ईसाईयों से कैसे हुआ इस्लाम का उदय?
सन् ५७१ ईस्वी की गर्मी के दिनों में शहर बसरा में ऊँटों पर सवार एक क़ाफ़िला आया । वह मक्का से आया था और अरब के दक्खिन प्रदेश में पैदा हुई सूखी वस्तुओं से लदा हुआ था । इस क़ाफ़िले का सरदार अबू तालिब और उसका बारह वर्ष का भतीजा था । बसरे के नेस्टर धर्मावलम्बी मठ की ओर से उनका आतिथ्य किया गया । मठ के संन्यासियों को जब मालूम हुआ कि उनका बारह वर्ष का बालक अतिथि अरब के प्रसिद्ध पवित्र मन्दिर काबा के रक्षक का भतीजा है , तो उन्होंने अपने धर्म की प्रशंसा और मूर्ति - पूजा की निन्दा उस बालक के हृदय में प्रवेश कराई । उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि बालक असाधारण बुद्धि मान और नवीन ज्ञान का उत्सुक है । खास कर धर्म सम्बन्धी विवाद में उस का मन बहुत लगता है । इस बालक का नाम मुहम्मद था ।
मक्का में उस समय एक काला पत्थर पूजा जाता था , जो उल्कोद्भव था । यह काबा में रक्खा हुआ था और उसके साथ ३६० अन्य मूत्तियां थीं , जो वर्ष भर के दिनों की सूचक थीं । क्योंकि उस समय साल के दिन यों ही गिने जाते थे । यह वह समय था , जबकि ईसाई धार्मिक समूह अपने पादरियों की दुष्टता और ऐश्वर्य - तृष्णा के कारण अराजकता की दशा को पहुँच चुका था । पश्चिमी देशों के पोप लोग धन , विलास और शक्ति के ऐसे प्रलोभन देते थे कि बिशप लोगों के चुनाव में भयंकर बध करने पड़ते थे । पूर्वीय देशों में कुस्तुन्तुनिया इन धर्मान्ध झगड़ों का केन्द्र था , जहाँ अनेक पन्थ और दल बन गये थे।
ये लोग परस्पर अत्यन्त घृणा - भाव रखते थे । अरब उन दिनों स्वतन्त्रता की अपरिचित भूमि थी , जो "भारत -सागर" से लेकर शाम देश के मरुस्थल तक फैली हुई थी । यह भगोड़ों और झगड़ालू ईसाइयों का आश्रय स्थल हो रहा था । अरब के मरुस्थल ईसाई संन्यासियों से भर गये थे और वहाँ के बहते रे लोगों ने उनके पन्थ को स्वीकार कर लिया था । हवश देश के ईसाई राजे , जो नेस्टर धर्म को मानते थे , अरब के दक्षिणी प्रान्त यमन पर अधिकार रखते थे । अरब एशिया के दक्षिण - पश्चिम कोण पर एक मरुस्थल है । इसकी लम्बाई १ , ४०० मील और चौड़ाई ७०० मील है । जन - संख्या ५० लाख के लगभग है । देश भर में पहाड़ , पहाड़ी , ऊजड़ - जंगल और रेत के टीले हैं । जल का भारी अभाव है । खजुर ही इस देश की न्यामत है । अधिकांश अरब वासी , जिन्हें खानाबदोश कहते हैं , किसी पहाड़ो नाले के पास ठहर जाते हैं और जब चारापानी का सहारा नहीं रहता तो अन्यत्र चल देते हैं । इस देश में गर्मी इतनी पड़ती है कि दोपहर के समय हिरन अन्धा हो जाता है । आँधियाँ ऐसी आती हैं कि बाल के टीले के टीले इधर से उधर उड़ जाते हैं । यदि यात्रियों का कोई समूह इनके चपेट में आगया तो उसकी खैर नहीं । कहीं - कहीं सर्दी भी बड़े कड़ाके की पड़ती है । सर्दी में वर्षा भी होती है । यही वर्षा का जल नालों और गड्ढों में संचित करके पिया जाता है । _ _ _ _
अरब के घोड़े संसार में प्रख्यात हैं । यह पशु पथरीले स्थान पर बड़ा काम आता है , पर रेतीले भागों के काम की चीज़ तो ऊँट है । यह न केवल सवारी के काम आता है , प्रत्युत् इसका मांस और दूध भी बहुतायत से काम में लाया जाता है । लोग खजूर का गूदा स्वयं खाते और गुठली ऊँटों को खिलाते हैं । अब उनकी दशा में कुछ परिवर्तन हो गया है ।
बसरा नगर के नेस्टर मठ के महन्त वहीरा ने मुहम्मद को नेस्टर मत के सिद्धान्त सिखाये । इस विद्वान् संन्यासी के सदुपदेश से मुहम्मद के मन में मूर्ति पूजा से बहुत घृणा हो गई ।
