डार्विन का झुठा विकासवाद
(सप्रमाण, सःसाक्ष्यों व संदर्भों के साथ)
#डार्विन ने शिक्षा दी कि मनुष्य , योनि - विकास के द्वारा , पशुसे मनुष्य बना है । उसने योनि - विकास का क्रम इस प्रकार बतलायाः - -
( १ ) प्रथम अमीबा आदि एक घटक जन्तु हुए ।
( २ ) फिर आदिम मत्स्य ।
( ३ ) फिर फेफड़े वाले मत्स्य ।
( ४ ) फिर सरीस्टर मेंढक आदि जलचारी जन्तु ।
( ५ ) फिर स्तन्य जन्तु ।
( ६ ) फिर अंडज स्तन्य ।
( ७ ) फिर पिंडज = अजरायुज स्तन्य ।
( ८ ) फिर जरायुज स्तन्य ।
( ९ ) फिर किम्पुरुष = बन्दर , बनमानस , पतली नाक वाले वनमानसों में पहले पूंछ वाले कुक्कुटाकार , फिर विना पूँछ वाले नराकार , फिर इन्हीं नराकार बनमानसों की किसी शाखा ( लुप्त कड़ी ) से जिसका अभी तक ज्ञान नहीं गूंगे मनुष्य फिर अन्त में उन्हीं से बोलने वाले मनुष्य उत्पन्न हुए ।
डारविन ने इस योनि विकास के साथ साथ ही मानसिक विकास ( Mental evolution ) की भी कल्पना करते हुए प्रकट किया कि मनुष्य में बिना किसी निमित्त पुरुष के स्वतः क्रमशः ज्ञान की वृद्धि हो जाती है ।
#इस_वाद_पर_आक्षेप
(१) पहला आक्षेप : -
एक विकासवादी प्राणी शास्त्रज्ञ के मतानुसार उद्भिदों से लेकर मनुष्य योनि तक पहुंचने में ६७ लाख योनियाँ बीच की कूती जाती हैं । परन्तु इन ६७ लाख योनियों का विवरण देकर उनमें योनि विकास प्रमाणित करने की तो कथा ही क्या है उनके नाम भी बतलाना असम्भव है । जर्मन के प्रसिद्ध प्राणि - शास्त्रज्ञ #अर्नेस्ट_हैकल ने एक जगह लिखा है कि -
" मछली से मनुष्य होने तक , कम से कम , ५३ लाख ७५ हजार योनियाँ बीती हैं । सम्भव है कि यह संख्या इस ( ५३ लाख ) से १० गुनी हो ।"*
(* . Lost link by Ernst Haeckal with notes by Dr . H . Gada . )
पुराणों में कुल योनियाँ ८४ लाख वर्णित हैं जिनकी तफसील एक जगह इस प्रकार मिलती है : स्थावर योनियाँ ३० लाख जलचर कृमि पक्षी पशु मनुष्य या स्थावर योनियों को छोड़ कर जलचर से मनुष्य तक ५४ लाख योनियाँ पुराणों के अनुसार हैं परन्तु हैकल ने सैकड़ों वर्षों के बाद उन्हें केवल ५३४ लाख कूता है । फिर यह तो स्पष्ट ही है कि इसमें क्रमशः ज्ञान का ह्रास तो माना जा सकता है परन्तु इसे ज्ञान का विकास किस प्रकार कहा जा सकता है !
फिर इन ५३१ लाख योनियों के विवरण देने में हैकल ने यह कह कर अपनी असमर्थता प्रकट की है कि “ सम्भव है यह संख्या इससे १० गुनी हो । "
थोड़े से मुट्ठी भर स्तन्य जन्तुओं का विवरण देकर , जिसके भीतर भी लुप्त कड़ी अभी तक बाकी ही है , योनि विकास को प्रमाणित समझना , साहस मात्र है ।
(२) दुसरा आक्षेप :-
अब तक सैकड़ों जन्तु , योनि रूप में , अन्धे ही पैदा होते हैं । पता नहीं इनका विकास क्यों नहीं हुआ और पशुओं को छोड़ कर अनेक द्वीपों में अब तक मनुष्य - भक्षक मनुष्य पाये जाते हैं , इनके ज्ञान की , क्रमशः वृद्धि न होने का , समाधान क्या है ?
