प्राचीन अमेरिका की सभ्यता का आदी स्त्रोत है भारत !
सन् १४९२ में जेनेवा के प्रसिद्ध पर्यटक कोलम्बस ने अमेरिका का 'अनुसन्धान' किया था । इससे पहले यूरोप के निवासी इस बिस्तृत महाद्वीप के सम्बन्ध में कुछ भी न जानते थे । परन्तु प्राच्य देशों के ' अर्धसत्य ' लोग १५ वीं सदी से बहुत पूर्व अमेरिका से परिचित थे । डे गिग्नेस के अनुसार चीनी साहित्य से ज्ञात होता है , कि प्राचीन चीनी लोगों को अमेरिका का परिज्ञान था । वे ऐशिया की सीमा से बहुत दूर चीन के पूर्व में ' फाड - सन्ग ' नाम के एक प्रदेश की सत्ता मानते थे और इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह ' फाड - सन्ग ' अमेरिका के सिवाय और कोई न था ।[The Human Species by A. De Quatrefages , P. 202]
प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता पारावे के अनुसार ' फाइ - सन्ग ' चीन से २०००० लो की दूरी पर स्थित था । मोशिये पोथियक के अनुसार एक ' ली ' ४८६ गज़ के बराबर होता है । इस प्रकार हिसाब लगाने से ज्ञात होता है , कि ' फाड - सन्ग ' कैलिफोर्निया को कहते थे। प्राचीन जापानी लोग भी अमेरिका से परिचित थे । वे इस देश की ' फाड - सी ' कहते थे ।
इन प्राच्यदेशों का अमेरिका के साथ व्यापारिक और धार्मिक सम्बन्ध स्थापित था । चीनी और जापानी लोग व्यापार के निमित्त वहां आया जाया करते थे । पांचवीं सदी के अन्त में चीन के अन्तर्गत ' की - पिन ' देश से बौद्ध - प्रचारक ' फाड सन्ग ' में बौद्धधर्म का प्रचार करने के लिए गये थे ।
(देखे. Ibid , P. 204-5)
केवल चीन और जापान का ही नहीं , भारत और अमेरिका का पारस्परिक सम्बन्ध भी बहुत प्राचीन है । प्राचीन साहित्य में अनेक स्थानों पर पाताल देश और उसके निवासियों का वर्णन है ।
महाभारत काल में दिग्विजय करता हुवा अर्जुन पातालदेश में भी पहुंचा था , और यहाँ ' नागों ' पर विजय प्राप्त कर - पातालदेश की राजकन्या उलूपी के साथ उसने विवाह किया था ।[. महाभारत - सभापर्व]
भारतीय साहित्यमें अन्यत्र भी बहुत से स्थानों पर पातालदेश का वर्णन आया है । परन्तु इस अध्याय में हम भारतीय साहित्य के आधार पर प्राचीन भारत और अमेरिका का सम्बन्ध प्रदर्शित नहीं करेंगे , अपितु अमेरिका के वास्तविक निवासियों की सभ्यता और धर्म के आधार पर यह सिद्ध करेंगे , कि भारत और अमेरिका में बहुत प्राचीन समय से सम्बन्ध स्थापित था ।
