नर व नारीवाद मे सनातनी की भूमिका पर विमर्श...

 हम सत्य के कसौटी पर सोचने वाले बने। किसी भी सनातनी को स्वयं को न तो नारीवादी कहना चाहिए न ही पुरूषवादी। मानवतावादी न्यायवादी सत्यवादी बनो अर्थात् तर्क तथ्य वेद के कसौटी पर समाज को कसो। सनातन धर्मवादी बनने के अंतर्गत ही दोनो का कल्याण है। महिला पुरुष महिला पुरूष मे हमे वामपंथी उलझा रहे हैं। हमारे यहां ऐसा लिंगवाद न था, न होना चाहिए । प्रकृति ने दोनो को ही भिन्न-भिन्न बनाया है। दोनो के प्रकृति के अनुरूप न्युट्रल (प्राकृतिक व निष्पक्ष) समाज की स्थापना वैदिक ऋषि मनीषीयो ने की है... या ईश्वर ने हमे वेद के माध्यम से जो व्यवस्था दी है वही शाश्वत है।

हालांकि ज्योति जी काम करती है, वामपंथियों से बचाती है, मार्गदर्शक है... रही बात वामपंथ की तो उसका एजेंडा है एथेस्ट, एथेस्ट यानी नास्तिकवाद से हमे परिवार बचाते हैं इसलिए वे परिवार खत्म करने का एजेंडा चलाए हुए हैं, दुसरी ओर मार्केट भी यही चाहता है, रही कसर अब्राह्मीक मजहब पुरी कर देते हैं, ज्यूडिशरी मे बैठे कम्युनिस्ट विवाह संस्था को बलात्कार के अंतर्गत लाना व खत्म करना चाहते हैं। तो ये देखकर मन भर जाता है कि कितने शत्रु है 800 वर्ष से संघर्षरत इस भग्न सनातन सभ्यता के.. ऊपर से हिंदू वर्ग मे मुर्ख व भोले लोगों की कमी नहीं है। जो इन सब से कोसो दुर असाधारण अनभिज्ञ होते हुए शत्रु को नही पहचानते। 

ये वामपंथी , छद्म नारीवादी जो नारी की शोषक है न कि पोषक। यथार्थ मे ये समाज में फुट डालने के एजेंडे में है। इनका एजेंडा है कि भारतीय परिवार खत्म करो और लोगो को स्टेट पर निर्भर करो। वामपंथ का लक्ष्य है ये। क्योंकि यही तो वामपंथी शैली रही है। अभी वो इसी पीच पर खेला कर रहे हैं।

वामपंथ की आलोचना आंबेडकर ने बडे विस्तार से की है। कम्युनिस्ट कैसे होते हैं वो लिखा है।


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