गरबा का नवरात्र से कोई संबंध नहीं...

गरबा...

(१) गरबा का नवरात्र से कोई संबंध नहीं है। वह लोकनृत्य है। नवरात्र के अतिरिक्त भी अन्य उत्सवों में होता है।

(२) गरबा नृत्य का मूल उद्भव गुजरात में हुआ। वह गरबा कालांतर से गुजरात, राजस्थान और मालवा प्रदेशों में प्रचलित एक लोकनृत्य बना। वह अर्वाचीन है।

(३) गरबा अधिक पुराना नही है। उसका उल्लेख किसी भी प्राचीन ग्रंथ मे नही, न ही इस नृत्य का उल्लेख शास्त्रों में है। इसका कुछ ही शताब्दियों पहले लोकमान्यता लोकपरंपरागत रूप से उद्भव हुआ। और ये बात भी निर्विवादित है। 

(३) कोई भी नृत्य एक कला है। भक्ति की अपनी परिभाषा है । कला की अपनी व नृत्य की अपनी परिभाषा है। उपासना की अपनी परिभाषा है। नृत्य केवल कला है। न कि ईश्वरीय उपासना। नृत्य न भक्ति है न तप है। न आध्यात्मिक क्रिया है। न योग है। 

(४) गीत संगीत नृत्य वादन साहित्य और कविता यह स्वस्थ मनोरंजन तथा मानसिक विकास के सर्वोत्तम तथा मानसिक विकास के सर्वोत्तम साधन है । शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यों से एक प्रकार की ऊब पैदा होती है जो मानसिक सरसता के अभाव में दूर नहीं होती । इन साधनो का यही महत्व है। 

(५) आध्यात्मिक भौतिक उत्थान ही धर्म है। स्वयं को साधना साधना है। कृपा प्रसन्नता हेतु भी उपासना तप साधना अनुष्ठान का प्रचलन होता है, इस साधना जगत में भी नृत्य व भक्ति से देव प्रसन्न होने का देवी संबंधित शास्त्र या ग्रंथों में गरबा का कोई उल्लेख नहीं। आप दुर्गा सप्तशती या देवी भागवत पढ लिजिए, गरबा नृत्य कही पर भी नही। अतः ये सभी तथ्य इसे लोकनृत्य व क्षेत्रीय मान्यता सिद्ध करते है। नवरात्र क्षेत्र विशेष की मान्यता न होकर व्यापक पर्व है। कम से कम जब गरबा नृत्य का अस्तित्व नही था तब भी पर्व तो था। 

(६) नवरात्र मनोरंजन या लोकनृत्य का पर्व है कि शक्ति आराधना का तप जप आध्यात्मिक साधना उपासना का? गरबा एक नृत्य प्रकार है और नृत्य एक कला है, नृत्य का औचित्य कुछ और है। नवरात्र ऋतु सन्धि है, इन दिनों का महत्व विशेष है। इसलिए इन दिनों ऋतु चर्या के दृष्टि से आयुर्वेद सम्मत उपवास होना चाहिए। नवरात्र शक्ति आराधना साधना उपासना का पर्व के रूप में व्यापक रूप से मनाया जाता है । ब्रह्मचर्य के बिना कोई भी साधना विफल हो जाती है। इसलिए ब्रह्मचर्य व उपवास नवरात्र ऋतु संधि के अनिवार्य तप है। 

(७) विशेष चमत्कार व मान्यताओ कही कही सत्य असत्य जनश्रुतियो, जनप्रमादो से अनेक क्षेत्रीय परंपराओं का जन्म भारत में हुआ। कईयों का उदय व विलोप हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में देखने को मिलता है, अनेक लोकदेवीयां व लोक परंपराएं है। उनके उद्भव का कारण लोगो की अपनी श्रद्धा या घटना मानी जाती है। आदी शंकराचार्य जी ने बौद्ध मत का खंडन किया वैसे शास्त्र से शुद्ध करके ही हमने खंडन करते हुए संस्कृति को विशुद्ध करना चाहिए। और उन सभी का मापदंड वेद है।

लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं

 तद्विरोधिषूदासीनता ॥

   - नारद भक्ति सुत्र / ११

अर्थ: - भक्त लोक और वेद के अनुकूल

आचरण करता है । इसके विरोधी आचरण

के प्रति वह उदासीन रहता है । अर्थात्

भक्त मर्यादाओं की रक्षा करता है ।

नवरात्र व्रत क्या है ?