जब मुहम्मद मक्का लोटा , तो वह उन्हीं ईसाई संन्यासियों की भांति जङ्गल में कुटी बनाकर रहने को हीरा नामक पहाड़ी की एक गुफा में ,मक्का से कुछ मीलों के अन्तर पर थी , चला गया और ध्यान तथा प्रार्थना में लग गया ।
उस एकान्त विचार से उसने एक सिद्धान्त निकाला अर्थात ईश्वर की अद्वैतता । एक खजूर के वृक्ष की पीठ से टिककर उसने इस विषय के विचार अपने मित्रों और पड़ोसियों को सुनाये और यह भी कह दिया कि इसी सिद्धान्त के प्रचार में मैं अपना सारा जीवन लगा दूंगा । उस समय से मृत्यु तक उसने अपनी उंगली में अंगूठी पहनी , जिस पर खुदा था - ' मुहम्मद ईश्वर का दूत । '
बहुत दिनों तक उपवास और एकान्तवास करने तथा मानसिक चिन्ता से अवश्य मति भ्रम हो जाता है , यह वैद्य लोग भली - भांति जानते हैं । इसी हालत में मुहम्मद को प्रायः अन्तरिक्ष वाणियाँ सुनाई पड़ती थीं । फरिश्ते उसके सामने आते थे । एक दिन स्वप्न में जिबराइल नाम का फरिश्ता उसे अपने साथ आकाश पर ले गया , जहाँ मुहम्मद निर्भय उस भयङ्कर घटा में चला गया , जो सदैव सर्व शक्तिमान् ईश्वर को छिपाये रहती है । ईश्वर का ठण्डा हाथ उसके कन्धे पर छु जाने से उसका चित्त काँपा।
शुरू में उसके उपदेश का बहुत विरोध हुआ और उसे कुछ भी सफ लता न हई । मूर्ति - पूजकों ने उसे मक्का से निकाल दिया । तब उसने मदीने में , जहाँ बहुत से यहूदी और नेस्टर पन्थ वाले रहते थे , शरण ली ।
नेस्टर पन्थी तुरन्त उसके मतवालम्बी हो गये । छ : वर्षों में उसने केवल १ , ५०० चेले बनाये । परन्तु तीन छोटी लड़ाइयों में उसने जान लिया कि उसका अत्यन्त विश्वासप्रद तर्क उसकी तलवार है । ये तीनों छोटी लड़ाइयां पीछे से बीडर , ओहद और नशन्स के बड़े युद्ध प्रख्यात किये गये । उसके बाद मुहम्मद बहुधा कहा करता था कि ' बहिश्त तलवार के साये के नीचे पाया जायगा । ' कई एक उत्तम आक्रमणों द्वारा उसने अपने शत्रुओं को पूर्ण रूप से पराजित किया ।
अरब की मूर्ति - पूजा जड़ से नष्ट हो गई और यह भी मान लिया गया कि वह ईश्वर का दूत है । जब वह शक्ति और ख्याति को पराकाष्ठा को पहुँचा , तब वह अन्तिम बार मदीने से मक्का की ओर गया । उसके साथ एक लाख चौदह हजार भक्त फूलों के गजरों से सजे हुए ऊँटों पर फहराते झण्डे लिये हुए चले । उसके साथ ७० ऊँट बलिदान के लिये थे । उस समय काबे के मन्दिर में ३६० मूर्तियां थीं जो एक वर्ष के दिनों की चिह्न थीं । यह मन्दिर प्राचीन भारत के ढंग का और शाम देशीय देवालयों से मिलता - जुलता चौकोर खली छत का भवन है ।
मुहम्मद की आज्ञा थी कि मक्का पहुँचते ही सब मूर्तियाँ तोड़ डाली जाय । उस समय अबूसुफियान मक्के का सरदार था जिसने प्राणभय से कल्मा पढ़ लिया । जब वह नगर के निकट पहुँचा तब उसने यह शब्द कहे -
" हे ईश्वर ! मैं यहाँ तेरी सेवा के लिए हाजिर हैं । तेरे बराबर कोई दूसरा नहीं , केवल तू ही पूजने योग्य है । केवल तू ही सबका राजा है ; उसमें तेरा कोई साझी नहीं । "
अपने हाथों से उसने ऊंटों का बलिदान किया , और मुत्तियों को छिन्न भिन्न कर दिया । काबा के व्याख्यान - पीठ से उच्च स्वर से कहा -
" श्रोतागण , मैं केवल तुम्हारे समान एक मनुष्य हूँ । " एक मनुष्य से , जो डरते - डरते उसके पास आया , कहा - " तुम किस बात से डरते हो , मैं कोई अलौकिक नहीं हैं । मैं एक अरब - निवासी स्त्री का पुत्र हूँ , जो धूप में सुखाया हुआ मांस खाती थी । "
