कविराज भोज रचित संस्कृत काव्यशास्त्र की अनूठी कृति - सरस्वतीकंठाभरण.......!
#सरस्वतीकण्ठाभरण_का_परिचय :
महाविद्वान राजर्षि "कविराज भोज" विरचित सरस्वतीकण्ठाभरण काव्य शास्त्र के क्षेत्र में अपना अनुपम स्थान रखता है । ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में विरचित इस ग्रन्थ का सम्बन्ध काव्यशास्त्र के विकास की तृतीय और अन्तिम अवस्था से है ।
काव्यशास्त्र के विकास की सर्जनात्मक अवस्था जो कि 7 वीं शताब्दी के मध्य में भामह से प्रारम्भ होती है और नवीं शताब्दी के मध्य में आनन्दवर्धन के काल तक उत्कर्ष को प्राप्त करती है , का अनुसरण करते हुए यह ग्रन्थ अपने पूर्ववर्ती सभी काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों के काव्यत्व - प्रयोजक समस्त तत्त्वों जैसे- अलंकार , रीति , रस , ध्वनि का पुराणों के काव्यशास्त्रीय विचारों को अपने भीतर समेटे हुए है ।
सरस्वतीकण्ठाभरण काव्यशास्त्र के विकास की निर्णायक अवस्था की अन्तिम कड़ी का प्रतिनिधित्व करते हुए काव्यशास्त्र के क्षेत्र में लगभग तीन सौ वर्षों तक के विचारकों की उपलब्धियों का पुनरीक्षण करने के लिए हमें एक विशेष भूमि प्रदान करता है ।
कारिका , वृत्ति एवं उदाहरणों से समन्वित इस ग्रन्थ में 5 परिच्छेद हैं ।
(१) प्रथम परिच्छेद में दोष एवं गुण का विवेचन किया गया है ।
(२) द्वितीय में शब्दालङ्कार का तृतीय में अर्थालड्कार का चतुर्थ में उभयालकार तथा पंचम परिच्छेद में रस का विवेचन किया गया है ।
(३) इनमें से प्रथम परिच्छेद में वर्णित दोष को त्याज्य बताया गया है , जबकि गुण . अलकार एवं रस को सहृदय हृदय श्लाघ्य उत्तम काव्य बन्ध की सर्जना के लिए आवश्यक बताया गया है ।
(४) इन तत्त्वों के विषय में अपने विचार को व्यक्त करते
प्रथम परिच्छेद में दोष एवं गुण का विवेचन किया गया है ग्रन्थकार ने ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही कहा है कि कोई कवि ऐसे काव्य की रचना करके कीर्ति एवं प्रीति का भाजन हो सकता है जो दोष से रहित हो , गुण समन्वित हो , अलकार से अलङ्कृत हो और रसभावादि परिपूर्ण हो ।
अपने उपर्युक्त विचार का अनुसरण करते हुए ग्रन्थकार ने उक्त 4 तत्त्वों का ग्रन्थ के 5 परिच्छेदों में वर्णन किया है । प्रथम परिच्छेद में दोष एवं गुण का विवेचन 151 कारिकाओं में किया गया है । दोष 3 श्रेणियों में विभक्त किये गये हैं- पद दोष वाक्य दोष और वाक्यार्थ दोष ।
प्रत्येक श्रेणी व दोषों की संख्या 16-16 बतायी गयी है । गुण भी शब्द गुण , अर्थगुण और वैशेषिक गुण के भेद से तीन श्रेणियों में विभाजित किए गये है । द्वितीय परिच्छेद में कुल 156 कारिकाए है , जिनके द्वारा शब्दालङ्कारों का निरूपण किया गया ।
अलंकार तीन श्रेणियों में विभाजित किए गये हैं । इनमें विभाजन का आधार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित होता है । शब्दालङ्कारों के वाह्य , अर्थालङकारों को आभ्यान्तर एवं उभया लङ्कारों को बाह्याभयान्तर कहा गया है ।
यह तथ्य ध्यातव्य है कि सरस्वतीकण्ठाभरण अपनी वर्णन शैली में अपने पूर्ववर्ती काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों के तुलना में अधिक सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध है ।
वामनकृत काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति को छोड़कर , जो कि ठोस तर्कसंगत आधार पर काव्य के शरीर , दोष , गुण , अलकार और प्रयोग की पाँच अध्यायों में विवेचना करता है । भोज के समय तक किसी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ के द्वारा ठोस एवं तर्कपूर्ण योजना का अनुसरण नहीं किया गया है ।
सरस्वतीकण्ठाभरण के पूर्व पाँच काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ ( भामह का काव्यालङ्कार , दण्डी का काव्यादर्श उद्भट का काव्यालङ्कारसारसंग्रह , वामन का काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति और रुद्रट काव्यालङ्कार ) प्रकाश में आ चुके थे । यद्यपि आनन्दवर्धन का ध्वन्यालोक भी उस समय तक लिखा जा चुका था तथापि अन्य ग्रन्थों की तुलना में इसे अलकार पर विशेष पुस्तक नहीं माना जा सकता है ।
उस ध्वन्यालोक में ध्वनि को काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिष्ठित करके विभिन्न काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों के विचारों की पूर्वकल्पना करके उनके ऊपर ध्वनि के मौलिक विचारों का अध्यारोपण किया गया है ।
इसके पश्चात् मम्मट का आगमन होता है जिन्होंने काव्यप्रकाश में विभिन्न काव्यशास्त्रीय सम्प्रदायों द्वारा वर्णित काव्य सम्बन्धी तत्त्वों का विवेचन किया गया है । यदि हम भोज के पूर्ववर्ती भामह आदि आचार्यों की योजना एवं विवेचना पद्धति की समालोचना करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरस्वतीकण्ठाभरण निश्चप्रचम् काव्य सम्बन्धी आवश्यक तत्त्वों की स्पष्टता एवं योजना की दृष्टि से एक उत्कटकोटिक कृति है । यह ग्रन्थ में अपने पूर्ववर्ती अन्य सभी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों से अधिक विशद है ।
अन्त में हम यह कह सकते हैं कि सरस्वतीकण्ठाभरण संस्कृत काव्यशास्त्र के क्षेत्र में एक अनूठी कृति है । जो हमारे सम्प्रदायों काव्यशास्त्र एवं नाट्यशास्त्र को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास करती है तथा जिसमें काव्यकला से सम्बन्धित आवश्यक सूचनाएं संग्रहीत की गयी हैं । इसमें विद्वत्ता का गर्व नहीं प्रदर्शित किया गया है ।
जय मां वाग्देवी 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
जय मां सच्चीयाय 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
जय राजा भोज ⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️⚔️

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