भीमराव आंबेडकर के इस्लाम पर विचार

#बाबा_साहब_डॉ_भीम_राव_अंबेडकर_के_इस्लाम_पर__विचार  ( 14 . 4 . 1891 - 6 . 12 . 1
956 )

 ( प्रमुख उद्धरण बाबा साहेब डॉ .अम्बेडकर सम्पूर्ण खण्ड 15, "पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000 से लिए गए है")

( 1.) #हिन्दू_काफिर_सम्मान_के_योग्य_नहीं -

" मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिरी , और एक काफिर सम्मान के योग्य नही । निम्न कुल में जमा होता है , और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नही होती । इसलिए जिस देश में काफिरों का शासन हो , यह मुस्लमानों के लिए दार - उल - हर्ष है। ऐसी स्थिति में यह साबित करने के लिए और सबुत देने की आवश्यकता नहीं कि मुसलमान हिन्द सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे"

(📖 डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय ,खण्ड 15."पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000. पृ. 304 ) 

(2.) हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं । साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है । मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों के निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपेन शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद का संकोच नहीं करते ।
                           
📖प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय , खण्ड १५ १

उस समय एफ . ए . दुर्रानी ने कहा था - ' भारत - सम्पूर्ण भारत हमारी पैतृक सम्पत्ति है और उसका फिर से इस्लाम के लिए विजय करना नितांत आवश्यक है ' तथा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए महत्त्वपूर्ण था कि उसका शिविर यानी पड़ाव बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जा सके । "
( 📖 पुरुषोत्तम , मुस्लिम राजनीतिक चिन्तन और आकांक्षाएँ पृ . 51 , 53 )

(3.) मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए -

    डॉ. आंबेडकर कहते हैं कि - 

 " इस्लाम एक बंद #निकाय की तरह है , जो मुसलमानों और गैर - मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है , वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है । इस्लाम का भातृभाव मानवता का भातृत्व नहीं है , मुसलमानों का मुसलमानों से ही भातृत्व है । यह बंधुत्व है , परतु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं , उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है । #इस्लाम_का_दूसरा_अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता , क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा , जिस देश में वे रहते हैं , उसके प्रति नहीं होती . बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है , जिसका कि ये एक हिस्सा है । एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यत दुष्कर है । जहाँ कहीं इस्लाम का शासन है , वहीं उसका अपना विश्वास है । दूसरे शब्दों में , इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिंदुओं को अपना निकट संबंधी मानने की इजाजत नहीं देता ।"

" अली जैसे एक महान भारतीय , परंतु सच्चे मुसलमान ने, अपने शरीर को, हिंदुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया"

 (📖 डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय खण्ड 15, "पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000. पृ . 337)

(4.)#एक_साम्प्रदायिक_और_राष्ट्रीय_मुसलमान_में___अन्तर__देख_पाना_मुश्किल -

#लीग को बनानेवाले सांप्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अंतर से समाझना कठिन है। यह अत्यत संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना , लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं , जिसके फलस्वरूप मुस्लिम लीग से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तवन अधिकांश कांग्रेसजनों की धारणा है कि इन दोनों में कोई अंतर नहीं है और कांग्रेस के अंदर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति सांप्रदायिक मुसलमानों की सेवा की एक चौकी की तरह हैं। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती । जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डाॅ. अंसारी में सांप्रदायिक  निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपि कांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।

(📖 डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड 15, "पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000.पृ. 414 - 415 )

(5 .)#भारत_में_इस्लाम_के_बीज_मुस्लिम_आक्रांताओं__ने__बोए -
 " मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिंदुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे । परंतु वे घृणा का यह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे । ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता । ये ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे । उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया । इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है । यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है । यह तो ओक ( बाज ) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है । उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सधन विकास हुआ है । एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कही की भी अपेक्षा अपनी गाद ' से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है । उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिंदू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए है । यहाँ तक कि सिखों की कुल्लाड़ी भी इस ओक ( बाज ) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी। 

