भारतीय सभ्यता का सत्य...

प्रागैतिहासिक काल या विकासवाद नितान्त असत्य व अवैज्ञानिक परिकल्पना है, डार्विनवाद वैज्ञानिक दृष्टि से बीसवीं शताब्दी में ही खंडित हो चुका था। लेकिन भारतीय पाठ्यक्रम में इसलिए आजतक रहा क्योंकि संसार का सबसे दिर्घ काल तक औपनिवेशिक दास रहने वाले राष्ट्र मे दुर्भाग्य से भारतीय सभ्यता अव्वल है, इसमे बडा रेकार्ड हमने बनाया है। हमारे लिए ये इसलिए लज्जाजनक है क्योंकि हम आद्य व सनातन सभ्यता है, इसी आर्यावर्त मे मानव मानवता मानवीय सभ्यता का प्रादुर्भाव हुआ। अब ये नास्तिकवाद या प्रागैतिहासिक विकासवाद हमारे मष्तिष्क मे पाठ्यक्रमों द्वारा एथेस्ट वाम तत्वो ने घूसेड़ दी है। वर्तमान युग के भौतिकविद वैज्ञानिक भी ईश्वरीय अस्तित्व वा चेतना को स्वीकार करते हैं, सर्वविदित है। अतः आज जो वैदिक विज्ञान को नही जानते वे भी सृष्टि रचना ईश्वरीय है ये भौतिकी के धरातल पर स्वीकार करते हैं लेकिन उसके गहनता मे उचित थ्योरी आए ये उक्त विषय का प्रक्रिया का विस्तार से अनुसंधान अभ्यास कहना उचित होगा। संसार को भारत ने चरित्र की शिक्षा दी। शक, मलेच्छ आदि लोग युधिष्ठिर के यज्ञ में भी पधारे थे। अतः कुछ काल उपरांत अवैदिक अवधारणाओं द्वारा, ज्ञान धर्म विज्ञान के युद्ध के पश्चात हुए लोप से, शनैः शनैः अविद्यादि दोष फैला। एक समय आया कि वे पुरी तरह असभ्य एवं कंद मूल तक सीमित जंगली बन गये। कंद मूल वनवास तो विद्वान ज्ञानी ऋषि मुनियों भी करते हैं लेकिन अंतर है ज्ञान व अज्ञान का। वे पश्चिमी अज्ञानी पशुओं के भांति व घोर अधर्मी हो गये तो नरपशु ही कहेंगे, ये अंतर है । अतः अरबी कवि द्वारा उल्लेखनीय है कि अविद्या अज्ञान अंधकार से एक बार, भारतीय विद्वानों को अरब भेजकर विक्रमादित्य ने उन्हे कृतार्थ किया। हालांकि फिर भी पश्चिमी देशों में जो अब्राह्मीक मजहबो का उदय हुआ, वो काल पश्चिमी देशों का अज्ञान अंधकार का, वहां स्थापित भग्न वैदिक सभ्यता के भी विस्थापना का दौर था।

अब अरबी इतने अधर्मी पापी बलात्कार के अविष्कारक, लंपटता व मद्यपान के अविष्कारक, अमर्यादा व्यभिचार के अविष्कारक मजहबो द्वारा प्रतिपादित गिरोह पैदा हुए, वहां मानवीयता विहिन प्रजाति पैदा हुई, पशु से भी भयावह, घिनौनी, दरिंदों की नरपशुता की प्रजाति...

इस असभ्यता ने सभ्यता चरित्र मर्यादा धर्म का उच्च सोपान क्या है ये वो कालांतर से भूल बैठे। इसमे लम्पटता ऐसी कि अगम्यगमण कदाचार ही इनका कल्चर बना रहा। किताब की कट्टरता पर ये अवैज्ञानिक असभ्य गिरोह चलायमान रहे। व चल रहे हैं।

इनकी गन्दगी हिंसा अमानवीयता असभ्यता इतनी पिछडी व नग्न थी कि वो भारतीयो के लिए अनभिज्ञ थी। इनके आक्रमण होते रहे क्योंकि इनके प्रदेश विपन्न थे, भारत भुमि संपन्न थी। इसलिए भारत ने कभी अन्य देशों पर अधिक आक्रमण नही किया। अरबी आक्रमणकारियों के आक्रमण का कारण विपन्नता ही थी।

