक्ति हैं ।

(१) एक तो वे , जिन्होंने मनु को पूर्वाग्रहग्रस्त अंग्रेजी अलोचनाओं और उस परम्परा के माध्यम से पढ़ा है , और जो प्राचीन भारतीय साहित्य में कालक्रम से हुए परिवर्तनों - प्रक्षेपों से परिचित नहीं हैं ।

(२) दूसरे वे , जिन्होंने मनुस्मृति के मौलिक और प्रक्षिप्त , दोनों पों को चिन्तन - मनन पूर्वक नहीं पढ़ा है ।

(३) तीसरे वे , जिन्होंने किन्हीं भ्रान्तियों , पूर्वाग्रहों और निहित स्वार्थों के कारण मनु के विरोध को अपना लक्ष्य बना लिया है ।

किन्तु वास्तविकता यह है कि महर्षि मनु का व्यक्तित्व और कृतित्व निंदा और विरोध करने का पात्र नहीं है । वे भारत और भारतीयता के लिए गर्व और गौरव के विषय हैं । भारत में मनु की प्रतिष्ठा महर्षि मनु ही पहले वह व्यक्ति हैं , जिन्होंने संसार को एक व्यवस्थित , नियमबद्ध , नैतिक एवं आदर्श मानवीय जीवन जीने की पद्धति सिखायी है । वे मानवों के #आदि_पुरुष है , आदि धर्मशास्त्रकार , आदि विधिप्रणेता , आदि विधिदाता ( #लॉ_गिवर ) , आदि समाज और राजनीति व्यवस्थापक , आदि #राजर्षि हैं । मनु ही वह प्रथम धर्मगुरु हैं , जिन्होंने यज्ञपरम्परा का प्रवर्तन किया । उनके द्वारा रचित धर्मशास्त्र , जिसको कि आज #मनुस्मृति के नाम से जाना जाता है , सबसे प्राचीन स्मृतिप्रन्थ है ।

अपने साहित्य और इतिहास को उठाकर देख लीजिए , वैदिक साहित्य से लेकर आधुनिक काल तक एक सुदीर्घ परम्परा उन शास्त्रकारों , साहित्यकारों , लेखकों , कवियों और राजाओं की मिलती है , जिन्होंने मुक्तकण्ठ से मनु की प्रशंसा की है ।

(१) #वैदिक_संहिताओं एवं #ब्राह्मणप्रन्थों में मनु के वचनों को “ औषध के समान हितकारी और गुणकारी " कहा है ।

(२) महर्षि वाल्मीकि #रामायण में मनु को एक प्रामाणिक धर्मशास्त्रज्ञ के रूप में उद्धृत करते हैं और हिन्दुओं में भगवान् के रूप में पूज्य राम अपने आचरण को शास्त्रसम्मत सिद्ध करने के लिए उसके समर्थन में मनु के श्लोकों को उद्धृत करते हैं ।

(३) #महाभारत में अनेक स्थलों पर मनु का सर्वोच्च धर्मशास्त्र और न्यायशास्त्री के रूप में उल्लेख करते हुए उनके धर्मशास्त्र को परीक्षासिद्ध घोषित किया है ।

(४) अनेक #पुराणों में मनु को आदि राजर्षि , शास्त्रकार आदि विशेषणों से विभूषित करके उन्हें लोक हितकारी व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया है ।

(५) #निरुक्त में आचार्य यास्क ने मनु के मत को उद्धृत करके ' पुत्र - पुत्री के समान दायभाग ' के विषय में प्रामाणिक माना है ।

(६) #कौटिल्य अर्थशास्त्र में चाणक्य ने मनु के मत को प्रमाण रूप में उद्धृत किया है ।

(७) #स्मृतिकार_बृहस्पति मनु की स्मृति को सबसे प्रामाणिक स्मृति मानकर उसके विरुद्ध स्मृतियों को अमान्य घोषित करते हैं ।

(८) बौद्ध कवि #अश्वघोष ने अपनी कृति 'वज्रकोपनिषद्' में मनु के वचनों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है ।

(९) #याज्ञवल्क्यस्मृति , मनुस्मृति पर ही आधारित है ।

(१०) सभी #धर्मसूत्रों और #स्मृतियों में मनु के वचनों को समर्थन में प्रस्तुत किया है ।

