गायत्री उपासना के मूल में निहित वैज्ञानिक सत्य
#गायत्री_उपासना_के_मूल_में_निहित_वैज्ञानिक_सत्यः
मंत्र विज्ञान ध्वनि विज्ञान पर आधारित एक विधा है।
हमारे पूर्वज ऋषि इसके उद्भत ज्ञाता थे।
उन्होंने ध्वनि तरंगों कि विशिष्टता को पहचाना था।उस आधार पर उन्हें विशेष सम्मान और स्थान दिया। गायत्री मंत्र को महामंत्र कहना इसी तथ्य को उजागर करता है और बताता है कि आरोग्य शास्त्र की दृष्टि से यह कितना अप्रतिम और अद्भुत है।
ऋषियों ने गायत्री शब्द को गायतं त्रायते इति गायत्री कहकर परिभाषित किया है।अर्थात जो गानेवाले का त्राण करे वही गायत्री है।पिछले दिनों इसे शास्त्रिय मान्यता भर माना जाता था और आप्तवचन से अधिक कुछ नहीं स्विकारा जाता था, लेकिन अब जबकि गायत्री मंत्र पर अध्ययन - अनुसंधान हो रहे हैं,तब विदित हुआ है कि उक्त परिभाषा में सूत्रकार की कितनी गहरी अंतर्दृष्टी सम्मिलित है।
अब जबकि ध्वनि विज्ञान पर आधारित गायत्री मंत्र का विश्लेषण हो चुका है, तब पता चला है कि उसमें शब्दों और अक्षरों का क्रम विन्यास कुछ इस प्रकार है कि जब उसका उच्चारण किया जाता है, तो उससे ऐसी तरंगें निःसृत होती है, जो संपुर्ण शरीर तंत्र पर अनुकूल प्रभाव डालती हैं। इस तथ्य के प्रकाश में जब गायत्री विषयक मान्यताओं पर, मनन किया गया, तो सभी बुध्दि संगत प्रतित हुई। वह गाने वाले का त्राण उसे समग्र रूप से स्वस्थ बनाकर करती हैं।
इन अंतर्वैज्ञानिक अनुसंधान तथ वैज्ञानिक शोधो की दिशा में उल्लेखनीय कार्य
#जबलपुर_हास्पिटल_अॅन्ड_रिसर्च_सेंटर
में ह्रदय रोग विभाग के प्रमुख एवं मूर्ध्दन्य ह्रदय रोग विशेषज्ञ डाॅ. आर. एस. शर्मा ने किया है। एक ह्रदय रोग विशेषज्ञ होने के नाते अध्ययन के लिए शर्मा ने सर्वप्रथम ह्रदय रोग और उससे संबंधित उच्च रक्तचाप को चुना, उसमें औषधि सेवन के साथ साथ गायत्री मंत्र जप को भी अनिवार्य बना दिया गया। कई रोगीयों पर अनेक महिने परिक्षण करने के उपरांत जो नतिजे सामने आए वह काफी उत्साहवर्धक थे। पाया गया कि जिन रोगीयों ने दवा के साथ साथ मंत्र जप को भी अपनाया था, उनके और केवल दवा पर आश्रित रोगीयों के स्वास्थ्य में भारी फर्क था। मंत्र जप को औषधि के साथ अनुपूरक चिकित्सा के रूप में अपनाने वाले मरिज़ शरिर, चेहरे और सक्रियता की दृष्टि से बिल्कुल अलग प्रतित हो रहे थे।जबकि केवल दवा पर निर्भर रोगीयों के मुखमंडल निस्तेज और थके हुए मालूम पडे़।
डाॅ. शर्मा ने उत्साहित होकर पुन्ह ह्रदय रोग और उच्चरक्तचाप पर गायत्री मंत्र के प्रभाव की therapy पर अनुसंधान किया। उसके लिए उन्होंने दो भिन्न भिन्न विचारों वाले लोगों का चयन कीया। एक दल में ऐसे लोगों को रखा जो आध्यात्मिक प्रकृति के औ नियमित मंत्र जप करते हैं। दुसरे ग्रुप में उन लोगों को रखा गया जिनकी दिनचर्या एकदम भौतिक है, चिंतन शैली भी भौतिक है,
जिन्होंने कभी भी कोई मंत्रोपासना नहीं की थी।।
दोनों का एज ग्रुप 25-35 रखा गया। दोनों की स्वास्थ्य परिक्षा कर कन्फर्म किया गया की वे स्वस्थ हैं। उनमें से किसी को भी कोई रक्तचाप ह्रदय आदि के रोग नहीं थे। आध्यात्मिक समुह को सलाह दी गई की वे अपने क्रम को आध्यात्मिक बनाए रखे और नियमित जपक्रम जारी रखे। कम से कम 5 माला नित् का प्रतिबंध लगा दिया गया। कंट्रोल ग्रुप पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था।अध्ययन तिन वर्ष तक चला। दोनों समुहों का बीच बीच में नियमित परिक्षण होता रहा। तिन वर्ष पश्चात जो परिणाम सामने आया वह वाक्कयी मे चौकाने वाले था। नियमित गायत्री मंत्र का जप करने और आध्यात्मिक जीवन शैली अपनाने वाले ह्रदय अथवा रक्तचाप संबंधित किसी प्रकार की कोई भी शिकायत नहीं पाई गई। जबकि कंट्रोल ग्रुप में से अनेकों में इसके लक्षण उभर आए थे। आध्यात्मिक ग्रुप शाकाहारी था जबकि कंट्रोल ग्रुप को आमिष - सामिष दोनों प्रकार के भोजन की छूट थी।
