भारतीय स्त्री

भारतीय स्त्री.. 

रामायण में माता सीता श्रीराम के साथ राजसिंहासन पर विराजित हैं., भारतीय इतिवृत्त मे पती के देहांत के बाद "प्रभावती" ने गुप्त और वाकाटक जैसे दो विस्तृत साम्राज्य पर 12 वर्ष तक दो छोटे पुत्रों के बडे होने तक शासन किया था. एक साम्राज्ञी "रूद्रमादेवी" पर दक्षिण ने movie बनाई है। उसने कन्या होते हुए साम्राज्य संभाला। फिर स्वयंवर किया। माता जिजा से लेकर ताराबाई तक और राणी चेन्नमा राणी लक्ष्मीबाई तक भारतीय संस्कृति में ये क्रम अक्षुण्ण दिखाई पडता है।

 अथर्ववेद से यह स्पष्ट है कि नारी को अपने उपनयन का अधिकार प्राप्त था । कहा गया है कि नारी ब्रह्मचर्य की अवस्था पूरी करने के बाद विवाह के योग्य हो जाती है । श्रौत सूत्र से यह स्पष्ट है कि नारी वेद मंत्रों का अनुपाठ कर सकती थी और उसे वेदों का अध्ययन करने के लिए शिक्षा दी जाती थी । पाणिनि की अष्टाध्यायी से इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि नारियां गुरुकुलों में जाती थीं और वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थीं और वे मीमांसा में प्रवीण होती थीं । पतंजलि के महाभाष्य का कहना है कि नारियां शिक्षक होती थीं और बालिकाओं को वेदों का अध्ययन कराती थीं । [ बाबासाहेब डॉ . अम्बेडकर सम्पूर्ण वाङ्मय , खंड 7 , पेज 322 ]

भारतीयता मे दूसरे की नोकरी करना पिछवाडा धोना समझा जाता है. खुद पुरूष कर लेगा पर स्त्री से पिछवाडा धूलाना और भी असहनीय है। ये भारतीयता ही इस मानसिकता का भग्न कारण है। अंग्रेजो ने भारतीयों को नोकर बनने की मानसिक दासता बनाने जो मेहनत की थी वो आज फलिभूत है। और यहा देखी जा सकती है। मैकाले के बनाए प्रपंच से चल कर आज अच्छे खासे वामी कथित नारीवादी राष्ट्रद्रोही बन चुके हैं। लज्जा इसका कारण रहा। पर लज्जा करनी नही चाहिए जब पेट पर नौबत आ जाती है तो फिर लज्जा छोड देना पाप नही ऐसा मुंशी प्रेमचंद ने भी सम्मति दी है लेकिन आजकल पेटभर खाकर जो निर्लज्जता की वकालत हो रही है वो नीचता और अधमता ही है।

नोकर बनने की व्यवस्था दे गये अंग्रेज...

भारतीय नारी कभी नोकरी नही करती ये अंग्रेज लिख गये,

उसके पिछे का कारण विवेकानंद का एक निम्नलिखित वृत्तांत देकर समझाते हैं -

बात उन दिनों की है जब भारत अंग्रेजो से बौद्धिक रूप से परतंत्र नही हुआ था । एक अंग्रेज ने भारत के विवेकानंद जी से पूछा की आपके देश मे महिला हाथ क्यो नही मिलाती ? इस पर विवेकानंद ने कहा कि क्या आपके देश का साधारण नागरिक महारानी से हाथ मिला सकता है ? तो अंग्रेज बोला बिल्कुल नही फिर विवेकानंद ने कहा हमारे देश में प्रत्येक स्त्री महाराणी है .. !

 - Collected / Ref / inspired from :

         ( AWGP Literature )

भारतीय दृष्टि नोकरीपेशा की नही रही,

मालिक बनने की owner की थी,

ऊपर से स्त्रियों के लिए सम्मान राणी के स्तर का तो कुलवधू को अपने आप को नष्ट करके भी लोग अन्य नोकरी नही करने देते थे। आज भी अच्छी नोकरी हो तभी जाने देते हैं। ये भारतीय दर्शन रहा है, इसे डॉ एनी बेसेंट,रोमा रोला, डॉ. आंबेडकर, विदेशी यात्रा वृतांत, महर्षि दयानंद सरस्वती, मैक्समूलर और मैकाले की साक्षीया, लाला लाजपत राय, प्रो. धर्मपाल, वैज्ञानिक राजिव दीक्षित , मूल अंग्रेजी पत्रों में पढ इनसे जाना जा सकता है कि भारतीय जीवन ग्राम्य आदि कैसा था।

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