कैसे बनी क्रिश्चियनिटी ?
#कैसे_बनी_क्रिश्चियनिटी ? जानिए सत्य इतिहास..
महाभारत युद्धोपरांत कालांतर से वैदिक शिक्षा-प्रणाली, तथा सभ्यता की विद्याए आदि के लुप्त होने और वैदिक धर्म भग्न होने के बाद आगे चलकर वैदिक धर्म से बने विभिन्न संप्रदाय यह पंथोपपंथ वेद , उपनिषद् , रामायण , महाभारत , भगवद्गीता , श्रीमद्भागवतम् , योगवासिष्ठ , पुराणों आदि से बिछड़ते बिछड़ते उस मूलगामी साहित्य को भूलते गए ।
संस्कृत भाषा का उनका बढ़ता अज्ञान भी एक कारण बना । संस्कृत से दूरी, समय का variation, इन सब से संस्कृत की प्राकृत बोलीया बनी.. कुछ पंथों ने वेदों को देववाणी मानने से इन्कार करना भी आरम्भ किया ।
उनमें से कुछ पंथों में हठी , कोधी , दुराग्रही व्यक्ति उत्पन्न हुए जो सम्पत्ति तथा अधिकार प्राप्त करने की लालसा से किसी प्रकार अधिका धिक लोगों को निजी पंथ के अनुयायी बनाने की होड़ में लगे हुए थे ।
पीटर और पॉल ऐसे ही दो व्यक्ति मूलतः कृष्णपंथी थे । किन्तु आगे चलकर उन्होंने कृष्ण के बजाय ' कृस्त ' अपभ्रंश का लाभ उठाकर कृष्ण - नीति उर्फ भगवद्गीता प्रचारक पंथ को त्याग दिया ।
ईशस् कृष्ण ( iesus Chrisn ) का उच्चारण ( jesus christ ) जीसस कृस्त ( अथवा क्राइस्ट ) करते - करते पीटर तथा पॉल आदि के अनुयायियों ने बातों - बातों में बालकृष्ण के जीवन से मिलता - जुलता जीसस क्राइस्ट का एक काल्पनिक चरित्र भी बुनना चाहा । कुमारी माता के गर्भ से जीसस का चमत्कारी जन्म , जॉन द्वारा उसका उपनयन तथा निरपराध जीसस को यकायक , बिना कारण दिया गया क्रूर मृत्युदंड इन तीन घटनाओं की अंटसंट जीवनकथा अनुयायियों को सुनवा सुनवाकर उस समय के शासकों के विरुद्ध जनता को भड़कानेवाले भाषण पीटर तथा पॉल देने लगे । इसी कारण पीटर तथा पॉल दहशतवादी तथा आतंकवादी माने जाते थे । उनका अन्त भी भीषण हुआ ।
तथापि भविष्य में जब ईसाई पंथ का प्रभाव तथा अधिकार बढ़ा तब पीटर और पॉल को Saint यानी सन्त की उपाधि से सम्मानित किया गय । अब वे दोनों सन्त ही समझे जाते हैं । पीटर तथा पॉल ने निजी जीवनकाल में जो दुर्व्यवहार किया या अनेक लोगों से शत्रुता की , उसका ब्योरा दबाये जाने के कारण अब सारे ईसाइयों की यही धारणा बन गई है कि पीटर तथा पॉल सादा , उज्ज्वल जीवन व्यतीत करनेवाले सन्त ही थे ।
इतिहास में ऐसा बार - बार होता दिखाई देता है । छल , बल , कपट आदि से इस्लाम का प्रसार करनेवाले मुसलमान फकीर भी सन्त ही कहे जाते हैं । सन् १९८०-९० के दशक में भारत के पंजाब प्रान्त में सिक्खों को हिन्दुत्व से पृथक् दर्शानेवाले आतंकवादी भी निजी अनुयायियों में सन्त ही कहे जाते हैं । जिसकी लाठी उसकी भैंस ।
आतंक तथा दमन से फैलाए गए सारे पयों का प्रारम्भिक इतिहास दुष्टता से भरा होने से उसे दबाकर एक नया झूठा इतिहास प्रसृत किया जाता है । अतः सत्य इतिहास का ज्ञान चाहनेवालों को इतिहास के अध्ययन तथा विवरण करने में बड़ी सावधानी रखनी पड़ती है ।
जीसस कृस्त के चरित्र की बात ही लें । कहते हैं कि एक कुंवारी की कोख से उनका जन्म हुआ । इस कथन में वदतो व्याघातः का दोष साफ दिखाई देता है क्योंकि गर्भवती होने से कौमार्य का भंग हो जाता है । आंग्ल भाषा का Virginity ( यानी कौमार्य ) शब्द लें । वां जननं इति ऐसा उसका संस्कृत विवरण है । अतः कुंवारी के गर्भ से जीसस का जन्म असंभव है।