(३) तीसरा आक्षेप :-
विकासवाद की पुष्टि में एक युक्ति यह भी दी जाती है कि मनुष्य के गर्भ की अवस्था भी इस वाद की पुष्टि करती है । इस युक्ति का तात्पर्य यह है कि -
"गर्भ के प्रारम्भिक मासों में उस ( गर्भ ) का चित्र उन्हीं जन्तुओं से मिलता - जुलता होता है , जिनमें कि उन्नत होकर योनि - विकास द्वारा , मनुष्य बना हुआ , कह जाता है । अन्त के मांसों में उसमें मनुष्यत्व के चिह्न प्रकट हुआ करते हैं परन्तु यह कथन , अब हाल की खोजों से , ठीक सिद्ध नहीं होता है । "
" थियोसोफिकल पाथ " में डाक्टर बूड़ जौन्स के कथन का हवाला देते हुए , रियान ( C . J . Ryan ) ने लिखा है : -
" हैकल का यह वाद , कि मनुष्य का गर्भ बन्दरों के गर्भ से लगभग अन्त के मासों तक पहचाना नहीं जा सकता , अशुद्ध और त्याज्य है । कुछेक आवश्यक अंग जैसे कि मनुष्य के पाँव , पाँव की एक माँस पेशी ( by muscle ) के साथ , जो मनुष्य से नीचे के जन्तुओं में नहीं पाये जाते , मनुष्य के गर्भ में यथा सम्भव प्रारम्भ ही में प्रकट हो जाते हैं , यदि मनुष्य , चार पाँव वाले जन्तुओं आदि की योनियों से गुजार कर बना होता तो वे अवयव अवश्य गर्भ के अन्त में प्रकट होते । "
डाक्टर बूड जोन्स और रियान का भाव उनके ही शब्दों में समझा जा सके इसलिए इन दोनों सज्जनों के लेखों के उद्धरण फुटनोट में दे दिये गये हैं ।§ वूड जोन्स ने अपने लेख में , जैसा कि उन के उद्धरण से मालूम होगा , इस बात को स्पष्ट रीति से वर्णन कर दिया है कि मनुष्य योनि विकास द्वारा नहीं बनी है किन्तु उसकी योनि इन सब से भिन्न .और स्वतन्त्र है । जब दस मास में रज और वीर्य के मेल से मनुष्य बन जाता है तब उसे लाखों वर्षों में बना हुआ बताना ईश्वरी शक्ति ( Nature ) का अपमान करना है ।
(४) चौथा आक्षेप :-
यह ( विकास ) वाद प्रत्यक्ष के विरुद्ध और अवैज्ञानिक है । संसार में एक सार्वत्रिक नियम देखा जाता है कि जो चीज़ उत्पन्न होती है नष्ट हो जाती है , जो चीज बढ़ती है अन्त में घटने लगती है । सूर्य की गरमी बढ़ कर अब घट रही है । मनुष्य उत्पन्न होकर युवा होता है फिर बूढ़ा होने लगता और अन्त में मर जाता है । वृक्षों की भी यही अवस्था होती है । यह कहीं भी नहीं देखा जाता कि कोई चीज़ बढ़ती ही चली जाय और घटे नहीं । विकास के साथ ह्रास अनिवार्य है । परन्तु डार्विन का विकास वाद एक पहिये की गाड़ी है , हास - शून्य विकास है , इसीलिए अस्वीकर्तव्य है ।
(५) पाँचवाँ आक्षेप :-
क्रमशः ज्ञान - वृद्धि का सिद्धान्त तो सर्वथा निराधार और क्लिष्ट कल्पना मात्र है । इस सम्बन्ध में अनेक समयों में अनेक व्यक्तियों के द्वारा परीक्षण किये गये और सब का एकही फल निकला और वह यह था कि क्रमशः ज्ञान वृद्धि का सिद्धान्त अप्रामाणिक है ।
परीक्षण करने वाले व्यक्तियों के नाम ये हैं :