( 📖 डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड 15, "पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000. पृ . 49 )

इस उपरोक्त उध्दरण में बताया गया है कि कैसे सिख और बौध्दों के मंदिरों और स्तुपों को झाडीयों की तरह काट कर उन्होंने अपने धर्म के पौधे को बरगद या ओक की तरह मजबूत किया या खडा किया। बौध्द और इस्लाम का जन्म से ही वैर है, डॉ. आंबेडकर के अनुसार भारत के 
हिंदु बौद्ध तथा जैन और सिख आदि के पूर्णतः मुस्लिम धर्म विरूद्ध पध्दति वाला, विरूद्ध अवधारणा और विचारों वाला है, इनकी एकता में सौदार्ह्यता रहना संभव ही नहीं है।

(6.)#मुसलमानों_की_राजनीतिक_दाँव_पेंच_में_गुंडागर्दी:- 

 'तीसरी बात , मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर - तरीके अपनाया जाना है । दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत है कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है ।

 (📖 डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड 15, "पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000 पृ . 267 )

(7.)  #हत्यारे_धार्मिक_शहीद - " महत्त्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई । मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का , जिन्होंने यह कत्ल किये । जहाँ कानून लागू किया जा सका , यहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सजा मिली ; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निदा नहीं की । इसके विपरीत उन्हें #गाजी ' बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आंदोलन शुरू कर दिए गए ।'
इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि . बरकत अली का . जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की । यह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है , क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है । मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है , परंतु जो बात समझ में नहीं आती , वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण '

( 📖  डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय, खण्ड 15, "पाकिस्तान और भारत के विभाजन 2000. पृ. 147 - 148 )

(8.) #ऐतिहासिक_रूप_से_विरूद्धता

" - क्या कोई ऐसा ऐतिहासिक घटना - क्रम है जिसे हिन्दू और मुसलमान समान रूप से गौरव या व्यथा के विषय के रूप में याद रखे हुए हैं ? समस्या की जड़ में यही प्रश्न है । यदि हिन्दू स्वयं को और मुसलमानों को एक ही राष्ट्र का अंग मानना चाहते हैं , तो उन्हें इसी प्रश्न का उत्तर देना होगा । दोनों समुदायों के बीच सम्बन्धों के इस पक्ष पर दृष्टि डालें तो यही सामने आयेगा कि वे तो बस एक दूसरे से युद्ध में रत दो सेनाओं की भाँति रहे हैं । उनके बीच किसी साझी उपलब्धि की प्राप्ति के लिए मिल - जुले प्रयासों का कोई युग नहीं रहा । उनका इतिहास एक दूसरे के नाश का इतिहास है , राजनीतिक और मजहबी शत्रुताओं का इतिहास है । जैसा कि भाई परमानन्द ने अपनी पुस्तिका हिन्दू राष्ट्रवादी आन्दोलन ' में उल्लेख किया है , " हिन्दू अपने इतिहास में पृथ्वीराज , प्रताप , शिवाजी और बन्दा वैरागी के प्रति श्रद्धा रखते हैं , जिन्होंने इस भूमि की रक्षा और सम्मान के लिए मुसलमानों से संघर्ष किया ; जबकि मुसलमान मुहम्मद बिन कासिम जैसे विदेशी हमलावरों और औरंगजेब जैसे शासकों को अपना राष्ट्रनायक मानते हैं । "

धार्मिक क्षेत्र में हिन्दू रामायण , महाभारत और गीता से अपनी प्रेरणा पाते हैं । दूसरी ओर , मुसलमान अपनी प्रेरणाएं कुरान और हदीस से प्राप्त करते हैं । अतः , जो बातें उन्हें एक सूत्र में बाँधती हैं , उनसे अधिक शक्तिशाली हैं वे बातें जो उन्हें बाँटती हैं । हिन्दुओं और मुसलमानों के सामाजिक जीवन की कुछ विशेषताओं - समान जाति , भाषा व देश जैसी कुछ बातों पर निर्भर करके हिन्दू उन बातों को आधारभूत और महत्त्वपूर्ण मानने की गलती कर रहे हैं जो केवल संयोगजनित और ऊपरी हैं । हिन्दुओं और मुसलमानों को जितना ये तथाकथित् समानताएं मिलाती हैं , उससे कहीं अधिक बाँटती हैं राजनीतिक व साम्प्रदायिक शत्रुताएं । दोनों समुदाय अपना अतीत यदि भूल पाते तो शायद सम्भावनाएं कुछ और होतीं । "

