यहूदी लोगों की वैदिक परंपरा

#यहुदी_लोगों_की_वैदिक_परंपरा...

(भाग :1)

१९३३ से जर्मनी के शासक हिटलर ने यहूदी लोगों की निर्मम हत्या करना आरम्भ किया । उसका यह सिद्धान्त था कि जर्मनी के मूल निवासी आर्यावर्त से उद्गमीत आर्यवंश के श्रेष्ठ मानव हैं और जर्मनी में रहने वाले यहूदी लोग कोई हीन जाति के पराए लोग होने के कारण उनका अन्त करना उसका परम कर्तव्य था । इस दुराग्रही , निराधार सिद्धान्त से प्रेरित होकर हिटलर ने लगभग ७० लाख यहूदी लोगों का अन्त किया ।

गलत इतिहास पढ़ा हुआ व्यक्ति कितना भयंकर आतंक मचा सकता है इसका यह एक मोटा उदाहरण है। एक बात पाठकगण  इस संदर्भ में गांठ बांध लें कि "आर्य नाम की कोई जाति या वंश नहीं ।" आर्य तो धर्म है । किसी भी वंश का व्यक्ति उसे अपना सकता है ।

सनातन वैदिक धर्म को ही आर्य धर्म कहा जाता है । भगवान कृष्ण उसी आर्यधर्म के अनुयायी थे । भगवद्गीता में उन्होंने उसी धर्म का प्रवचन किया है । यहूदी लोग भगवान कृष्ण के यदु लोग थे ।

उनके नेता भगवान कृष्ण जब स्वयं आर्य धर्म के जाने - माने प्रवक्ता थे तो अन्य यहूदी लोग अनार्य कैसे हो सकते हैं ?

अत : ज्यू लोगों को अनार्य कहकर उनकी हत्या करने में हिटलर ने बड़ा अत्याचार और अनाचार किया । यहूदी पंथ को Judaism कहा जाता है । वह Yeduism का अपभ्रंश है ।

(१) सौराष्ट्र यह यदु लोगों का प्रदेश था । श्रीकृष्ण की द्वारिका उसी प्रदेश में है । वहाँ के शासक जाडेजा कहलाते हैं । जाडेजा यह " यदु - ज " शब्द का वैसा ही अपभ्रंश है जैसे Judaism है । जाडेजा और Judaism दोनों का अर्थ है यदु उर्फ जदुकुलवंशी ।

(२) उसी पंथ का दूसरा नाम है Xionism | उसका उच्चार है " जायो निम् " जो " देवनिज्म " का अपभ्रंश है । भगवान कृष्ण देव थे अतः उनका यदुपंथ देवपंथ कहलाने लगा । 'द' या 'ध' का अन्य देशों में " ज " उच्चार होने लगा । जैसे ध्यान बौद्धपंथ का उच्चार चीन - जापान में " जेन " बौद्ध पंथ किया जाता है , उसी प्रकार " देवनिजम् " का उच्चार ज्ञायोनिजम हआ ।

(३)  यहूदी परम्परा के प्रथम नेता अब्रह्म माने गए हैं । यह " ब्रह्म " शब्द का अपभ्रंश है । उनके दूसरे नेता " मोजेस् " कहलाते हैं , जो महेश शब्द का विकृत उच्चार है । मोझेस की जन्मकथा कृष्ण की जन्मकथा से मेल खाती है , अत : वह महा - ईश - भगवान कृष्ण ही हैं , इसके सम्बन्ध में किसी को शंका नहीं रहनी चाहिए ।