कहा जाता है कि कृस्त बड़ा ही सौजन्यशील तथा मृदु स्वभावी था । किसी ने एक गाल पर थप्पड़ मारा तो प्रहारक की सुविधा हेतु दूसरा गाल भी उसके सम्मुख करना चाहिए , ऐसा उपदेश कृस्त करता रहा । यह यदि सत्य होता तो वह अपने आपको यहूदियों का राजा कहलवाकर रोमन शासन उल्टा देना चाहता था , यह आरोप हास्यास्पद प्रतीत होता है ।
अतः कील ठोककर कृस्त मारा गया , यह कथा कपोलकल्पित सिद्ध होती है । उसे देहदंड दिए जाने से पूर्व वह मेज पर १२-१३ शिष्यों सहित सायं भोजन ले रहा है , ऐसा एक चित्र ईसाई जनता में बड़ा महत्त्वपूर्ण माना जाता है । किन्तु जानकार विद्वान् कहते हैं कि इस काल में तो रोमन शासन में लोग वैदिक प्रथा के अनुसार भूमि पर बैठकर ही भोजन किया करते थे , अतः Last Supper वाला चित्र सर्वथा कपोलकल्पित है ।
उसी प्रसंग का एक और मुद्दा यह है कि रोमन शासन की पुलिस जब जीसस की तलाश में वहाँ पहुँची तो ( Judas Iscariot ) ज्यूडस इसक रियट नाम के शिष्य ने विद्यमान १२-१३ व्यक्तियों में जीसस के प्रति
अंगुली - निर्देश कर जीसस को पकड़वाया ।
यह बात भी इस कारण मनगढन्त लगती है कि जीसस यदि प्रसिद्ध धार्मिक नेता था तो १२-१३ व्यक्तियों के गुट में उसका पता लगाना कौन सी वडी वात थी । अतः ज्यूडस इस्कॅरियट के अंगुली - निर्देश की बात भी काल्पनिक लगती है ।
जीसस के हाथ तथा दोनों पैर यदि कीलों से क्रूस पर ठोके गए थे तो रक्तस्त्राव के कारण उसकी तुरन्त मृत्यु अटल थी । फिर भी तीन दिनों के पश्चात् जीसस के पुनर्जीवित होकर सीधा स्वर्गारोहण करना अटपटा - सा लगता है । जीसस को ईसाई लोग परमात्मा का अवतार मानते हैं । और परमात्मा सर्वशक्तिमान कहा जाता है । ऐसे सर्वशक्तिमान ईश्वरावतार को धोखे से पकड़कर झूठे आरोप में देहदंड दिया जाना भी जंचता नहीं ।
ईसाइयों की मान्यता है कि जीसस को कीलें ठोकने से उसके शरीर से जो रुधिर वहा वह उसे परमात्मा माननेवाले अनगिनत व्यक्तियों के सारे पापों को सदियों तक धोता रहेगा । इस तक में तो कई दोष दिखाई देते हैं । एक दोष यह है कि जीसस की मृत्यु यदि स्वेच्छा से किया हुआ आत्मसमर्पण अर्थात् आत्महत्या नहीं थी तो उसके शरीर से निकला रुधिर विश्व के अन्त तक उसका नेतृत्व कवूल करनेवाले असंख्य व्यक्तियों के पाप धोता रहेगा , यह धारणा विश्वासयोग्य नहीं लगती ।
दूसरा दोष यह है कि किसी के शरीर से निकला रक्त तुरन्त गाढ़ा बनकर सूखे रूप में केवल दाग बनकर रह जाता है । ऐसे सूखे दाग दूसरों के पाप कैसे धो सकेंगे ? तीसरा दोष यह है कि मानव रक्त स्वयं एक दुर्गंधयुक्त जन्तुभरा पदार्थ होते हुए दूसरों के पाप कैसे धोएगा ? जीसस का नेतृत्व कबूल करने वालों को ही पापमुक्ति प्राप्त होगी , दूसरों को नहीं - इस कथन में भी ईश्वरीय आध्यात्मिक निष्पक्षता के बजाय स्वार्थी राजनितिक पक्षपातपूर्ण सौदेबाजी की झलक दिखाई पड़ती है ।
इस प्रकार वेद विरूद्ध कपोल कल्पित अंधविश्वास पर आधारित संप्रदाय वेद ज्ञान के अभाव वश अज्ञानंधकार में पैदा हुए....
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✍️🔶जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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