मैक्सिको के प्राचीन निवासियों को ' एज्टेक ' कहते थे । जब कोलम्बस नै अमेरिका का ' अनुसन्धान ' किया , तो सब से पूर्व स्पेनिश लोगों ने वहाँ पर अपने उपनिवेश स्थापित किये । स्पेनिश लोगों ने ' एज्टेक ' सभ्यता को नष्ट कर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश की । ' एज्टेक ' लोग सभ्यता की दृष्टि से बहुत पिछड़े हुवे न थे । वे बड़े बड़े नगरों में निवास करते थे । उन्होंने विशाल इमारतों का निर्माण किया था । उनका धर्म बहुत उन्नत और विकसित था । यद्यपि ' एज्टेक ' लोगों की सभ्यता अब बहुत कुछ नष्ट होचुकी है , परन्तु उसके विषय में हमें बहुत सी ब ातें मालूम हैं । यदि हम इस आश्चर्यजनक सभ्यता का ध्यान पूर्वक अनुशीलन करें , तो हमें भारतीय सभ्यता और धर्म से बहुत कुछ एकता ज्ञात होगी । हम दोनों सभ्यताओं के सम्बन्ध और सादृश्य को प्रदर्शित करने के लिये कुछ उदाहरण उद्धृत करते हैं:
१. #चतुर्युग_की_कल्पना-
प्राचीन मैक्सिकन या ' एज्टेक ' लोग संसार को अनादि मानते हुये सम्पूर्ण काल को चार युगों में विभक्त करते थे । उनके मत में , प्रत्येक युग हज़ारों वर्षों का होता था । वे मानते थे कि , प्रत्येक युग के अन्त में किसी महाभूत या सूलतत्त्व के द्वारा सम्पूर्ण मनुष्य जाति का विनाश होजाता है , और उसके बाद फिर सृष्टि की उत्पत्ति होती है ।
[History of the Conquest of Mexico by W , H. Prescott P. 31]
चतुर्युगी का यह विश्वास भारतीय साहित्य में अनेक स्थानों पर पाया जाता है । मनुस्मृति में चारों युगों का विस्तार के साथ वर्णन किया गया है । मैक्सिकन लोगों और भारतीयों को इस कल्पना में स्पष्टतया साद्दश्य दृष्टिगोचर होता है ।
२. #जलप्लावन_का_विश्वास - ' एजटेक लोग जलप्लावन पर विश्वास रखते थे । प्राचीन अनेक जातियों में जलप्लावन सम्बन्धी विश्वास उपलब्धाः होते हैं । वाइवल की पुरानी गाथाओं , फाल्डियन लोगों के प्राचीन अवशेषों और यूनानियों के विस्तृत साहित्य में जलप्लावन की बात मिलती हैं । ' एजटेक ' लोगों का विश्वास था कि जलप्लावन के पश्चात् दो व्यक्ति जीवित बचेथे । पहले व्यक्ति का नाम ' कोक्सकोक्स ' था और दूसरी उसकी धर्मपत्नी थी । जलप्रलयः के बाद जव सम्पूर्ण पृथिवी जलाप्लावित हो गयी , तब ये व्यक्ति ही एक नौका में बच सके । एक पर्वत की उपत्यका में इन्हें आश्रय मिला । पीछे से इन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण मानव जाति की उत्पत्ति हुई ।
' एजटेक ' लोगों के प्राचीन अमरीकन पड़ौसी ' मिचा अकेन लोग थे । वे भी जलाप्लायन पर विश्वास रखते थे । यह भी मानते थे कि जलप्रलय के बाद सब प्राणियों के नष्ट हो जाने पर केवल एक ही व्यक्ति बचा इस का नाम : ' टेज्पी ' था । जिस नौका पर यह यचा , उस में इस के सिवाय सब प्रकार के प्राणियों और पक्षियों का भी एक एक प्रतिनिधि बचाया गया था ।पीछे से इन्हीं के द्वारा सब जीवों की उत्पत्ति हुई । '[Prescaott Conquest of Mexico P. 561-2]