इसके अतिरिक्त तिव्र या अनियमित ह्रदय की गति वाले रोगियों पर प्रयोग किया गया। उन्होंने ऐसे बिमारी से सामान्य जाग्रत अवस्था के 16 घंटों में से हर दो घंटे गायत्री मंत्र की माला जपने को कहा। यह क्रम 1माह चलाने के बाद 24 घंटों में 4 घंटे रख दिया गया। जप संख्या बढाकर दुसरे महिने 3 माला कर दिया गया। इसके बाद इसी प्रकिया को अगामी महिनों में जारी रखा गया। इससे कुछ ही महीनों में ह्रदय गति सामान्य होती पाई गई।प्रयोग में गायत्री मंत्र के 🕉️वाले (प्रणव वाले) हिस्से से प्लुप्त उच्चारण (लंबा खिंचकर) पर जोर दिया गया, साथ ही इस बातपर भी ध्यान रखा गया कि बिमार की ह्रदय गति 50 से और रक्तचाप 90-60 से कम न हो।अन्य स्पेशलिस्ट ह्रदय विशेषज्ञ के द्वारा भी यहां कई प्रकार के इस क्षेत्र में शोध संस्थान आदि में मंत्र therapy का प्रयोजन पुर्णतः यथायोग्य परिणत करने का प्रयास किया गया है। जो कई शोध आदि अन्याय विदेशी विश्वविद्यालयों में भी जारी है।
उपरोक्त प्रयोग से ह्रदय गति और अन्य अनियमितताएं कैसे सामान्य हो जातीं हैं? इस संबंध में उनका कहना है कि मंत्र के शब्द विन्यास में ही चमत्कार है।उन शब्दों को क्रमिक रूप से बोलने या उच्चारण करने से कुछ असाधारण स्तर की ध्वनि तरंगें पैदा होती है। जो आॅटोनाॅमस नर्वस सिस्टम के सिंपैथेटीक वाले भाग को प्रभावित करना आरंभ करती है। तांत्रिकातंत्र के उस हिस्से के जाग्रत या सक्रिय होते ही ह्रदय गति एवं B.P. सामान्य होने लगती है और रोगी स्वयं को स्वस्थ अनुभव करता है।
अपने इन अध्ययनों के आश्चर्यजनक परिणामों की रिपोर्ट डाॅ. शर्मा ने विस्तृत रूप से अखिल भारतीय भेषज विज्ञान के विशेषज्ञ के सम्मेलन में भेजी जो उन दिनों गुहावाटी में संपन्न होने जा रहा था। शोध पत्र स्विकार कर लिया गया।
बाद में #जनरल_आॅफ_अशोसिएशन्स_आॅफ_फिजिशियन्स नामक भेषज विज्ञान शोध पत्रिका में प्रकाशित भी किया गया।सम्मेलन में गायत्री मंत्र को अन्य रोगो में आजमाने की अनुशंसा की गई। तथा रिपोर्ट की सराहना भी हुई।
गायत्री मंत्र एक मूल वैदिक महामंत्र होने के नाते उसमें संपुर्ण बाह्यशुचिता का विधान है। पर जो रोगग्रस्त है वे चलते-फिरते, उठते-बैठते तथा लेटते हुए किसी भी अस्वच्छ स्वच्छास्थिती मे इसका मानसिक जप कर सकते हैं क्योंकि मानसिक जप का कोई नियम नहीं है।
मंत्र से स्वास्थ्य पर पडने वाले इन वैज्ञानिकों के अनुसंधान और मिनी रिसर्चेस तथा चर्चा एक सुत्रबध्द पुस्तक में संकलित किया गया तो एक पुस्तक का प्रारूप बन जाएगा।
अन्य एक शोध के अनुसार , गायत्री मंत्र के बोलने से शरीर में हाइपोथैलमस हार्मोन का स्त्राव होता है, विज्ञान के अनुसार यह हार्मोन इन्सान में गंभीर बिमारीयों से लड़ने की क्षमता देता है।
ध्वनि तरंगों में कितनी शक्ति है यह कोई छिपा तथ्य नहीं है। इन्फ्रासोनिक और अल्ट्रासोनिक तरंगों के रुप में विज्ञान इनकी शक्ति को जानता है। मंत्र शक्ति के रूप में मंत्र शास्त्र में इनका चिकित्सकीय उपयोग हुआ है।गायत्री मंत्र उसका उत्कृष्ट उदाहरण है।हममें से प्रत्येक को इस मंत्र की उपासना अवश्य करनी चाहिए। इससे एक साथ तीन लाभ प्राप्त होंगे-स्वास्थ्य, समृध्दि और आत्मिक प्रगति, ऐसा गायत्री महाविघ्या के आचार्यों का कथन है।
📖✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩

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