पोवार कौन है ?

पोवार यह एक प्राचीन ब्रह्म क्षत्र वंश है। जो जन्म से क्षत्रिय और कर्म से क्षत्रिय तथा ब्राह्मण दोनो के गुणों का समाहार थे इसलिये यह ब्रह्म-क्षत्र कुल के क्षत्रिय कहलाएँ। इनका जिक्र महाभारत में मालव जनपद के क्षत्रियों के रूप में हुआ है जिनके कुल में ही आगे चलकर आदित्य पोंवार तथा विक्रमादित्य जैसे विख्यात शासकों का जन्म हुआ। 

डाॅ. राजबली पांडेय ने अपने पुस्तक संवत् प्रवर्तक विक्रमादित्य में मालवगणमुख्य विक्रमादित्य का मूल वंश सुर्य वंश होना लिखा है। इसका एक एतिहासिक प्रमाण नंदसा अभिलेख भी है। पोंवार शब्द की उत्पत्ति मूल शब्द प्रमर या प्रमार शब्द से हुई जो एक अपभ्रंश है लेकिन बहोत पुराना क्योंकि परमारों के लिए पहली शताब्दी में आए टाॅलेमी ने अपने यात्रा वर्णन के ग्रंथ में भी "पोंवार"  लिखा है । अब तक यह एतिहासिक प्रमाण नहीं मिल सके है कि यह शब्द और कितना प्राचीन है। इसलिए इसकी प्राचीनता अभी 
हमे प्रथम शताब्दी ही स्वीकार लेनी चाहिए। यह शब्द  प्रमार के और एक अपभ्रंश परमार से भी ज्यादा प्राचीन है। 

*️⃣ अग्निवंश का भ्रम :

क्या पोवार अग्निवंश के है? तो इसका उत्तर है बिल्कुल नहीं। क्योंकि पोवार या प्रमारों पर हमने पहले ही लिख दिया की वे मालव जनपद, सुर्य वंश तथा "ब्रह्म - क्षत्र"  कूल से है। यह सुर्य वंशी क्षत्रिय थे जिन्हें प्रमर कहाँ गया है। एक कवि चंदबरदाई जिसे इतिहास ज्ञान नहीं था उसने यह सब लिखा है कि पोवार या प्रमार अग्निवंश के है तथा कपोल कल्पित कथा भी लिखी है । पृथ्वीराज रासौ के पूर्व और पश्चात जहां भी यह उल्लेख है वे सभी अमान्य है जिनका खण्डन डाॅ. गौरीशंकर ओझा ने भी किया है। अतः इस आर्य जाति 
पर यह भ्रम सर्वथा गलत है कि यह अग्नि कुंड से जन्मे।इसी कथा का दुष्प्रभाव है कि कर्नल  टाॅड जैसे इतिहासकार परमारों या पोवारो को विदेशी मान बैठें। फिर भी इस कथा को देखते हुए निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि बौध्द मत के कारण अहिंसा के रास्ते क्षात्र धर्म की हानी हुई।  प्रमार आदि बौध्द आदि मत के मानने वाले हो गए थे और वैदिक धर्म संकट से जूझ रहा था तब आर्यावर्त की सीमा रक्षा का जो दायित्व क्षत्रियों का था उसका निर्वहन कराने आबु पर्वत पर यज्ञ हुआ तथा क्षात्र धर्म की वापसी की चार क्षत्रिय वंशीयो ने भीषण प्रतिज्ञा की। इसपर V. A. SMITH ने लिखा है कि इन चार अग्निकुल में प्रमार वंशीय दो अवतारों का उदय हुआ विक्रमादित्य और शालिवाहन। "Early History of India"  की वह टिप्पणी इस तरह से है : ”The most systematic record of Indian historical tradition is that preserved in the dynastic lists of the puranas. In Kshatriya varna two most valiant and courageous Kings Vikramaditya and Salivahana Kings of Parmara Dynasty protect India from invaders, protect Dharma and culture of the India.”

अर्थात भारतीय समाज को आक्रमणकारियों से रक्षा करने हेतु, धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा करने के लिए क्षत्रिय वर्ण में दो अवतार जन्म लिए सम्राट विक्रमादित्य एवं शालिवाहन परमार (परमार राजवंशीय शासक) जिनकी वीरता की कोई परिकाष्ठा नही थी ।

*️⃣ भंडारा जिले का महाराष्ट्र सरकार गजेटियर कहता है:


Maharashtra Government Gazetteer of Bhandara District says :

 " Ponvars.—The Ponvars originally belonged to Malva. The Ponvar dynasty ruled in Malva from the 9th to the 18th Century. In the twelfth Century Nagpur was included in the Malva kingdom and the first settlement of the Ponvars may probably be attributed to this period . They themselves say that they originally came to Nagardhan near Ramtek and then spread over the surrounding country. Some of the most influential members of the caste accompanied Chimnaji Bhosle on his Cuttack expedition and on their return were rewarded with grants of land in Lanji and other tracts to the west of the Wainganga river which were largely covered with forests "

"  This is the reason of Ponwar being Patels, Malgujars and Jamindars of Wainganga Valley area ." 