(११) वलभी के राजा #धारसेन के ५७१ ईस्वी के शिलालेख में मनुधर्म को प्रामाणिक घोषित किया है ।

(१२) बादशाह शाहजहां के लेखक पुत्र #दाराशिकोह ने मनु को वह प्रथम मानव कहा है , जिसे यहूदी , ईसाई , मुसलमान आदम कहकर पुकारते हैं ।

(१३) #गुरु_गोविन्दसिंह ने ' दशम ग्रन्थ ' में मनु का मुक्तकण्ठ से गुणगान किया है ।

(१४) आर्य समाज के प्रवर्तक #महर्षि_दयानन्द ने वेदों के बाद मनुस्मृति को ही धर्म में प्रमाण माना है ।

(१५) #श्री_अरविन्द ने मनु को अर्धदेव के रूप में सम्मान दिया है ।

(१६) #श्री_रवीन्द्रनाथ_टैगोर , डॉ . राधाकृष्णन जवाहरलाल नेहरु आदि राष्ट्रनेताओं ने मनु को आदि  "लॉ गिवर" के रूप में उल्लिखित किया है ।

(१७) अनेक कानूनविदों जस्टिस डी . एन . मुल्ला , एन . राघवाचार्य आदि ने स्वरचित हिन्दू लॉ सम्बन्धी ग्रन्थों में मनु के विधानों को ' अथारिटी ' घोषित किया है ।

(१८) मनु की इन्हीं विशेषताओं के आधार पर , लोकसभा में भारत का संविधान प्रस्तुत करते समय जनता और #पं_नेहरु ने तथा जयपुर में #डॉ_अम्बेडकर की प्रतिभा का अनावरण करते समय तत्कालीन राष्ट्रपति आर . वेंकटरमन ने डॉ . अम्बेडकर को 'आधुनिक मनु' की संज्ञा से गौरवान्वित किया था ।

🔮#विदेशों_में_महर्षि_मनु_की_प्रतिष्ठा_मनु_की_प्रतिष्ठा
गरिमा और महिमा का प्रभाव एवं प्रसार विदेशों में भी भारत से कम नहीं रहा है ।

(१) ब्रिटेन , अमेरिका , जर्मन से प्रकाशित ' #इन्साइक्लोपीडिया ' में मनु को मानवजाति का आदि पुरुष , आदि धर्मशास्त्रकार , आदि विधिप्रणेता , आदि न्यायशास्त्री और आदि "समाजव्यवस्थापक" वर्णित किया है ।

(२) मनु के मन्तव्यों का समर्थन करते हुए अपनी पुस्तकों में मैक्समूलर ,
ए . ए . मैकडानल , ए . बी . कीथ , पी . थामस , लईसरेनो आदि पाश्चात्य लेखकों ने मनुस्मृति को धर्मशास्त्र के साथ - साथ एक लॉ बुक ' भी माना है और उसके विधानों को सार्वभौम , सार्वजनीन तथा सबके लिए कल्याणकारी बताया है ।

(३) भारतीय सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज #सर_विलियम_जोन्स ने तो भारतीय विवादों के निर्णय में मनुस्मृति की अपरिहार्यता को देखकर संस्कृत सीखी और मनुस्मृति को पढ़कर उसका सम्पादन भी किया ।

(४) जर्मन के प्रसिद्ध दार्शनिक #फ्रीडरिच_नीत्से ने तो यहां तक कहा कि " मनुस्मृति #बाइबल से उत्तम ग्रन्थ है " बल्कि " उससे बाइबल की तुलना करना ही पाप है । "

(५) अमेरिका से प्रकाशित             
         '"#इन्साइक्लोपीडिया_आफ___दि_सोशल_साइंसिज"' ,

 "#कैम्ब्रिज_हिस्ट्री_आफ_इंडिया" ,

 कीथरचित ' #हिस्ट्री_आफ_संस्कृत_लिटरेचर  ' ,

 भारतरल पी . वी . काणे रचित

 '#धर्मशास्त्र_का_इतिहास '

#डॉ० सत्यकेतु रचित                
                
"#दक्षिण - पूर्वी और दक्षिण एशिया में भारतीय संस्कृति"

आदि पुस्तकों में #विदेशों में मनुस्मृति के प्रभाव और प्रसार का जो विवरण दिया गया है , उसे पढ़कर प्रत्येक भारतीय अपने अतीत पर गर्व कर सकता है ।

