प्राचीन बर्मा की सनातन वैदिक संस्कृति

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"बर्मा"  ब्रह्मदेव अथवा भगवान् ब्रह्मा के क्षेत्र का संक्षिप्त रूप है । यह ( ब्रह्मा की पुत्री ) ब्रह्मपुत्रा के तट पर बसा हुआ है । इसकी नदियाँ इरावदी तथा चिन्दविन संस्कृत नाम हैं । संस्कृत में इरावदी का अर्थ जल से आपूरित है , तथा चिन्दविन का नाम चिन्तवन अर्थात् चिन्तन के लिए उपयोग में आने वाले वन में से प्रवाहित होने वाली जलधारा से व्युत्पन्न है । सालदीन उस नदी का संस्कृत नाम है जो सालवान - वन से वहती है ।

भारतीय वाङ् मय में उल्लेखित देवराज इन्द्र का बाहन पावन स्वस्थ शरीर गजराज ऐरावत नाम भी इरावती द्वारा सिंचित प्रदेश के नाम पर पड़ा है । अन्य क्षेत्रों से बिल्कुल भिन्न , स्वस्थ - शरीर हाथी केवल इरावती के चहुँ ओर के प्रदेश में ही पाए जाते हैं । बर्मी भाषा में संस्कृत का ' त ' ' द ' में बदल जाता है ।

राज्याध्यक्ष के लिए बर्मी लोग ' अदि - पदि ' शब्द का प्रयोग करते हैं जो मूल रूप में संस्कृत का ' अधिपति ' शब्द है । उनके राजाओं के संस्कृत नाम थे , और उनके परम्परागत राज्यारोहण समारोह प्राचीन वैदिक - पद्धति के अनुसार ही होते थे ।

निस्संकोच भाव से सभी लोगों पर रंग - बिरंगा जल पकने वाला भारतीय पर्व ' होली ' बर्मा में अभी भी पूरे जोर - शोर से भारत की ही भांति मनाया जाता है ।

उत्तर - पूर्वी वर्मा के शान - प्रदेश नामक पहाड़ी क्षेत्र के भाग में ग्रामीण लोगों का अपने सिर पर लम्बी पगड़ियां बांधने का भारतीय रिवाज़ अभी ज्यों - का - त्यों प्रचलित है । प्रत्येक ग्राम में वहाँ के संरक्षक देवता का एक मन्दिर है जिसके उच्च शिखर पर ध्वजा फहराती रहती है ।

ग्राम के वृद्ध लोग वहाँ के सम्भ्रान्त निवासियों को साथ लेकर सम्माननीय अतिथियों का गाँव की सीमा पर ही स्वागत करते हैं । गाँव का पंचायतघर ही अतिथिघर के रूप में उपयोग में आता है , सम्प्रदाय के नेता के घर की महिलाएं अपने घरों / से सुसज्जित काष्ठ - पात्रों में लाया हुआ भोजन स्वयं ही अतिथि को परोसती हैं । यह सब - कुछ उस सुदूर क्षेत्र में फैली प्राचीन भारतीय संस्कृति का स्मरण दिलाने वाला है ।

भारतीय मान्यता " अतिथि देवो भव " की भावना के अनुरूप ही प्रत्येक गृह - स्वामी का कर्तव्य अतिथि को देवता रूप ही मानना होता है । भ्रमणशील अपरिचित व्यक्ति भी यदि किसी घर पर जा पहुंचते हैं , तो उनका स्वागत भी ताड़ - गुड़ एवं उबली हुई चाय के साथ किया जाता है ।

प्रत्येक घर में एक पूजा - स्थल भी होता है , जहाँ किसी देवता की प्रतिमा होती है ।

इस प्रकार बर्मा भी आर्य देश था जहां वैदिक संस्कृति फली फूली.... लेकिन उसका म्यांमार धाम कब और कैसे जानिए....

1937 से पहले ब्रिटिश ने बर्मा को भारत का राज्य घोषित किया था लेकिन फिर अंगरेज सरकार ने बर्मा को भारत से अलग करके उसे ब्रिटिश क्राउन कालोनी (उपनिवेश) बना दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान ने बर्मा के जापानियों द्वारा प्रशिक्षित बर्मा आजाद फौज के साथ मिल कर हमला किया। बर्मा पर जापान का कब्जा हो गया। बर्मा में सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज की वहां मौजूदगी का प्रभाव पड़ा। 1945 में आंग सन की एंटीफासिस्ट पीपल्स फ्रीडम लीग की मदद से ब्रिटेन ने बर्मा को जापान के कब्जे से मुक्त किया लेकिन 1947 में आंग सन और उनके 6 सदस्यीय अंतरिम सरकार को राजनीतिक विरोधियों ने आजादी से 6 महीने पहले उन की हत्या कर दी। आज आंग सन म्यांमार के 'राष्ट्रपिता' कहलाते हैं। आंग सन की सहयोगी यू नू की अगुआई में 4 जनवरी, 1948 में बर्मा को ब्रिटिश राज से आजादी मिली।

बर्मा 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हुआ और वहाँ 1962 तक लोकतान्त्रिक सरकारें निर्वाचित होती रहीं। 2 मार्च, 1962 को जनरल ने विन के नेतृत्व में सेना ने तख्तापलट करते हुए सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया और यह कब्ज़ा तबसे आजतक चला आ रहा है। 1988 तक वहाँ एकदलीय प्रणाली थी और सैनिक अधिकारी बारी-बारी से सत्ता-प्रमुख बनते रहे। सेना-समर्थित दल बर्मा सोशलिस्ट प्रोग्राम पार्टी के वर्चस्व को धक्का 1988 में लगा जब एक सेना अधिकारी सॉ मॉंग ने बड़े पैमाने पर चल रहे जनांदोलन के दौरान सत्ता को हथियाते हुए एक नए सैन्य परिषद् का गठन कर दिया जिसके नेतृत्व में आन्दोलन को बेरहमी से कुचला गया। अगले वर्ष इस परिषद् ने बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार कर दिया।

इस प्रकार प्राचीन बर्मा एक वैदिक संस्कृति से जुड़ा आर्यावर्त का हिस्सा 1988 में म्यांमार में परिवर्तित हो गया... अर्थात् नाम से.... आज भी वहां वैदिक संस्कृति के चिन्ह यथावत् है।

✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩
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