ब्रह्मचर्य शारिरिक ही नहीं मानसिक भी...
ब्रह्मचर्य शारिरिक ही नहीं मानसिक भी...
ब्रह्मचर्य का लौकिक लौकिक अर्थ है , अविवाहित । अविवाहित रहना अच्छा है । इससे जीवनी शक्ति का क्षरण रुकता है । शरीर का समुचित परिपोषण होने में दृढ़ता परिपक्व होती है । रोगों से जूझने और उन्हें परास्त करने की क्षमता का भण्डार भरा रहता है । सुन्दरता सुस्थिर रहती है । स्त्री- बच्चों की जिम्मेदारी न रहने , अपना समय , श्रम मनोयोग और साधन दूसरे अधिक उपयोगी कामों में लगा सकने का अवसर मिलता है , गृहस्थ की अनेकानेक समस्याओं का , झंझट बचता है । अधिक अध्ययन करने , पुण्य कमाने , तीर्थयात्रा जैसे परिभ्रमण पर निकलने की गुंजाइश रहती है । ब्रह्मचारी दीर्घजीवी भी होते हैं । उपरोक्त सभी लाभों पर विचार करने पर वे शारीरिक एवं लौकिक ही प्रतीत होते हैं । उनकी संगति ब्रह्म परायण होने के साथ कैसे जुटे ? जब ब्रह्मचर्य का शब्दार्थ होता है , ब्रह्म को आचरण में समाविष्ट करना । " ब्रह्म को चर जाना । " गाय घास चरती है और उसको दूध में बदल देती है । ऐसा कुछ ब्रह्मचर्य में भी होना चाहिए । उस विद्या को अपनाने पर व्यक्ति को ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करनी चाहिए , ब्रह्म निर्वाह के , ब्रह्म दर्शन के समीप पहुँचना चाहिए , पर वैसा होते देखा नहीं जाता । ब्रह्मचारी का शारीरिक क्षरण भर रुकता है , उसके पास बलिष्ठता की पूँजी भर जमा होती है । कई बार तो वह लाभ भी पूरी तरह मिलता नहीं देखा जाता ।
विधवाएँ और विधुर प्रत्यक्षतः ब्रह्मचारी ही रहते हैं । कुरूप और दरिद्री को भी विवाह का संयोग नहीं मिलता । तथाकथित साधु सन्त भी सामाजिक मर्यादा के कारण विवाह नहीं कर सकते । इतने पर भी देखा गया है कि इस प्रकार अविवाहित रहने वालों में कोई विशेषता दृष्टिगोचर नहीं होती है । इस परिणाम को देखते हुए असमंजस होता है कि शास्त्रकारों ने ब्रह्मचर्य का महत्त्व गाया बताया है , वह अलंकारिक ही तो नहीं है । उस प्रतिपादन में यथार्थता समाहित है भी या नहीं । तथ्यतः ब्रह्मचर्य की प्रधान भूमिका मानसिक है । अध्यात्म उच्चस्तरीय मनोविज्ञान ही है । जब योग के , तप के , साधन के साथ उसे जोड़ा जा रहा हो , तो उस सम्बन्ध में इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि इसके साथ ही ब्रह्म के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाला कोई तत्व दर्शन भी जुड़ा होना चाहिए । वस्तुतः ऐसा है भी ।
पानी का स्वभाव नीचे की दिशा में ढलकने का है । पर यदि उसे ऊपर की ओर ऊँचा चढ़ाना हो तो उसके लिए विशेष स्तर के प्रयत्न होने चाहिए । शरीर के परिपुष्ट होने पर यौवन की दहलीज पर पैर रखते ही कामुक आवेश जागृत होते हैं । एक उन्माद जैसा चढ़ता है । जिसकी आकुलता स्खलित होने का कोई उपाय ढूँढ़ती है । सीधा मार्ग नहीं मिलता तो औंधा - तिरछा तरीका अपनाती है । इस कारण वीर्य रक्षा का