      हमारा शरीर एक दुर्ग (किला ) है। इसमे रहने वाली शक्तियां दुर्गा है। दुर्गा अर्थात जो कठिनता (मुश्किल ) से वश में हो। हमारे शरीर में ऐसी नौ शक्तियां है जिन्हे वश करना कठिन होता है। वह नौ शक्तियां है पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (जीभ,नाक आँख ,कान और त्वचा ),मन ,बुद्धि ,चित्त एवं अहंकार। ये शक्तियां परमात्मा द्वारा दिया साधन है जिससे हम ईश्वर को प्राप्त कर सकते है। हमें इनके एक-एक करके व्रत करने चाहिए जिससे कि; इन्हे वश में करके ईश्वर का उपवास (समीपता) प्राप्त हो सके। यदि हम एक -एक करके पांचों इन्द्रियों वश करते हैं तो ही मन को वश में करने की शक्ति प्राप्त होती है। फिर बुद्धि और चित्त को वश में करके अन्त में हम अहंकार को पूर्णतः मिटाने की ओर बढ़ते है। 

(८) आराधना उपासना साधना के साधन नृत्य नही होते। वो मात्र कला होती है। पापो का शमन, ईश्वर प्राप्ति या ज्ञान प्राप्ति या पुण्य इनके साधन शम दम आदि षट संपत्ति व कर्म है। भक्ति है। उपासना व तप है। नृत्य से कोई ईश्वर की कृपा नही पाता और न ही नृत्य किन्ही देवी व देवताओं को प्रसन्न करता है। वो हमारे व दर्शको के मन को प्रसन्न करने वाला शरिर को व्यायाम देने वाला, एक तरह मर्म चिकित्सा (एक्युप्रेशर) भी है, शरिर को स्वस्थ रखने वाला अवश्य ही उत्तम कला के रूप में धार्मिक उत्सवों में मर्यादा भक्ति के साथ सम्मिलित होता है। 

(९) अतः इसतरह हम जानते हैं कि पुरे भारत में ये प्रचलित हो रहा है, टीवी सिनेमा व मिडिया इंटरनेट द्वारा हुआ प्रचार-प्रसार है। इसलिए ये प्रचलित होता जा रहा है...क्योंकि इसका कोई आध्यात्मिक व शास्त्रीय आधार भी नहीं है और नृत्य जैसी कला की वर्जना भी नहीं है। जिन वस्तुओं की शास्त्र मे वर्जना नही लिखी विवेक के आधार पर वे नियम भी बनाने होते हैं, जैसे मोबाइल फोन, गलत विन्यास आदि। वैसे ही आधुनिक वस्तुओं का समावेश भी विवेक के आधार पर होता है। जैसे लाउडस्पीकर। आधुनिक वाद्ययंत्र आदि। 

(१०) इसलिए गरबा नवरात्र में हर क्षेत्र में दृष्टिगोचर भी नहीं व यथार्थ मे अनिवार्य बिल्कुल भी नही। ये किसी प्राचीन ग्रंथ मे नही मिलेगा। अतः नृत्य होना चाहिए लेकिन देवी के उपासना के भाव से, अन्यथा नवरात्र का विकृतिकरण ही होगा। और पश्चात देवी को प्रसन्न करने के लिए मान्यता के अनुसार ये प्रचलित होता गया। 

(११) गरबा का विरोध यथा उद्देश्य नही अपितु गरबा के प्रचलन के आड मे जो हो रहा है उससे सचेत करना लेख का मुख्य प्रयोजन है। वो निम्नलिखित है :-

➡️ इसके प्रचलन से मूल स्वरूप का ह्रास व पर्व का विकृतिकरण हो रहा है। 

➡️ गलत अभद्र विन्यास अंगप्रदर्शन रंगों से अंगो पर देवी का चित्र उतारना नाचना आदि मामले आगे आए हैं। 

➡️ गायत्री साधना में दो अनिवार्य शर्त होती है जिनके खंडित होने से वो अनुष्ठान आध्यात्मिक उर्जा या अनुष्ठान विफल कहलाता है वे है - उपवास व ब्रह्मचर्य...