जितने भी विदेशी यात्रियों के वृतांत है उनके अनुसार भारत में स्त्री लम्पटता चोरी मदिरापान तामसिक आहार व रोग का नामोनिशान नही था, व स्वास्थ्य केंद्र, विद्या के केंद्र (विश्वविद्यालय) विपुलता के साथ स्थित थे।

इतिहास पुरातत्व साहित्य दर्शन विज्ञान से भारत ही सार्वभौम मानवीय सभ्यता की जननी सिद्ध होते हुए पश्चिमी कल्चर असभ्यता, हास्यास्पद अवैज्ञानिकता एवं मूर्खता की पराकाष्ठा सिद्ध होता है। पाश्चात्यो को न विवाह पता था न खाने का तरीका न धोने का तरिका... पाश्चात्य व पशु एक दूसरे के पर्यायवाची कह सकते हैं। विज्ञान का जन्म भारत में हुआ 

मेहनत करके पाश्चात्यो ने उसे चुराया। पुनर्चक्रण किया। श्रेय पेंटेंट के साथ स्वयं लिया। कापीराइट पेंटेंट डिग्री जैसे हास्यास्पद स्वार्थ वाले सिद्धांत पश्चिमी ही दे सकते हैं, जिन्होंने कभी देखा नही उन्होंने जब देखा तो आश्चर्य होगा ही, कृपणता होगी ही, एक अंग्रेज तो सोने से भरे भारतीय जहाज जब सागर में जलमग्न हुए वो देखकर ही पागल हो गया, ऐसे लोभी धूर्त छली जिनमे कोई आदर्श व मानवता का नामोनिशान नही ऐसे नीच ये थे। भारत मे जब वे आए तो पहली बार सभ्यता क्या होती है वो जाना। यथार्थ मे मानवीय सभ्यता देखकर, ज्ञान विज्ञान देखकर, संपन्नता देखकर, प्राचीन गौरवपूर्ण भाषा लिपि इतिहास देखकर वे अवाक् रह गये। जो सभ्य व सज्जन विद पश्चिम मे हुए वो आदर के पात्र हैं। उन्ही मे एक फादर (अबे ड्यूबो) का कथन उद्धृत करते हैं जो उसने अपने अंदाज में कहा या लिखा है -

         ❝ हिंदू - नारी का शरीर पवित्र होता है ।

             कोई मनुष्य सब के सामने अँगुलियों के

             अग्रभाग से भी उन्हें स्पर्श नहीं कर सकता ।

             कितनी ही हीन दशा उनकी क्यों न हो ,

             बड़े-से-बड़े लोग भी उनके लिये

             आदर पूर्वक “माता" का ही

             सम्बोधन करते हैं । ❜❜

(१) अपने मां जैसा सम्मान व संबोधन... ये देखकर कौनसे अर्वाचीन पश्चिमीयो को इस धरा के सभ्यता का विलक्षण प्रस्फुरण स्तब्ध न कर गया...

(२)"शरिर पवित्र.." इस कथन से विदित होता है कि मन वचन कर्म व सचरित्रता के सामान्य स्तर का, यथास्थिति प्रत्यक्ष यही पर इसने देखा.. वह इसे निश्चित ही असाधारण जान पडा... क्योंकि पश्चिम में स्त्री एक वस्तु है, सुकरात और अरस्तू पाश्चात्यो के सबसे बड़े विचारक और दार्शनिक है । वे कहते हैं- “ स्त्री शरीर में आत्मा नही होती । स्त्री ऐसे होती है जैसे मेज या कुरसी । जिस तरह मेज या कुरसी को कही भी उठाकर फेंका जा सकता है , स्त्री को भी कही भी उठाकर फेंका जा सकता है । स्त्री ऐसे होती है जैसे कोई कपडा । जब जरूरत पड़ी उतार के फेंक दिया , जब जरूरत पड़ी पहन लिया । कपडा शरिर पर हमेशा धारण किया नही जा सकता इसलिए स्त्री को भी हर समय साथ नही रखा जा सकता । उसे कपडे की तरह पहनना , फेंकना और बदलते रहना चाहिए । "