लाभ भी नहीं मिल पाता । फिर ब्रह्म परायण होने का लाभ मिलेगा ही कैसे ? होना यह चाहिए कि ब्रह्मचारी की मनोभूमि उच्चस्तरीय आदर्शों में इस प्रकार संलग्न रहनी चाहिए कि उसे कामुक आचरण तो दूर उस प्रकार के विचारों के लिए भी अवसर न मिले । प्रवाह को रोक देने के लिए मजबूत बाँध बाँधने चाहिए । यह मानसिक बाँध साधनात्मक मनोयोग भी हो सकता है और परमार्थ परायण सेवा साधना के प्रति प्रबल उत्साह और प्रवाह इसी प्रकार मोड़ा जा सकता है । आदर्शवादी तत्परता ऐसी होनी चाहिए कि हर समय उच्चस्तरीय चिन्तन में ही मन रमा रहे । परमार्थ स्तर की योजनाएँ ही बनती रहें । इतना ही नहीं वरन् क्रिया- कलाप भी ऐसे होने चाहिए जिनमें शरीर का श्रम समय और मन का एकाग्रभाव पूरी तरह नियोजित रहे । इस प्रकार ब्रह्मचारी ऊर्ध्वरेता बनता है । उसकी कामुक ललक अधोगामी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा आदर्शों में रमण करने लगती है । महानता से सम्बन्धित क्रिया- कलापों को अपना प्रिय विषय बनाता है । इस प्रकार अधोगामी प्रवृत्तियाँ रुकती हैं और वे उच्चस्तरीय विचारणाओं , भावनाओं और योजनाओं में नियोजित रहती हैं । फलतः दिशा बदल जाने पर मानसिक ब्रह्मचर्य भी सध जाता है और शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार का पोषण उज्जवल योजना के आधार पर मिलने लगता है । ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में जो लाभ बताया गया है वह इस अनुबन्ध के आधार पर उपलब्ध होने लगता है ।
ब्रह्मचर्य पालन एक बड़ा अवरोध है- विषम लिंग के प्रति हेय स्तर का अश्लील आकर्षण । नर- नारी के रमणी , कामिनी , भोग्या रूप का चिन्तन करता है अथवा नारी नर के यौवन उभार पर ध्यान केन्द्रित करती है , तो मानसिक उत्तेजना इस स्तर की बढ़ जाती है कि रति कार्य के लिए व्याकुलता सताने लगती है । यह चिन्तन ही प्रकारान्तर से व्यभिचार बन जाता है शारीरिक क्षरण की तरह मानसिक लोलुपता भी इस व्रत को खोखला बनाती है । शारीरिक पात को किसी प्रकार रोका भी जा सके , तो मानसिक अश्लीलता समूचे मनःक्षेत्र को मथ डालती है और उस आग में ओज की बहुमूल्य सम्पदा जलने लगती है । इसे ब्रह्मचर्य का नाश ही समझा जा सकता है । ऐसे व्यक्तियों को न शारीरिक लाभ मिलता है , न मानसिक । ब्रह्म परायणता तो निभे ही कैसे ? ब्रह्मचर्य पालन के लिए इन्द्रिय निग्रह से भी अधिक आवश्यक मनोनिग्रह है । मन को अश्लील चिन्तन से रोकने का एक ही उपाय है । विपरीत लिंग पक्ष के प्रति पवित्रता का समावेश किया जाय । नर नारी को आयु के अनुसार पुत्री , भगिनि एवं माता के समान समझे । कल्पना क्षेत्र में भी प्रत्येक नारी को इसी पवित्र बन्धन में बाँधे और उसे अपनी सगी रिश्ते में पवित्र लगने वाली दृष्टि से मान्यता दें । यही बात नारी के सम्बन्ध में भी है उसे भी पुरुष मात्र को पुत्र , भाई या पिता की तरह मान्यता देनी चाहिए और पवित्रतम सम्बन्ध में सुदृढ़ रखने की व्रतशीलता अपनानी चाहिए । एक ही परिवार में सभी आयु के लोग रहते हैं । उसमें से कई तो युवक- युवती भी होते हैं । इतने पर भी उनमें से परस्पर कोई दुर्भाव नहीं उभरते और न अनैतिक आचरण बन पड़ते हैं । यह मानसिक स्थिति का अन्तर है । परायापन आते ही पवित्रता की दीवार ढह जाती है और युवक- युवती आयु का चिन्तन उभरते ही अनाचार के भाव उठने लगते हैं ।
