मांडव गढ़

मांडव गढ़

यह मांडू एक समय आबाद नगर था । इसका एक नाम था ' शादियाबाद' आनंद नगर । उसकी प्राकृतिक सुषमा के बीच आज शाद का अनुभव उतना नहीं होता जितना एक गम का अनुभव होता है , एक हल्की बेचैनी होती है । इस अलस दोपहरी में यहाँ कितने ही फैशनेबल टूरिस्टों की आवाजाही थी - सब मानो जल्दी में न हों ऐसे व्यस्त भाव से घूम रहे थे ।


हमने ग्राम पंचायत की धर्मशाला भी देखी । धर्मशाला ही थी , वहां रहना रुचे वैसा नहीं था । कुछ चलने के बाद एक जैन धर्मशाला थी । पुरानी शैली की थी , पर विशाल और व्यवस्थित । अहमदाबाद के हैं , यह जानते ही वृद्ध मुनीमजी गुजराती में बोलने लगे । झटपट हमारे नाम रजिस्टर में लिखकर उन्होंने सामान ले आने को कहा । इतने में वहाँ का स्थानिक क्लर्क आ पहुंचा । हमारे सामने ही वृद्ध मुनीमजी को हिंदी में फटकारने लगा । सामान लेकर आ जाए उसके बाद ही नाम लिखना चाहिए - वगैरह । मुनीमजी की तरफ से क्षमा मांगकर हम सामान ले आए । धर्मशाला के अंदर एक सुंदर बावड़ी थी , खुद को ही पानी खींचना होता । इमली का पुराना पर विशाल वृक्ष अभी कतारों से भरा पड़ा था । पास में ही देरासर था । हम ही मात्र यात्रिक थे । भा गया । कुछ ही देर में अध्वगखेद दूर कर हम बाहर निकल पड़े ।

मांडू के सारे स्थल देख लेने थे हमें । पर यह कोई छोटा नगर थोड़े ही था । विध्य के किनारे की लगभग दो हजार फीट ऊँची जिस पहाड़ी पर मांडू बसा है पूर्व और पश्चिम लगभग पांच मील होंगे , उत्तर - दक्षिण भी लगभग उतना ही । यहाँ एक मात्र उपलब्ध साधन टेम्पो रिक्शा है , जिससे इन सब स्थानों पर जाया जा सकता है । बस स्टैंड के पास से यह टेम्पो मिलता था । वहां पहुंचे इतने में तो एक छैले जवान ने सलाम करते हुए कहा - गाइड चाहिए सा'ब ? हम मांडू का पूरा इतिहास बताएंगे । आप चाहें तो अंग्रेजी में , आप चाहें तो हिंदी में । ढलती पहर थी । एक जोरदार धरधराहट के साथ टेम्पो चालू हुआ और उसी के साथ गाइड की अखलित वाकधारा भी ।

बीच - बीच में उर्दू शेर भी ठोकता जाता था । पर यह ध्यान देना नहीं चूकता था कि शायरी हमें अच्छी लगती है या नहीं । टेढे - मेढ़े रास्तों से होता हुआ टेम्पो दक्षिण की ओर जा रहा था । गाइड मांडवगढ़ की शादियाबाद की पुरानी समृद्धि की बात करता जा रहा था । अरे , यहाँ मार्ग के दोनों ओर तो कहीं भी कोई घर नहीं । खेत जुत रहे हैं और बीच - बीच में खंडहर खड़े हैं , पर मानव बस्ती कहाँ ? पानी भरे उथले सरोवर हैं - हरे कच्च झाड हैं । हाँ , एक समय मांडवगढ़ में रौनक थी । यहां लगभग लाख कुटुम्ब रहते थे , ( गाइड कहता जा रहा था ) कोई नया व्यक्ति यहां बसने के इरादे से आता तो उसे प्रत्येक परिवार की ओर से एक ईंट दी जाती थी और एक स्वर्ण मोहर । एक साथ उसके पास एक लाख ईट हो जाती थी जिससे वह घर बांधता था और हो जाती थी लाख स्वर्णमोहर जिनसे वह व्यापार करता । भा जाने जैसी बात थी , भले ही गले न उतरती हो ।

हम आसपास देख रहे थे ; कहीं कोई ईंट नहीं दिख रही थी । कहाँ गई होंगी सब । इन खेतों के नीचे गहन वनराजियों के मूल में दबी पड़ी होंगी । जो कुछ खंडहर दिख रहे थे वे तो शाही घरानों के साथ जुड़े हुए थे । सामान्य मनुष्य का एक भी घर नहीं । कहाँ गए वे सब घर ? इतिहास तो मांडव के पदचिह्न छठी शताब्दी तक ले जाता है । उस समय के एक अभिलेख में मंडप दुर्ग नाम से उसका उल्लेख हुआ है ।

मध्यकाल के फारसी इतिहासकारों की तवारीख कालांतर में प्रचलित मांडव नाम में मिलता है । जिसमें से हो गया मांडू । कोई फिर कहता है मंडू । दसवीं सदी में मालवा पर परमारों का शासन था । उनकी राजधानी थी उज्जैन , फिर धारा गरी - धार । परमार जाओं में मुंज और भोज का प्रताप दूर तक फैला था । मुंज के नाम का तो तालाब है मांडू में जो मांडू के साथ मुंज के सम्बन्ध को जोड़ देता है और वैसे भी मांडू तो उसकी राजधानी धारानगरी से बीस बाईस माइल ही तो दूर है और भोज की सरस्वती अर्थात वाक्देवी की एक प्रतिमा मांडू में से प्राप्त हुई है ।

उसके बाद बारहवीं शताब्दी में मांडू ने मालवा की राजधानी होने का गौरव पाया । तेरहवीं शताब्दी के अंत में मांडू मुसलमानो के हाथ में गया । एक नई अफगान सभ्यता के सम्पर्क में आया ।

संदर्भ :-📖https://books.google.co.in/books?id=IRX_yVd0R5EC&pg=PA45&dq=धारानगरी+राजधानी

📖Book : "Vidisha"
By Bhola Bhai Patel. 📄 p. 45-46.

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