यह दिखलाने की आवश्यकता नहीं , कि प्राचीन अमरीकन लोगों की ये गाथायें भारतीय विश्वासों से कितनी अधिक मिलती जुलती हैं । एक इतिहास के .. पुस्तक के पहले खण्ड में भारतीय साहित्य में जो भी जल प्लावन सम्वन्धी गाथायें मिलती हैं , उनका विस्तार के साथ उल्लेख हैं ।* अतः उन्हें यहां फिर उद्धृत करने की आवश्यकता नहीं ।[*भारतवर्ष का इतिहास प्रथम खपट ( द्वितीय संस्करण ) by aachary ramdev. पृ ० १८०-१८८]
मत्स्य , अग्नि , भागवत आदि पुराणों तथा महाभारत और शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्धों के वृत्तान्त इस से वहुत मिलते हैं । इस में कोई सन्देह नहीं कि प्राचीन यूनानी , हिब्रू और काल्डियन लोगों की तरह अमेरिकन लोगों ने भी जलप्लावन का विश्वास भारतीय साहित्य से ही लिया था ।
३. #चोलुला_का_बुर्ज -
वर्तमान पैवला नगरी के समीप अमेरिका में एक विशाल स्तम्भ वा वुर्ज उपलब्ध होता है , जिसे कि ' चोलुला का वुर्ज ' कहते हैं । यह १८० फीट ऊंचा है और कञ्चो ईटों का बना हुचा है । प्राचीन विश्वासों के अनुसार इस वुर्ज का निर्माण दैत्य लोगों ने प्रलय के पश्चात् किया था । वे लोग समझते थे कि इस घुर्ज के द्वारा वे अन्तरिक्ष वीं बादलों के समीप पहुंच सकेंगे । पर देव लोग इसे न सह सके । उन्होंने इस प्रयत्न को नष्ट करने के लिये आकाश से अग्नि पर्या प्रारम्भ की , और दैत्यों को अपना प्रयत्न छोड़ना पड़ा । '
[ Prescaott . Conquest of Mexico P. 582]
अमेरिकन लोगों की यह गाथा अनेक रूपों में प्राच्यदेशों में भी उपलब्ध होती हैं । हिन्दू लोगों का वेबल का बुर्ज ' चोबुला के बुर्ज से बहुत कुछ मिलता है । सर विलियम जोन्स के अनुसार यह बुर्ज का विश्वास भारतीय साहित्य में भी उपलब्ध होता है कि पुराणों में वर्णित बलि राजा की कथा ; स्तम्भ फाड़ कर शेर का निकलना आदि रूपान्तर द्वारा बुर्ज सम्बन्धी प्राचीन विश्वास के सादृश्य को सिद्ध करते हैं ।
४. #मृतकों_का_दाह -
प्राचीन मैक्सिकन लोग मृतकों का दाह किया करते थे । पीछे से अस्थियां और राख को एक बरतन में सञ्चित कर के उसे एक स्थान पर रख कर ऊपर से समाधि बना दी जाती थी । कार्ली लिखता है कि " निस्सन्देह मृत लाशों को जलाने का यह तरीका , अवशिष्ट राख को एक वर्तन में सश्चित करता , फिर उसके ऊपर एक समाधि का निर्माण करना ये सब बातें ईजिपृ . और हिन्दुस्तान के रिवाजों का स्मरण करा देती हैं ।
[See the quotalion of Carli in . Prescott - conquest of Mexico . P. 586 Foot note 37]
(पढें :. Asiatic Researches Val III . P. 486 .)