(४)  महाभारतीय युद्ध के पश्चात् द्वारिका प्रदेश में शासकों के अभाव से लूटपाट , दंगे आदि आरम्भ हुए । धरती कम्प आदि से सागर तटवर्ती प्रदेश जलमग्न होने लगा । अतः यादव लोग टोलियाँ बनाकर अन्यत्र जा बसने के लिए निकल पड़े । कूल २२ टोलियों में वे निकले । उनमें से १० टोलियाँ उत्तर की ओर कश्मीर की दिशा में चल पड़ीं और कश्मीर , रूस आदि प्रदेशों में जा बसीं । अन्य १२ टोलियां इराक , सीरिया , पॅलेस्टाईन , जेरूसलेम , ईजिप्त , ग्रीम आदि देशों में जा बसीं । मध्य एशिया के १२ देशों में यदुवंशियों की वही १२ टोलियां हैं । वहीं यहूदियों की १२ टोलियाँ कहलाती हैं ।

(५) भगवान कृष्ण के अवतार समाप्ति के पश्चात् यहूदी लोगों को जब कठिन और भीषण अवस्था में द्वारिका प्रदेश त्यागना पड़ा तभी से यहूदी लोगों ने मातृभूमि से बिछड़ने के दिन गिनने शुरू किए । उसी को यहूदियों का passover शक कहा जाता है । उसका अर्थ है मातृभूमि त्यागने के समय से आरम्भ की गई कालगणना ।

(६) सन् १९८६ में यहूदी लोगों का ५४४७वां वर्ष चल रहा था । यह एक विचित्र योगायोग है कि कृष्ण की मति का , भगवद गीता का और वैदिक धर्म का तिरस्कार करने वाले मुसलमान लोग भी यहदियों को वैसे ही शत्रु मानते हैं जैसे वे भारत के हिन्दुओं को मानते हैं ।

(७) यहूदियों का सालोमन् नामक राजा था । सॉलोमन् यह शालमानव इस संस्कृत शब्द का अपभ्रंश है । वनों में जो बड़े ऊँचे और पुष्ट वृक्ष होते हैं उनका शाल - वृक्ष नाम है । कालिदास ने दुष्यन्त को शाल वृक्ष की उपमा दी थी , क्योंकि शालवृक्ष जैसी दुष्यन्त की शरीरयष्टि ऊंची और पुष्ट थी । इस्लामी नाम सुलेमान और यहूदी नाम सॉलेमन् उसी संस्कृत शाल मानव शब्द के अपभ्रंश हैं । उस यहूदी सॉलेमन् राजा के प्रासाद की विपुल शोभा - सामग्री भारत से ही प्राप्त की गई थी ।

▪️इस सम्बन्ध में #Edward_Pocock ने "India in Greece" नाम के अपने ग्रन्थ में पृष्ठ २२१ पर लिखा है ,

" That India is the point whence came the gold ; and the luxuri ous appliances of Solomon ' s court is clear : both the length of the voyage and the nature of the commercial ports , and the original land of the Phoenicians , establish the fact , that it was a coasting voyage of Three years . "

 #अर्थात् " सॉलेमन् के प्रासाद में दृष्टिगोचर होने वाला सुवर्ण और अन्य मूल्यवान सामग्री भारत से ही लाई गई थी । वे वस्तुएं , उन्हें लाने के लिए किया गया दीर्घ - प्रवास , फणि उर्फ फिनीशियन् लोगों का निवास स्थान और सागर के किनारे किया हआ तीन वर्षों का प्रवास आदि तफसील ध्यान में रखते हुए वह सारी कीमती सामग्री अवश्यमेव भारत से आई होगी । "

▪️उसी ग्रन्थ में पृष्ठ २२४ पर पोकॉक लिखते हैं

" When Judah did evil in the sight of the lord and built them high places and imagesandgroves on every high hill , and under every tree , the object was Bal and the pillar was his symbol . It was on this alter they burnt incense and sacrificed the calf on the 15th day of the month , The sacred Amavas of the Hindus , The calf of Israel is the bull of Balesar or Iswar ! !"

 इसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है :-

 " यदु लोगों से यदि कोई पाप होता तो वे पहाड़ के ऊपर कुंजवनों में या वृक्ष के तले मन्दिर बनाते और उममें बाल ( कृष्ण ) की मूर्ति स्थापन कर देते । मन्दिर के आगे ( गरुड़ ) स्तम्भ होता था । मन्दिर की वेदी पर घूप जलाते थे और प्रति अमावस्या को एक बछड़े की बलि देते थे । "

(८) कृस्ती धर्मग्रन्थ बायबल में भी यहूदी लोगों के भगवान का नाम " बाल " उल्लिखित है जो स्पष्टतया बालकृष्ण ही है । बालेसर यह कलेश्वर का ही अपभ्रंश है । ऊपर दिए उद्धरण में गाय के बछड़े की बलि देने की बात वैदिक संस्कृति से मेल नहीं खाती । भारत के हिन्दुओं की वैसी प्रथा नहीं है । गोहत्या तो निषिद्ध मानी गई है । मण्डन में एक बात कही जा सकती है कि केवल बछड़े का उल्लेख है । उसे गाय का बछड़ा नहीं कहा है । तो हो सकता है किसी और प्राणी का बछड़ा हो । किन्तु पाप करने पर प्रायश्चित के रूप में मन्दिर बनवाना , उसमें मूर्ति की स्थापना करना , मन्दिर के प्रवेश द्वार के आगे स्तम्भ खड़ा करना , वेदी पर धूप जलाना या अगरबत्ती सुलगाना यह सारी वैदिक प्रणाली ही प्राचीन यहूदी प्रथा में अन्तर्भूत थी ।

(९) सुवर्ण गोवत्स वर्तमान युग में यहूदियों के मन्दिरों में भगवान की मूर्ति भले ही न रहती हो फिर भी यहूदियों को मूर्तिपूजा से तिरस्कार नहीं । मूर्ति देखते ही जैसे उसे तोड़ने के लिए एक कर्मठ मुसलमान का मस्तिष्क भड़क उठता है वैसा यहूदी का कभी नहीं होता ।

(१०) भारत में हजारों यहूदी हिन्दुओं से इतने घुलमिल गए हैं कि उनकी भिन्नता पहचानी नहीं जा सकती । हिन्दु वैदिक - प्रथा में मूर्ति - पूजा करना या न करना , जाप करना या न करना , गुरु करना या न करना , ईश्वर को मानना या न मानना आदिबातों में प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता होती है । यहूदियों की वही भावना होती है । इस प्रकार के कर्मठ या अकर्मठ व्यवहार का आदर करना यहूदियों की भी प्रथा है । _ _

(११) इसी कारण द्वारिका से प्रस्थान करते समय यहूदियों में भी आस्तिक नास्तिक , कर्मठ - अकर्मठ , मूर्तिपूजक या निर्गुणभक्त आदि सब प्रकार के लोग थे किन्तु उन्हें जब स्वदेश छोड़ना पड़ा तो मूर्तिपूजकों ने भी मूर्तिपूजा बन्द कर दी ।

(१२) इसके कारण थे -

( 1. ) प्रवास में मूर्तियों का भार उठानाकठिन था ।

( 2. ) प्रवास में मूर्तियाँ टूट - फूट जाती थीं ।

( 3. ) मूर्ति स्थापित करने की या पूजापाठ की सुविधाएँ नहीं होती थीं ।

( 4. ) जल के अभाव में मूर्ति को नहलाना या भक्त ने स्वयं नहाना नियमित रूप से शक्य नहीं था ।

( 5. ) देवी , गणेश , शिव , राम , कृष्ण आदि विविध मूर्तियों के भक्तों में वादविवाद होकर यहूदी समाज में पराए प्रदेश में फट पड़ने का डर था । मन्दिर की सम्पत्ति की अभिलाषा से शत्रु द्वारा लूटपाट की शक्यता होती थी , आदि ऐसे अनेक कारणों से यहूदी परम्परा से मूर्ति पूजा हट गई ।

