भारतीय लोग ही थे जिन्होंने पश्चिमी एशिया - स्थित स्मारको का निर्माण किया था ।
#इन_बातों_का_विचार_करें.....
एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचारणीय बात यह है कि यद्यपि भारत में अति विशद और विद्वतापूर्ण शिल्प - शास्त्र अर्थात् स्थापत्यकला का विज्ञान रहा है , तथापि उसी के अनुरूप ऐसी कोई वस्तु "प्राचीन" अथवा "मध्यकालीन" "मुस्लिम - संसार" में उपलब्ध नहीं है ।
यदि कोई समुदाय स्थापत्य कलात्मक - प्रतिभा का दावा करता है तो उसके पास ऐसे मौलिक ग्रन्थ होने चाहिये जिनमें संरचनात्मक रूपों और निर्माण कार्य में व्यवहृत सामग्री की सामर्थ्य , क्षमता का विशद वर्णन हो ।
प्राचीन तथा मध्यकालीन भारत में ऐसा वाङ्गमय था । आक्रामक मुसलमानों में ऐसा कोई ज्ञानभण्डार नहीं था ।
इससे भी एक पग आगे जाकर हम कह सकते हैं कि किसी उच्च प्रतिभा तथा कलापूर्ण व्यक्तित्व से सम्पन्न होना तो दूर , आक्रमणकारी मुस्लिम सेनाएँ तो अधिकांशत : अशिक्षित जाहिलों में भरी पड़ी थीं ।
अतः , मध्यकालीन भारतीय स्मारकों और पश्चिम एशिया के मुस्लिम स्मारकों में परस्पर यदि कोई भी समानता है , तो वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे स्मारक भी भारतीय भवन - निर्माण - विशेषज्ञों , इंजीनियरों नया कारीगरों की सहायता से ही बनाये गये थे ।
मुहम्मद गज़नी और तैमूरलंग के आक्रमणों के वर्णनों में यह पूर्णरूप में स्वीकार किया गया है , जब वे कहते हैं कि भारतीय राजप्रासादों , मन्दिरों सौर नदी के घाटों की सुन्दरता और भव्यता से सम्मोहित होकर वे , सामान्य
रूप में निपट बर्वर लोग भी , सामान्य नर - संहार से प्रतिभावान कारीगरों और तकनीकियों को केवल इसीलिए छोड़ दिया करते थे कि उनको मृत्यु भय दिखाकर पश्चिमी एशिया की भूमि पर ले जाते थे , जहाँ वे भारतीय स्मारकों की तुलना - योग्य मकबरे और मस्जिदें बनाएँ ।
अतः , हमें आज प्रचलित विचार - प्रवाह को विलोम - गति प्रदान करनी है , और इसकी अपेक्षा कहना यह है कि मध्यकालीन भारतीय भवनों का रूप - रेखांकन व निर्माण मुस्लिम स्थापत्यकार तथा इंजीनियरों द्वारा होना तो दूर , ये तो भारतीय लोग ही थे जिन्होंने पश्चिमी एशिया - स्थित स्मारको का निर्माण किया था ।
✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩
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