भारतीय इतिहास का पुणर्लेखन क्यों?
#भारतीय_इतिहास_पुणर्लेखन_क्यों?
स्वतंत्रता के पश्चात् विश्व के अनेक देशों यथा , जापान , चीनादि ने अपने देश का राष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास पुनर्लेखन किया , परन्तु भारत ही एक ऐसा देश है जिसने अंग्रेजीभाषा के समान विदेशी पाश्चात्य किंवा आंग्ल विचारों को , अपनी छाती से , स्वतन्त्रता के इतने वर्षों के पश्चात् भी उसी प्रकार चिपकाये हुए है , जिस प्रकार बन्दरिया अपने मरे हुए बच्चे को चिपकाये रहती है । यह अत्यन्त राष्ट्रीय खेद का विषय है । राष्ट्रीय एकताहेतु एवं सत्यज्ञानपिपासाशान्ति हेतु भारत का इतिहास पुनर्लेखन , न केवल आवश्यक , वरन् अनिवार्य ही है । इस सम्बन्ध में लेखक , पिछले ३० वर्षों से , साधनों के अत्यन्त अभाव में भी इतिहासपुनलेखन पर परिश्रमपूर्वक अनु सन्धान कर रहा है और यह प्रथम पुष्प उसी सत्यानुसन्धान का प्रतिफल है । स्वतन्त्रता से पूर्व एवं पश्चात् एकमात्र अनुसन्धाता स्व० श्रद्धेय पं . भगवद्दत्त ने भारतवर्ष का इतिहास लिखने का महान् प्रयत्न किया । लेखक ने पं० भगवद्दत्त की खोजों से प्रेरणा लेकर संस्कृतवाङमय के मूलग्रन्थों का आलोडन किया और अनेक , सर्वथा नवीन , मौलिक एवं क्रान्तिकारी तथ्य प्रकाश में लाये हैं । लेखक , पं० भगवदत्त के अधिकांश विचारों एवं खोजों से सहमत है , परन्तु अनेक बातों से असहमति भी है , यथा वेदमंत्रों में इतिहास एवं परशुराम , प्रतर्दन , दिवोदास आदि का समय इत्यादि , ग्रन्थ - परायण से ही ज्ञात होंगे । पाश्चात्यलेखकों ने अपने साम्राज्यकाल में भारतीयग्रंथों , विशेषत : इतिहास पुराणों में अश्रद्धा उत्पन्न की जो भारतीयजन में आज भी नहीं जम पाई है । पुराण अपनी अनेक कमियों के बावजूद , आज भी भारतीय इतिहास ( स्वायम्भुवमनु से यशो धर्मा तक ) के मूलस्रोत हैं ।
लेखक कुवरलाल व्यासशिष्य ने पुराणों के आधार पर भारतीय इतिहास के अनेक मूल सत्यों की खोज की है जिसमें मुख्य है - भारतीय इतिहास के मौलिक कालक्रम ( Chronology ) का अनुसन्धान एवं निर्धारण ।
इस लेखक ने पुराणों के आधार पर मुख्यत : निम्न तथ्यों की खोज की है , जिनका परिगणन द्रष्टव्य है
१ . #विकासवाद - भारतीयवाङ्मय एवं आधुनिक वैज्ञानिकपरीक्षण से सिद्ध किया गया है कि डाविनप्रतिपादित विकासमत धोर अवैज्ञानिक एवं एक अतथ्य है , यह आत्मा , ईश्वर और मनुष्य की प्रगति का विरोधी है ।
२ . भारतीय इतिहास के प्रति प्रथमबार मैकालेयोजना के अन्तर्गत पाश्चात्य षड्यंत्र का भण्डाफोड़ किया गया है ।
३ . पाश्चात्यमिथ्याभापामत का खोखलापन प्रदर्शित किया गया है और आर्यपद का यथार्थ लिखा गया है ।
४ . भारतीयदैत्यों ने ही योरोप , अमेरिका और अफ्रीका को बसाया , यह तथ्य वहां के भौगोलिक नामों विशेषतः देशनामों से सिद्ध किया गया है ।
