बृहत्स्थान या ब्रिटेन की विष्णुमूर्ति !
#बृहत्स्थान_या_Britain_की_विष्णुमूर्ति.....
A Complete History of the Druids ( ड्रुइडों का सम्पूर्ण इतिहास ) नामक पुस्तक की भूमिका के प्रथम पृष्ठ पर ही उल्लेख है कि " ब्रिटेन ( आंग्ल भूमि ) में पाए गए भग्नावशेषों में एक स्थान पर जो स्तम्भ , वर्तुल और सर्प की प्राकृति मिली उनका विवरण देना आवश्यक है । ''[1]
उस ग्रंथ के पृष्ठ ६ पर लिखा है " सर्प प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक था । उसका नाम ' सेराफ ' ( Seraph ) कितना अर्थपूर्ण है । "
उक्त शब्द ' #सेराफ ' वस्तुतः संस्कृत सर्प शब्द का अपभ्रंश है । (" It may be necessary to give an explanation of the Pillars , the Circle and the Serpent . ")
देवताओं पर सर्वदा नागों के फणों का छत्र होता है । अतः नाग प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक माना गया है । प्रत्यक्ष जीवन में भी यह देखा गया है कि जिस व्यक्ति के ऊपर नाग निजी फण का छत्र खड़ा कर बिना दंश किए निकहा जाए वह व्यक्ति बड़ा भाग्यवान होता है । आंग्ल भाषा में सर्प , सर्पट , सर्पंटाईन आदि शब्द होना इस बात का एक प्रमाण है कि प्राचीन समय में आंग्लभूमि में और विश्व के हर प्रदेश मे संस्कृत ही बोली जाती थी ।
इसी तथ्य के अन्य बहुत सारे प्रमाण इसी ग्रन्थ में अन्य पृष्ठों पर विविध संदर्भो में उद्धृत हैं । उसी ग्रन्थ के पृष्ठ १५ पर कहा है ,
" अनेक इतिहासकारों के कथन से यही निष्कर्ष निकलता है कि अम्लिभूमि के मूल निवासी विश्व के पूर्वी भागों से आए थे । "
इससे स्पष्ट है कि वे भारत से ही आंग्ल भूमि में जा बसे थे । क्योंकि उतने प्राचीन काल में सभ्यता भारत में ही थी । इससे पता लगता है कि आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा ने इतिहास कैसा उल्टा कर रखा है ।
वे सिखाते हैं की वैदिक संस्कृति वाले आर्य लोग किसी अन्य प्रदेश से भारत में आए । किन्तु वास्तविकता तो वह है जो मैंने ऊपर कही है कि वैदिक संस्कृति का प्रसार भारत से अन्य सारे प्रदेशों में हुआ । यहाँ एक और मुद्दा विशेष ध्यान देने योग्य है कि प्रचलित पाश्चात्य विचारधारानुसार किसी अन्य प्रदेश से आर्य लोग कुछ भारत में चले गए और कुछ यूरोप में ।
तो यदि भारत में प्रवेश किए हुए आर्य लोगों की जीवन प्रणाली वैदिक थी और भाषा संस्कृत थी तो उन्ही जनों की जो दूसरी शाखा यूरोप में गई उनकी जीवन - प्रणाली भी तो वैदिक और भाषा संस्कृत ही होनी चाहिए ।
पाश्चात्य विद्वानों की ही धारणा से जो निष्कर्ष प्रतीत होता है वह वे आजतक नहीं निकल पाये । यह प्रचलित सदोष संशोधन पद्धति का एक मोटा उदाहरण है । ऐसे अनेक दोषों से ही वर्तमान इतिहास में अनेक त्रुटियाँ हैं ।
वैदिक संस्कृति वाले भारतीय लोग ही यदि ब्रिटेन में प्रथम जा बसे तो उन्होंने वहाँ शेषशायी भगवान् विष्णु का महान् शिल्प प्रस्थापित करना स्वाभाविक ही था । ब्रिटेन के वेल्स विभाग में ( Isle of Angelsey ) आइल ऑफ
अंगलसी यानी अँगलसी द्वीप है । उसी द्वीप पर उस प्राचीन महान् विष्णु शिल्प के भग्नावशेष अभी भी उपलब्ध हैं । और तो और ' अंगलसी ' यह ' प्राग्लेशः ' यानि अंगुल भूमि का नाथ ( भगवान् विष्णु ) इस अर्थ का विकृत संस्कृत शब्द ही है ।
ब्रिटेन भूमि का मूल प्राचीन संस्कृत नाम ' अंगुलि स्थान ' यानि ' अंगुली जैसी छोटी सिकड़ी भूमि ' था । यूरोप को यदि हम तलहस्त के आकार का भू - खण्ड मानकर चलें तो ब्रिटेन उस यूरोप खण्ड के अंगुलि समान दिखाई देता है । इसी कारण उसका संस्कृत नाम वेदकालीन ऋषियों मे ' अंगुलिस्थान ' रखा । उसी का उच्चारण संस्कृत शिक्षा का उस भूमि में लोप होने पर , बिगड़ते - बिगड़ते ' अंगुलियेई ' और ' इंग्लैंड ' ऐसा परावर्तित हो गया ।