(📖 पाकिस्तान आॅर पार्टिशन आॅफ इण्डिया पृ०१७ - १८ ) "

_ पर दुःख यह है कि दोनों समुदाय अपना भूतकाल न मिटा सकते हैं , न भुला सकते हैं । उनका भूतकाल उनके धर्म या मजहब में स्थापित हुआ पड़ा है और अपने भूतकाल को भूलना उनके लिए अपने धर्म को या मजहब को त्यागने जैसा है । इसकी आशा करना व्यर्थ है ।।

(9.) - - यदि अन्तरराष्ट्रीय इस्लामवाद का यह मजहबपरस्त रूप एक अन्तरराष्ट्रीय इस्लामी राजनीतिक स्वरूप अपनाने की ओर बढ़ता है , तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । "

( पाकिस्तान और पार्टिशन ऑफ इंडिया , पृ० २८७ - ६१ )

 इस प्रकार की अपनी वैचारिक प्रेरणाओं के प्रभाव में रहते हुए " मुसलमान किस सीमा तक एक ऐसी सरकार की सत्ता को स्वीकारेंगे जिसको बनाने और चलाने वाले हिन्दू होंगे ? " यह प्रश्न भी डॉ० अम्बेडकर ने उठाया । इस संदर्भ में उन्होंने इस बात का वर्णन किया कि मुसलमान हिन्दुओं को किस दृष्टि से देखते हैं । " - मुसलमान की दृष्टि में हिन्दू काफिर है और काफिर सम्मान के योग्य नहीं होता । वह निकृष्टजन्मा और प्रतिष्ठाहीन होता है । इसीलिए काफिर द्वारा शासित देश मुसलमान के लिए दारुल - हर्ब होता है । "

( वही , पृ० २६४ )

 डॉ० अम्बेडकर कुछ उदाहरण भी देते हैं : " - खिलाफत आन्दोलन के दिनों में भी , जब हिन्दू लोग मुसलमानों की इतनी अधिक सहायता कर रहे थे , मुसलमान यह मानना नहीं भूले कि उनकी तुलना में हिन्दू नीची और घटिया जाति के हैं । "

 _ _ _ " एक मुसलमान ने खिलाफ़त - समर्थक अखबार ' इन्साफ ' में लिखा : _ _ _ ' स्वामी ' और ' महात्मा ' का क्या मतलब ( अर्थ ) है ? क्या ऐसे शब्द मुसलमान अपने भाषणों या लेखों में गैर - मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल ( प्रयोग ) कर सकते हैं ? " वह लिखता है कि ' स्वामी ' का अर्थ है ' मालिक ' , और ' महात्मा ' का अर्थ है
' श्रेष्ठतम आध्यात्मिक शक्तियों वाला ' और यह रूह - ए - आजम ' तथा ' सर्वोच्च आत्मा ' के बराबर होता है । उसने मुस्लिम उलेमाओं से कहा कि वे एक आधिकारिक फतवा जारी करके बतायें कि क्या मुसलमानों का गैर - मुस्लिमों के लिए ऐसे सम्मानपूर्ण शब्दों का प्रयोग मुस्लिम कानून के अनुरूप है ?

(📖 किताब :-पाकिस्तान और पार्टिशन ऑफ इंडिया , पृ० २८७ - ६१)

#नोट:-संदर्भ स्त्रोतों की कुछ काॅपीया कमेंट बॉक्स में चित्रित कि गयी है। यह लेख अनेक प्रामाणिक संदर्भों से प्रेरित है।

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