ओशो मत खंडनम्....
लम्पट ओशो का कहना है कि बहोत ज्यादा रतिक्रिया का भोग होने से उसके प्रति अनिच्छा उत्पन्न होगी और इस तात्कालिक अनिच्छा को वो वासना पर विजय बताते हुए कहता है कि यही ब्रह्मचर्य भी सध गया। लेकिन ये कथन नितान्त असत्य बचकाना व हास्यास्पद है। एक दिन बहोत मिष्ठान्न खा लेने से क्या मिष्ठान्न खाने की इच्छा समाप्त हो जाएगी? ओशो जो है क्षणिक व स्वाभाविक इंद्रिय दुर्बलता वा नपुंसकता को वासना पर विजय बता गया। जबकि ऐसी अवस्था में भी मन की इच्छा होती ही है। मन सोचता है जब मेरा शरीर ठीक होगा तो अमुक भोग उपभोग करूंगा।
चलिए शास्त्र आदि प्रमाण से व दर्शन से ओशो के मत का अब खंडन करते हैं -
राजर्षि भर्तुहरी कहते हैं - भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः... तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥ (वैराग्यशतक-७)
अर्थात् भोगो को हमने नही भोगा, भोगो ने ही हमे भोग लिया। इन सभी के बाद भी हमारी कुछ पाने की तृष्णा जीर्ण नही हुयीं अपितु हम स्वयं जीर्ण हो गये।
राजा ययाति की कथा महाभारत में प्रसिद्ध है कि निरंतर भोगो को भोगा लेकिन संतुष्ट कभी नहीं हुआ। नया शरिर धारण करके कायाकल्प करके भोग भोगा फिर भी संतुष्ट न हुआ। अंततः तप द्वारा ही मन पर वासना पर संयम रखने मे ही विनय विवेक द्वारा आत्मानंद की सुख की प्राप्ति होती है। ये उसका सार है।
महर्षि पतंजलि कृत योगसुत्र का प्रमाण :
वासना का अभाव कैसे करें वो पतंजलि योगदर्शन मे देखने मिलता है। उन्होंने वासना के अभाव का सूत्र दिया है।
हेतुफलाश्रयालंबनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः ॥ ४/११ ॥
[[शब्दार्थ – हेतुफलाश्रयालंबनैः = हेतु , फल , आश्रय और आलंबन - इनसे ; संगृहीतत्वात् = वासनाओं का संग्रह होता है , इसलिए ; एषाम् इन ( चारों ) का ; अभावे अभाव होने से ; तदभावः = उन ( वासनाओं ) का भी ( सर्वथा ) अभाव हो जाता है । यह वासनाओं के अभाव का सूत्र है ...]]
अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोगों की प्रगाढ़ता और परिपक्वता के परिणाम में विवेकज्ञान का उदय संभव होता है । इसके प्रभाव व प्रकाश में , वासनाएँ तिरोहित होती हैं । जब तक ऐसा नहीं होता , तब तक वासनाएँ चित्त में संगृहीत रहती हैं । क्लेशों का मूल कारण अविद्या है , उसी तरह वासनाओं का मूल कारण भी यही है । अविद्या के नाश होने पर ही वासनाओं के हेतु का नष्ट होना संभव है । यदि जन्म , आयु व भोग के प्रवाह को विराम मिलता है , तो वासनाओं व कर्म को भी विराम मिलना चाहिए । सार यही यह है कि विवेकज्ञान का प्रभाव व प्रकाश बढ़ेगा तो स्वतः ही अविद्या प्रभावहीन हो जाएगी और तब हम वासनाओं के प्रभाव से मुक्त हो सकेंगे ।
महाभारत का प्रमाण :
न जातु काम : कामानाम् उपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ।।
~ महाभारत , आदि पर्व - ७५/५०
अर्थात् विषय भोग की इच्छा विषयों का उपभोग करने से कभी शान्त नहीं हो सकती । घी की आहुति डालने से अधिक प्रज्वलित होनेवाली आग की भांति वह और भी बढ़ती जाती है । (मूलतः यह भगवान मनु का कथन है।)
 |
| पथभ्रष्ट ओशो का मत खंडन |
भगवान मनु का कथन :
