अयोध्या कितनी प्राचीन है ?
कुछ लोग यह भ्रम फैला रहे हैं कि अयोध्या ईसा के बाद की नगरी है जो पहले साकेत थी अर्थात् बौद्ध काल में... आदि आदि..! ये वही लोग हैं जो अंग्रेजो के बाद भारत की परिकल्पना बताते हैं और संस्कृत को ईसा के बाद की भाषा कहते फिरते हैं। इसी विषय पर अनेक एक से बढ़कर एक साक्षों के आधार पर हम जानेंगे की अयोध्या कितनी प्राचीन है❓कैसे अयोध्या के अलग अपभ्रंश बने? साकेत शब्द कब किस काल में किस अर्थ में आया?
◼️ईसा पूर्व में बौद्ध काल के पुर्व अयोध्या :
अयोध्या से अनुमान है कि अजेय क्षत्रियों के नगरी का नाम है क्योंकि अर्थ है कि जिसे युद्ध में जीता ना जा सके वह अ+योध्या कहलाईं।
(१) कोसल जनपद की एक नगरी थी जिसकी स्थापना का श्रेय स्वयं मनु को दिया गया है । परम्परागत रूप में इस मनु को सातवाँ मनु कहा गया है ।
(२)Faizabad Sanskritik Gazetteer
(By नीतू सिंह) में लिखा है "ऐतिहासिक तथा साहित्यिक प्रमाणों से भी यह स्पष्ट विदित होता है कि अयोध्या एक (बौद्ध काल से पहले की ) प्राचीन नगरी है ।
(३) #अथर्ववेद और तैत्तिरीय आरण्यक में अयोध्या का एक प्रतीकात्मक वर्णन मिलता है जिसमें मानव शरीर को आठ चौकों और नौ द्वारों वाली देवताओं की नगरी अयोध्या बताया गया है ।
' अष्टाचक्र नवद्वारा देवानां पूरयोध्या ।
तस्यां हिरव्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ॥
(४) अयोध्या के नामकरण के सम्बन्ध में एक अन्य पौराणिक कथा है । कहा जाता है कि मनु ने अयोध्या नगरी को बसाकर उसका राज्य अपने ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु को दे दिया । इक्ष्वांकु के बाद उसका पुत्र विकुक्षि अयोध्या का राजा हुआ । इस विकुक्षि का एक दूसरा नाम ' अयोध ' भी था और कुछ विद्वानों ने यह संकेत दिया है कि इस नगरी का यह नाम अयोध्या के कारण पड़ा ।
(५) अयोध्या के नामकरण के सम्बन्ध में पौराणिक कथा है ।
तेषां विकुक्षिपेठस्तु विकुक्षित्वाद अयोधताम ।
प्राप्तः परधर्मज्ञः सोडयोध्याधिपति प्रभुः ।।
' जहाँ तक पुराणों में उल्लिखित इतिहास का प्रश्न है , अपने लम्बे अस्तित्व काल में अयोध्या के कम - से - कम चार बार बसाए जाने का उल्लेख मिलता है । पहली बार स्वयं मनु ने इसे बसाया था , जिसका उल्लेख हम पहले कर चुके हैं । श्रीराम ने अपने जीवन के अन्तिम समय में इस नगरी का परित्याग करके स्वर्ग - गमन किया और अयोध्या उजड़ गयी । लेकिन , कुछ ही दिनों बाद उनके पुत्र कुश ने इसे दुबारा बसाया था । रामायण के उत्तरकाण्ड में यह उल्लिखित है कि अयोध्यापुरी राम के जाने के बाद बहुत दिनों तक सूनी पड़ी रहेगी , फिर राजा ऋषभ के समय में यह पुनः आबाद होगी । किन्तु कालान्तर में यह पुनः उजड़ गयी और किंवदन्ती यह कहती है कि विक्रमादित्य ने इसे फिर बसाया ।'
(६) #ऋग्वेद के चौथे मण्डल के तीसवें सूक्त की सतरहवीं - अठारहवीं में यदु और #तुर्वश के द्वारा इन्द्र की सहायता से नदी पार करके सरयूपार के क्षेत्र में अर्ण और चित्रवथ को परास्त करने अथवा वध करने की बात कही गयी है
उत व्या तुर्वशायदू अस्नातारा शचीपतिः ।
इन्द्रो विद्वां अपरायत् ॥7 ॥
उत व्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः ।
अर्णो चित्ररथवधीः ॥8 ॥
