विक्रम युग में स्त्री

प्राचीन भारतवर्ष में स्त्रीयों की स्थिति..... 

प्राचीन भारत में स्त्रीयों पर हमने विगत लेख में देखा है और विस्तार से जानकारी पाईं हैं । ¶

वेदों से हम भारतीय २१ महान आर्य विदुषीयों को जानने के उपरांत अब चर्चा करेंगे मध्य काल जिसका निर्धारण वामपंथी और ईसाई इतिहासकारों ने लगभग ११ वीं शताब्दी के लगभग से किया है। वास्तव में जिसे वह भारत का प्राचीन काल मानते हैं वह भारत का मध्यकालीन इतिहास था। अब वैदिक काल के उपरांत चाणक्य और बौध्द काल तथा सम्राट विक्रमादित्य और मालवनरेश भोज तक की वह सारी स्थिति जो तत्कालीन समाज में स्त्रियों के लिए थीं, उसे लेकर चर्चा करेंगे...।

वैदिक युगीन भारत में स्त्रियों की अवस्था काफी उन्नत थी विशेषतया ऋग्वैदिक काल के दौरान। इस स्थिति में उत्तर वैदिक काल में काफी गिरावट देखने को मिलने लगी जबकि उन पर कई तरह के प्रतिबंध लादे जाने लगे। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों से संपत्ति का अधिकार काफी हद तक छीन लिया गया था तथा उन्हें अब युद्ध में भी शामिल होने की इजाजत नहीं रह गई थी। इसके अलावा उपनयन आदि संस्कार भी उनके लिए निषेध हो गए। ऐसे में बुद्ध काल में जबकि नगरीकरण का विस्तार हो रहा था, उसी समय स्मृतियों की रचना भी अपने आरम्भिक हालातों में आ चुकी थी। निषेध नियमों का कठोर होते चले जाना तथा पहले के अधिकारों में कटौती के साथ कर्तव्यों की बड़ी सूची का सम्मिलित हो जाना स्त्रियों पर बहुत बड़ा आघात था।

◾बौध्द काल में स्त्रीं : [1]

बुद्ध काल में यानि लगभग पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत में नारी धर्म बहुत महत्वपूर्ण हो चला था। अब नारी को बंधन और तय मर्यादा के दायरे में रखने की पूरी कोशिश होने लगी। यही वो समय था जबकि संपत्ति के रूप में नारी को भी रखने का आशय प्रकट होने लगा। यानि नारी अब स्वतंत्र अस्तित्व रखने की बजाय भोग्य वस्तु की तरह व्यवहृत की जाने लगी। ऐसे में स्वाभाविक था कि नए मानदंड खलबली मचाते। यदि महात्मा बुद्ध को देखा जाए तो उस दौर में उन्होंने संघ में स्त्री के शामिल होने का निषेध किया और अंततः एक आम्रपाली ही प्रविष्ट हो सकीं। 

◾विक्रम युग में स्त्रीं :

विक्रमादित्य प्रमार का समय विक्रम संवत् है। अर्थात ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी। विक्रम युग की तुलना तो सिर्फ रामराज्य से ही कयी विद्वानों ने की है। उसकाल में स्त्री क्या किसी भी व्यक्ति को कोई प्रतिकूल परिस्थिति ऐसी नहीं थी, जिसे आपत्तिकारक कहा जा सकें। प्रजा को जिसने ऋण मुक्त किया और फिर विक्रम संवत् चलाया उसके लिए और कहना ही क्या? इसपर कई लेख विचार प्रसार में सप्रमाण लिखे जा चुके हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार सूर्यमल्ल मिश्रण के अभिव्यक्ति से ज्ञात होता है श्रीराम युग के बाद विक्रमादित्य का युग ही रामराज्य सरीख रहा। उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य प्रमार को धर्मराज युधिष्ठिर के भांति अभिव्यक्ति दी है।

#कथासरित्सागर, अमरकोष, राजतरंगिणी आदि में विक्रम कालिन समाज व्यवस्था का विवरण मिल जाता है। राजबली पांडेय कृत विक्रमादित्य में चक्रवर्ती विक्रमादित्य महान को मालवगणमुख्य कहाँ गया है अर्थात मालवा उनकी राजधानी थी। (शकारि सम्राट विक्रमादित्य प्रमार मूल वंश से सूर्य वंश के थे।)

एक इतिहासकार लिखते हैं :- "विक्रम काल में ललित कलाओं में नाट्य , वाद्य और गायन का उत्कर्ष चरम सीमा को पहुँच गया था । चित्र - कला पर लोगों का बहुत अनुराग था । गृहों की सजावट में रंग , चित्र , मूर्ति , पत्थर और ध्वजा - पताका मालर बन्दनवार आदि का उपयोग होता था । क्रय - विक्रय पर किसी प्रकार का टैक्स न होने से वाणिज्य - व्यसाय की भी दशा समुन्नत थी । इस प्रकार हिन्दू धर्म की हिली हुई जड़ को सम्राट विक्रम ने अपने अलौकिक गुणो से अच्छी भाँति जमा कर ' राम - राज्य ' को भारत भूमि में दूसरी बार लौटा - सा दिया था ।"*

मेरुतुंगाचार्य ने अपने ग्रंथ प्रबन्ध चिंतामणि में लिखा है कि चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य प्रमार की पुत्री थी "राजकुमारी प्रियंगुमंजरी", को (नवरत्न) आचार्य वररुचि पढाया करते थे। और इस प्रकार समस्त कन्याओं को पढने के लिए तो शालाएं और ज्योतिष के शंशोधन विद्यालय आदि तो थे ही जिसमे अकेली प्रियंगुमंजरी ही नहीं बल्कि अनेक कन्या अध्ययन करती रही होगी। इसकी पुष्टि भी जैन ग्रंथों से होती है। 