(३) पश्चिम मे कोई भी अमर्यादित किसी भी स्त्री को धरकर कोई भी अभद्र हरकत करे, हाथ लगावे, स्पर्श करे, ये पशुवत कल्चर वहां होता है। कुत्ते कुत्तीया जब इकट्ठा होते हैं, समूह मे, यदि उन्हे आपने देखा तो समझो पाश्चात्य कल्चर भी देखा। जी हाँ। वही कल्चर पाश्चात्य है। अतः उसने देखा कि यहां तो नारी से कोई भी ऐसे हाथ नही लगा सकते तो यह सभ्यता देखकर वह स्तब्ध रह गया। फिर से दोहराता हू कि पहली बार मानवीय सभ्यता आखिर होती क्या है ये पशुतुल्य असभ्य पाश्चात्य भारत से ही जान सके। एक वृतांत उल्लेखनीय है...

बात उन दिनों की है जब भारत अंग्रेजो से बौद्धिक रूप से परतंत्र नही हुआ था । एक अंग्रेज ने भारत के संन्यासी से पूछा की आपके देश मे महिला हाथ क्यो नही मिलाती ? इस पर संन्यासी ने कहा कि क्या आपके देश का साधारण नागरिक महारानी से हाथ मिला सकता है ? तो अंग्रेज बोला बिल्कुल नही फिर संन्यासी ने कहा हमारे देश में प्रत्येक स्त्री महाराणी है .. !

भारतवर्ष की शक्ति और समृद्धि , ज्ञान और गुरुत्व विश्वविख्यात है । प्राचीन काल की श्रेष्ठतम उपलब्धियों से भरपूर सहित्य और इतिहास हमें प्रतिक्षण उस गौरवपूर्ण अतीत की याद दिलाता है । पूर्वजों की आत्माओं का प्रकाश इस देश के कण - कण को जागृति का सन्देश दे रहा है । यह बात हर एक नागरिक के हृदय में समाई हुई है , वह आत्माभिमान अभी तक मरा नहीं किन्तु काल के दूषित प्रभाव के कारण आज आर्य जाति सब तरह से दीनहीन बन चुकी है । अब उसका कदम केवल विनाश की ओर ही बढ़ रहा है । जानते हुए भी हम अपनी पूर्व प्रतिष्ठा को भुलाये बैठे हैं । हमारी गाथायें विदेशों में बिक गईं । हमारे ज्ञान की एक छोटी - सी किरण पाकर पाश्चात्य देश अभिमान से सिर उठाये खड़े हैं और हम अपने पूर्वजों की शान को भी मिट्टी में मिलाने को तैयार हैं । कठोर बनने का कोई उद्देश्य नहीं है । कटु बात कहकर अपनी ही आत्मा के कणों का जी दुखाना नहीं चाहते किन्तु जो दुर्गति हमारी संस्कृति की इन दिनों हो रही है उसे देखकर हृदय में सौ - सौ बरछों का सा प्रहार लग रहा है ।

   आत्मा की इस आवाज को कोई धर्माभिमानी , राष्ट्रहितैषी तथा जाति के गौरव के लिये प्राण अपर्ण करने वाला ही समझ सकता है । आर्य संस्कृति का या हिन्दू धर्म का नाम उल्लेखन करने में साम्प्रदायिक संकीर्णता का भाव नहीं आना चाहिये । हमारी संस्कृति दिव्य - संस्कृति है । उसमें प्राणिमात्र के हित की व्यवस्था है । यह उद्बोधन केवल इसलिये है कि उस चिर - सत्य का प्रादुर्भाव केवल इसी भूमि में हुआ है इसी से हम उसे एक विशेष सम्बोधन से विभूषित करते हैं , अन्यथा हिन्दू धर्म का क्षेत्र सम्पूर्ण विश्व है ।