यहाँ स्पष्ट रूप से सरयूपार क्षेत्र का उल्लेख है जहाँ के चित्ररथ और अर्ण को चद्रवंशी तुर्वश और यदु क्षत्रियों ने परास्त किया था । अयोध्या प्राचीन नगरी है तथा धार्मिक व सांस्कृतिक है । यद्यपि प्रथम तीन वेदों में कोसल व उसकी राजधानी अयोध्या का उल्लेख नहीं आता किन्तु #अथर्ववेद में इस नगरी को स्वयं देवताओं द्वारा निर्मित बताया गया है तथा इसको स्वर्ग की भाँति सम्पन्न कहा गया है ।
(७) "स्कन्द पुराण" में अयोध्या शब्द के माहात्म्य का वर्णन अधोलिखित है :
"अकरो ब्रह्म च प्रोक्तं यकरो विष्णुरुच्यते ।
धकारो रुद्ररूपश्च अयोध्यानाम राजते ।"
#अर्थात् अयोध्या शब्द में निहित अक्षरों का महत्त्व बताया गया है - ' अ ' कार ब्रह्म ' य ' कार विष्णु तथा ' ध ' रुद्र का प्रतीक है । इसलिए अयोध्या ब्रह्मा , विष्णु और महेश तीनों का एकीकृत स्वरूप है ।
(८) प्राचीनकाल में अयोध्या के चारों ओर का प्रदेश कोसल के नाम से जाना जाता था । साहित्य में अयोध्या और कोसल दोनों का उल्लेख मिलता है । मत्स्य तथा वायु पुराण में इसे इक्ष्वाकुओं की राजधानी तथा बृहत्संहिता में राम के पुत्र कुश द्वारा बसाए जाने का उल्लेख मिलता है ।
(९)' युग पुराण' में साकेत का उल्लेख करते समय उसके सात राजाओं तथा भवन सैनिकों द्वारा घेरे जाने का उल्लेख है ।
(१०) वायु पुराण में भी साकेत का उल्लेख है ।
(११) शतपथ ब्राह्मण में कोसल को वैदिक आर्यों का देश कहा गया है ।
(१२) 'ऐतरेय ब्राह्मण' तथा 'सांख्यायन श्रौतसूत्र' में अयोध्या को एक ग्राम के रूप में अभिहित किया गया है । प्रायः सभी पुराणों और दोनों महाकाव्यों में अयोध्या का उल्लेख बार - बार मिलता है ।
(१३) भविष्य पुराण प्रतिसर्ग में यह उल्लेख मिलता है
अयोध्या मथुरा माया काशी कांची हावंतिका ।
पुरी द्वारावती तेन राज्ञा च पुनरुद्धृताः॥
________________( / 23 , 26 बी -30 अ )
यहाँ पर तेन राज्ञा च पुनरुद्धृता का ताप्पर्य यह बताया गया है कि उस राजा ने इन सातों नगरियों का पुनरुद्धार किया । कुछ लोगों ने इसे पुष्यमित्र माना है , जो ईसा पूर्व की दूसरी शताब्दी में हुए थे । किन्तु ऐसा लगता है कि यह गुप्त वंशीय कोई राजा था जिसको विक्रमादित्य कहा गया है ।
(१४) नारदीय पुराण में एक प्रसिद्ध श्लोक मिलता है जिसमें अयोध्या को मथुरा , माया , काशी , कांची , अवन्तिका और द्वारावती , इन सात मोक्षदायी नगरियों में सबसे पहला स्थान दिया गया है ।
(१५) ब्रह्माण्ड पुराण में केवल छः नाम गिनाए गये हैं । किन्तु इन सभी उद्धरणों में अयोध्या का नाम सबसे पहले आता है । कुछ पुराणों में इन सप्तपुरियों के नाम थोड़े से हेर - फेर के साथ मिलते हैं । पुराणों में इसका उल्लेख तीर्थ के रूप में भी हुआ है । नामकरण अयोध्या - अयोध्या के विविध रूप मिलते हैं जैसे - अयोज्झा , अयुज्झापुर , उज्झा , अ - यु - ज , अयुधा , अजोदह और अवध ।
(१६) बौद्ध पालि ग्रन्थों में अयोध्या का नाम अयोज्झा और अयुज्झा मिलता है ।
(१७) प्रारम्भिक जैन प्राकृत ग्रन्थों में अयुज्झा और उत्तरकालीन जैन ग्रन्थों में अयुज्झा और उज्झा दोनों नाम मिलते हैं । उत्तर कालीन जैन प्राकृत ग्रन्थ अवस्गचूर्णि और अवस्सनिज्जुति ग्रन्थों में सायेय और साकेत नामों का उल्लेख मिलता है ।
◼️विभिन्न नाम अपभ्रंश विभिन्न ग्रंथ में......