न जातु काम : कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते ।
~ महर्षि मनु ( मनुस्मृति- २.९४ )
काम , काम के उपभोग से शान्त नहीं होता , अपितु अग्नि में जैसे घृत ( घी ) डालने से अग्नि तीव्र होती है , वैसे ही भोगों को भोगने से वासनाएँ और अधिक बढ़ जाती हैं ।
इस तरह वासना का अभाव होता है न कि व्यभिचारी ओशो के अनुसार वासना के अति भोग से उसका अभाव होगा। ये भी कोई तर्क था ओशो का? कितना हास्यास्पद है। अतः ओशो मन तक भी नहीं पहुंच पाया। वो सिर्फ इंद्रियों की अति भोग से उत्पन्न temporary वैराग्य वा अनिच्छा को ही यथार्थ वैराग्य मान बैठा। ऐसा कथित वैराग्य तो श्मशानघाट पर, रतिक्रिया के पश्चात, ज्वर रोगादि मे भी होता है। आचार्य चाणक्य ने भी कहा है कि बुढी होने पर कोई भी पतिव्रता हो जावे वा रोगी होने पर ईश्वरभक्त होवे तो क्या आश्चर्य। असल भक्ति व पतिव्रत तो क्रमशः निरोगता व जवानी में हो तो कुछ बात है। अतः वैसे ही वीर्यवान बलवान् होकर चेतना को ऊर्ध्व कर ब्रह्मचर्य का पालन करना, इंद्रिय निग्रह करना ही ब्रह्मचर्य है, ऐसे वीर्यवान होकर वैराग्य को धारण करना ही तो यथार्थ वैराग्य है। क्षणिक सुख व वैराग्य यथार्थ सुख व वैराग्य नही हो सकते।
फ्रायड का मत ७० के दशक में ही वैज्ञानिक धरातल पर खंडित हो चुका है। अब तक तो सैकड़ों वैज्ञानिक प्रमाण और हो चुके हैं। उसी मत को आधार बनाकर ओशो नामक व्यभिचारी ने अपनी दुकान चलाई।
फ्रायड का मत व उसका वैज्ञानिक दार्शनिक धरातल पर खंडन :
💥 नीचे प्रस्तुत लेख १९७० की पत्रिका अखंड ज्योति का है जिसमे लिखा है -
एक समय था जब फ्रायड ने काम - वासना संबंधी सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुये लिखा था- ' मनुष्य शरीर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष कामुकता की भाप वाला इंजन है । इंजन से जब तक भाप निकलती रहती है तब तक उसे कोई खतरा नहीं रहता पर यदि भाप का निकलना रोक दिया जाये तो इंजन में विस्फोट हो सकता है , वह नष्ट - भ्रष्ट हो सकता है ।
इस सिद्धांत की पुष्टि में फ्रायड ने कई चिड़चिड़े , उद्विग्न , अपराध भावना वाले लोगों की चर्चा की और बताया कि उनकी कामेच्छा को फलीभूत होने का अवसर नहीं मिला , उसी के फलस्वरूप उनमें यह मानसिक विकार उत्पन्न हुये । उन्होंने इस सिद्धांत को बहुत बढ़ा - चढ़ाकर दिखाया और यहाँ तक दलील दे डाली यदि मनुष्य को अपनी काम - वासना की तृप्ति के लिये अवसर नहीं दिया गया तो उसकी प्रवृत्ति हिंसक और समाज विरोधी तक हो सकती है , उससे युद्धों तक की नौबत आ सकती है । '
फ्रायड के अनुयाइयों के प्रचार का परिणाम यह हुआ कि जीवनी शक्ति से संबंधित ' काम भावना ' को पाश्चात्य देशों में नग्न रूप दे दिया गया । आज की सामाजिक विच्छृंखलतायें , विषमतायें , पश्चिमी देशों में बढ़ रहे रोग - शोक और अपराधी मनोवृत्ति उसी का परिणाम हैं । संघर्षपूर्ण सामाजिक परिस्थितियों ने एक बार फिर से मनोवैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों का ध्यान इस ओर खींचा और तब एक नई परिकल्पना को जन्म मिला कि काम - वासना इंजन में भाप जैसी शक्ति तो है पर उसे व्यर्थ नष्ट करने से तो जीवन के मूल स्रोतों के पतन होने की संभावनायें बढ़ जाती है । यदि उस शक्ति को ऊर्ध्वगामी या नियंत्रित उपयोग की दिशा में लगा दिया जाता है तो उससे इंजन से हजारों टन ढोने की क्षमता आ जाती है । भाप निकाला हुआ इंजन तो बेचारा अपना भी भार नहीं ढो सकता ।