" This event also seems to be recorded by ancient Hindus in two of their Puranas , and it will be proved , I trust , on some future occasion that the lion bursting from a pillar to destroy a blasphening giant , and the dwarf who beguiled and held in derision the magnificent Beli , are one and the same story related in a symbological style . "
इसी सम्बन्ध में विचार करते हुवे ऐतिहासिक प्रेस्कोट लिखते हैं- " मृत शरीर को जलाना कोई विशेष बात नहीं है । शरीर को किसी न किसी प्रकार समाप्त तो करना ही है । परन्तु जब हम देखते हैं कि पीछे से अवशिष्ट राख को एक बर्तन में एकत्रित किया जाता है तष सादृश्य बहुत बढ़ . जाती है । इतनी सूक्ष्म सद्दशता का पाया जाना सामान्य बात नहीं है । यद्यपि केवल इस एक बात का मिल जाना अपने आप में कोई बड़ा प्रमाण नहीं है , पर जव इसे अन्य बातों के साथ मिला कर देखा जाता है , तो प्राच्य देशों के साथ पारस्परिक सम्बन्ध फी सम्भावना बहुत बढ़ जाती है । "
५. #भाषा_की_समानता -
प्राचीन अमेरिका में अनेक प्रकार की ' भाषायें बोली जाती थीं । ये परस्पर एक दूसरे से बहुत भिन्न थीं । परन्तु इन में अनेक समानतायें भी विद्यमान थीं और आश्चर्य यह है , कि ये समानतायें भारतीय भाषाओं में भी बहुत कुछ पाई जाती हैं । उदाहरणार्थ , समास के द्वारा बहुत बड़े भाव को एक छोटे से शब्द वा पद में ले आना संस्कृत व सभी प्राचीन भारतीय भाषाओं की बड़ी भारी विशेषता है । यही बात अमेरिकन भाषाओं में भी पाई जाती थी । इसी प्रकार शब्द रचना , ईडियम आदि के विपय में भी अनेकविध समानतायें ध्यान देने योग्य हैं । '(देखे:Ibid . P. 588-9)
६. #वैज्ञानिक_सादृश्य - ऐतिहासिक प्रेस्कोट ने प्रदर्शित किया है कि मैक्सिकन लोगों को घर्षगणना , मासविभाग , मासों और दिनों के नाम - आदि प्राच्य देशों की वर्षगणना आदि से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं । इसे वे ' वैज्ञा निक सादृश्य ' के नाम से पुकारते हैं । इन वैज्ञानिक सादृश्यों का भी संक्षेप के साथ उल्लेख कर देना आवश्यक है ।
प्राचीन मैक्सिकन लोग चन्द्रमा के अनुसार अपनी बर्षगणना करते थे । दिनों और मासों को सूचित करने के लिये मैक्सिकन लोग अनेक पशु पक्षियों के नाम प्रयुक्त करते थे । भारत तथा अन्य प्राच्य देशों में भी इस कार्य के लिये प्राणियों के नाम प्रयुक्त किये गये हैं । [ ref:Ibid . P. 587 .]
मेष , वृष , कर्क , सिंह , वृश्चिक , मकर , मीन आदि भारतीय नाम इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है ।
७. #अनुश्रुति_Tradition-
प्राचीन मैक्सिकन या एजटेक लोगों में यह अनुथुति विद्यमान थी कि उनकी सभ्यता का मूल पश्चिम या उत्तर पश्चिम में है । सम्पूर्ण अमेरिका महाद्वीप में निवास करने वाली जातियों में यह अनु श्रुति किसी न किसी रूप से विद्यमान थी । एजटेक लोगों में तो यह लिखित रूप से भी पाई जाती है । [ Ibid . P. 589 .]
यह ध्यान रखना चाहिये , कि अमेरिकन लोगों के लिये पश्चिम या उत्तर पश्चिम एशियाटिक देश वा प्राच्य देश ही होंगे । अमेरि कन अनुश्रुति के अनुसार ' केटसाल कटल ' नाम का एक शुभ्र व्यक्ति प्राच्य देशों से उन के देश में आया था । इस की दाढ़ी बहुत लम्बी थी , कद ऊंचा , बाल काले और रङ्ग शुभ्र था । इस ने अमेरिका निवासियों को कृषि की शिक्षा दी , धातुओं का प्रयोग सिखलाया और शासन व्यवस्था की कला में निपुणता प्राप्त कराई ।