(१) जैन ग्रन्थों में अयोध्या के कई नाम मिलते हैं जैसे - इक्खागभुमि, कोसल , विनीता रमपुरी और पदमपुरी आदि । जैन ग्रन्थ कल्पसूत्र में भी कोसल के ऋषभ तीर्थंकर की भूमि इक्खागभूमि का उल्लेख मिलता है । "
(२) चतुर्थ शताब्दी ई . के प्रारम्भिक जैन प्राकृत ग्रन्थ पौमचरिय में अयोज्झा को इक्ष्वाकु वंश के राजा अजित की राजधानी तथा भारत ( भरत ) की नगरी बताया गया है । इसी ग्रन्थ में अयोध्या को कोसल तथा साकेत के पर्यायवाची के रूप में भी उल्लिखित किया गया है ।
(३) संस्कृत ग्रन्थों में प्रायः अयोध्या नाम ही मिलता है । महाभारत तथा रामायण में अयोध्या का उल्लेख है । महाभारत में इसे इक्ष्वाकुओं की राजधानी तथा रामायण में अयोध्या को सरयू तट पर स्थित बताया गया है ।
(४) कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में अयोध्या और साकेत को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया है ।
(५) मत्स्य तथा वायु पुराण में इसे इक्ष्वाकुओं की राजधानी तथा वृहत्संहिता में राम के पुत्र कुश द्वारा इसे दुबारा बसाए जाने का उल्लेख भी मिलता है ।
(६) चीनी स्रोतों में इसे अ - यु - ज - अयुज ( अथवा अवध ) नाम से उल्लिखित किया गया है । ' साकेत - अयोध्या का एक नाम साकेत भी मिलता है ।
(७) पाणिनि तथा पतंजलि ने साकेत की तरफ जाने वाले मार्गों का उल्लेख किया है ।
(८) युग पुराण में साकेत का उल्लेख करते समय उसके सात राजाओं तथा यवन सैनिकों द्वारा उसके घेरे जाने का उल्लेख है । वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराण में भी साकेत का नाम उल्लेख है ।
(९) रघुवंश महाकाव्य में साकेत को अयोध्या के साथ समी.त किया गया है ।
(१०) हेमचन्द्र ने साकेत को अयोध्या और कोसल को एक ही माना है ।
(११) यादव प्रकाश के शब्दकोश वैजन्ती में साकेत , अयोध्या , कोसल एवं नन्दिनी को पर्यायवाची माना गया है ।
(१२) यशोधर तथा कामसूत्र में भी साकेत को अयोध्या का पर्यायवाची मानकर उल्लिखित किया गया है ।
(१३) काशिका में साकेत को पाटलिपुत्र के समान एक खाई की भाँति बताया गया है ।
(१४) वराहमिहिर ने भी साकेत का उल्लेख किया है ।
(१५) महामयूरी में साकेत के यक्षों का तथा कामसूत्र में वहाँ स्थित गणिकाओं का उल्लेख किया गया है ।
(१६) बौद्ध पालि ग्रन्थों में साकेत के अनेक उद्धरण मिलते हैं ।
(१७) संयुक्त निकाय में उसे कोसल राजा पसेनदि ( प्रसेनजित ) के साम्राज्य के अन्तर्गत बताया गया है ।
(१८) विनय तथा संयुक्त निकाय में साकेत के मार्गों , नदियों तथा उसे कोसल की राजधानी के रूप में उल्लिखित किया गया है ।
(१९) दीप निकाय में साकेत की गणना भारत के छः महाजनपदों में की गयी है ।
(२०) अंगुत्तर निकाय में साकेत के तिकण्डकि वन , जहाँ बुद्ध ने निवास किया था और कालकाराम बगीचे का तथा सुत्तनिपात में श्रावस्ती और प्रतिष्ठान के बीच पड़ने वाले पहले पड़ाव के रूप में साकेत का उल्लेख मिलता है ।जातकों में नंदियमग जातक तथा महावस्तु में इसका उल्लेख है ।