फ्रायड की दलील का जितना समर्थन हुआ उससे अधिक विरोध और अब लंदन के एक अन्य मनोविज्ञान शास्त्री ने तो इस सिद्धांत की नींव ही हिला कर रख दी । लिसैस्टर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्राध्यापक श्री डेविड राइट ने अनेक बन्दी - शिविरों , फौजी संस्थानों , खेल - कूद और पर्वतारोहण जैसी सामाजिक सामुदायिक और राष्ट्रीय संधि के कार्यों में भाग लेने वालों के जीवन का विस्तृत अध्ययन करने के बाद पाया कि उनमें से अधिकाँश सामान्य परिस्थितियों में ही संभोग का आनन्द लेते रहे । उन्हें अपने अभियान अथवा उसके बाद विषय - भोग की कभी भी इच्छा नहीं होती जब तक कि वे या तो स्वयं भूतकालीन संभोग का स्मरण नहीं करते या उनके सामने इस तरह की चर्चा के विषय नहीं आते । यदि वे इच्छा न करें अथवा उनके सामने कामुकता भड़काने वाली प्रवृत्तियाँ न आयें तो वे काम वासना के लिये कभी परेशान नहीं होंगे वरन् उनमें मनोविनोद और आह्लाद के स्वभाव का विकास ही होने लगता है । श्री डैविड राइट ने द्वितीय महायुद्ध के दौरान बन्दी बनाये गये जापानियों , साइबेरिया शिविर में बंदी लोगों तथा अस्पतालों के उन लोगों से जाकर भेंट की जो लंबे समय से किसी बीमारी से आक्राँत पड़े थे । उनसे बातचीत करते समय उन्होंने पाया कि उनमें काम - वासना की कोई इच्छा नहीं रह गई थी तो भी वे तो अशाँत थे , न उद्विग्न वरन् उनके अन्तःकरण से एक प्रकार की शाँति और आत्म - विश्वास की झलक देखने को मिलती थी । यह आत्म - विश्वास अच्छे अर्थों में था- कि यदि इन परिस्थितियों से मुक्ति मिले तो अमुक - अमुक अच्छे काम करे । '
श्री डैविड राइट के इस कथन की और भी पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मिल जाती है और इस तरह फ्राइड के सिद्धांत का लगभग अन्त ही हो जाता है । आने वाले समय में लोग फ्रायड के सिद्धांत को तूल देकर अपना न तो मस्तिष्क खराब करेंगे और न शरीर की शक्तियाँ बरबाद करेंगे वरन् शक्तियों के संचय से जीवन की अनेक ऐसी धाराओं का विकास करने में समर्थ हों , जिनका संबंध आध्यात्मिक तत्वों से है और जो यथार्थ में मनुष्य के लक्ष्य हैं । ईश्वर , आत्मा , परलोक , पुनर्जन्म जैसे आध्यात्मिक सत्यों की शोध में ब्रह्मचर्य सबसे अधिक सहायक है । आगे की पीढ़ी का ध्यान ब्रह्मचर्य द्वारा शक्ति संयम और उससे जीवन की प्रसन्नता के लिये नई - नई विधाओं की खोज की ओर कहीं अधिक होगा ।
मेरीलैण्ड ( अमरीका ) के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ चाइल्ड हेल्थ एण्ड ह्यूमन डेवलपमेंट ( अमरीका की एक राष्ट्रीय संस्था जो बच्चों के स्वास्थ्य और मानव विकास की आवश्यकताओं की शोध और शिक्षण करती है ) ने एक खोज में बताया कि मनुष्य शरीर की कोशिकाओं में गुणसूत्रों ( क्रोमोसोम्स - अर्थात् व्यक्ति के शरीर स्वभाव आदि का निर्धारण करने वाले तत्व ) के तेईस जोड़े रहते हैं । प्रत्येक जोड़े में 1 गुण सूत्र पिता का एक माता का होता है । 