श्रृंगार के नाम पर साहित्यिक अश्लीलता स्वीकार योग्य नहीं..
वेदवेदांत उपनिषदों के अत्यंत प्राचीन काल एवं मध्यकालीन एवं फिर कलि संवत् से परवर्ती काल ऐसे विभाजन मे साहित्य को देखा जावे और कलिकाल मे भी कालीदास जो कि विवादास्पद पात्र है,जो चार व्यक्तियों के मध्य भ्रमण करता हुआ भ्रम उत्पन्न करता है, उन चार कालीदास को एक ही कालीदास बनाकर बहुलतम लोग सारा साहित्य कालीदास कृत मानते हैं, उन कालीदास का समय, फिर ग्यारहवीं शताब्दी विक्रम से लेकर चौदहवी शताब्दी विक्रम पर्यंत भक्ति कालीन साहित्य... इनमे संस्कृत साहित्य में बहोत कुछ बिगड़ा, बहोत कुछ बना...
इन दिनो जो प्रक्षेप हुए उनमे अभावपूर्ति के लिए जो हुए वो अच्छे थे जैसे चिकित्सा संबंधी पांडुलिपियों या ग्रंथों में, पौराणिक विवरण में जो हुए वो अश्लील न तो श्रृंगार रस है न पद्य है, वो केवल घृणित क्षेपक ही है जो वाममार्ग के अस्तित्व व विदेशी हस्तक्षेप व विकृतिकरण का सूचक है...
क्योंकि ग्यारहवीं शताब्दी में संस्कृताचार्य एक महानतम कवि राजर्षि भोज के समय उनका साहित्य सभी अलंकारों से भरा होनेपर भी आदर्श ही है.. वहां स्वयं उनके हाथो कोई ऐसा काम नहीं हुआ... जिन्होने गलत किया उनके हाथ छेदभेद दिए... उन्होंने चंपू रामायण लिखी... पांच कांड में पूर्ण किया, बाद में उत्तरकांड कुछ कवियों ने जोड दिया, उत्तरकांड विवाद पर लोग कहेंगे कालीदास से ऐसी भूल कैसे हो सकती है? कालीदास से बहोत बडी भूल हुई है, इतनी गुरू कि बताने भी लज्जा आती है, वो मर्यादा जो ग्यारहवीं शताब्दी के राजा भोज अपने रामायण में पालन करते हुए चलते हैं, उसे इन्ही महान कवि कालिदास ने भंग किया, कुमारसम्भव मे... कुमारसंभव मे श्रृंगार के नामपर "____" अश्लीलता के साथ वर्णन हो अथवा भारतमाता शकुंतला का सेक्स ओबजेक्ट के रूप में चित्रण दोनो ही भूल महाकवि कालिदास के ही लेखनी का अंश थी। फिर उत्तरकांड जैसी मूल एक कवि जो कि मणुष्य है क्यो न हो? विमर्श तो हम ऐसे करते हैं जैसे कालीदास ईश्वर थे। कालीदास की आलोचना परवर्ती संस्कृत विद्वानों ने की भी है, हम कौन होते हैं, कवि "आनन्दवर्धन" सरीख कितनी ही और टिप्पणीयां रही हो, भारतीय संस्कृत साहित्य जो आज उपलब्ध हैं वह उसके तुलना में थोडा है जो कालातीत हो गया, जो राख हो गया... सृष्टि कितने ही बार बनी व बनेगी, कितने ही कवि कितने ही महापंडित हुए होंगे, उनकी किर्ति अपकीर्ति पांडित्य से अधिक कर्म पर निर्भर करती है... हिंदी के महाकवि तुलसीदास की अभिव्यक्ति मे कहे तो माता-पिता का कथित श्रृंगार वर्णन नहीं किया जाता है। कितना प्रकृष्ट कटाक्ष है।
आज हम भारतीय जन, कालीदास हो या भवभूती, कौन कैसा था ये सब हिन्दी अनुवाद मे उनपर जो कुछ उपलब्ध हैं उसी से उन्हे जानते है.. संस्कृत मे उनके साहित्य को पढकर नही... क्योंकि संस्कृत आती है नहीं... कोई गलत बात इसलिए मान्य नहीं हो सकती कि वो मध्ययुगीन वा प्राचीन काल में हो गयी या तब से चली आ रही है... 'य:तर्केण अनुसंधत्ते स धर्मं वेद न इतर:'
वैदिक साहित्य में सबकुछ आदर्श है, वहा नारी का कोई कथित श्रृंगार के नामपर भोग्या के रूप में वर्णन नही.. मध्यकालीन वर्णन अनुचित है और सदैव रहेंगे... वर्तमान में हमे उसी वैदिक काल के पथ प्रदर्शन पर पुनः चलना होगा क्योंकि -
वेदोअखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्। आचारश्चैव साधुनामात्मनस्तुष्टिरेव च।। (मनु स्मृति 2/6)
अर्थात चारों वेद और वेदवेत्ताओं द्वारा रचित वेदानुकूल समृतियाँ या धर्मशास्त्र तथा उनका श्रेष्ठ स्वभाव, सत्पुरुषों का श्रेष्ठ आचरण, अपने आत्मा की प्रसन्नता अर्थात जिस कार्य के करने में भय, शंका, लज्जा न हो, जहाँ आत्मा को प्रसन्नता अनुभव हो यह धर्म के मूल और आधार है।
कालीदास रूपी अपवाद एवं पौराणिक अश्लीलता को छोड़ दिया जावे, मध्यकालीन वाममार्ग (बलिप्रथा, पंचमकार, नग्न नक्काशी, विधर्मी क्षेपक आदि) छोड़ दिया जाए जिसे सामान्यतः भारतीय जनमानस ने निष्कासित किया, वो टिक न सका, ऐसा वो वाममार्ग जो तत्कालीन समय समाज से दूर अल्पमात्रा मे छिपते छिपाते चलता रहा, जिसका अस्तित्व समाज पर तब हावी होने से समय समय पर, धर्म सुधारक हुए भी... किंतु वर्तमान स्थिति में जो चौदहवी पंद्रहवीं शताब्दी वा मध्ययुगीन अवांछनीय वाम अवधारणा को आधार बनाकर एवं विधर्मी हस्तक्षेपो से अमर्यादित जो कुछ अब तक या जो कुछ अब नये तौर पर हो रहा है वो ठिक करना आवश्यक है, हिंदू समाज इन चिजो को मुर्खतापूर्ण तरीके से स्वयं ही ढो रहा है।


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