(१३) किन्तु यहूदी आत्मा को मूर्ति - पूजा से चिढ़ या तिरस्कार नहीं है ।

(१४) यहूदी लोग और पारसीजन बड़ी श्रद्धा से मूर्ति - पूजा में सम्मिलित होते हैं क्योंकि वे मूलत : वैदिकधर्मी ही हैं । इसी कारण यहूदी इतिहास में उनके मन्दिरों में सोने के गोवत्स की मूर्ति होती थी ऐसा उल्लेख बार - बार आता है । बालकृष्ण की भी मूर्ति होती थी ।

(१५) बछड़े को टेककर बालकृष्ण मुरली बजाया करते थे । इस प्रकार चित्रों और मूर्तियों से भारतीय लोग भली प्रकार परिचित हैं । किन्तु द्वारिका छोड़ने के पश्चात् देश - विदेश में भटकते - भटकते यहदियों का सारा इतिहास छिन्न - भिन्न हो गया ।

(१६) तथापि यहूदियों का वह फटा - टूटा इतिहास वैदिक संस्कृति के आधार से कैसे संवारा जा सकता है वह हमने यहाँ बतलाया है । यही नहीं वैदिक संस्कृति के आधार पर सारे विश्व के इतिहास की टूटी - फूटी कड़ियाँ जोड़ी जा सकती हैं । _ _ _ _

(१७) यहूदियों के मन्दिरों में गोवत्स और बालकृष्ण की सोने की प्रतिमाएँ होती थीं इस बात का एक और प्रमाण यह है कि यहूदी इतिहास के विभाग उनके ( कृष्ण ) मन्दिर के आधार पर

" प्रथम मन्दिर के काल का इतिहास " , " द्वितीय मन्दिर के कालखण्ड का इतिहास " ऐसा करने की प्रथा पड़ी है ।

◼️ #हिब्रू_भाषा यानी " हरि बूते " इति हब्रू यहूदियों की भाषा का नाम “ हब्रू " है । यहूदियों के आंग्ल ज्ञानकोष का नाम है Encyclopaedia Judaica | उसमें " हबू " शब्द का विवरण देते हुए कहा है कि उस शब्द का पहला अक्षर जो " ह " है वह परमात्मा के नाम का संक्षिप्त रूप है । अव देखिए कि ऊपरले विवरण में दो न्यून हैं । एक न्यून तो यह है कि " ह " से निर्देशित होने वाला यहूदियों के भगवान का पूरा नाम क्या है ?

(१) यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया । करेंगे भी कैसे , जब ज्ञानकोपकारों का ही ज्ञान अधूरा है । हम वैदिक संस्कृति के आधार पर उस कमी को दूर करते हैं । " हरि " यह कृष्ण का नाम है , उसी का " ह " अद्याक्षर है । _ _ _

(२) अब दूसरा न्यून यह है कि यहूदी ज्ञानकोष वालों ने हब्रू शब्द में ब्रू अक्षर क्यों लगा है ? यह कहा ही नहीं । उस महत्वपूर्ण बात का उन्हें ज्ञान न होने से वे उसे टाल गए । बू अक्षर का तो बड़ा महत्त्व है । " ब्रूते " यानी बोलता है इस संस्कृत शब्द वह अद्याक्षर है । अतः हबू का अर्थ है " हरि ( यानी कृष्ण ) बोलता था वह भाषा " । ठीक इसी व्याख्यानुसार संस्कृत और हब में बड़ी समानता
है ।

(३) हब संस्कृत से भिन्न क्यों ? यदि कोई ऐसी शंका करे कि हरियानी भगवान कृष्ण तो ठेठ संस्कृत बोलते थे । उनकी वाणी महाभारत में और भगवद्गीता में प्रथित है । तो जो भाषा श्रीकृष्ण बोलते थे यही यदि हब का अर्थ है तो हब्रू संस्कृत ही क्यों नहीं है ? इस शंका का उत्तर यह है कि महाभारतीय युद्ध के अपार संहार से वैदिक शासन टूट गया और संस्कृत गुरुकुल शिक्षा बन्द हो गई ।