( 1 ) असुरवानापाल लेयार्ड ( Layard ) और शैलिन्सन ( Rowinson ) दो अन्वेषकों ने नैनवा और वैवलन ( असीरिया ) दो अन्वेषकों ने नैनवा ओर वैवलन ( असीरिया ) उपोद्घात के पुराने खंडरों को खुदवाया और ईंटों पर लिखे हुए पुस्तकालय निकाले । उन पुस्तकों से वानापल के परीक्षणों का हाल मालूम हुआ । पुराणों में इसी वानापाल को वानासुर लिखा है जिसने इस देशपर आक्रमण किया था और पराजित हुआ था ।
( 2 ) यूनान का राजा सेमिटिकल ।
( 3 ) द्वितीय फ्रेडरिक ( Fredrick the Second ) ( 4 ) चतुर्थ जेम्स ( Jaimes the 4th of Scotland ) ( 5 ) अकबर
इन राजाओं के आधिपत्य में अनेक विद्वानों ने १० – १० बारह - बारह ( अकबर ने ३० बच्चों पर ) छोटे - छोटे नवजात बालकों को शीशों के मकानों में रक्खा और उनकी परवरिश के लिए धाइयाँ रक्खीं और उनको समझा दिया गया कि वे बच्चों को खिला पिला कर प्रत्येक प्रकार से उनका रक्षा करें ; परन्तु उनको , किसी प्रकार की , कोई शिक्षा न दें , न उनके सामने कुछ बोलें । उन धाइयों ने ऐसा ही किया । इस प्रकार परवरिश पाकर जब बच्चे बड़े हुए तब जाँच करने से मालूम हुआ कि वे सभी बहरे और गूंगे थे । (evidence :Transactions of the Victoria Institute Vol . 15p . 336 .)
यदि बिना शिक्षा दिये स्वयमेव किसी में ज्ञान उत्पन्न हो सका होता तो इन बच्चों को को भी बोलना आदि स्वयमेव आ जाता । इनका बहरा और गुंगा रह जाना साफ़ तौर से प्रकट करता है कि स्वयमेव ज्ञान न उत्पन्न होता है, न उसकी वृद्धि होती है ।
(६) छठा आक्षेप :-
वैज्ञानिक भी अब क्रमशः ज्ञान - वृद्धि के मन्तव्य का विरोध करने लगे हैं :
( १ ) सर आलिवर लाज , क्रमशः ज्ञान वृद्धि के सिद्धान्त का विरोध करते हुए , ऐसा मानने वालों से प्रश्न करते हैं कि सूक्ष्म कला ( Fine arts ) फोटोग्राफी आदि का , बिना शिक्षा प्राप्त किये , किस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ ?
एक दूसरे विद्वान बालफोर ( Balfour ) ने लाज के इस प्रश्न का समर्थन किया है ।
(देखे : Life and Matter by Sir Oliver Lodge p . 143 .)
( २ ) डाक्टर वालेस ने जो विकासवाद के आविष्कारकों में से एक थे , अपने क्रमशः ज्ञान की वृद्धि वाले सिद्धान्त को छोड़ कर एक जगह लिखा है कि जो विचार वेद की ऋचाओं से प्रकट होते हैं और जो उत्पन्न भाषा में प्रकट हुए हैं उनके लेखक उत्तम से उत्तम शिक्षकों और हमारे मिलटनों और टैनीसनों से न्यून नहीं थे । डाक्टर वालेस के शब्द ये हैं : _ _ _ " We must admit that the mind which concieved and expressed appropriate language , such ideas , as are verywhere apparent in these Vedic hymns , could not have been in any way inferior to those of the best of our religous teachers and poets to our Milton ' s and our Tennysons . "
(original reference : Social environment and moral progress by Dr . Wallace p . 14 .)