22 जोड़े ऐसे होते हैं जिनका काम - वासना संबंधी गुणों व विकास से कोई संबंध नहीं होता । अधिकतम 1 ही जोड़ा काम - वासना का रहता है इसी से काम - वासना की प्रवृत्ति का व्यक्ति में निर्धारण होता है किन्तु कुछ मामलों में यह भी देखा गया कि उस एक जोड़े में भी एक गुणसूत्र या तो माता की ओर का या पिता की ओर का था ही नहीं सारे 23 समूहों में केवल एक ही गुणसूत्र था । ऐसे व्यक्तियों में सेक्स अंगों का विकास तो असामान्य होता है किन्तु उनके स्वभाव में काम - वासना संबंधी कोई विशेष रुचि नहीं होती वरन् कई बातों में असाधारण प्रतिभा वाले सिद्ध हुये । बेशक ! कुछ एक ऐसे भी उदाहरण आये जबकि बाईस जोड़े अलिंगी गुणसूत्रों ( आटोसपल क्रोमोसोम ) की जगह 21 जोड़े ही रह गये शेष दो में से 1 तो पूरा ही जोड़ा काम संबंधी गुणसूत्र का था जबकि दूसरे में भी एक गुणसूत्र काम - वासना वाला था । वैज्ञानिकों ने पाया कि इस अतिरिक्त काम वासना के गुणसूत्र वाले सभी व्यक्ति लम्पट , क्रोधी , असामाजिक और खूँखार थे ।
तात्पर्य यह कि काम - वासना पर नियंत्रण न होना व्यक्ति के लिये सुविधा का नहीं पतन का ही कारण हो सकता है । फ्रायड के कामशास्त्र को काटने के लिये इतनी उपलब्धि काफी है पर संभवतः आगे के प्रयोग इस दिशा में और भी प्रभाव डालेंगे और ब्रह्मचर्य की महत्ता के वैज्ञानिक प्रमाण ढूंढ़ निकालेंगे । [[#संदर्भ : (akhandjyoti/1970/November)]]
इस प्रकार फ्रायड मत ओशो दोनो वैज्ञानिक धरातल पर नहीं टिकते। वे अब्रह्मचर्य का अवैज्ञानिक मत चलाए वो वैज्ञानिक धरातल पर ब्रह्मचर्य के दृष्टिकोण में भी निपट मुर्ख असत्य व हानिकारक सिद्ध होता है। चिकित्सा शास्त्र आयुर्वेद तो जीवन के तीन आधार स्तंभ आहार, निद्रा व ब्रह्मचर्य को मानता है।
अमेरिका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. बेनिडिक्ट लस्टा का कथन है - "पशु अंश जब तक मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा करता है, तब तक वह मनुष्य विशेष महत्वपूर्ण का कार्य कर सकता है।" प्रो0 रावसन ने सम्मति दी है - "ब्रह्मचारी की बुद्धि कुशाग्र और विशद होती है, उनकी वाणी मोहक होती है, उनकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है, उनका स्वभाव आनंदी और जोशीला होता है।"
💥 आत्मव्यभिचार से सावधान....
ओशो आदि के व्यभिचार वादी मत बच्चों के लिए व वयस्कों के लिए भ्रम व खतरनाक है। जानिएं अब्रह्मचर्य आत्मव्यभिचार का परिणाम या दुष्प्रभाव :
( इन दिनों मिडिया वेबसाइट, शोशल प्लैटफॉर्म, ott,
film, साहित्य एवं श्रृंखला सब के द्वारा आत्मव्यभिचार
मे कोई हानी नही है ऐसा नेरेटिव किशोर नवयुवकों व
वंशश्रेणीयो में फैलाया जा रहा है। भ्रामक लेख भी है।
ये सब इसलिए प्रस्तुत किया जाता है उन सब के
पिछे - फार्मा इंडस्ट्री , नौकरशाह, ड्रग माफिया गिरोह,
कोठावर्ग उद्योग, एवं नशा या व्यसन द्वारा लत
लगवाने का षडयंत्र, जो लगातार राष्ट्र के वंशश्रेणीयो को
अशक्त बनाने के लिए प्रवृत्त वाम ताकतें चलाती है ।
अतः इसपर जागरूक होना अनिवार्य सामयिक
विषय व कर्तव्य है। नाबालिकगण शिकार हो रहे हैं। )
💥 सेक्सुअल साइंस पुस्तक के उद्धरणों के अनुसार :-
➡️ मैथुन करते करते कई चूहों की मृत्यु होती देखी गई है