(२१) पालि बौद्ध टीका धम्मपदत्थकथा में व्यापारी धनंजय द्वारा साकेत के स्थापित किये जाने की चर्चा है ।
(२२) प्रारम्भिक जैन प्राकृत साहित्य में साकेत का ज्ञान कुछ भिन्न रूप में मिलता है । इसमें साकेत को सायेय और सागेय अथवा साकेय के रूप में उल्लिखित किया गया है , जो साकेत का ही रूप है । सायेय और सागेय का उल्लेख पन्नवना , नायाधम्मकहायो , अन्नगददसाओ , अनुत्तरोववाइयदसाओ तथा विवागसूय आदि में मिलता है । सायेय और साकेय नाम उत्तरकालीन जैन प्राकृत ग्रन्थों में मिलते हैं । इसमें अवस्सगचूर्णि और अवस्सनिज्जुति ग्रन्थ आते हैं । अवस्सगचूर्णि में साकेय में सुरप्पिया के नाम के यक्ष मन्दिर होने का उल्लेख है तथा अवस्सनिज्जति में अभिणन्दन द्वारा सायेय में प्रथम पारणा करने का उल्लेख है ।
(२३) चतुर्थ शताब्दी ईसवी के प्रारम्भिक जैन प्राकृत साहित्य में भी साकेत के लिए सायेय नाम मिलता है । पौमचरिय में सायेय में स्थित एक मन्दिर का उल्लेख है जो मुनि सुरतस्वामिन को दिया गया था ।
(२४) " ग्रीक लेखक टॉलेमी साकेत को सोगेद के रूप में उल्लिखित करता है और तिब्बती ग्रन्थ इसे ' सोकेड ' के रूप में ।
(२५) तिब्बती ग्रन्थों में गुजान शासक कनिक ( कुशाण शासक कनिष्क ) और लिग - वंश के शासक विजयकीर्ति द्वारा सोकेड को अधिकृत किये जाने का उल्लेख है जहाँ विजयकीर्ति में अनेक बौद्ध विहारों को प्राप्त किया था ।
(२५) चीनी स्रोतों में साकेत के लिए श - कि नाम मिलता है जिसका उल्लेख फाहियान ने किया है । उसने श - कि को महान देश के रूप में उल्लिखित किया है । चीनी स्रोतों में इसका एक नाम श - कि - त ( = साकेत ) भी मिलता है । इसमें कहा गया है कि म - मिंग ( अश्वघोष ) श - बि ( = श्रावस्ती ) देश के श - कि - त का निवासी था । कनिंघम ने साकेत और अयोध्या को एक ही माना है । उनके अनुसार फाहियान की श - कि अथवा श - चि और वेनसांग की विशाखा , साकेत अथवा अयोध्या ही है ।
(२६) रघुवंश महाकाव्य में साकेत और अयोध्या को एक - दूसरे का पर्यायवाची बताते हुए साकेत नगर को राजा दशरथ और उनके पुत्र की राजधानी के रूप में उल्लिखित किया गया है ।
(२७) #दिव्यावदान में साकेत की व्याख्या इस प्रकार की गयी है
#स्वयभागतं_स्वयभागतं_साकेत_साकेत_मिति_संज्ञ_संकृत्ता ।।
यह आप ही आप आया आप ही आप आया । इसलिए साकेत नाम पड़ गया । संस्कृत में केत का अर्थ है बुलाना और आ उपसर्ग लगाने से अर्थ उलट जाता है । इसलिए साकेत का अर्थ हुआ अपने आप आना । ' स ' लगा देने का अर्थ हुआ किसी के साथ आप से आप आना । "
◼️ #विशाखा - अयोध्या को विशाखा भी कहा गया है जो सम्भवतः बौद्ध काल की देन है ।