शारीरिक पापों की तरह मानसिक पाप भी होते हैं । किसी पर प्रत्यक्ष आक्रमण भले ही न बन पड़े , पर उसे क्षति पहुँचाने की मानसिक योजना बनती रहे , क्रोध उभरता रहे तो इतने से भी वह मानसिक पाप अपना प्रभाव उत्पन्न करेगा । शारीरिक एवं मानसिक विक्षेप उत्पन्न करेगा । आधि- व्याधियों को जन्म देगा । इसी प्रकार कामुक चिन्तन के बारे में भी समझा जाना चाहिए । वह भी व्यभिचार की तरह अपना कुप्रभाव छोड़ता है । शारीरिक रस को नष्ट होने से भले ही बचा लिया जाय पर मानसिक विनाश तो निश्चित रूप से होगा । मानसिक रूप से व्यभिचारी और शरीर क्षेत्र के ब्रह्मचारी उन समस्त लाभों से वंचित रहते हैं जो ब्रह्मचर्य की महिमा के सम्बन्ध में बताए गए हैं । पूँजी को रोककर न रखें प्रकृति का एक सुनिश्चित प्रवाह क्रम है । एक क्षण के लिए भी वह किसी को एक स्थिति में रहने नहीं देती । अणु- परमाणु घटकों से लेकर ग्रह नक्षत्रों तक सभी को निरन्तर गतिशील रहना पड़ता है । हवा सभी को हिलाती- डुलाती रहती है । रक्त संचार और श्वास प्रश्वास का क्रम अंग प्रत्यंगों को गतिशील रहने के लिए बाधित करते हैं । नदी नाले का प्रवाह बहता रहता है । अन्न उपजता , आहार बनता और बाद में खाद बनकर नये सिरे से उपजने की तैयारी करता है । शरीर जन्मते , बढ़ते , ढलते और मृत्युमुख में चले जाते हैं । सूर्य- चन्द्र उदित होते , प्रकाश देते और अस्ताचल की गोद में चले जाते हैं । यह भ्रमणक्रम ही चेतना का शरीर का सुनिश्चित क्रम है । यदि उनमें कहीं गतिरोध खड़ा हो , तो समझना चाहिए कि वह तन्त्र बिखरने जा रहा है ।
धन की भी यही गति रहनी चाहिए । प्रगति इसी का नाम है । उत्पादन कोई कितना ही क्यों न करे , पर उसे किसी स्थान विशेष पर संग्रहीत नहीं होना चाहिए । व्यक्ति के पास भी उसकी जमाखोरी नहीं होनी चाहिए । कर चोरी मुनाफाखोरी को अपराध माना गया है । उन्हीं में एक गणना जमाखोरी की भी होती है । 9 शास्त्रकारों ने पंच महापातकों में एक परिग्रह की भी गणना की है ; हिंसा , असत्य , चोरी , व्यभिचार के समतुल्य ही परिग्रह को माना गया है । परिग्रह का अर्थ जमाखोरी है । उसे उपार्जन की रोकथाम नहीं समझनी चाहिए । कमाने में , उगाने में हर्ज नहीं । वस्तुएँ यदि अधिक मात्रा में उपलब्ध होंगी तो ही वे जरूरतमन्दों के काम आ सकेंगी । यदि अभाव की स्थिति बनी रहेगी , तो उसके कारण कठिनाई सभी को भुगतनी पड़ेगी । व्यवसाय थम जायेगा । क्रय विक्रय का सिलसिला न चलेगा । छीना झपटी शुरू हो