उसी ड्रइड्स वाले ग्रंथ में पृष्ठ ३६ पर उल्लेख है कि "ड्रृ इडों" के कई मंदिरों के भग्नावशेष अभी इस आइल ऑफ मैन ( Isle of Man ) और आइल ऑफ अँगलसी ( Isle of Angelsey ) द्वीपों पर हैं । उनमें से कई महान् शिलाओं के हैं जैसी शिलाएं अबीरी ( Abiry ) और स्टोनहेंज ( Stonehenge ) नामक प्राचीन स्थानों में हैं ।
" पृष्ठ ५४" पर वर्णन है कि
"अबीरी नगर एक मैदान के ऊँचे भाग में बसा है । वहां के भग्नावशेषों मेंसेराफ उर्फ सर्प की विशाल प्राकृति एक वर्तुल ( गोल चक्कर ) से निकली दर्शायी गई है । उस गोल आकृति के बाहर बड़ा विस्तृत और ऊँचा परिकोटा है । परिकोटे के अन्दर की तरफ ८० फुट चौड़ाई की खाई बनी हुई है । इस खाई का व्यास लगभग १३५० फुट और घेरा ४००० फुट है । समूचे भू - भाग का क्षेत्रफल २२ एकड़ के आसपास है । इस खड्ड के बीच ऊँची खड़ी १०० महान शिलाओं से बना एक गोल घेरा था । प्रत्येक शिला १५ से १७ फुट ऊँची थी । उनकी चौड़ाई भी प्रायः उतनी ही थी । सन् १७२२ में जब डॉक्टर स्टयूक्ले उस स्थान पर गए थे तब उक्त १०० शिलाओं में से ४४ ही वहाँ शेष दिखाई दे रहीं थीं । उनमें केवल १७ शिलाएँ खड़ी थीं । अन्य २७ या तो गिर पड़ी थीं या झुकी थीं । बाकियों में से १० टॉम रॉबिन्सन ने सन् १७०० में नष्ट कर दी । अन्य शिलाओं के अवशेष वहाँ दीख रहे थे । एक तरफ ये १०० शिलाएँ और दूसरी ओर खाई । इनके बीचोंबीच प्राचीन काल में एक अच्छा मार्गरहा होगा । उस महान् और सुन्दर दृश्य की हम कल्पना भी नहीं कर सकते । "
पृष्ठ ५६ से ५६ पर उस ग्रंथ में लिखा है ,
" इस नगर के मकान , दीवारें और कुटियाँ आदि उन्हीं प्राचीन शिलाओं से या उनके खण्डों से बनी हैं जो उस स्थान में थे । " प्रब हम नगर के दक्षिणी द्वार से निकल कर परिकोटे की दिशा में चलें । इसका नाम ' पवित्र मार्ग ' ( या देव मार्ग ) या । प्रोब्इरटोन् पहाड़ियों के शिखर का हाक् पेन ' नाम है जिसका अर्थ प्राच्यभाषा में ' शेष का शीर्ष ' ऐसा होता है । अबीरी के परिकोटे से यह ७२०० फुट अन्तर पर है । यहाँ के लोगों की उस स्थान के प्रति अभी भी बड़ी श्रद्धा है । उसे वे आश्रम कहते हैं । जब वह पूरा बना हुआ था तब सत्यमेव वह विश्व का विशाल और सुन्दर मन्दिर रहा होगा । वहाँ विद्यमान सारे चिह्नों से यही निष्कर्ष निकलता है कि वह उस पवित्र त्रिमूर्ति का मन्दिर रहा होगा । ' अबीरी ' का अर्थ उसके संस्थापकों के मूल प्राचीन । भाषा में ' सर्वशक्तिमान् देवत्रय ' ऐसा ही था । "
यह है उस ग्रंथ में लिखा वर्णन । उस पर हमारा भाष्य यह है कि जिस खड्ड का उल्लेख ऊपर आया है वह क्षीरसागर रूपी सरोवर था । क्योंकि शेषनाग पर लेटे विष्णु सर्वदा सरोवर के मध्य में बताए जाते हैं ।
बाइबल के ' जेनेसिस् ' खण्ड के प्रारम्भ में यही उल्लेख है कि भगवान् जल पर विराजमान थे । शेष के शीर्ष का नाम भी प्राच्यभाषा में था । वहाँ का मन्दिर विशाल , सुन्दर और विश्वप्रसिद्ध था । और वहाँ वैदिक त्रिमूर्ति ब्रह्मा - विष्णु - महेश की भव्य प्रतिमाएं थीं । ड्रुइड लोग उस देवस्थान के संचालक थे । इस वर्णन से स्पष्ट है कि अंगलसी उर्फ आंग्लेश : द्वीप उसके भव्य और पवित्र देवस्थान के लिए विश्व में प्रसिद्ध था ।
📖ref.
[1]Preface to A Complete History of The Druids , Theit Origin , Manners , Customs , Powers , Temples , Rites and Superstitions with an inquiry into their Religion and its coincidence with the Patriarchal , by Lichfield , printer T. G. Lomax , marketed by Long mann , Hurst , Reas & Orme , London .
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