#लेखक_कुवरलाल_व्यासशिष्य लिखते हैं _"जब से भारतभूमि बाह्य दास्यभाव अर्थात् सन् १९४७ में जब से अंग्रेजों की परतंत्रता से स्वतंत्र हुई है , तब से अब तक शासकवर्ग एवं विद्वद्वर्ग में बहुधा वीर घोषणायें होती रहती हैं कि भारतीयइतिहासपुनर्लेखन की महती आवश्यकता है , परन्तु अद्यपर्यन्त , ३६ वर्ष (ले. के समय नुसार ) व्यतीत होने पर भी शासक वर्ग की ओर से गम्भीर प्रयत्न तो क्या , इतिहासपुनर्लेखन का साधारण या हल्का प्रयत्न तक भी नहीं हुआ । विद्वद्वर्ग में केवल एक व्यक्तिगत लघु , परन्तु गंभीर प्रयत्न भारतीय स्वतन्त्रता से पूर्व ही किया था , जबकि सन् १९४० में लाहौर से पण्डित भगवद्दत्त ने ' भारतवर्ष का इतिहास ' प्रथम बार बड़ी कठिनाई से प्रकाशित किया । पण्डितजी के प्रयत्न स्वतन्त्रता के पश्चात् भी लगभग २३ वर्ष पर्यन्त अर्थात् १९६८ तक , जब तक वे जीवित रहे , चलते रहे । इसमें कोई सन्देह नहीं कि पण्डित भगवद्दत्तजी के इतिहासपुनर्लेखन के प्रयत्न महान् अन्धकारसागर में प्रकाशस्तम्भ के समान मार्गदर्शक हैं , परन्तु एकाकी हैं । उनके समानधर्मा सर्वश्री युधिष्ठिर मीमांसक ( संस्कृतव्याकरणशास्त्र का इतिहास ) ; उदयवीरशास्त्री ( सांख्यदर्शन का इतिहास ) , सूरमचन्द्रकृत आयुर्वेद का इतिहास इत्यादि प्रयत्न भी एकाकी या अपूर्ण ही हैं , फिर भी सत्यशोधकों के परमसहायक हैं , जबकि आंग्लप्रमुओं के तदनुयायी भारतीय कृष्णप्रभुओं ने इतिहास में घोर मिथ्यावादों की कर्दम ( कीचड़ ) की दलदल उत्पन्न कर रखी है । इस घोर कीचड़ से निकलना सामान्यबुद्धि का काम नहीं , जिसमें डॉ . मंगलदेव शास्त्री , डॉ . वासुदेवशरण अग्रवाल , डॉ . काशीप्रसाद जायसवाल और पण्डित बलदेव उपाध्याय जैसे प्राच्यविद्याविशारद भी फंसकर नहीं निकल सके । भारतीयइतिहासपुनर्लेखन की महती आवश्यकता क्यों है , इस तथ्य को प्रायः प्रत्येक विद्वान् समझ सकता है , फिर भी संक्षेप में हम इस आवश्यकता पर विचारमंधन करेंगे ।"
" आंग्लप्रभुओं ने अपनी षड्यन्त्र पूर्ण - #मैकालेयोजना के अन्तर्गत ऐसे समय में भारत का इतिहास लिखना प्रारम्भ किया जबकि भारतदेश अपने अतीत गौरव एवं प्राचीनतम इतिहास को अन्धतम अज्ञानावर्त में डाल चुका था । आंग्लप्रभुओं ने अपने मिथ्याज्ञान के द्वारा उस अन्धतम अज्ञानावर्त पर और गर्त चढ़ाई । इसमें कोई सन्देह नहीं कि भेद ( फूट ) और अज्ञान के बीज भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीनकाल से थे, अब भी हैं , विदेशी शासकों द्वारा भारतीय भेदमूलक तत्वों यथा जातिवाद , भाषावाद , सम्प्रदायवाद और अज्ञान का लाभ उठाना स्वाभाविक था , अतः उन्होंने भेदमूलक एवं अज्ञानमूलक उपादानों का उपबृहण अथवा विस्तार किया ।
अतः अंग्रेजों ने आर्य - अनार्य या आर्य - दस्यु या आर्य - द्रविड़ समस्या खड़ी करके यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि भारतवर्ष सदा से ही विदेशी जातियों का उपनिवेश या अड्डा रहा है , इसके द्वारा
अब भी हैं , विदेशी शासकों द्वारा भारतीय भेदमूलक तत्वों यथा जातिवाद , भाषावाद , सम्प्रदायवाद और अज्ञान का लाभ उठाना स्वाभाविक था , अतः उन्होंने भेदमूलक एवं अज्ञानमूलक उपादानों का उपबृहण अथवा विस्तार किया । अतः अंग्रेजों ने आर्य - अनार्य या आर्य - दस्यु या आर्य - द्रविड़ समस्या खड़ी करके यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि भारतवर्ष सदा से ही विदेशी जातियों का उपनिवेश या अड्डा रहा है , इसके द्वारा प्रत्यक्ष या प्रच्छन्नरूप से वे सिद्ध करना चाहते थे कि भारतवर्ष में अंग्रेजों का राज्य या शासन सर्वथा वैध या न्यायपूर्ण है , जबकि आर्य - द्रविड़ या उनसे भी पूर्व शबर , मुण्ड , आन्ध्र , पुलिन्द आदि जातियाँ यहाँ बाहर से आकर बसती रहीं और भारत भूमि पर आधिपत्य करती रहीं ।"