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#मनु_की_वर्णव्यवस्था_का_वास्तविक_स्वरूप

( १ .) मनु की वर्णव्यवस्था गुण - कर्म - योग्यता पर आधारित और वेदमूलक -

मनुस्मृति में वर्णित गुण - कर्म - योग्यता पर आधारित वर्णव्यवस्था वेदमूलक है । यह मूलतः तीन वेदों ( ऋग् १० . ९० . ११ - १२ ; यजु० ३१ . १० - ११ ; अथर्व० १९ . ६ . ५ - ६ ) में पायी जाती है । मनु वेदों को धर्म में परम प्रमाण मानते हैं , अतः उन्होंने वर्णव्यवस्था को धर्ममूलक व्यवस्था मानकर उसे वेदों से ग्रहण करके अपने शासन में क्रियान्वित किया तथा धर्मशास्त्र के द्वारा प्रचारित एवं प्रसारित किया ।

( २ .) वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था में अन्तर और परस्परविरोध -

मनु की वैदिक वर्णव्यवस्था गुण - कर्म - योग्यता पर आधारित है , जन्म पर आधारित नहीं । यह समझ लेना आवश्यक है कि वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था परस्पर विरोधी व्यवस्थाएं हैं । एक की उपस्थिति में दूसरी नहीं टिक सकती । इनके अन्तर्निहित अर्थभेद को समझकर इनके मौलिक अन्तर को आसानी से समझा जा सकता है । वर्णव्यवस्था में वर्ण प्रमुख है और जातिव्यवस्था में जाति अर्थात् ' जन्म ' प्रमुख है । जिन्होंने इनका समानार्थ में प्रयोग किया है उन्होंने स्वयं को और पाठकों को भ्रान्त कर दिया । ' वर्ण ' शब्द ' वृज् - वरणे ' धातु से बना है , जिसका अर्थ है - ' जिसको वरण किया जाये ' वह समुदाय । निरुक्त में #आचार्य_यास्क ने इसके अर्थ को इस प्रकार स्पष्ट किया है।

“ वर्ण : वृणोते : ” ( २ . १४ ) = वरण करने से वर्ण ' कहलाता है ।

जबकि #जाति का अर्थ है - ' जन्म ' । इस अर्थ में जाति शब्द का प्रयोग मनुस्मृति में हुआ " जाति - अन्धबधिरौ ” ( १ . २०१ ) = जन्म से अन्धे - बहरे । " जाति स्मरति पौर्विकीम् " ( ४ . १४८ ) = पूर्वजन्म को स्मरण करता है । " द्विजाति : " ( १० . ४ ) = द्विज , क्योंकि उसके दो जन्म होते हैं । “ एकजाति : " ( १० . ४ ) = शूद्र , क्योंकि उसका विद्याजन्म नहीं होता । एक जन्म ही होता है ।

 वैदिक वर्णव्यवस्था में समाज को ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र , इन चार समुदायों में व्यवस्थित किया गया है । जब तक गुण - कर्म - योग्यता के आधार पर व्यक्ति इन समुदायों का वरण करते रहे , तब तक वह वर्णव्यवस्था कहलायी । जब जन्म से ब्राह्मण , शूद्र आदि माने जान लगे तो वह जातिव्यवस्था बन गयी । वर्ण शब्द का धातु - प्रत्ययमूलक अर्थ ही यह संकेत देता है कि जब यह व्यवस्था बनी तब यह गुण - कर्म - योग्यता के अनुसार वरण की जाती थी , जन्म से नहीं थी ।

( ३ .) वर्गों में जातियों का उल्लेख नहीं -

मनु की कर्मणा वर्णव्यवस्था का साधक एक बहुत बड़ा प्रमाण यह है कि मनु ने केवल चार वर्णों का उल्लेख किया है , किन्हीं जातियों अथवा गोत्रों का परिगणन नहीं किया है । इससे दो तथ्य स्पष्ट होते हैं । एक - मनु के समय जन्मना कोई जाति नहीं थी । दो - जन्म अथवा गोत्र का वर्णव्यवस्था में कोई महत्त्व नहीं था और न उसके आधार पर वर्ण की प्राप्ति होती थी । यदि मनु के समय जातियां होती और जन्म के आधार पर वर्ण का निर्धारण होता तो वे उन जातियों का परिगणन अवश्य करते और बतलाते कि अमुक जातियां या गोत्र ब्राह्मण हैं और अमुक शूद्र । मनु , जन्माधारित महत्ताभाव को कितना उपेक्षणीय समझते हैं , इसका ज्ञान उस श्लोक से होता है जहां भोजनार्थ कुल - गोत्र का कथन करने वाले को उन्होंने ' वान्ताशी = वमन करके खाने वाला ' जैसे निन्दित विशेषण से अभिहित किया है ( ३ . १०९ ) । और आदर - बड़प्पन के मानदण्डों में कुल - गोत्र - जाति का उल्लेख ही नहीं है , केवल गुण - कर्मो का है ।