जायेगी । सम्पन्न की सुविधा उठाते और अपने को दरिद्रता में दिन काटते देखकर असमानता जन्य ईर्ष्या का उदय होगा और उस आवेश में बड़ों को गिराने का अभियान चल पड़ेगा । ईर्ष्या के साथ द्वेष भी जुड़ा हुआ है । द्वेष मात्र तभी नहीं होता , जब किसी को हानि पहुँचाई जाय । उसका एक मनोवैज्ञानिक कारण यह भी है कि पड़ोसी का वैभव दीख पड़े और अपनी स्थिति उससे हीन दीख पड़े , तो इसका कारण अपनी असमर्थता , अयोग्यता सोचने के स्थान पर लोग यह अनुमान लगाने लगते हैं कि हमसे कहीं अधिक कमा लेने वाला चोर बेईमान रहा होगा । जिसके प्रति घृणा उपजी उसके लिए द्वेष भी उपजेगा ही । द्वेष के बीज जहाँ भी उगते हैं , वहाँ कलह उत्पन्न होता है । विग्रह का कोई न कोई कारण स्वरूप बन ही जाता है । विग्रह में दोनों पक्षों को हानि होती है । समय , श्रम , धन की बर्बादी होती है और अन्ततः आक्रमण , प्रतिशोध का ऐसा सिलसिला चल पड़ता है , जिसका अन्त ही नहीं होता । कई बार तो यह पीढ़ी दर पीढ़ी तक भी चलता देखा गया । इसमें सब प्रकार तबाही ही तबाही है ।
मनुष्य समुदाय एक परिवार की तरह है । उसका निर्वाह और विवाह परस्पर मिल जुलकर ही होता है । आदान प्रदान के कारण ही एक दूसरे की आवश्यकताएँ पूरी कर पाते हैं । किसान गेहूँ कमाता है और तेली तेल । दोनों अपनी- अपनी कमाई को दाब कर रखें , किसी दूसरे को न दें , तो उसका परिणाम यह होगा कि दोनों इतनी मात्रा का उपयोग तो कर नहीं सकेंगे , संगृहीत वस्तुएँ जगह घेरेंगी और सड़ेंगी । साथ ही जो व्यवसाय क्रम चल सकता ( विनियम के आधार पर उनका काम चल सकता ) था , उन सभी को अभाव ग्रस्त स्थिति में रहना पड़ेगा । एक का संग्रह दूसरे अनेकों के लिए असुविधा का दरिद्रता का निमित्त कारण बनता है । उचित यह है कि उपार्जित पूँजी को अन्यायों के काम आने के लिए आगे बढ़ने दिया जाय । उसे एक स्थान पर रोका न जाय । परिग्रह वह है जो जेवर , जायदाद , वाहन आदि के ठाट- बाट रोपने में पूँजी को मृतप्रायः बना देता है । फैशन के नाम पर अन्धाधुन्ध कपड़ों के सेट बनाना , कोठी बंगले खड़े करना , प्रदर्शन के लिए बड़े ठाटबाट थोपना , अंग सज्जा की अनावश्यक वस्तुएँ कला के नाम पर एकत्रित करना आदि कामों में जो पूँजी लग जाती है , वह दिन - दिन घिसती घटती ही जाती है , वापस तो लौटती ही नहीं । यह स्थिति सामाजिक प्रगति की दृष्टि से नितान्त हानिकर है । जेवरों में रुपया फँसाकर उसकी ब्याज से तो वंचित रहना ही पड़ता है । साथ ही उसकी चोर उच्चकों से सुरक्षा की विशेष व्यवस्था भी करनी पड़ती है । दर्शकों का मन ललचाता है और वे वैसी ही सज्जा बनाने के लिए अपराधी कृत्यों पर उतरते हैं । जेवर की टूट - फूट होती रहती है , वह घिसता रहता है । मरम्मत में ढेरों पैसा जाता है । मिलावट की चोरी भी हर बार बढ़ती जाती है । ऐसी सजा जिसमें लाभ एक भी न हो हानिकारक अवसर अनेक बनें । उसे अपनाने से क्या लाभ ? उसी प्रकार आवश्यकता से अधिक बड़ा मकान बना लेना , जिन वाहनों को किराए पर लेकर काम चल सकता था , उन्हें खरीद लेना ऐसा सफेद हाथी बाँधना है , जो दरवाजे की शोभा तो बढ़ाता है , पर उपार्जन की दृष्टि से व्यर्थ और खर्च के हिसाब से भारी महँगा पड़ता है ।