(४) युधिष्ठिर ने लगभग ३७ वर्ष राज्य किया और कलियुग आरम्भ होने पर भगवान कृष्ण के अवतार की समाप्ति हई । तत्पश्चात् द्वारिका प्रदेश पर धरती कंप , बाढ़ , लूटमार आदि कई संकट आ पड़े । वह अवधि सौ दो सौ वर्ष की थी या पाँच सौ , सात सौ वर्ष या उससे भी अधिक थी , हम नहीं जानते किन्तु द्वारिका राज्य में कृष्णावतार के अन्त से संस्कृत का भी लोप हुआ ।

(५)  तत्पश्चात् वहाँ की सामाजिक , प्राकृतिक तथा राजनयिक उथल - पुथल में संस्कृत ने जो प्राकृत - विकृत मोड़ लिया वह हब बनी । आगे चलकर यहूदियों के देश - विदेश भटकते - भटकते कृष्ण की पावन स्मृति में उस भाषा का नाम ( हरि जो भाषा बोलता था - इस अर्थ से ) हब्रू ही रहा ।

◼️यहूदी लोगों का धर्मचिह्न :-

(१) यहूदी लोगों के मन्दिर को Synagogue कहते हैं । उसका वर्तमान उच्चार " सिनेगॉग " मूल संस्कृत " संगम " शब्द है । " संगम " शब्द का अर्थ है " सारे मिलकर प्रार्थना करना " । संकीर्तन , संतसमागम आदि शब्दों का जो अर्थ है वही सिनेगॉग उर्फ संगम शब्द का अर्थ है ।

(२)  यहूदी मन्दिरों पर षटकोण चिह्न खींचा जाता है । वह वैदिक संस्कृति का शक्तिचक है । देवीभक्त उस चिह्न को देवी का प्रतीक मानकर उसे पूजते हैं । वह एक तांत्रिक चिह्न है ।

(३) घर के प्रवेश द्वार के अगले आँगन में हिन्दु महिलाएं रंगोली में बह चिह्न खींचती हैं । दिल्ली में हुमायूं की कब्र कही जाने वाली जो विशाल इमारत है वह देवी भवानी का मन्दिर था । उसके ऊपरले भाग में चारों तरफ बीसों शक्तिचक्र संगमरमर प्रस्तर पट्टियों से जड़ दिए गए हैं ।

(४)  यहूदी लोगों में David नाम होता है वह " देवि + द " यानी देवी का दिया पत्र इस अर्थ से डेविदु उर्फ डेविड कहलाता है । अरबों में उसी का अपभ्रंश दाऊद हआ है । अतः 'ह' और अरबी दोनों संस्कृतोद्भव भाषाएँ हैं ।

(५) ईश्वर के अपने लाडले जन यहूदी लोग अपने आपको ' ईश्वर के अपने लाडले लोग ' मानते हैं ।

(६) #Chosen_People_of_God यह उनकी कहावत है । उसे महाभारत का ऐतिहासिक आधार माने ।

(७) भगवान कृष्ण के पास जब दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही आगामी युद्ध के लिए सहायता मांगने पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने एक तरफ अपने आपको रखा और दूसरी तरफ अपनी पूरी यादव सेना को और अर्जुन से पूछा कि इनमें से तुम क्या चाहते हो ? अर्जुन ने श्रीकृष्ण को चुना और कौरवों की तरफ से यादव सेना लड़ी । इस घटना से महाभारत का ऐतिहासित्व सिद्ध होता है ।

क्योंकि यादव लोग और श्रीकृष्ण की जीवनकथा यदि काल्पनिक होती तो यदु उर्फ जदु यानि यहूदी लोगों की परम्परा में हमें उस यादव परम्परा के चिह्न नहीं मिलते जो इस पोस्टर में [2.चित्र (star shaped)] हमने प्रस्तुत किए हैं ।