(१) सिंहली परम्परा में धनंजय नामक एक श्रेष्ठि की पुत्री विशाख नाम की थी और बौद्ध साहित्य में उसे बहुत सम्मानित स्थान दिया गया है । धनंजय राजगृह का एक श्रेष्ठि था जो साकेत में आकर बस गया था । उसकी पुत्री विशाख का विवाह श्रावस्ती के श्रेष्ठि मृगार के पुत्र पुनर्वर्धन के साथ हुआ था । विशाखा ने सर्वप्रथम बौद्ध धर्म में दीक्षा ली थी । ' कनिंघम ने ' धनन ' और ' विशाख ' लेख वाले सिक्कों का भी उल्लेख किया है जो साकेत अथवा अयोध्या से बहुत बड़ी मात्रा में मिले हैं । "
◼️ #इक्खागभूमि -
(1) जैन ग्रन्थ में भी अयोध्या के कई नाम मिलते हैं तथा इक्खागभूमि , कोसल , विनीता , रामपुरी और पदमपुरी आदि । #आवस्सगनिज्जुति में इक्खागभूमि ( इक्ष्वाकुभूमि ) को अयोध्या का ही एक नाम बताया गया है और उसे प्रथम जैन तीर्थकर उसभ की राजधानी बताया गया है ।
(2) रामायण के उत्तरकाण्ड में यह उल्लेख मिलता है कि राम के जाने के बाद अयोध्यापुरी बहुत दिनों तक सूनी पड़ी रहेगी , फिर राजा ऋषभ के समय में यह पुनः आबाद होगी ।
(3) इससे लगता है कि ऋषभ राम के बाद हुए थे किन्तु जैनियों में ऋषभ प्रथम जैन तीर्थंकर के रूप में जाने जाते हैं जिसका जन्मस्थान इक्खागभूमि बताया जाता है ।
(4) जैन ग्रन्थ #कल्पसूत्र में भी कोसल के ऋषभ तीर्थकर की जन्मभूमि इक्खागभूमि का उल्लेख मिलता है । इस प्रकार रामायण में उल्लिखित अयोध्यापुरी और कल्पतरु में आये इक्कागभूमि दोनों एक ही स्थान हैं । "
◼️ #कोसल - कोसल महाजनपद के रूप में जाना जाता है किन्तु जैन स्रोतों में इसे एक नगर के रूप में भी बताया गया है ।
(1) हेमचन्द्र ने अभिधान चिन्तामणि में कोसल को साकेत और अयोध्या के अर्थ में ही प्रयुक्त किया है :
#साकेत =#अयोध्या = #कोसल ।
(2) प्रारम्भिक जैन प्राकृत ग्रन्थ #पन्नवना और #नायाधम्मकहाओ में कोसल को साकेत की राजधानी बताया गया है ।
(3) उत्तरकालीन जैन ग्रन्थ #अवस्सगचूर्णि में अयुज्झा ( अयोध्या ) को कोसल की प्रधान नगरी के रूप में उल्लिखित किया गया है । अवस्सगनिज्जुति में कोसल को कोसलपुर कहा गया है और उसे चौथे तीर्थंकर सुमै की राजधानी बताया गया है ।
(4) चतुर्थ शताब्दी ई . के प्रारम्भिक जैन प्राकृत ग्रन्थ पौमचरिय की अनुक्रमणिका में अयोध्या के पर्यायवाची के रूप में कोसल को कोसलपुरी , कोसला और कोसलानगरी के रूप में उल्लिखित किया गया है ।
◼️ #विनीता - अयोध्या का एक अन्य नाम विनीता अथवा विणीया भी मिलता है ।
(1) जम्बूदीप प्रज्ञप्ति में अयोध्या के लिए विणीया शब्द का प्रयोग मिलता है जिसे बरहवास ( भारतवर्ष ) की राजधानी बताया गया है जो प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभ की जन्मभूमि भी थी ।
(2) उत्तरकालीन जैन ग्रन्थों में विनीता के स्थान पर विणीया नाम मिलता है ।
(3) अवस्सगनिज्जुति के अनुसार , विणीया तीसरे जैन तीर्थकर अभिणंदन की राजधानी कही गयी है ।
(4) रामपुरी व पदमपुरी नाम भी जैन ग्रन्थों में भी प्रयुक्त किया गया है । इसके अतिरिक्त अयोध्या का एक नाम नन्दिनी भी है ।
(5) जैन - तीर्थकर रामायण में उत्तरकाण्ड में यह कहा गया है कि राम के स्वर्ग चले जाने के पश्चात रमणीय अयोध्यापुरी अनेक वर्षों तक सूनी पड़ी रहेगी और राजा ऋषभ के समय में यह पुनः आबाद होगी ।