( ३ ) डाक्टर वालेस ने मिश्र और मेसोपटेमिया की पुरानी कलाओं और लेखों पर विचार करते हुए उनको भी आजकल की अच्छी से अच्छी कलाओं से कम नहीं ठहराया है । उन्हों ने इन और ऐसी ही अन्य बातों पर विचार करते हुए परिणाम यह निकाला है कि क्रमशः ज्ञान वृद्धि का कोई प्रमाण नहीं है :
" There is therefore no proof continuously in creasing intellectual power ."
(reference :- 2 . Social environment and moral progress by Dr . Wallace p . 8 - 26 .)
( ४क ) गैलटन महोदय ने एक जगह लिखा है :
"It follows from thus that theaverage ability of the Athenian race is on the lowest possible estimate very nearly two grades higher than our own ; that is about as much as our own race is above that of the African Negro ( Heridity Genius by Galton p . 331 ) .
इसका सार यह है कि यूनानियों को मध्य योग्यता नीची से नीची मात्रा में यदि वह कृती जावे तो भी हमारी सभ्यता से दो दरजे ऊपर थी अर्थात् लगभग उतनी ऊँची थी जितनी हमारी जाति अफ्रीका के वहशियों से ऊँची है ।
( ४ख ) प्रोफेसर गोल्डस्मिथ के एक पुस्तक ( The laws of life ) की समालोचना करने हुए " के " ( W . E . Key ) महोदय ने " गुड हैल्थ " ( Good Health ) में लिखा है कि विकासवाद का , अर्थ समझने से पहले , यह वात अच्छी तरह से हृदयांकित कर लेनी चाहिए कि यह वाद न तो यह कहता है कि ईश्वर नहीं है और न इसकी शिक्षा यह है कि मनुष्य बन्दरों से उत्पन्न हुआ है ।
[साक्ष्य :- Before considering the meaning oferolution itmether eliminates God , nor does it tench that monkeys aro the ancesters of man ( Vedic Mag . Sept . 1923 . )]
( ५ ) पैरी ने अपने एक ग्रन्थ¶ में और इडवार्ड कारपेंटर ने भी अपने एक दूसरे ग्रन्थ में डॉक्टर वालेस और प्रो० "के" की सम्मतियों का समर्थन किया है।€
(Ref:-¶ The Children of the Sun by Perry .) (Ref:-€ . The Art of Creation by Edrard Carpentor p . 105 .)
( ६ ) डारविन भी , जो विकासवाद का आविष्कारक था , अनीश्वरवादी नहीं था । उसनी अपने एक पुस्तक के पहले संस्करण में , जो योनियों के उत्पत्ति के संबंध में है , लिखा था :
" I should infer from analogy that probably all the organic beings have descended from some one premordial form into which life was first breathed . "
परन्तु उसी पुस्तक के दूसरे संस्करण में उसने उपयुक्त वाक्यों को संशोधन करके इस प्रकार लिखा है :
" There is a grandeur in this view of life having been originally breathed by the creator into a few forms or into one . "
(पढें :-Origin of Species by Charles Darwin)
संशोधित वाक्य में जीवन फूंकने वाले ईश्वर को वर्णन करके डार्विन ने साफ शब्दों में प्रकट कर दिया है कि वह ईश्वर की सत्ता मानता था ।
#नोट - टिंडल ने अपने वेलफास्ट के भाषण में , डार्विन के पहले संस्करण में प्रयुक्त किये हुये "आदिम योनि" ( Premordial Form ) शब्दों पर , आक्षेप किया था कि उस ( डार्विन ) ने किस आधार पर यह कल्पना की है । (पढें:- Lectures and Essays by Tyndall. p . 30 .)