➡️ गरबा जैसे नृत्य जब अमर्यादित फुहडता धारण करते हैं तब वे अब्रह्मचर्य युक्त दुराचरण ही हो जाते हैं। इससे तो अच्छा इस नृत्य का आयोजन ही न करना ही आयोजन करने से अधिक श्रेयस्कर होगा।

➡️ स्मरण रहे। गरबा नवरात्र नही है। और ऐसा होने भी न दे। अन्यथा पर्व का विकृतीकरण ही है। 

(१२) इसलिए गरबा के बजाय यज्ञ और साधना का अधिक महत्व इस पर्व मे है। यज्ञ का वैज्ञानिक आध्यात्मिक धार्मिक नवरात्रीय प्रबल महत्त्व है, वो अनिवार्य कर्मकांड भी है। लेकिन गरबा ऐसे प्रचलन में लाया जा रहा है कि मूल नवरात्र का स्वरूप, धर्म अध्यात्मिक शास्त्रीय मूल स्वरूप का ही परित्याग हो रहा है एवं जो अनिवार्य नही उसे प्राथमिकता दी जा रही है।

(१३) अनिवार्य उपक्रमों को छोड़कर नचाने के लिए मुर्खतापूर्ण तरिके से आयोजन मंच समिति बन रही है। हम हाथ जोड़कर विनती करते हैं, जहा कभी गरबा नृत्य नही होता था कृपया वहा ये आयोजन न कराए। कराए भी तो हर रोज नही। और शालीनता हो तो कराए अन्यथा न कराना ही अधिक श्रेयस्कर है।

(१४) नवरात्र मे हवन तप (ब्रह्मचर्य ) जप, हवन, कन्याओं का भोज, कन्या पुजन, कन्या भोज, यज्ञ, दान , साधना, संध्या, सत्संग मे रामकथा आदि, गायत्री साधना,अहिंसा सात्विकता , स्तवन मे सप्तशती आदि शामिल करना, इनका अधिक महत्व रहा है। नृत्य आदि तो अनावश्यक व मनोरंजक तत्व भर है। उन्हें करना या न करना अनिवार्य नही होता । 

(हमारे क्षेत्र में अभी 1-2 वर्ष हुए गरबा हो रहा है। और मै तो यहां तक कहुंगा, जहा ये हो रहा है वहां इसको कम महत्व दिया जाए, या इसे बंद ही कर दिया जाए तो अति उत्तम है । और हमारे क्षेत्र में ऐसा ही है। लेकिन शहरो में इसे लेकर विकृतिकरण समाविष्ट हो रहा है। ) 

लेकिन इनको छोडकर, या इनको परित्याग कर, गरबा का आयोजन नवरात्र में करना गरबा को ही नवरात्र घोषित करने के भांति है । नाचना कोई आवश्यकता नहीं। कही कही तो महिलाओं को जबरन नाचने प्रेरित किया जा रहा है। हमने हर जगह नाचने का महत्व प्रस्थापित कर रखा है। भागवत कथा हो, रामकथा हो या नवरात्र, इनके अतिरिक्त विवाह जैसे धार्मिक संस्कार को तो दारू पार्टी व नाच-गाना ही बना दिया है। विकृतिकरण की कोई परिसीमा नही रही। इतना लिबरल अज्ञ होना ही सांस्कृतिक धार्मिक अधः पतन का कारण है। जो मर्यादा वश, लज्जावश कभी नही नाचते वो भी नाचे , मानो ये अनिवार्य हो ऐसा कदापि उचित नहीं है।

💥 ध्यातव्य : लेख का मन्तव्य गरबा के नवरात्र में मानो अनिवार्य हो इसप्रकार के प्रचलन वर्जित करना चाहिए यही है । साधना के पर्व मे मनोरंजन अधिक कि साधना तप ये विचारणीय है। अतः मिथ्या को अनिवार्य बनाकर व्यर्थ का प्रयोजन करना उचित नहीं है। यही हमारा अभिप्राय है। इतर राज्यों में गरबा इस कदर नवरात्र की पहचान बन रहा है मानो गरबा ही नवरात्र है, और यथार्थ नवरात्र ही नदारद। 