(6) जैन परम्परा के अनुसार सभी तीर्थकर कालक्रम से अयोध्या में जन्म लेते और यहीं पर राज्य करते हैं । लेकिन चौबीस तीर्थंकरों में केवल पाँच तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या में मानी जाती है ।
इनके नाम इस प्रकार हैं -
1 . आदिनाथ अथवा ऋषभनाथ , 2. अजितनाथ , 3. अभिनन्दननाथ , 4. सुमन्तनाथ और 5. अनन्तनाथ ।
किन्तु सभी चौबीस तीर्थकरों को इक्ष्वाकुवंशीय ही कहा गया है । "
(7)"बुद्ध के समय में साकेत या अयोध्या एक विशाल और महत्त्वपूर्ण नगर बन चुका था । इसका एक प्रमाण यह भी है कि बुद्ध ने इस नगर की अनेक बार यात्रा की थी और यहाँ पर ठहरे थे । साकेत में जिन स्थानों पर बुद्ध ने निवास किया था उनमें अंजनयन तथा तिकण्डकिवन के नाम आते हैं । साकेत में ही कालाकाराम के स्थित होने का भी उल्लेख मिलता है जो बुद्ध के शिष्यों का आवास स्थल था । कालाकाराम में बुद्ध के भी ठहरने का उल्लेख मिलता है । "
(8) इस प्रकार हम देखते हैं कि बुद्ध और महावीर के काल में भी जिसे आधुनिक इतिहासकार छठी शताब्दी ई . पू . मानते हैं - साकेत अथवा अयोध्या एक समृद्धशाली और महत्त्वपूर्ण नगरी थी जो धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तो थी ही , राजनीतिक दृष्टि से भी उसका महत्त्व कम नहीं हुआ था ।
(9) चतुर्थ शताब्दी ई . के प्रारम्भिक जैन प्राकृत ग्रन्थ पौमचरित्र्य में अयोध्या को इक्ष्वाकु वंश के राजा अजित की राजधानी तथा भरत की नगरी बताया गया है । इसी ग्रन्थ में अयोध्या को कोसल तथा साकेत के पर्यायवाची के रूप में भी उल्लिखित किया गया है ।
(10) महाभारत में अयोध्या को इक्ष्वाकुओं की राजधानी तथा रामायण में अयोध्या को सरयूतट पर स्थित बताया गया है । कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में अयोध्या और साकेत को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया ।
(11) पाणिनी तथा पतंजलि ने साकेत की तरफ जाने वाले मार्गों का उल्लेख किया है । "
(12) कोसल यद्यपि महाजनपद के रूप में जाना जाता है किन्तु जैन स्रोतों में इसे एक नर के रूप में भी बताया गया है । हेमचन्द्र के अभिधान चिन्तामणि में कोसल को साकेत और अयोध्या के अर्थ में ही प्रयुक्त किया गया है ।
(13) इस प्रकार अयोध्या कोसल जनपद में सरयू के किनारे बसी थी । कोसल भारत के महाजनपदों में सम्मिलित था । ( अनुत्तर निकाय 1-213 ) इसके पश्चिम में कुरु - पंचाल तथा पूर्व में विदेह था । ( इण्डिया , वाल्यूम -1 , पृ . 308 ) । ।
(14) रामायण काल में इस जनपद का बहुत महत्त्व था किन्तु राम के बाद दो भागों में विभक्त हो गया । उनके बड़े पुत्र कुश दक्षिण कोसल के शासक हुए इन्होंने कुशायली नगरी जिसे विन्याचल में उन्होंने ही बसाया था , राजधानी बनायी ( वायुपुराण 88-198 ) ।