जमीन में धन गाड़कर रखना भी ऐसा ही है , जिसे किसी को न बता पाने या गाड़कर भूल जाने पर वह एक प्रकार से समाप्त ही हो जाता है । उत्तराधिकारियों के लिए प्रचुर पूँजी छोड़ मरना भी ऐसा ही है , जिससे उनकी हानि ही होती है , बिना परिश्रम के को धन उपलब्ध होता है उसका सदुपयोग नहीं बन पाता । दुर्व्यसनों में उसकी समाप्ति होती है । अपनी मेहनत का कमाया हुआ पैसा ही उपयोगी कामों में खर्च हो सकता है , क्योंकि उसके सम्बन्ध में जानकारी रहती है कि इसे कितनी मेहनत से कमाया गया है ? जिसे कमाने में अपनी मेहनत नहीं लगी उसके बेहिसाब खर्च करने में भी झिंझक नहीं होती । इस प्रकार हराम की कमाई देने वाले की संकीर्णता का तो विज्ञापन करती ही है , साथ ही ग्रहणकर्ता के भी हित में नहीं बैठती । जेबकट , जुआरी , सट्टेबाज कई बार ढेरों पैसा कमा लेते हैं , पर उसे उन्हें बर्बाद करने में भी देर नहीं लगती । ऐसे लोगों के साथ में पैसा टिकता ही नहीं । वे कूड़े की तरह मिली दौलत को फुलझड़ी की तरह जलाने में हिचकते नहीं । इस प्रकार इसे धन का दुरुपयोग ही कहना चाहिए । संकट ग्रस्तों , अभाव ग्रस्तों की सहायता में अपनी कमाई का एक अंश लगाते रहना आवश्यक है । इससे लोग संकट से उबरते हैं और अभाव ग्रस्तता से त्राण पाते हैं । सत्प्रवृत्ति संवर्धन कर सकने वाले अनेक कार्य ऐसे हैं , जिनका संस्थापन , संचालन बन पड़ने से अनेकों का अनेक प्रकार हित- साधन होता है । जहाँ संकटपन स्थिति हो वहाँ दान भी दिया जा सकता है , पर अधिक प्रयास इस बात का होना चाहिए कि अधिकों को अधिक काम मिले और इसके लिए जहाँ पूँजी कम पड़ती हो उसकी आवश्यकता पूरी हो । यह उधार देने और उस कमाई से अपनी पूँजी किस्तों में वापस लेने की व्यवस्था बना देना भी एक प्रकार से पूँजी निवेश है , जिसके पीछे यदि बड़ी ब्याज कमाने का प्रलोभन हो , तो उसे भी दान या सहायता ही कहा जा सकता है । बचत का पूरा पूरा ध्यान रखा जाय और उस आधार पर जो संचय बन पड़े , उसे रोक रखने के साथ ऐसे लोगों को ऐसे कामों के लिए उपलब्ध कराया जाय , जिससे वे अपनी आजीविका का चक्र घुमाने के साथ- साथ दी हुई पूँजी को भी धीरे- धीरे वापस लौटाने की सदाशयता का भी परिचय देते रहें ।
दान हो या उधार- सहयोग देकर दूसरों को अपने पैरों खड़ा होने की स्थिति तक पहुँचाना निश्चय ही पुण्य- परमार्थ है , पर उसको संचयशील , मितव्ययी एवं उदार चेता ही कर सकते हैं । यह बन तभी पड़ सकता है , जब पूँजी का महत्त्व और उसके सदुपयोग का प्रतिफल सही तरह समझा जाय । इसी को सच्चा अपरिग्रह समझा जाना चाहिए ।
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