#क्वेट्सालकटल ' अमेरिकन लोगों के लिये इतना अधिक लाभकारक और उपयोगी सिद्ध टुबा कि पीछे से उसकी देवता की तरह पूजा होने लगी । इस रहस्य मय व्यक्ति ने अमेरिका में सतयुग ( Golden age ) का प्रारम्भ किया । इस के प्रभाव से पृथिवी पुष्पों ओर फलों से परिपूर्ण हो गई । इतना बड़ा अनाज होने लगा कि एक व्यक्ति एक सिट्टे से अधिक न उठा सकता था । नानाविध रंगों की कपास उगने लगी । अभिप्राय यह है कि उस दैवी पुरुष के प्रभाव.से अमेरिका में नवीन युग प्रारम्भ हो गया । '[1. Prescott . Conquest of Mexico . P. 21]
परन्तु यह ' केट्सालकटल ' बहुत समय तक अमेरिका में न रह सका । किसी देवता के प्रकोप से- कारण यया था , इसका हमें पता नहीं है- इसे देश छोड़ कर जाना पड़ा ।
जब वह मैक्सिकन खाड़ी के समीप पहुंच गया , तव , उसने अपने अनुयाइयों से विदा ली और समुद्र पार करके वापिस चला गया । {Ibid- P. 30}
यह ' केटसालकटल ' कौन था ⁉️
इस में सन्देह नहीं कि यह प्राच्यदेशों का रहने वाला था और इस का वर्णन सूचित करता है कि यह आर्यजाति का था । हम केवल अनुमान नहीं कर रहे हैं । हमारे पास इसके लिये दृढ़ प्रमाण विद्यमान है ।
यह ' केटसालकटल ' कौन था , इसे स्पष्ट करने के लिये रामायण का अनुशीलन करना चाहिये । वाल्मीकीय रामायण के उत्तरकाण्ड में एक बड़ी मनोरञ्जक और उपयोगी कथा मिलती है ।
उस में राक्षसों की उत्पत्ति की . कथा लिखते हुवे ' सालकटकट ' वंश के राक्षसों की उत्पत्ति का वर्णन किया है । इन का विनाश विष्णु ने किया और उस से पराजित होकर ' सालकटकट ' वंश के राक्षस लोग - जिनका मूल निवास स्थान लङ्काद्वीप था- पाताल देश में चले गये । इनका नेता सुमाली था ।
रामायण में लिखा है " हे कमलेक्षण राम ! इस प्रकार वे राक्षस सम्मुखयुद्ध में विष्णु के द्वारा पराजित हो गये और उनके बहुत से नायक युद्ध में मारे गये ।
“ जब वे लोग विष्णु के साथ युद्ध न कर सके , तो अपनी पत्नियों को लेकर अपना देश लङ्काद्वीप छोड़ कर पाताल चले गये ।"
“ हे रघुसत्तम ! वे राक्षस सालकटङ्कट बंश के थे , उन का पराक्रम बहुत प्रख्यात है । उनके नेता का नाम ' सुमाली ' था ।"
" जिन राक्षसों का तुम ने विनाश किया है , वे ' पौलस्त्य राक्षस ' हैं ।। सुमाली , माल्यवान् , माली आदि जिन राक्षसों के नेता थे , घे रावण के राक्षसों से अधिक शक्ति शालो थे । "
इस तरह स्पष्ट है कि विष्णु द्वारा पराजित होकर सालकटकट राक्षस पाताल देश या अमेरिका में चले गये ।
मैक्सिकन ' केटसालकटल ' और भारतीय ' सालकटकट ' में कितनी समानता है । ये दोनों एक ही शब्द के रूपान्तर हैं ।
मैक्सिकन इतिवृत्त के अनुसार जो ' केटसालकटल ' देवता प्राच्य देशों में उस देश के निवासियों को कपि , धातुविद्या तथा शासनव्यवस्था मिखाने में समर्थ हुवा था , वह सालकटकट सुमाली ' के सवाय अन्य कोई न था ।
यह बतलाने की आवश्यकता महीं , कि राक्षसलोग प्राचीन भारत की एक जाति विशेष ही थे । वे भी अन्य लोगों की तरह से थे । रावण आदि राक्षसों का वेद , शास्त्र आदि आर्य साहित्य में कुशल होना सिध्द करने की आवश्यकता नहीं है।
अभिप्राय यह है कि राक्षस लोग भारतीय ही थे , वे अन्य भारतीयों की तरह सभ्यता आदि की दृष्टि से बहुत उन्नत थे । भौतिक सभ्यता की दृष्टि से तो चे अन्य भारतीयों की अपेक्षा भी आगे बढ़े हुवे थे । यदि उन का नेता अमेरिका वा पाताल देश में जाने के लिये राजनीतिक कारणों से बाधित हुवा हो , और वहां उस के द्वारा सभ्यता का प्रचार हुवा हो , तो इस में आश्चर्य ही क्या है ?