_ _ _ अंग्रेजों ने भारतीय एकता के उपादानों या घटनाओं का अपने इतिहासग्रन्थों में कोई उल्लेख नहीं किया , यथा अगस्त्य या पुलस्त्य , राम या हनुमान् या व्यास को उन्होंने ऐतिहासिक पुरुष ही नहीं माना , इनकी ऐतिहासिकता की उन्होंने पूर्ण उपेक्षा ही की । अगस्त्य - पुलस्त्य के दक्षिण अभियान की उन्होंने चर्चा ही नहीं की , जो उत्तर दक्षिणभारतीय एकता का महान् प्रतीकात्मक उपक्रम था । प्रायः स्वयं सिद्ध एकतामूलक तथ्यों में भी उन्होंने भेद के वीज देखे । वेद , जो न केवल भारतवर्ष वरन् विश्वसंस्कृति का मूल है , उसे केवल उत्तरभारतीय या पंजाब या पांचाल ( उत्तरप्रदेश ) की सम्पत्ति सिद्ध किया गया । संस्कृतभाषा , जो मानवजाति की आदिभाषा या मूलभाषा है , उसका उद्गम एक काल्पनिक एवं बाह्य इण्डोयूरोपियनभाषा से माना गया ।
_ _ _ अंग्रेज या पाश्चात्यमिथ्याभिमानी लेखकों द्वारा प्रत्येक प्राचीन भारतीय विद्या या श्रेष्ठज्ञानविज्ञान को विदेशी मूल का सिद्ध करने का प्रयत्न किया । यहां पर प्रत्येक विषय या शीर्षक के विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है , परन्तु अतिसंक्षेप में कथन करेंगे । जब पाश्चात्यों ने यहाँ की प्राचीनजातियों , भाषाओं और धर्मों को विदेशी बताया तो उन्होंने प्रत्येक प्राचीन एवं श्रेष्ठविद्या का मूल भी बाह्यदेश को बताना आरम्भ किया । यथा पाश्चात्यों के अनुसार प्राचीनतमकाल में भारतीयों ने ज्योतिषविद्या या नक्षत्रविद्या बैवीलन या कालडियावासी असुरों से सीखी , द्वादश राशियों का ज्ञान या सप्ताह के वारों के नामादि यूनानियों से सीखे । पाणिनिव्याकरण सूत्र में एक ' यवनानी ' लिपि का उल्लेख है ; इस आधार पर पाश्चात्यों ने कल्पना की कि भारतीयों ने लिपि या लिखना , सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात् यूनानियों से सीखा । इसी प्रकार भारतीय नाट्य कला का उद्गम ग्रीकनाटकों में देखा गया ।
#पाश्चात्यों ने यह भी सिद्ध करने की चेष्टा की कि भारतीयों ने नगरनिर्माणकला , स्थापत्यकला ( भवन शिल्प ) , शासनव्यवस्था आदि सभी कुछ यूनानियों से सीखे । उनके अनुसार आर्यजाति तो यायावर या घुमक्कड़ थी , उन्हें न तो नगर बसाना आता था न खेती करना और न शासन करना और न उन्हें धातुज्ञान था , न समुद्र से उनका परिचय था । आर्यों ने धर्म के उपादान उपासनापद्धति आदि यहाँ के वनवासियों या द्रविड़ादि जातियों से सीखे । आर्य तो कूपमण्डूक जाति थी , समुद्रयात्रा या नाव बनाना उन्होंने द्रविड़ों से सीखा । मैक्समूलर , विन्टरनीत्स कीथ मैकडानल आदि को वेदमन्त्रों में समुद्र का उल्लेख ही दिखाई नहीं दिया , फिर आर्य समुद्रयात्रा कैसे करते , उनके अनुसार प्राचीनभारतीय आर्य भेड़ बकरी चराने वाले गड़रिये थे , वेदमन्त्र इन्हीं गरयों के गीत हैं जो ऋषिमुनियों द्वारा भेड़ - बकरी चराते समत गाये जाते थे । पाश्चात्यों का षड्यन्त्र और मिथ्याज्ञान स्वाभाविक ही था , परन्तु स्वतन्त्रता के पश्चात् भी उसी पाश्चात्य आंग्लविद्या का गुणानुवाद और पठन - पाठन सचेता भारतीय के लिए बुद्धिगम्य नहीं है ।