जो कुछ विकास-वाद के संबंध में ऊपर लिखा गया वह यह प्रकट कर देने के लिये पर्याप्त है कि यह वाद अनेक त्रुटियों और कमियों से पूर्ण है और इस वाद के दो सिद्धान्त तो अत्यन्त आपत्तिजनक हैं :
( १ ) एक योनि से दूसरी योनि का उत्पन्न होना
( २ ) क्रमशः ज्ञान की वृद्धि ( Mental Evolution ) और अधिकतर वैज्ञानिक भी अब इसके विरुद्ध हो गये और बराबर होते चले जाते हैं ।
इसलिए डार्विन ने ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के सिद्धान्त में , जो बाधा अपने विकासवाद को अन्वेषणा से पहुँचाने का यत्न किया था , वह यत्न निष्फल सा सिद्ध हो रहा है । इस लिए उसके सम्बन्ध में अब और अधिक न कह कर फिर मैं असली विषय ( ईश्वरीय ज्ञान ) की ओर आता हूँ ईश्वरीय ज्ञान के सम्बन्ध में तीन कल्पनाएं जो ज्ञान ईश्वर द्वारा प्राप्त होता है , उस के सम्बन्ध में तीन कल्पना की जाती है :
(1) पहली कल्पना :
ईश्वरीय ज्ञान की आवश्यकता जगत के प्रारम्भ में होती है । जब तत्कालीन मनुष्य - समाज में शिक्षकों का अभाव होता है उस अभाव की पूर्ति ईश्वरीय ज्ञान द्वारा होती है ।
ऋषि - मुनियों का ऐसा ही विचार था और अब भी ऋषि दयानन्द ने इस कल्पना की पुष्टि की है और आर्य - समाज इसी विचार का पोषक है ।
(2) दूसरी कल्पना :-
दूसरा विचार यह है कि समय समय पर विशेष विशेष पुरुषों के द्वारा विशेष विशेष पुस्तकों के रूप में ईश्वरीय ज्ञान प्रादुर्भूत हुआ करता है । ईसाई , मुसलमान , यहूदी आदि सम्प्रदाय इस विचार के समर्थक हैं ।
(3) तीसरी कल्पना :-
तीसरा विचार यह है कि बिना किसी पुस्तक के माध्यम के , समय समय पर विशेष विशेष पुरुषों को ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होता रहता है । ब्रह्म समाज और उनके अनुयाई तथा अन्य कुछेक पुरुष इस कल्पना को ठीक मानते हैं । जब जगत् के प्रारम्भ में मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त हो चुका तब उसके बाद भी ऐसे ज्ञान प्राप्ति की कल्पना से ईश्वर की सर्वज्ञता में धब्बा आता है । इलहाम होकर फिर उसे रद्द कर करना अथवा उसमें संशोधन करना अथवा उसके स्थान पर नया ज्ञान देने से ईश्वर के ईश्वरत्व में बाधा पहुँचती है इसलिए दूसरी और तीसरी कल्पनायें अप्रतिष्ठित हैं।
🙏विचार प्रसार🚩🚩🚩🚩🚩
✍️जय मां भारती 🙏🙏🕉️🕉️
✍️सत्य सनातन धर्म की जय हो 🔱 🔱 🔥🔥🔥
{ #footnote§.:- Dr . Wood Jones ( The Problem of man ' s Ancestry p . 33 . ) " We are left with the una voidable impression that the search for his aucesters must be pushed a very long way back .
It becomes impossible to picture man as being descended from any form at all like the recent monkeys
or from their fossil representatives .
He must have started an independent line of his Own long before the anthropoid apes and the monkeys leveloped those specializations which shaped their definite evolutionary destinies . " _ _ _ Referring to Wood Jone ' s above view Ir . C . J . Ryan irrites in the " Theosophical Path " He proves that Haeckals teaching that a human embryo can not be distinguished from that of monkeys until very late developments is wrong and must be abandoned , by showing that certain essentially human characters such as the human walking foot with a leg muscle found in none of the lover ' animals , are visible in the human embryo at the earliest possible time and not late in the formation as they would be if man had passed these the anthro . poidal and quadrupadal stages . ( Vedic magn . May 1926 p . 143 . )}
#Reference :- आर्य सिध्दांत विमर्श


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