' क्वेटसालकटल ' या ' सालकट कट ' के फिर पातालदेश वा अमेरिका से लौट कर आने को कथा भी रामायण में लिया है ।
रामायण के अनुसार " बहुत समय तक विष्णु के भय से डरा हुबा स्तुमाली पातालदेश में विचरण करता रहा । इसके पश्चात् वह लौट आया और पुत्रों पौत्रों के साथ
लङ्का में निवास करने लगा ।"
{देखिय: 'चिरात्सुमाली व्यचरद्रसातलं स राक्षसो विष्णुभयाम्रितस्तदा ।पुत्रश्च पौत्रैश्च समन्वितो वली ततस्तु लङ्कामवसद्धनेश्वरः ॥#रामायण उत्तरकाण्ड #अष्टमसर्ग झो . २६ . तथा उत्तरकाण्ड का नवमसर्ग देखिये}
इस विषय को बहुत विस्तार से लिखने की आवश्यकता नहीं है । इसमें सन्देह नहीं कि भारतीय और अमेरिकन इतिवृत्त एक दूसरे से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं । भारत का ' सालकटंकट ' ही अमेरिका का ' केटसालकटल' है ।
इस प्रकार इस विवेचना के पश्चात् यह परिणाम निकालना असङ्गत नहीं है कि अमेरिकन सभ्यता का मूल भारतवर्ष ही है । ऐतिहासिक प्रेस्कोट अमेरिकन सभ्यता का मूल ढूंढने का प्रयत्न करते हुवे इस परिणाम पर पहुंचे हैं :--
" The Reader of the preceding pages may perhaps acquiesce in the general conclusions - not startling by their novelty . First , that the coincidences are sufficiently strong to authorize a belief that the civilization of Anahuae was in some degree influenced by that of Eastern Asia .
And , secondly , that the discrepancies are such as to carry back the communication to a very remote period ; so re note that this foreign influence has been too feeble to interfere materially with the growth of what may be regarded in its essential features as a peculiar and indigenous civilization . ?" [#Prescott_Canquest_of_Mexico_P. 598 .]
हम श्रीयुत प्रेस्कोट के इस उपसंहार से सामान्यतया सहमत होते हुवे केवल इतना और कहना चाहते हैं , कि पूर्वीय एशिया नहीं अपितु भारतीय सभ्यता ने प्राचीन अमेरिकन सभ्यता पर प्रभाव डाला था ।
" निस्सन्देह , पूर्वीय एशिया का भी अमेरिका के साथ सम्बन्ध था , और इस सम्बन्ध में भी अमेरिका के धर्म और सभ्यता पर बहुत प्रभाव डाला , परन्तु पूर्वीय एशिया की सभ्यता और धर्म का आदिस्रोत भी तो भारतवर्ष ही है । "
"सालकटंकट" द्वारा भारत की जो सभ्यता अमेरिका पहुंची , उसका ही सबसे अधिक प्रभाव हुआ ।
इस लेख में जितने साक्ष्य मौजूद हैं कि अमेरिका में पहुंची सभ्यता भारत से ही थी, इस बात के और भी कई साक्ष्य है। भारत के वामपंथियों ने अवश्य इनसे सभी से दूर रखने की अबतक सफल कोशिश की है अन्यथा अमेरिका भारत का यह इतिहास सभी भारतीय जानते.....
🙏विचार प्रसार 🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮🔮
✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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