सम्राट भोज का चक्रवर्ती साम्राज्य
मालवचक्रवर्ति भोज का विशाल साम्राज्य
महाप्रतापी राजा भोज का विक्रम संवत १०७८ या १०२१ ई. में मात्र २० वर्षो बाद , ४० - ४१ वर्ष की आयु में मालवसम्राट परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर त्रिभुवन चक्रवर्ती के सर्वोच्च सर्वभौम पद पर राजतिलक हुआ । भोज ने अपने सेनापति कुलचंद्र तथा सुरादित्य के साथ अपने राज्य की सीमा उत्तर में हिमालय अर्थात् काश्मीर तक तथा दक्षिण में मलय या केरल और पश्चिम में द्वारका एवं पूर्व में बंगाल तक विस्तारित की थी। पी . टी . श्रीनिवास अयंगार , भोज का राज्य गोदावरी तथा यमुना तक तथा डी . सी . गांगुली , भोज का राज्य उत्तर में बांसवाडा , डुंगुरपुर तक , दक्षिण में गोदावरी तक तथा पश्चिम में कैरा जिले तक विस्तृत मानते हैं । डॉ . दशरथ शर्मा अनुसार गुजरात का अहमदाबाद तक का भाग , मालवा , बहुतांश राजस्थान , मध्यभारत का अधिकांश भाग , बस्तर भाग तथा महाराष्ट्र के कोंकण , खानदेश और विदर्भ उसके साम्राज्य में सम्मिलित था । अतः भोज सार्वभौम राजा था । मालवचक्रवर्ती बन चुका था । उसने अनेक छोटे - बड़े राजाओंको पराजित कर अपने राज्यक्षेत्र की सीमाओं में वृद्धि की थी । परिणाम स्वरुप भोज ने अपने पैतृक राज्य के रुप में केवल मालवा प्राप्त किया था जिसे उसने विशाल साम्राज्य में परिवर्तित कर दिया वह ८४ सामंतों या मांडलिक राजाओं का स्वामी था । उसने ८४ उपाधियाँ ग्रहन की थी । ८४ ग्रंथ लिखे । धार में ८४ प्रासाद , देवालय तथा चौराहे बनाए । [1]
उदयपुर की ग्वालियर प्रशस्ति में लिखा है कि सम्राट भोज का राज्य उत्तर में हिमालय से, दक्षिण में मलयाचल तक और पूर्व में उदयाचल से पश्चिम में अस्ताचल तक फैला हुआ था। इस सम्बन्ध में निम्न श्लोक इस प्रकार है - आकैलासान्मलयर्गिरतोऽ स्तोदयद्रिद्वयाद्वा। भुक्ता पृथ्वी पृथुनरपतेस्तुल्यरूपेण येन॥१७॥[2][3]
कुछ विद्वानों का मत है कि सम्राट भोज का राज्य लगभग संपुर्ण भारतवर्ष पर ही था। उसका अधिकार पूर्व में डाहल या चेदि, कन्नौज, काशी, बंगाल, बिहार, उड़ीसा और आसाम तक था । दक्षिण में विदर्भ, महाराष्ट्र, कर्णाट और कांची तक तथा पश्चिम में गुजरात, सौराष्ट्र और लाट तक, तथा उत्तर में चित्तौड़ साँभर और काश्मीर तक था। चम्पू रामायण में भोज को विदर्भ का राजा कहाँ गया है और विदर्भराज की उपाधि से विभुषित किया गया है। [4][5]
भोज एक महान विजेता था । उसने कल्याण के चालुक्य राजा जयसिंह को पराजित किया । चेदिराज गांगेयदेव कलचुरि , आदिनगर के स्वामी इन्द्ररथ , गुजरात के चालुक्य भीम , लाट के स्वामी वत्सराज , कान्यकुब्ज के प्रतिहार राजा राज्यपाल , तुरुप्क राजा महमूद गजनवी, तोग्गलनप आदि के विरुद्ध भोज के युद्ध हुए। भोज ने चित्तौड़ तथा शाकम्भरी पर आक्रमण कर उन्हें जीता । दूबकुण्ड के राजा अभिमन्यु ने उसकी अधीनता स्वीकार करली थी । ग्वालियर के राजा कीर्तिराज, कच्छपघात तथा नाडोल के चौहानों के विरुद्ध भोज को सफलता नहीं मिली । लेकिन किर्तिराज को भी भोज ने परास्त करने में यश प्राप्त किया था। प्रबन्धचिंतामणि ने गौड़ , कलिंग , आन्ध्र आदि पर भी उसका अधिकार बताया गया है।[6]
भोज के राज्य विस्तार को दर्शाता हुआ और एक श्लोक इस प्रकार है - केदार-रामेश्वर-सोमनाथ-सुण्डीर-कालानल-रूद्रसत्कैः । सुराश्रयैर्व्याप्य च यःसमन्ताद्यथार्थसंज्ञां जगतीं चकार ॥२०॥[7]
इसी से स्पष्ट है कि भोज ने अपने साम्राज्य के पूर्वी सीमा पर सुंदरबन स्थित सुण्डिर, दक्षिणी सीमा पर रामेश्वर, पश्चिमी सीमा पर सोमनाथ तथा उत्तरी सीमा पर केदारनाथ सरिख विख्यात मंदिरों का निर्माण तथा पुर्ननिर्माण किया था। भोज ने काश्मीर में कुण्ड भी बनवाया था। भोज के साम्राज्य विस्तार पर विद्वानों में थोडा मतभेद हो सकता है क्योंकि भोज की साम्राज्य सीमाएं विस्तिर्ण किंतु थोड़ी अस्थिर रही। [8]
भोज का काश्मीरराज्य भी इतिहास में दर्ज है। विश्वेश्वरनाथ रेउ ने राजा भोज से सम्बन्धित राज्यों की सुचि में काश्मीरराज्य के विषय में लिखा है कि राजा भोज ने सुदूर काश्मीरराज्य के कपटेश्वर ( कोटेर ) तीर्थ में पापसूदन का कुण्ड बनवाया था और वह सदा वहीं के लाए हुए जल से मुँह धोया करता था । इसके लिये वहाँ का जल मंगवाने का पूरा पूरा प्रबन्ध किया गया था । [9]
📚संदर्भ पुस्तकें और अन्य साहीत्य :
[1]चक्रवर्ती राजा भोज.पृ.२१.डॉ. ज्ञानेश्वर टेंभरे.Msc. Ph.d.२०१५.श्री गजानन इंटरप्राइजेस-21.सुरेंन्द्रनगर.नागपुर-15.भारत. ISBN 978-935142-832-9
[2]↑ एपिग्राफिया इंडिका.भाग.१.पृ.२३५. श्लो.१७.
[3]↑ राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ. 125.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932.
[4]↑ राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932.
[5]↑ धारा देवी तथा भोज.मध्यप्रदेश संदेश.4 अप्रैल 1970.पृ.१३
[6] राजा भोज का रचनाविश्व. पृ.१. डॉ.भगवतीलाल राजपुरोहित, आचार्य हिंदी विभाग. सान्दिपनी महाविज्ञालय,उज्जैन (म.प्र.).पब्लिकेशन स्कीम. जयपुर. भारत.ISBN 81-85263-63-9.
[7] ↑ एपिग्राफिया इंडिका. भाग.१. पृ.२३६.श्लो.२०.
[8] ↑ राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932.
[9] राजा भोज. श्रीयुत विश्वेश्वरनाथ रेउ. पृ.235.इलाहाबाद.हिंदुस्थानी एकेडेमी, यु. पी.1932.

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