💥 इतिहास खंगालने पर स्पष्ट हो जाता है कि वो एक राज्य तक सिमित नृत्य प्रकार था जो अनेक उत्सवों में किया जाता था वह भी एक ट्रिब विशेष तक सिमित था । महाराष्ट्र के विदर्भ आदि व दक्षिण व पूर्व भारतीय कयी राज्यों प्रदेशों क्षेत्रों में गरबा नही होता था व अब ऐसे अनेक क्षेत्र है जहां नही होता । विशेषतः ग्राम्य अंचलों मे। नवरात्र में हमारे क्षेत्र में एक गांव वह स्थान पर पहली बार सन 2022 मे मात्र एक मंदिर मे आयोजन हुआ था। हमारे गांवों के अंचलों मे पिछले कुछ वर्षों में ही ये आयातित हुआ है। गरबा आज भी गुजरात इधर छोड़कर 60% + गांवो व अंचलों मे नही होता, यह बडे-बडे शहरो मे प्रचलित है व अर्वाचीन है। 

💥 अतः ऐसे पर्व मे नृत्य की तय्यारी गुजरात से आयातित करना... क्या सभी को अनिवार्य है? जिन्हे ये पसंद हो वे कम से कम मर्यादित होकर करे। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा सर्वत्र नहीं हो रहा है।

अनिवार्य व मूल स्वरूप क्या है? क्या उसमे जोडा जा रहा है? सामयिक चिंतन करे। यदि इसमे समाज न चेते तो -? 

💥 परिणामस्वरूप : नवरात्र एक दिन नाच गाने का पर्व बनकर रह जावेगा । क्योंकि वहां फिल्मी गाने पर भी नाच है, ऐसा होते-होते ही विकृतिकरण होता है...नवरात्र अपना मूल स्वरूप पुरी तरह खोकर एक, अंगप्रदर्शन व नचनीयां बनने का पर्व बन जाएगा।

नवरात्र में - सर्वत्र आजतक सत्संग जप तप सार्वजनिक भजन किर्तन (जगराता), यज्ञ कन्या भोज ब्रह्मचर्यं उपवास उपासना साधना संध्या स्वाध्याय, देवी की विभूतियों शक्ति धाराओं को आत्मसात करने का प्रयास करना नवरात्र का मूल स्वरूप कहलाता रहा। आज इन सभी को दूर रख कही कही तो गरबा ही नवरात्र बन गया है। यह अंतर्मन में पिडादायक ही है। 

अतः गरबा को अनिवार्य न माने, गरबा नृत्य को इतना महत्व न दिया जाए। व शालीनता से नवरात्र को शक्ति आराधना के मूल पर्व को आत्मसात किया जाए। जय वेदमाता 🙏🚩

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ओम् भूर् भुवः स्वः।

तत् सवितुर्वरेण्यं।

भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

गायत्री मन्त्र की हम तीन प्रकार से साधना कर सकते हैं। प्रथम मन्त्र जप करके उसके एक एक शब्द के अर्थ की भावना ईश्वर प्रणिधानपूर्वक करें। दूसरे प्रकार में गायत्री मन्त्र के तीन चरणों का भाव रूप में ध्यान करें। तीसरा प्रकार है गायत्री मन्त्र पर जो प्रचलित पद्यानुवाद उपलब्ध हैं उनका मन्त्रपाठ के उपरान्त गान करें।

ओम् इस पद का अर्थ पूर्व लिख आए। भूः, भुवः और स्व ये तीन महाव्याहृतियां कहाती हैं। इनकी पृथक् से साधना विधि भी पूर्व वर्णन की है तैत्तिरीय उपनिषद में भू को प्राण, भुवः को अपान तथा स्व को व्यान नाम से कहा गया है। भूः = ईश्वर प्राणों के माध्यम से सकल जगत के जीने का हेतु होने से प्राणों से भी प्रिय है। भुवः = ईश्वर मुक्ति की इच्छा करनेवाले मुमुक्षुओं, मुक्तों और अपने सेवक धर्मात्माओं को सब दुःखों से अलग करनेवाला होने से अपान कहाता है। तथा स्वः = स्वयं आनन्दस्वरूप तथा अपने उपासकों को आनन्ददाता ईश्वर जो सब जगत में व्यापक होके सबको नियमों में रखता सबका आधार है ज्ञान नाम से कहता है।