(४.) मनु को जातिव्यवस्थापक मानने से मनुस्मृति - रचना व्यर्थ -

यदि हम मनु को जन्मना वर्णव्यवस्था का प्रतिपादक मान लेते हैं तो इससे मनुस्मृतिरचना का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जायेगा , क्योंकि मनुस्मृति में पृथक् - पृथक् वर्गों के लिए पृथक् - पृथक् कर्मों का विधान किया गया है । यदि कोई व्यक्ति जन्म से ही बाह्मण , क्षत्रिय , वैश्य या शूद्र कहलाने लगता है , तो वह विहित कर्म करे या न करे , वह उसी वर्ण में रहेगा । उसके लिए कर्मों का विधान निरर्थक है । मनु ने जो पृथक कर्मों का निर्धारण किया है , वही यह सिद्ध करता है कि वे कर्म के अनुसार वर्णव्यवस्था को मानते हैं , जन्म से नहीं ।

(५ .) वर्णव्यवस्था में वर्णपरिवर्तन का विधान -

 वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था में एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि वर्णव्यवस्था में वर्णपरिवर्तन हो सकता है और व्यक्ति को वर्णपरिवर्तन की स्वतन्त्रता होती है , जबकि जातिव्यवस्था में जहां जन्म हो गया , जीवनपर्यन्त वही जाति रहती है । मनु की व्यवस्था वर्णव्यवस्था थी , जिसमें व्यक्ति को वर्ण परिवर्तन की स्वतन्त्रता थी । इस विषय में मनुस्मृति का एक महत्त्वपूर्ण श्लोक प्रमाणरूप में उद्धृत किया जाता है जो सभी सन्देहों को दूर कर देता है।

शूद्रो ब्राह्मणताम् एति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् । क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात्तथैव च । । ( अ० १० , श्लोक ६५ )

अर्थात् - गुण , कर्म , योग्यता के आधार पर ब्राह्मण , शूद्र बन जाता है और शूद्र ब्राह्मण । इसी प्रकार क्षत्रियों और वैश्यों में भी वर्णपरिवर्तन हो जाता है । '

(६ .) निर्धारित कर्मों के त्याग से वर्णपरिवर्तन -

मनुस्मृति में दर्जनों ऐसे श्लोक हैं , जिनमें निर्धारित कर्मों के त्याग से और निकृष्ट कर्मों के कारण द्विजों को शूद्र कोटि में परिगणित करने का विधान किया है [ द्रष्टव्य २ । ३७ , ४० , १०३ , १६८ : ४ । २४५ आदि श्लोक । और शूद्रों को श्रेष्ठ कर्मों से उच्चवर्ण की प्राप्ति का विधान है ( ९ . ३३५ ) ।

 (७ .) महाभारत काल तक वर्णव्यवस्था का प्रचलन -

 उक्त प्रमाणों और युक्तियों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मनु द्वारा विहित वर्णव्यवस्था में सभी व्यक्तियों को गुण - कर्मानुसार वर्ण में दीक्षित होने के समान अवसर प्राप्त थे । ऋग्वेद से लेकर महाभारत ( गीता ) पर्यन्त यह कर्माधारित वर्णव्यवस्था चलती रही है । गीता में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है " चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुण - कर्म - विभागशः " [ ४ । १३ ]