(15) छोटे पुत्र लव उत्तर - कोसल के राजा हुए । उन्होंने अपनी राजधानी श्रावस्ती में स्थापित की । बौद्ध धर्म के प्रारम्भ में भी कोसल के उत्तर व दक्षिण में दो भाग मिलते हैं । उत्तर कोसल के उत्तर व दक्षिण में दो भाग मिलते हैं । उत्तर कोसल की दो राजधानियाँ थीं श्रावस्ती और सकेत । सरयू नदी इन दोनों की विभाजक रेखा थी ।
(16) रामायण तथा अन्य प्रारम्भिक ग्रन्थों के अनुसार कोसल की पहली राजधानी अयोध्या थी किन्तु बुद्ध के समय उसका महत्त्व कम होता गया । ( पतंजलि कालीन भारत , 1963 , बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना , डॉ . प्रभुदयाल अग्निहोत्री , पृ . 107 )
(17) अयोध्या का राजवंश पुराणों और महाकाव्यों के अनुसार वैवस्वत मनु इस महादेश के प्रथम राजा थे और उन्होंने अयोध्या नगर बसाया था । " मनु के पुत्र इक्ष्वाकु प्रसिद्ध राजा थे जिसके समय कोसल की महत्ता बढ़ी । इक्ष्वाकु राजवंश में अनेक महत्त्वपूर्ण शासक हुए । ऐसा माना जाता है कि इस वंश के 125 राजाओं ने अयोध्या पर शासन किया जिसमें 91 महाभारत युद्ध के पूर्व हो चुके थे और शेष बाद में हुए । कहा जाता है कि इस वंश के छठे राजा पृथु का नाम पृथ्वी पड़ा , जिन्होंने मैदानों को समतल किया । उनके पौत्र श्रावस्त ने श्रावस्ती नगर बसाया जो बाद में उत्तर कोसल की राजधानी बना ।
(18) कुछ पीढ़ी बाद मान्धाता इस वंश का शासक हुआ । ऐसा कहा जाता है कि उसके शासन काल में सूर्य कभी नहीं डूबता था । मान्धाता के पुत्र पुरुकुत्स ने गन्धर्वे को हराया और नाग राजकुमारी से विवाह किया । उसका पौत्र अनरण्य एक युद्ध जो रौनाही नामक स्थल पर हुआ था , में मारा गया । रौनाही अयोध्या से लगभग 24 किलोमीटर दूर है ।
गौतम बुध्द का जब जन्म भी नहीं हुआ था तब से कई शताब्दियों पहले से ही इस प्रकार अयोध्या नगरी विद्यमान थी यही निष्कर्ष है। उदाहरण के लिए लेते हैं हम तैत्तिरीय ब्राह्मण, अयोध्या का नाम - वर्णन तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी आता है। The Andhra Pradesh Journal of Archaeology, Volume 3, Issue 2
(Director of Archaeology and Museums, Government of Andhra Pradesh.) , 1995 - Andhra Pradesh (India) में लिखा है :
"The Aitareya Brahmana with some certainty dates to the 1st millennium BCE, likely to its first half."
अर्थात् " शुरूआती आधा तैत्तिरीय ब्राह्मण ईसा के सहस्राब्दी वर्षों पुराना है...मानो लगभग १००० वर्ष पुराना... " और ऐसे प्राचीन ग्रंथ में अयोध्या का वर्णन किया गया है तो आप समझ लिजिए कि कैसे जब बुध्द पैदा भी नहीं हुए थे तब से अयोध्या थी और कैसे ये वामपंथी झुठ फैला रहे हैं जो निराधार हैं... 😊
इस प्रकार के और भी शेकडो साक्ष्य दिए जा सकते हैं लेकिन इस लेख में इतने ही पर्याप्त है अतः हम इतने में ही यह लेख विराम करते हैं। जय आर्यावर्त 🚩
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✍️जय मां भारती 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

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