अब गायत्री मन्त्र का संक्षेप से अ्थ लिखते हैं- तत् = उस सवितुः = (सविता के) ईश्वर को सकल जगत का उत्पादक, सूर्यादि का प्रकाशक तथा समग्र ऐश्वर्यदाता होने से सविता कहते हैं। वरेण्यम् = ईश्वर सर्वश्रेष्ठ होने से वरण करने योग्य है भर्गः = ईश्वर के क्लेशनाशक तेज को भर्ग कहते हैं जो शुद्ध विज्ञान स्वरूप है। देवस्य (देव का) जो आत्माओं में प्रकाश करनेहारा शुद्ध पवित्रस्वरूप है उस ईश्वर के दिव्य तेज का धीमहि = हम ध्यान करते हैं, उसे अपने आत्मा में धारण करते हैं। यः = हे परमात्मा, नः = हम सबकी, धियः = बुद्धियों को, प्रचोदयात = सकल बुराइयों से हटाकर सन्मार्ग में सदा प्रेरित करे।

💥 ओम् भूर्भुवः स्वः।(तीन महाव्याहृति यों का ध्यान)

 हमारे अस्तित्व के तीन मुख्य भाग हैं। स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण । इनका सम्बन्ध भूः, भुवः तथा स्वः इन तीनों महाव्याहृतियों से क्रमशः होता है। भूमि अस्तित्व बाहरी स्थूल काया है जो पार्थीव नाम से भी कही जाती है, जो पंच स्थूल भूतों से निर्मित है आयुर्वेद के अनुसार ये अन्न-रसमय है अर्थात् अन्न- रस- रक्त- मांस- मेद- अस्थि- मज्जा- शुक्रमय है। जीव के जाति एवं लिंग का निर्धारण इसी में होता है जन्म से मृत्यु पर्यन्त एक सी बनी रहे उसे जाति कहते हैं, जैसे मनुष्य, पशु, पक्षी आदि। इसी प्रकार पुरुष स्त्री या नपुंसकलिंग निर्धारण भूमय अस्तित्व का ही विषय है। हर जाति के लिए औसतन आय निर्धारण भी अलग-अलग होती है। जैसे मनुष्य जीवन की औसतन आय शत वर्ष की मानी गई है जो घटायी या निश्चित सीमा तक बढ़ायी भी जा सकती है।

भूमय अस्तित्व में ईश्वर निरन्तर प्राणों के माध्यम से हमारी रक्षा कर रहे हैं। प्राणों के कारण से ही शरीर में जीवन के लक्षण होते हैं। हम जानें या न जाने प्रत्यक्ष रूप से सर्वव्यापक होकर ईश्वर ही हमारे शरीर में सतत अनेकों प्रकार की सेवाएं हमें दे रहे हैं। जैसे आंख, कान आदि इन्द्रियों से देखना, सुनना, दिमाग द्वारा सूचना, हृदय का धडकना, समूचे शरीर में रक्त-संचार का होना, शरीर में पाचक रसों का उत्पन्न होना, खाए-पीए अन्न-पान का पाचन होकर उपरोक्त रसादि सप्त धातुओं का निर्माण एवं शरीर में सुवितरण होना, शरीर में उत्पन्न त्याज्य अपशेष का शरीर से बाहर निकालने की व्यवस्था आदि आदि असंख्य प्रकार से ईश्वर की सेवाएं हमें इस भूमय अस्तित्व में निरन्तर प्राप्त हो रही हैं।

 ओम् भूः इस जप के माध्यम से हम ईश्वर प्रणिधान पूर्वक उसके द्वारा प्राप्त सेवाओं को याद करते, उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हैं तथा धर्मार्थकाममोक्ष के प्रमुख साधन रूप इस भूमय स्थूल अस्तित्व को ताउम्र स्वस्थ निरोग बनाए रखने हेतु संकल्प भी करते हैं।

भुवःमय हमारा सूक्ष्म अस्तित्व है जो आंखों से दिखायी नहीं देता। इसमें अन्तःकरण चतुष्टय तथा दस इन्द्रियां प्रमुख हैं। मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार इन चारों के समुच्चय को अन्तःकरण चतुष्टय कहते हैं। सुनने, देखने, सूंघने, चखने तथा छूने की शक्ति ज्ञानेन्द्रियां हैं। इनसे क्रमशः शब्द, रूप, गन्ध, रस तथा स्पर्श इन पांच विषयों का ग्रहण या प्रत्यक्ष होता है। इन इन्द्रियों के भूमय स्थूल अस्तित्व में क्रमशः कान, आंख, नासिका, जिहा तथा त्वचा ये गोलक होते हैं। इसी प्रकार वाक्, पाद, पाणि, पायु, उपस्थ ये पंच कर्मेन्द्रियां हैं। वाणी से बोलना, पैरों से गमनागमन, हाथों से कर्म, पायु मल अपशेष त्याग तथा उपस्थ प्रजनन एवं जल अपशेष (मूत्र) त्याग हेतु प्रयुक्त होते हैं। बुद्धि से निर्णय लेना, मन से संकल्प-विकल्प, अहंकार से शरीर में रहते अपने होने का बोध तथा चित्त में जन्म-जन्मान्तर के कर्म एवं संस्कार पड़े रहते हैं।