(८) ऊपर कहे विभाजन में एक आध्यात्मिक तत्त्व दिखाई देता है कि श्रीकृष्ण ने जैसे अपने को एक तरफ और अपनी यादव सेना को दूसरी तरफ ऐसा बाँटा वैसा ही ईश्वरीय तत्त्व इस विश्व की चराचर वस्तुओं में अच्छे - बुरे , शीत और उष्ण , उच्च और नीच आदि द्वन्द्वों में विभाजित रहता है । दोनों विरोधी तत्त्व ईश्वर - स्वरूप ही होते हैं ।

(९) भारत में यादव का उच्चार जाधव और जाडेजा जैसे बना वैसे ही यद लोग यहूदी , ज्यूडेइस्टस् , ज्यू और झायोनिटस् कहलाते हैं ।

(१०) निर्देशित देश ज्यू लोग जब द्वारिका से निकल पड़े तो उन्हें साक्षात्कार हुआ जिसमें उन्हें कहा गया कि " Canaan" प्रदेश तुम्हारा होगा। 
 " कानान " यह कृष्ण कन्हैया जैसा ही कृष्ण प्रदेश का द्योतक था । यहूदी लोगों को भविष्यवाणी के अनुसार भटकते - भटकते सन् १९४६ में उनकी अपनी भूमि प्राप्त हो ही गई जिसका नाम उन्होंने Isreal रखा जो Isr = ईश्वर और ael = आलय इस प्रकार का " ईश्वरालय " संस्कृत शब्द है ।

(११) यह एक और प्रमाण है कि यहदी लोगों की परम्परा वैदिक संस्कृति और संस्कृत भाषा से निगडित है । हिटलर उनसे टकराकर नामशेष हो गया । अरब मुसलमान भी यहूदियों से टकराने के लिए आतुर हैं तो उनका भी हिटलर जैसा ही अन्त होगा ।

◼️ #यहूदी_ग्रन्थ_की_भविष्यवाणी :

#कृस्ती_बायबल का Testament नाम का जो पूर्व खण्ड है उससे समय समय पर ईश्वर का अवतरण होता है ऐसी भविष्यवाणी है । वह भगवद्गीता से ही यहदी धर्मग्रन्थ में उतर आई है । भगवदगीता में भगवान कहते हैं

 " यदा यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् " । ।

उस भविष्यवाणी का ही आधार लेकर पीटर , पॉल आदि कुछ महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों ने भाषण देने आरम्भ कर दिए कि बेचारा ऐसा एक गरीब व्यक्ति ( ईशस् कृष्ण के बजाय ) जीसस् कृस्त जन्मा और सूली पर भी चढ़ाया गया । वह ईश्वरावतार था । धीरे - धीरे उस अफवाह पर विश्वास करने वाले एक - दूसरे की पहचान के लिए गले में पीतल का चमकीला क्रूस पहनने लगे ताकि उससे अपने साथी पहचाने जा सकें ।

 आगे चलकर जब सन् २१२ ईसवी में रोमन् सम्राट् कांस्टेन्टाइने  ही उनके पक्ष में मिल गया तो फिर देर ही क्या थी । छल , बल और कपट से ६०० वर्षों में सारा यूरोप कृस्ती बना दिया गया । उधर सातवीं शताब्दी से अरब मुसलमानों ने भी वैसे ही एक सहस्र वर्ष तक जुल्म और जबरदस्ती करके फिलीपीन से लेकर अफ्रीका खण्ड तक करोड़ों लोगों को मुसलमान बनाया ।

क्रमशः 

🚩विचार प्रसार 🙏🙏🙏🙏🙏
✍️जय मां भारती 🚩⚔️🚩⚔️🚩⚔️🚩

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