💥 जोन्स जेनी ने इस बात को स्पष्ट करते हुए बताया है-

     " भारतवर्ष केवल हिन्दू धर्म का ही घर नहीं है वरन् वह संसार की सभ्यता का आदि भण्डार है ।

    "संसार में भारतवर्ष के प्रति लोगों का प्रेम और आदर उसकी बौद्धिक , नैतिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति के कारण है । " यह शब्द प्रो . लुई रिनाड ने व्यक्त किये हैं ।

  इन शब्दों से भी यही तथ्य प्रकाशित होता है कि भारत समग्र विश्व का है और सम्पूर्ण वसुन्धरा इसके प्रेमपाश में आबद्ध है । अनादि काल से धर्म की , संस्कृति और मानवता की ज्योति यह विकीर्ण कर रहा है । धरती की अनुपम कृति यह देश भला किसे प्यारा न होगा भारतवर्ष ने जो आध्यात्मिक विचार इस संसार में प्रसारित किये हैं वे युग - युगान्तरों तक अक्षुण्ण रहने वाले हैं । उनसे अनेक सुषुप्त आत्माओं को अनन्तकाल तक प्रकाश मिलता रहेगा । भारतीय संस्कृति के प्रवाह का उद्गम वे चिन्तन , शाश्वत और सनातन सत्य रहे हैं जिनकी अनुभूति ऋषियों ने प्रबल तपश्चर्याओं के द्वारा अर्जित की थी , वह प्रभाव धूमिल भले ही हो गया हो किन्तु अभी तक भी लुप्त नहीं हुआ है । धार्मिक , आध्यात्मिक एवं नैतिक क्षेत्र में ही सर्व सम्पन्न नहीं रहे वरन् कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं छूटा जहाँ हमारी पहुँच न रही हो ।

💥 आध्यात्मिक तत्व ज्ञान के अतिरिक्त सामाजिक , व्यावहारिक तथा अन्य विद्याओं के ज्ञान - विज्ञान में भी हम अग्रणी रहे हैं । अपनी एक शोध में डा. थीवो ने लिखा है कि-

   " संसार , रेखागणित के लिये भारत का ऋणी है ,

        यूनान का नहीं !"

💥 प्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो. बेवर का कथन है-

    " अरब में ज्योतिष विद्या का विकास भारतवर्ष से हुआ ।"

💥 कोलग्रुक ने बताया कि " कोई अन्य देश नहीं , चीन और अरब को अंकगणित का पाठ पढ़ाने वाला देश भारतवर्ष ही है । "

    यूनान के प्राचीन इतिहास का दावा है कि "भारत के निवासी यूनान में आकर बसे । ये बड़े बुद्धिमान , विद्वान और कला - कुशल थे । उन्होंने विद्या और वैद्यक का खूब प्रचार किया । यहाँ के निवासियों को सभ्य बनाया ।"

    निसंदेह इतना सारा ज्ञान अगाध श्रम शोध और लगन के द्वारा पैदा किया गया होगा । तब के पुरुष आलस्य , अरुचि , आसक्ति , अहंकार आदि से दूर रहे होंगे तभी तो वह तन्मयता बन पाई होगी जिसके बूते पर इतनी सारी खोज की जा सकी होगी । दुर्भाग्य की बात है कि आज वही भारतवर्ष विदेशियों के अनुकरण को ही अपनी शान समझता है । इस कार्य में जो जितना अधिक निपुण है उसे उतनी ही सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है । विश्व के विविध विषयों के जब आँकड़े प्रस्तुत किये जाते हैं तो यह देखकर तीव्र वेदना होती है कि उनमें भारतवर्ष संतोषजनक श्रेणी में नही आता है । क्या वह समृद्धि हम फिर से देख सकेंगे जिसका वर्णन प्रसिद्ध युनानी विद्वान ने इस तरह किया है " जो लोग भारत से आकर यहाँ बसे थे वे कैसे थे ? वे देवताओं के वंशज थे , उनके पास विपुल सोना था । वे रेशम के कामदार ऊनी दुशाले ओढ़ते थे । हाथी दाँत की वस्तुयें व्यवहार में लाते थे और बहुमूल्य रत्नों के हार पहनते थे । "