यह भुवःमय सूक्ष्म अस्तित्व हर जीव को आदि सृष्टि में परमात्मा निर्माण करके देते हैं। जीवात्मा सृष्टि के अन्त तक अथवा मुक्ति पर्यन्त लगातार इसी भुवःमय सूक्ष्म शरीर से विभिन्न स्थूल शरीरों को पाकर कार्य करता अर्थात् इसकी अधिकतम आयुमर्यादा चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष याने एक ब्रह्मदिवस अर्थात् सृष्टि काल जितना होता है। इस को हम इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि स्थूल शरीर के नष्ट हो जाने पर भी यह चलती सृष्टि में बीच में नष्ट नहीं होता। जब जीव मनुष्य योनि को पाकर अपनी अविद्या हटाकर समाधि लगाकर अपना तथा ईश्वर का साक्षात्कार कर संस्कारों का क्षय कर देगा तथा निष्काम कर्मों द्वारा मुक्ति की योग्यता अर्जित कर लेगा तो जीव का सृष्टि में पुनर्जन्म न हो सकने की स्थिति में यह भूवःमय सूक्ष्म शरीर भी नष्ट हो जाएगा।

 ओम् भुवः इस जप के माध्यम से हम जन्म-जन्मान्तरों से संचित विद्या को हटाने हेतु ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। ईश्वर का नाम भी भुवः जो हमें सब प्रकार के दुःखों से छुड़ाते हैं। इन्द्रिय दोष एवं संस्कार दोष से पुष्ट होती है। हम अपने अंतःकरण की शुद्धि हेतु ईश्वर की पवित्रता को धारण करते हैं तथा विवेक के माध्यम से शुद्ध ज्ञान भी अर्जित करते हैं। शुद्ध ज्ञान को आधार बनाकर कर्मों को भी शुद्ध करते जाते हैं। इस स्तर में ईश्वर प्रणिधान पूर्वक बुद्धि की निर्मलता तथा इन्द्रियों की धर्माचरण में दृढ़ता हेतु प्रार्थना की जाती है।

 स्वःमय हमारा अस्तित्व कारणमय है। इसमें तीनों अनादि पदार्थ आ जाते हैं। ईश्वर-जीव-प्रकृति तीनों ही अनादि पदार्थ अव्यक्त हैं। इनमें ईश्वर एवं जीव दानों ही चेतन तथा प्रकृति जड़ पदार्थ है तीनों ही अनादि अनुत्पन्न नित्य पदार्थ हैं। सत्त्व-रज-तमोमय प्रकृति रूपी कारण शरीर सब जीवों के लिए एक समान विभू है। अर्थात् प्रकृति के तीनों कण संसार के हर पदार्थ में होते हैं। ईश्वर का जीवों के साथ नित्य सम्बन्ध है। पर अविद्या के प्रभाव से जीव ने ईश्वर को भुला सा दिया है। शरीर के माध्यम से उत्पन्न होनेवाले सारे सम्बन्ध अनित्य हैं, संयोग-वियोगान्त होने से विनाशशील हैं। पर अविद्या के प्रभाव में जीव की सारी चेष्टा इन अस्थायी सम्बन्धों को स्थायी मानने एवं बनाए रखने की है।

  ओम् स्वः इस जप के माध्यम से ईश्वर की सन्निकटता को अनुभव करने का हम प्रयास करते हैं। विनाशशील संसार और सांसारिक सम्बन्धों की यथार्थता को समझते ईश्वर के अपने साथ नित्य सम्बन्धों के संस्कार बनाते जाते हैं। उपासना योग से ईश्वर प्रणिधान सिद्ध करते व्यवहार काल में भी ईश्वर की उपस्थिति को स्मृतिपथ में बनाए रखने का संकल्प करते हैं।

जय वेदमाता 🙏🚩

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