(८.) चारों वर्षों में पाये जाने वाले समान गोत्रों का रहस्य - ब्राह्मणों , क्षत्रिय जातियों , वैश्य और दलित जातियों में समान रूप से पाये जाने वाले गोत्र , ऐतिहासिक वंश परम्परा के पुष्ट प्रमाण हैं , जो यह सिद्ध करते हैं कि वे सभी एक ही मूल परिवारों के वंशज हैं । पहले वर्णव्यवस्था में जिसने गुण - कर्म - योग्यता के आधार पर जिस वर्ण का चयन किया , वे उस वर्ण के कहलाने लगे । बाद में विभिन्न कारणों के आधार पर उनका ऊंचा - नीचा वर्णपरिवर्तन होता रहा । किसी क्षेत्र में वही ब्राह्मण वर्ण में रह गया तो कहीं क्षत्रिय , तो कहीं शूद्र कहलाया । कालक्रमानुसार जन्म के आधार पर उनकी जाति रूढ़ हो गयी ।

 (९.) वर्णव्यवस्था के आधारभूत तत्त्व -

मनुस्मृति में वर्णित वर्णव्यवस्था के आधारभूत तत्त्व हैं - गुण , कर्म , योग्यता । मनु व्यक्ति अथवा वर्ण को महत्त्व और आदर - सम्मान नहीं देते अपितु उक्त गुणों को देते हैं । जहां इनका आधिक्य है , उस व्यक्ति और वर्ण का महत्व , आदर - सम्मान अधिक है , न्यून होने पर न्यून है । आज तक संसार की कोई भी सभ्य व्यवस्था इन तत्त्वों को न नकार पायी है और न नकारेगी । इनको नकारने का अर्थ है - अन्याय , असन्तोष , आक्रोश , अव्यवस्था और अराजकता । मुहावरों की भाषा में इसी स्थिति को कहते हैं ' घोड़े - गधे को एक समझना ' या ' सभी को एक लाठी से हांकना । ' इसका परिणाम होता है , कोई भी समाज या राष्ट्र न विकास कर सकता है , न उन्नति ; न समृद्ध हो सकता है , न सम्पन्न न सुखी हो सकता है , न संतुष्ट न शान्त रह सकता है , न अनुशासित ; न व्यवस्थित रह सकता है , न अखण्डित । ऐसी व्यवस्था अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती । वर्तमान में निश्चित सर्वसमानता का दावा करने वाली साम्यवादी व्यवस्था भी इन तत्त्वों से स्वयं को पृथक् नहीं रख सकी । उसमें भी गुण - कर्म - योग्यता के अनुसार पद और सामाजिक स्तर हैं । उन्हीं के अनुरूप वेतन , सुविधा और सम्मान में अन्तर हैं ।

हमारी आजकल की प्रशासनिक और व्यावसायिक व्यवस्था की तुलना करके देखिए , मनु की बात आसानी से समझ आ जायेगी और ज्ञात होगा कि मनु की और आज की इन व्यवस्थाओं में मूलभूत समानता है । सरकार की प्रशासन व्यवस्था में चार वर्ग हैं - १ . प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी , २ . द्वितीय श्रेणी राजपत्रित अधिकारी , ३ - ४ तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी । इनमें प्रथम दो वर्ग अधिकारी हैं , दूसरे कर्मचारी । यह विभाजन गुण - कर्म - योग्यता के आधार पर है और इसी आधार पर इनका महत्त्व , सम्मान एवं अधिकार हैं । इन पदों के लिए योग्यताओं का प्रमाणीकरण पहले भी शिक्षासंस्थान ( गुरुकुल , आश्रम , आचार्य ) करते थे और आज भी शिक्षासंस्थान ( विद्यालय , विश्वविद्यालय आदि ) ही करते हैं । शिक्षा का कोई प्रमाणपत्र नहीं होने से , अल्पशिक्षित या अशिक्षित व्यक्ति सेवा और शारीरिक श्रम के कार्य ही करता है और वह अन्तिम कर्मचारी श्रेणी में आता है । पहले भी जो गुरु के पास जाकर विद्या प्राप्त नहीं करता था , वह इसी स्तर के कार्य करता था और उसकी संज्ञा ' शूद्र ' थी । शूद्र के अर्थ हैं - ' निम्न स्थिति वाला ' ' आदेशवाहक ' आदि । नौकर , चाकर , सेवक , प्रेष्य , सर्वेट , अर्दली , निम्न श्रेणी कर्मचारी , आदि संज्ञाओं में कितनी अर्थसमानता है आप स्वयं देख लीजिये । व्यवसायों के निर्धारण में भी बहुत अन्तर नहीं है । शिक्षासंस्थानों से डाक्टर , वकील , अध्यापक , आदि की डिग्री प्राप्त करके ही व्यवसाय की अनुमति है , उसके बिना नहीं । सबके नियम - कर्तव्य निर्धारित हैं । उनकी पालना न करने वाले को व्यवसाय और पद से हटा दिया जाता