अर्थात्  
 "पोवार  मूल रूप से मालवा के थे। पोंवार  वंश ने मालवा में 9 वीं से 18 वीं शताब्दी तक शासन किया था। बारहवीं शताब्दी में नागपुर को मालवा साम्राज्य में शामिल किया गया था और पोंवारो की पहली बस्ती को संभवतः इस अवधि के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।  । वे स्वयं कहते हैं कि वे मूल रूप से रामटेक के पास नागरधन में आए और फिर आसपास के देश में फैल गए। जाति के कुछ सबसे प्रभावशाली सदस्य चिम्नाजी भोंसले के साथ उनके कटक अभियान पर गए और उनकी वापसी पर लांजी और अन्य में भूमि के अनुदान से पुरस्कृत किया गया  और   वैनगंगा नदी के पश्चिम की ओर जाने वाले रास्ते जो काफी हद तक जंगलों से ढके हुए थे ”

"पोंवर के वैनगंगा घाटी क्षेत्र के पटेल, मालगुजार और जमींदार होने का यही कारण है।" 
इस तरह पोवार उच्च जातियों के क्षत्रिय कुलीन लोग है जो धार से आकर बसे और धारकर भी कहलाएँ जिसे बाद में धाकड़ जैसे हास्यास्पद शर्मनाक अपभ्रंश का रूप हमें व्यंग में दे दिया गया। यदि गोंदिया जिले के प्रत्येक गांव का survey किया जाए और हर ग्राम के पटेल और महाजन कौन है पुछे जाए तो 99.9% गांव में  आपको पोवार जाती के ही महाजन तथा पटेल मिल जाएंगे। पटेल माने तत्कालीन ग्राम मुखिया हुआ करते थे। ऐसा ही परिक्षण भंडारा में कर लिया जाए तो भी 98% पोवार ही मालगुजार, पटेल और महाजन आदि उन गांवों के मिल जाएंगे। हमारे ग्राम कवडीटोला में हमारे गौतम कुल के पुर्वज "महाजन" थें। उनके नाम के साथ आज भी महाजन शब्द का प्रयोग किया जाता है। ठिक वैसे ही हमारे गांव में पटेल अपने कुल से पटले है। पटेल, महाजन, मालगुजार आदि की जमीनें भी बेहद विस्तृत होती थी। हमारे 4 थे पीढ़ी पूर्व जो हमारे पुर्वज महाजन चिखलू थे उनकी जमीन 24 एकड़  थी तथा पटेल आदि की भी लगभग वर्तमान में 25 एकड़ जमीन होगी तथा बेंच न दिए होते तो तत्कालीन समय पर 30 - 40 एकड़ रही होगी इसमें कोई संदेह नहीं। यह तो विषय को सरलता से   समझने समझाने के लिए मैने शुद्र उदाहरण प्रस्तुत किये है। ऐसे अन्यान्य उदाहरण आपको हर गांव में मिल जाएंगे... 

तो यह सब स्पष्टीकरण इसलिए है कि पोवार भलेही राजपुताना और मालवा छोडकर यहां आ बसे किंतु क्षत्रिय होने के कारण आखिरकार अपने प्रभुता को भी उन्होंने पुरी तरह से नहीं छोड़ा यह बात सिध्द हो जाती है। 

  
*️⃣ विक्रमादित्य :

चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में हो गए।

(१) "Journal asiatique of recueil de mémoires ginquieme serie, Tome 
III, Paris, janvier 1854" में लिखा है "विक्रमादित्य पोवार ने अपने युग में एक संवत की स्थापना की तथा यह भारत में प्रचलित संवत् है।" इसी में कविराज भोज के धारानगरी बसाने का भी उल्लेख है। 

(२) प्रसिद्ध इतिहास संशोधक Willium wilson के इतिहास खण्ड में भी विक्रमादित्य पर बहुत अच्छी जानकारी है। तदनुसार भारत में ईसा पूर्व 56 में शकारि विक्रमादित्य ने अपना संवत् चलाया।


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