भारत के राजनीतिक , सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास के पुनर्लेखन की महती आवश्यकता है , परन्तु आज भी स्वतन्त्रता के ३६ वर्ष पश्चात् हमारे विद्यालयों , महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में भारतीय इतिहास एवं संस्कृतसम्बन्धी पाश्चात्यलेखकों ( यथा कीथ , बेबर , मैकडानल , विन्टरनीत्स , मैक्स मूलर आदि ) के ग्रन्थ परमप्रामाणिकग्रन्थों के रूप में पढाये जा रहे हैं , वे ही संस्कृत साहित्य के इतिहासग्रन्थ , जो पाश्चात्यों ने भारतवर्ष पर शासन करने की दृष्टि से लिखे थे । हमारे विद्याकेन्द्रों में ज्यों - की - त्यों लगभग सौ वर्ष से पढ़ाये जा रहे हैं । हमारे विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों में वे ही अंग्रेजीकाल के सड़े - गले विचार भरे हुए हैं वे उन्हीं भ्रष्ट एवं मिथ्यापाश्चात्यग्रन्थों को पढ़ते हैं और उन्हीं के आधार पर पढ़ाते हैं । न केवल इतिहास के क्षेत्र में वरन् राजनीतिक , मनोविज्ञान , गणित , ज्यामिति , शिल्प या यन्त्रविज्ञान ( इजीनियरिंग ) या दर्शनया चिकित्साविज्ञान आदि के क्षेत्र में अभी तक परमप्रामाणिक भारतीयलेखकों या ग्रन्थों का प्रवेश तो क्या स्पर्श तक भी नहीं है । पाठ्यक्रमों के राजनीतिशास्त्र ग्रन्थों में अरस्तू या प्लेटो की बहुधा चर्चा होती है , परन्तु शुक्राचार्य , विशालाक्ष , बृहस्पति , व्यास या चाणक्य का नाममात्र भी नहीं मिलेगा , इसी प्रकार प्राचीनभारतीयगणित , दर्शन या शिल्पविज्ञान कितना ही श्रेष्ठ या उच्च कोटि का हो उसका स्पर्शमात्र भी पाठ्यग्रन्थों में नहीं मिलेगा । इतिहास के क्षेत्र में रामायण , महाभारत और पुराणों को तो कीथादि की कृपा से अछूत ही बना दिया गया है । हमारा मत यह है कि प्राचीनभारत का मूल इतिहासपुराणों में ही लिखा मिलता है ।
मूलइतिहासपुराणों को स्नातक एवं स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में अनिवार्य बनाना चाहिए , शासन या शिक्षणसंस्थानों द्वारा इतिहासपुराणों के इतिहाससम्बन्धी संशोधित भाग प्रकाशित होने चाहिएं । पाश्चात्यों के मिथ्याग्रन्थों का पूर्ण बहिष्कार होना चाहिए । अब हम संक्षेप में भारतीय इतिहास की विकृतियों के कारणों का सिंहावलोकन करेंगे । विकृति के कारणों के परिचय के साथ - साथ ही मुख्य विकृतियों का ज्ञान भी हो जाएगा , फिर भी यह जान लेना चाहिए कि भारतवर्ष तो क्या , विश्व के इतिहास में मुख्यविकृति कालक्रम ( Chronology ) सम्बन्धी है , यही इतिहासविकृति की नाभि या केन्द्र है । इस ग्रन्थ में मुख्यत : इसी विकृति का निराकरण किया जाएगा , अन्य विकृतियाँ तो आनुषंगिक या इस विकृति की अंगमात्र हैं , अतः प्रधानविकृति के निरा करण से उपांगभूत विकृतियाँ स्वयं निराकृत हो जाएंगी , जैसाकि पतञ्जलिमुनि ने महाभाष्य में लिखा है " प्रधाने कृतो यत्नः फलवान् भवति । "
#संदर्भ :- 📖भारतीय इतिहासपुनर्लेखन क्यों ? . पुराणों में इतिहासविवेक. लेखक० डा० कुंवरलाल व्यासशिष्य आचार्य , एम० ए० पी० एच० डी० gol . 2 0951 .

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