और मृत्यु का कारण छोटे - मस्तिष्क का निश्चेष्ट हो कर
मूर्छा में आ जाना होता है ।
➡️ रानहर्न्स का कथन है कि ४० वर्ष के एक व्यक्ति को
विवाह की पहली रात्री में ही मूर्छा आ गई । इलाज करने
पर वह अच्छा तो हो गया परन्तु अपनी इच्छाओं पर काबू
न रख सकने के कारण जब उस ने अपने को खुला छोड़ा
तो फिर मूर्छा का दौर हुआ और उस की मृत्यु हो गई ।
➡️ सेर्स एक ३२ वर्ष के आदमी का जिक्र करता है जिसे
मैथुन की अवस्था में ही मूर्छा आ गई । वह उस से पहले
दबादब शराब के प्याले-पर-प्याले चढ़ा रहा था । मृत्यु के
समय तक उसे उत्तेजना बनी रही । जब उस का
शवच्छेदन किया गया तब उस के छोटे-मस्तिष्क के मध्य
खण्ड़ में सूजन के चिन्ह दिखाई दिये , मस्तिष्क तत्व कई
जगहों से फटा हुआ मिला और दिमाग़ के अन्दर की कई
थैलियों में रुधिर भरा हुआ पाया गया ।
➡️ एन्ड्रल ने एक ५० वर्ष के आदमी का ज़िक्र किया है जिसे
किसी वेश्या के घर से बाहर निकलते ही मूर्छा आ गई ।
उसे अस्पताल लाया गया । वहाँ जाकर वह मर गया ।
मस्तिष्क चीर कर देखने से ज्ञात हुआ कि उस का
छोटा-मस्तिष्क सारा खराब हो गया था और उस का
कुछ - कुछ प्रभाव बड़े दिमाग पर भी होने लगा था ।
सेरीज़ ने भी एक विषयी आदमी का उल्लेख किया है ।
वह एक दिन किसी वेश्या के घर में गया और उस के बाद
दो दिन में मर गया । उस के दिमाग़ को चीरन से छोटे -
मस्तिष्क में रक्त संचय पाया गया ।
➡️ डॉ ० गियोट ने एक ५२ वर्ष के विषयी वृद्ध का वर्णन
करते हुए लिखा है कि उसे मस्तिष्क में रक्त - संचय के
आक्रमण कई बार हुए , उस का शरीर हृष्ट-पुष्ट था
इसलिये कुछ दिनों तक तो वह सब बर्दाश्त करता रहा
परन्तु अन्त में पागल हो गया । उसे की बीमारी
जल्दी-जल्दी बढ़ने लगी , नीचे के हिस्से में
अर्धांग हो गया और १२ घण्टों में ही
वह बेचारा चल बसा |
➡️ डेलैन्डीज़ एक लड़की का उल्लेख करता है ।
वह बचपन में ही कुसंगति में पड़ गई थी और अन्त में
वेश्या बन गई । उस के गुह्यांगों में इतनी जलन होती थी
कि सूजन उत्पन्न हो गई । उस का कुछ इलाज भी न हो
सका । अन्त में मृत्यु ने उस का इस दुःख से निस्तार
किया। दिमाग़ चीरने से देखा गया कि उसका छोटा
मस्तिष्क रुधिर शून्य होने के कारण स्पर्श में कठोर हो
गया था ।
➡️ इसी लेखक ने एक २० वर्ष के युवक का
उल्लेख किया है । वह छुटपन से ही हस्त मैथुन का
शिकार हो गया था । सब उपाय कर लिये गये थे परन्तु
उस की यह आदत छूटती ही न थी । उसे कभी-कभी
मृगी का दौर होता था । वह एक अस्पताल में भर्ती
हो गया । इस समय उस का वीर्यनाश होना बन्द न हुआ ।
अन्त में तीन महीने के बाद वह बिल्कुल सूख कर मर
गया । चीरने पर उस के छोटे - दिमाग में एक
गाँठ पायी गई ।
➡️ एक दस वर्ष की लड़की जिसे हस्त मैथुन की लत
पड़ गई थी एकान्त प्रिय तथा दुःखित सी रहा करती थी ।
चार महीने तक उस के सिर दर्द होता रहा जो कि अन्त में
इतना बढ़ा कि वह तीन हफ्ते तक लगातार दिन - रात
रोती रही और अन्त में मर गई । मरने से पहले उसे
अस्पताल पहुँचाया गया । डाक्टर लोग पूछ - ताछ
करने पर केवल इतना जान सके कि वह १२ दिन
तक बिस्तर में ही पड़ी रही थी , बार - बार उसे पित्त
की कय आती थी , हर समय ऊँघती रहती थी ,
चारों तरफ के लोगों का उसे कुछ ख्याल तक न रहता था !