     जो विध्वंसक विज्ञान और एटमी हथियार इन दिनों बन रहे हैं उनमें भी बड़ी शक्ति वाले आयुध यहाँ वैदिक युग में प्रयुक्त हुये हैं । सरस्वती की उपासना के साथ - साथ शक्ति की भी समवेत उपासना इस संदेश में हुई है । अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर जो " अशनि " शब्द का प्रयोग हुआ है , उसका अर्थ आजकल की भीमकाय तोपों जैसा ही है । प्रोफेसर विल्सन का कथन है- " गोलों का अविष्कार सबसे पहले भारत में हुआ था । योरोप के सम्पर्क में आने के बहुत समय पहले उनका प्रयोग भारत में होता था । "

💥 कर्नल रशबुक विलियम ने एक स्थान पर लिखा है—

      " शीशे की गोलियाँ और बन्दूकों के प्रयोग का हाल विस्तार से यजुर्वेद में म है । भारतवर्ष में तोपों और बन्दूकों का प्रयोग वैदिक काल से ही होता था ।

💥 डफ महोदय लिखते हैं- " भारतीय विज्ञान इतना विस्तृत है कि योरोपीय विज्ञान के सब अंग वहाँ मिलते हैं । " कहाँ तक गिनायें , ऐसे आख्यानों से योरोप का इतिहास भरा पड़ा है ।

    फ्रेडरिक शेलिंग , प्रो . मैक्समूलर , रोम्यों रोलौं , एम लुई जिकोलिएट , विक्टर कोसिन आदि अनेक विद्वानों तथा दार्शनिकों ने मुक्त कंठ से भारतीय गरिमा की प्रशंसा की है । जो भी इस संस्कृति के प्रभाव में आया उसी का मन इसे देखकर मोह गया । भारतीयों की सहृदयता , श्रद्धा और ईश्वर विश्वास के आगे संसार नतमस्तक हो जाता है । वह ज्ञान , वह गौरव , विज्ञान , कला , समृद्धि और संस्कृति सबका सब इस देश के गर्भ में अभी भी विद्यमान है । वह खोजें दृढ़ हैं , निरर्थक या लोप नहीं हुईं । उन विद्याओं का अस्तित्व अब भी विद्यमान है और यह प्रतीक्षा किया करता है कि कोई आये और हमारे अनन्त भण्डार में से जितना मन चाहे बटोर ले जाय , किन्तु कहाँ हैं वे कर्मवीर जो राष्ट्र के गौरव को फिर से ऊँचा उठा सकें । हमने एक परिभाषा सीख ली है— पतन की परिभाषा । "

     नशे में झूमते हुये व्यक्ति को जैसे खुद का भी होश - हवास नहीं रहता ठीक उसी तरह हो गये हैं हम हमारी रगों में विदेशीपन का , बनावट का नशा छा गया है । अपने सांस्कृतिक गौरव को भूल चुके हैं । तभी दिनों - दिन हमारी दुर्गति बढ़ती जा रही है । बेकारी रह नहीं सकती । भ्रष्टाचार टिक नहीं सकता , व्यभिचार पनप नहीं सकता , अत्याचार अधिक दिन तक सिर उठाये खड़ा नहीं रह सकता , पर हमारा आत्माभिमान तो जागे हम जिस दिन अपने को समझ पायेंगे , उस दिन हमारी व्यवस्था ही भिन्न होगी । सर्वत्र हास - परिहास होगा । ज्ञान की गंगा यहाँ बह रही होगी । समृद्धि का कुबेर अपना खजाना लुटा रहा होगा । सब कुछ होगा पर हमारी आध्यात्मिक वृत्तियाँ भी तो जागें । यदि इतना साहस हम में पैदा हो जाय तो युग को बदलते देर न लगेगी । वह स्वर्णिम विहान विहँसता हुआ चला आयेगा । आइये ! अब उसी धर्म और संस्कृति के अवगाहन के लिये तैयार हों ।

     जय आर्यावर्त जय मां भारती 🚩🙏

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