मक्का और काबे के मन्दिर को अधिकार में कर लेने पर अरब की बहुत सी जातियाँ मुहम्मद के धर्म में मिल गई । परन्तु कुछ कबीले अभो ऐसे थे जिन्होंने इस्लाम को अभी स्वीकार नहीं किया था । यह कबीले बनी , हवाजिन , सतीफ़ , जसर और साद वंश के थे । कुछ पहाड़ी जातियाँ भी इनके साथ मिल गई थीं । एक बार इनसे मुहम्मद ने युद्ध कर इन्हें परास्त किया , यह हनीम का युद्ध प्रसिद्ध है , इसमें मुहम्मद के साथ १२०० सवार थे ।
इस युद्ध में एक अद्भुत घटना घटी थो - जब लूट का माल इकट्ठा हो रहा था तब एक डोली जाती हुई देखी गई । रविया इब्नेरकी ने उसके पीछे घोड़ा दौड़ाया । निकट जाकर देखा तो एक बुढा बैठा था । रविया ने जाते ही बुड्ढे पर वार किया । पर उसकी तलवार हट गई । बुड्ढे ने हँसकर कहा - ' बेटे , अफ़सोस है तेरे माँ - बाप ने तुझे अच्छी तलवार नहीं दी । जा मेरी काठो में तलवार लटक रही है उसे ले आ और अपना काम कर । ' रविया ने तलवार निकाल ली और वार करने लगा ।
बुड्ढे ने कहा - ' अपनी माँ से यह ज़रूर कह देना कि मैं दुरैव इब्ने सम्मा को मार आया हूँ । ' रविया ने कहा - ' अच्छा कह दूंगा । ' इसके बाद वह उसका सिर काटकर घर गया और मां से उक्त समाचार कहा । माँ ने कहा - ' अरे दुष्ट जिसे तूने मारा है उसने तीन बार मेरी और तेरी दादी की इज्जत बचाई थी । ' रविया ने मुह फेरकर कहा - ' इस्लाम काफ़िर के अहसान और गुण नहीं मानता । '
मुहम्मद ने मक्का में यह घोषणा कराई थी -
" जिन लोगों ने अरब देश में अब तक इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया है उन्हें चाहिए कि चार मास के भीतर - भीतर कल्मा पढ़ लें या अरब को छोड़कर चले जाय । चार महीने बाद यदि कोई काफ़िर अरब में दिखाई देगा तो उसका सिर काट लिया जायगा । इसमें मुसलमानों के मित्रों , रिश्तेदारों और भाइयों का भी लिहाज नहीं किया जायगा । "
यमन का इलाका अभी मुसलमान नहीं हुआ था , वहाँ मुहम्मद साहब ने अली इब्ने अबितालिब को फौज लेकर भेजा । उन्होंने अली से कुछ प्रश्न किए तो अली ने तलवार निकाल कर कहा - इस्लाम का जवाब यह तलवार है - और कई विद्धानों के सिर काट लिये । इससे भयभीत होकर सारा यमन मुसलमान हो गया । वह मदीने में मरा । मृत्यु के समय उसका सिर आयशा की गोद में था । वह बार - बार पानी के बर्तन में अपने हाथ डुबोता था और अपने चेहरे को तर करता था । उसे तीव्र ज्वर और सन्निपात था । अन्त में उसका दम टूटा।
उसने आकाश को ओर टकटकी लगाये हुए टूटे - फूटे शब्दों में कहा " हे ईश्वर , मेरा पाप क्षमा कर । एवमस्तु । मैं आता हूँ । "
मृत्यु के समय उसकी आयु तिरेसठ वर्ष को थी । उसने अपने अन्तिम दस वर्षों में चौबीस युद्ध स्वयं अपने सेनापतित्व में तथा पांच - छ : दूसरों का आधीनता में कराये तथा कूल एक लाख चौदह हजार स्त्री - पुरुषों को मुस लमान बनाया ।
मृत्यु के समय उसके सम्बन्धियों में चार पुत्रियाँ , चार पुत्र , ८ बाँदियाँ , अठारह स्त्रियां , दो दाइयाँ , पाँच भाई , दो बहिन , छ फफियाँ , बारह चचा , चालीस लेखक , अठावन दास , सोलह सेविकाएं , सत्ताईस सेवक , आठ द्वारपाल , आठ वकील , पंद्रह बांगी , चार कविता करने वाली स्त्रियां और एकसौ छियानवे कवि थे ।
सम्पत्ति में - एक सिंहासन , अनेक लाठियां , दो पताकाएं , छः धनुष , चार भाले , तीन किरीट , तोन ढालें , साठ कवच , दस तलवारें , अनेक वस्त्र , सत्तर भेड़ें , इक्कीस ऊँटनियाँ , तीन गधे , चार खच्चर , बीस उम्दा घोड़े , सात प्याले , एक सिंगार का डब्बा और एक तकिया था ।
#संदर्भ_पुस्तक :- आचार्य चतुरसेन कृत भारत में इस्लाम। सन 1971. अध्याय - 2. (मुहम्मद रसुल अल्लाह) p.6.
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✍️जय मां भारती 🔥

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