 (१०) . शूद्रों को वर्ण परिवर्तन के व्यावहारिक अवसर -

 जो लोग अपने आपको ' शूद्र ' समझते हैं और अभी तक किसी कारण से स्वयं को ' शूद्रकोटि ' में मानकर मानवीय अधिकारों से वंचित रखा हुआ है , मनु को धर्मगुरु मानने वाला और मनु के सिद्धान्तों तथा व्यवस्थाओं पर चलने वाला ' आर्यसमाज ' योग्यतानुसार किसी भी वर्ण में दीक्षित होने का उनका आह्वान करता है और उन्हें व्यावहारिक अवसर देता है । जब आज का संविधान नहीं बना था , उससे बहुत पहले महर्षि दयानन्द ने मनुस्मृति के आदेशों के परिप्रेक्ष्य में छूत - अछूत , ऊंच - नीच , जाति - पांति , नारी - शूद्रों को न पढ़ाना ,  बाल - विवाह , अनमेल - विवाह , बहु - विवाह , सती प्रथा , शोषण आदि को सामाजिक बुराइयां घोषित करके उनके विरुद्ध संघर्ष किया था । नारियों के लिए गुरुकुल और विद्यालय खोले । अपनी शिक्षा संस्थाओं में शूद्रों को प्रवेश दिया , परिणामस्वरूप वहां शिक्षित सैंकड़ों दलित संस्कृत एवं वेद - शास्त्रों के विद्वान् स्नातक बन चुके हैं । दलित जाति के लोग क्यों भूलते हैं कि उनकी अस्पृश्यता को मिटाने के लिए , मनु के अनुगामी और ऋषि दयानन्द के शिष्य कितने ही आर्यसमाजी स्वयं अस्पृश्य ' बन गये थे , किन्तु उन्होंने संघर्ष को नहीं छोड़ा । इन घटनाओं से अनभिज्ञ दलित - लेखक आर्यसमाज को भी रंगीन चश्मे से देखते हैं । क्या उनकी यह अकृतज्ञता नहीं है ?

चक्रवर्ती श्रीभोजराज कृत #शृंगारमंजरी कथा में एक व्यापारी के पुत्र के सम्बन्ध में विवरण प्राप्त होता है । वह अनेक कलाओं तथा विज्ञानों में प्रवीण था , जैसे अश्वों द्वारा चालित वाहनों को चलाने की विधि ( अश्ववाहन विधि ) , हाथियों को पकड़ने की विधि ( गजायुर्वेद ) , व्यापार करने की कला ( वणिककला ) , जुए की कला के रहस्य ( द्युतरहस्य ) , वेश्याओं से सहचरी की कला वैशिकोपनिषद , चित्रकला , पत्रच्छेदनकला , पुस्तक प्रभूतिकला अर्थात् पुस्तक आदि के रखरखाव की कला । परन्तु इस प्रकार की स्थिति समस्त वणिकपुत्रों पर लागु नहीं की जा सकती थी । अन्य जातियो के समान वैश्यों में भी वर्ण का प्रभाव विद्यमान था । वैश्य लोग उन सभी का स्वागत करते थे जो व्यापार करते थे । कुछ ऐसे भी उल्लेख प्राप्त होते हैं । जब वैश्यपुत्र अपने पैतृक व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसाय अपना लेते थे । वैश्य समाज धनवाद और व्यापक व्यापार व्यवस्था का केंद्र बिन्दु था। 

(. मित्तल , ए . सी . , ‘ परमार साम्राज्य के अभिलेख ' , अहमदाबाद , 1979 , पृ . सं 66 .)

#संदर्भ :-पुस्तक:मनु का विरोध क्यों ? लेखक डॉ० सुरेन्द्र कुमार ' मनुस्मृति - भाष्यकार एवं प्रक्षेपानुसन्धानकर्ता ' आचार्य ( संस्कृत , व्याकरण , साहित्य , दर्शन ) एम . ए . ( संस्कृत , हिन्दी ) , पी - एच . डी . प्रकाशक आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट , दिल्ली

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