सम्राट उदयादित्य द्वारा निर्मित उदयपुर का उदयेश्वर मंदिर !

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मालवचक्रवर्ती  राजा भोज के पुत्र राजा उदयादित्य परमार द्वारा 11 वीं सदी में बनवाए गए उदयेश्वर महादेव मंदिर भी अपने आप में विशेषता पूर्ण शिवालय है।

(१) लाल बलुआ पत्थर से निर्मित इस मंदिर का निर्माण संवत् 1116-1137 (सन् 1059-1080) के मध्य किया गया था। एक चौकोर प्रांगण में स्थित यह मंदिर भोजपुर मंदिर से कुछ छोटा, लेकिन उससे अधिक सुंदर है।

(२)मंदिर परिसर विशाल पत्थरों से निर्मित चार दीवारी से घिरा हुआ है। मंदिर में प्रवेश के लिए बनाए गए चार द्वारों में से दो द्वार आज भी उपयोग किए जाते हैं। मुख्य मंदिर आठ अनुवर्ती छोटे मंदिरों से घिरा हुआ था। जिसमें से चार अभी भी जीर्ण-शीर्ण स्थिति में बचे हुए हैं। मंदिर के बाहरी हिस्से में शिव-दुर्गा, ब्रह्मा, विष्णु, गणेश आदि विभिन्न् देवी-देवताओं की अनगिनत बेहद कलात्मक और नयनाभिराम प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं।

(३) सन् 1336-38 में तुर्क हमलावरों ने इस मंदिर पर हमला किया और उसके कुछ ध्वंसावशेषों से इसी के पास एक मस्जिद बनवाई...

(४) लंबे समय तक यह मंदिर उपेक्षित पड़ा रहा, लेकिन सन् 1775 में भेलसा (विदिशा का तत्कालीन नाम) के सूबा खंडेराव आप्पाजी ने मंदिर के अंदर स्थित विशाल शिवलिंग का पीतल का खोल चढ़वाया और उसकी विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा करवाई।

(५) वर्तमान समय में शिवरात्रि जैसे त्यौहार पर प्रतिवर्ष यहां एक विशाल मेला लगाया जाता है और आसपास के हजारों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करते हैं एवं शिवाभिषेक भी किया जाता है। यह वर्तमान में पर्यटन सकथल के लिए नामित स्थान है। 






(६) इस परमारकालीन नीलकंठेश्वर मंदिर में पड़ती है सूरज की पहली किरण :

विदिशा जिले के उदयपुरा में स्थित इस नीलकंठेश्वर शिवालय  में प्रतिदिन सूर्य किरणाभिषेक होता है। सूरज की पहली किरण मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग पर पड़ती है। मंदिर का वास्तु कुछ इस प्रकार का है कि भोर की पहली किरण वेधशाला, मंडप और गर्भगृह के छोटे से द्वार को चीरती हुई भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग पर पड़ती है। जैसे सूर्यदेव उदय के साथ ही भोलेनाथ को प्रणाम कर जग में उजियारा फैलाने की इजाजत मांगते हों।

(७) मुख्य शिवलिंग पर पीतल का आवरण चढ़ाया गया है। जिसे विशेष मौकों पर जल अर्पित करने और दर्शन के लिए अलग भी रख दिया जाता है। मंदिर मेंं शिवलिंग के पास ही देवी पार्वती की प्रतिमा भी मौजूद है। 

(८) यह  मंदिर आस्था और शिल्प का बेजोड़ नमूना है। गगनचुम्बी शिखर, नायाब शिल्प और गर्भगृह में विशाल शिवलिंग के दर्शन करने यहां श्रावण सोमवार पर लाखों दर्शनार्थी पहुंचते हैं। 

(९) मुख्य मंडपों से सजा है मंदिर
गंजबासौदा के पास स्थित छोटे से गांव उदयपुर में भगवान शिव का यह मंदिर विख्यात है।  मंदिर के प्रांगण में एक वेधशाला भी है।

(१०) परमारोंं की राजधानी धार से दूर उदयपुर में निर्मित यह मंदिर उनकी सुदूर राज्य की सीमाओं को भी दशातज़ है। मंदिर के शिखर समकालीन चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित खजुराहो मंदिर से समानता रखते हैं। नीलकंठेश्वर मंदिर में मंडप के साथ ही प्रवेश के लिए तीन ओर मुख मंडप हैं। 

(११) देखते बनती है पार्श्व कला:
गर्भगृह के दोनों ओर गंगा-यमुना मानव रूप में उत्कीर्ण दिखाई देती हैं। जो मंदिर में प्रवेश से पूर्व आत्मिक शुद्धता की ओर संकेत करती है। मंदिर के चारों ओर दिक्पाल, देवी देवताओं की प्रतिमाओं का अंकन है। दुर्गा प्रतिमाएं, गणेश प्रतिमाएं, ब्रह्मा और विष्णु की प्रतिमाएं भी यहां शोभायमान हैं। शिव के गणों की प्रतिमाएं भी प्रवेश द्वार पर मौजूद हैं। जगह-जगह घुंघराले बाल, उभरी हुई आंखें और बड़े पेट वाले भारवाही यक्ष अपने कंधों पर सारा भार उठाए स्तंभों पर नजर आते हैं।

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