▪️विक्रमादित्य के बारे में कहा गया है :-

" उनके शौर्य का आतङ्क ऐसा था कि बलिष्ठ पुरुष निर्बल को तनिक भी नहीं सता सकता था । "

#महाकवि_कालिदास ने मानों उनके इसी आतङ्क का वर्णन इस रूप में किया है

 ' तस्मिन् महीं शासति वाणिनीना निद्रा विहारार्धपथे गतानाम् ।वातोऽपि नास्र सयदंशुकानि को लम्बयेदाहरणाय वस्त्रम् ॥' 

" उस राजा के राज्य करते समय अभिसार के लिये चलने वाली रमणियों के राजपथ पर थक कर सो जाने पर उनका अञ्चल हटाने की हिम्मत कौन करता जब कि वायु को भी उनका वस्त्र हिला देने की सामर्थ्य नहीं थी !"

चक्रवर्ती विक्रमादित्य महान के नवरत्न महाकवि कालिदास के इस वर्णन के बाद विक्रमादित्य के समय स्त्रीयों की स्थिति में भला और क्या बताना शेष रह जाता है? इस प्रकार विक्रमादित्य के समय स्त्रीयों का समय पुर्ण रूप से सुरक्षित था यह कहने में कोई भी दिक्कत नहीं। वह समय भारत का स्वर्णकाल कहा जाता है। 

◼️चंद्रगुप्त द्वितीय का उध्दरण :

यह कहने में कोई भी संदेह नहीं है कि स्त्री को चंद्रगुप्त द्वितीय के समय राज्य करने, शिक्षा, दिक्षा और वेद का अधिकार था। इसका उदाहरण तत्कालीन प्रभावती गुप्त से ही लेंगे। आर्यावर्त के महान आर्य सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री राजकुमारी प्रभावती एक विरांगणा थी। प्रभावतीगुप्त गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थी। उसका विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय के साथ 380 ई॰ के आसपास हुआ था। रुद्रसेन द्वितीय शैव मतानुयायी था जबकि प्रभावती वैष्णव मत को मानने वाली थी। विवाह के बाद रुद्रसेन भी वैष्णव हो गया था। अपने अल्प शासन के बाद 390 ई॰ में रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई और 13 वर्ष तक प्रभावती ने अपने अल्प-वयस्क पुत्रों ‍‌‍‌(दिवाकर सेन तथा दामोदर सेन)की संरक्षिका के रूप में शासन किया। दिवाकर सेन की मृत्यु प्रभावती के संरक्षण काल में ही हो गई और दामोदर सेन वयस्क होने पर सिंहासन पर बैठा। यही 410 ई॰ में प्रवरसेन द्वितीय के नाम से वाकाटक शासक बना। उसने अपनी राजधानी नन्दिवर्धन से परिवर्तन करके प्रवरपुर बनाई। शकों के उन्मूलन का कार्य प्रभावती गुप्त के संरक्षण काल में ही संपन्न हुआ। इस विजय के फलस्वरूप गुप्त सत्ता गुजरात एवं काठियावाड़ में स्थापित हो गई।[***]

प्रभावती के इस उदाहरण से समझिये की कैसे प्राचीन काल से लेकर उसकाल तक स्त्री को शासन करने का, तलवार बाजी,अपनी वरमाला से अपने योग्य वर स्वयं चुनने का, युध्द कौशल, राजनीति, वेद, राज्य शासन मंत्रणा तथा सिंहासन रूढ होकर राज्य करने का पुर्ण अधिकार रहता था। इसका कारण है हमारे महान संस्कृती शास्त्र जिनमें नारी को शक्ति कहा है, उनमें उसे दुर्बल नहीं बल्कि सबल समझा जाता है। ऐसे ही अन्य उदाहरण है जैसे दक्षिण की शासिका रूद्रमादेवी का जिनपर भी लेख शिघ्र ही प्रस्तुत किया जाएगा। भारतवर्ष में कयी, विरांगणाऐ और विदुषीता संपन्न स्त्रियां हुईं हैं ऐसे में वामपंथियों का यह झुठ की भारत में स्त्री को शिक्षा का अधिकार न था पुर्णतया मिथ्या प्रसार है। जो इन नारीयों का इतिहास पढने पर गलत सिद्ध हो जाता है। 

(जिसे इस विषय को और अच्छे से प्राप्त करना है वे इन ग्रंथों को पढे :1.The Vakataka Maharaja occupied a geographical position in which he could be of much service or disservice to the northern invader of the dominions of the saka Satraps of Gujrat and Saurashtra . " 2. " Chandra Gupta adopted a prudent precaution in giving his daughter to the Vakataka prince and so securing his subordinate alliance . " Dr. Smith)


क्रमशः 

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#संदर्भ :

¶https://www.facebook.com/groups/1750873528336204/permalink/2948901998533345/

[***]📖 Book: शान्ति कुमार, स्याल कृत "गौरवशाली भारतीय वीरांगनाएँ". भारतीय साहित्य संग्रह. राजपाल एंड सन्स. अभिगमन तिथि 31 दिसम्बर 2018.

*📖📖 विक्रमादित्य और उनके नवरत्न.ईशदत्त शास्त्री श्रीश।

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✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

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