उस का सिर हर समय नीचे लटका रहता था ,
और हाथ सिर पर पड़े रहते थे ।
मरने से चार दिन पहले वह प्रगाढ़ निद्रा में सो रही थी ,
प्रकाश का उसे कुछ ज्ञान न था , कभी - कभी आँखें
थोड़ी सी खोल देती थी । उस का छोटा-मस्तिष्क चीर
कर देखा गया तो ऊपरवाला हिस्सा तो सारे-का-सारा
सड़ाँद से भरा हुआ था और बाकी हिस्सा भी
कुछ-कुछ गल-सा गया था ।
➡️ कोम्बेट ने एक ११ वर्ष की लड़की का
उल्लेख किया है । उसे भी यही लत थी और
इसी के कारण उस का छोटा - मस्तिष्क बिलकुल
सड़-गल गया था । जो हिस्सा पूरा नहीं गला था
वहाँ लिसलिसी भिल्ली अभी शेष थी ।
💥 Havelock Ellis की पुस्तक Erotic symbolism
पृ. 168–169 ब्रह्मचर्य संदेश में उद्धृत है तदनुसार -
➡️ वीर्य नाश में वेदना तन्तुओं का जो तनाव होता
और उससे शरीर को जो धक्का पहुँचता है वह इतना
भयंकर होता है कि उस से सम्भोग के बाद अनुभव होने
वाले दुष्परिणामों का होना सर्वथा स्वाभाविक है
पशुओं में यही देखने में आया है । प्रथम सम्भोग के
बाद बड़े - बड़े तय्यार बैल और घोड़े बेहोश होकर
गिर पड़ते हैं, सूअर संज्ञाहीन हो जाते हैं ,
घोड़ियाँ गिर कर मर जाती हैं । मनुष्यों में मौत
तो देखी ही गई है परन्तु उस के साथ ही
सम्भोग के बाद की थकान से अनेक उपद्रव
भी उत्पन्न हो जाते हैं । कभी-कभी कई दुर्घटनाएँ
होती देखी गई हैं ।
➡️ नवयुवकों मे प्रथम संभोग से बेहोशी, उल्टी,
पेशाब आना, दस्त जैसी समस्याएं देखी गई हैं।
मिर्गी का मामला बहुत कम दर्ज किया गया है।
विभिन्न अंगों पर घाव, यहां तक कि प्लीहा का
टूटना भी कभी-कभी हुआ है। परिपक्व उम्र के
पुरुषों में धमनियां कभी-कभी उच्च रक्तचाप का
विरोध करने में असमर्थ हो जाती हैं, और पक्षाघात
के साथ मस्तिष्क रक्तस्राव हो जाता है। वृद्ध पुरुषों
के वेश्याओं के साथ अनुचित संबन्ध का परिणाम
अनेक बार मृत्यु देखा गया है । अनेक पुरुष
नव-विवाहिता वधुओं के आलिंगन के आवेग
को नहीं सह सके और उसी अवस्था में
प्राण-विहीन हो गये ।
💥 ध्यातव्य :
आज फेसबुक इंस्टाग्राम पर आनेवाले कंटेंट
आत्मव्यभिचार के लिए पर्याप्त है। उनपर
restricted mode जैसी कोई setting
कोई विकल्प नहीं है। जब तक बालिग कंटेंट
बालिग ही देख पाए ऐसी व्यवस्था न आ जाए,
बच्चो को अभिभावकों के संरक्षण में ही मोबाइल
फोन देना चाहिए, आंखो के समक्ष , केवल काम
हो तब ही। अन्यथा अठारह वर्ष तक उनका
भला चाहने वाले अभिभावकों को चाहिए कि वे
बोर्डिंग विद्यालयों के भांति ही मोबाइल फोन बच्चो
को न दे। उससे उनका जीवन बर्बाद हो सकता है।
नाबालिक बच्चो को अश्लीलता अर्धनग्नता से
बचाने के लिए सरकार पर ott, social media
पर restriction mode लगवाने की मांग करे।
© विचार प्रसार विचार प्रसार (fb)
((#विज्ञान #ब्रह्मचर्य #सामयिकी
#masturbation #आयुर्वेद ))
संबंधित लेख : https://vedic-vichaar-prasaar.blogspot.com/2023/10/blog-post_98.html
संदर्भ : पुस्तक की कुछ प्रतियां
 |
| ब्रह्मचर्य संदेश |
 |
| सैक्सुअल साइंस |
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