हम शरिर नही अपितु आत्मा है...

हम शरिर नही अपितु आत्मा है... 

★ इसी भाव से आत्म केंद्रीत करने वाले गुण

    आत्मा के गुण कहलाते हैं... 

★ कामन्दकिय नितीसार के अनुसार

     यह अपने आत्मा के गुण हैं : - - - 

(१) उद्योग , (२) विचार , (३) शील ,

(४) बुद्धि , (५) धारणा , (६) सत्व ,

(७) सत्य , (८) त्याग , (९) अनुराग ,

(१०) स्थिति , (११) गौरव , (१२) जितेन्द्रियता ,

(१३) सहनशीलता , (१४) लज्जा और

(१५) प्रगल्भता अर्थात् प्रतिभा...

मार्क्स नामक अमानवीय दानव ने बतलाया है कि मनुष्य की तीन मूलभूत आवश्यकताएं है। अन्न वस्त्र व आवास...

लेकिन ये तो पशु की भी मूलभूत आवश्यकतायें है, मनुष्य मे स्वाभिमान है अभिमान भी है, जिज्ञासा है, धर्म को समझने का विवेक रखने की सक्षमता, प्रकृति ने मनुष्य को दी है। चेतना है व उससे अभिभूत होकर ज्ञान चक्षु खोलने का आध्यात्मिक योग मानव तन ही से सार्थक होता है। इसप्रकार ऐसा मनुष्य कौन होगा जिसे पशु के भांति कहां जाये कि तु भोजन ले, वस्त्र पहन एवं आवास मे रह बस... फिर तुझे कोई मौलिक अधिकार नही... ये तो दास प्रथा का पोषक व मानवता का शोषक ही कहेगा, कितनी गंदी सोच वामपंथीयो के मार्क्सवाद की है, जो मनुष्य को पशु से निकृष्ट जीवन का वाद दे रही है।

चेतना व कर्मफल विधान एवं जन्म जन्मांतर विभिन्न योनियों से हमारा पुनर्जन्म होते रहने का चक्र सृष्टि का चक्र यह सनातन धर्म व आधुनिक विज्ञानियों ने जो अभिव्यक्त कर दिया है वो वैदिक सनातन दर्शन ज्ञान व वैदिक विज्ञान की सार्थकता इनके नास्तिकवाद का खंडन कर चुकी है। इस सदी में मार्क्सवादी अमानवीयता पशुता को विज्ञान के नामपर पढाकर भारतीय पाठ्यक्रम में भ्रामक जानकारी दी गई। महाराष्ट्र बोर्ड के विज्ञान विषयक छटी कक्षा के पाठ्यपुस्तक में मानव को पशु बताया फिर मानव की मूलभूत आवश्यकता यही सब बताई। जो लोग अपने आप को पशु मानते हैं, अपनी चेतना पशुतुल्य मानते हैं, जो केवल अन्न वस्त्र आवास ही में रहे, ऐसे मनुष्य तो पशु ही हुए। और मार्क्सवाद पशु ही बनाने का कथित दर्शन पढ़ाता है। यही सब पढकर मणुष्य पशु बनने की ओर अग्रसर हुआ।

लेकिन उस पाठ्यक्रम के लेखक को Human Beings का अर्थ भी उद्धृत करता फिर भी वो ऐसी बात विज्ञान के नामपर नही लिखता कि मनुष्य पशु है। व उसकी आवश्यकता निम्नलिखित है... ये एक ग्रीक का शब्द है -

★ Human = मानव शरिर

★ Being = चेतना 

तो ग्रीक के अनुसार भी बगैर चेतना के मणुष्य की कल्पना नही है। भारत में इसी चेतना से विहिन पशुतुल्य मनुष्य व मानवता विरोधी गंदगी को भरा गया। जो आत्मकेंद्रित न होकर इंद्रियों के आसक्ति मे केंद्रित कराने का वामपंथ कम्युनिस्ट पाठ्यक्रम हमे देता है । पाठ्यक्रम में ये सब विज्ञान के नामपर चल रहा है। जो कि पाठ्यक्रम में शामिल रहना हास्यास्पद है। जिसमें साफ साफ वामपंथ दिखाई दे रहा है। एकतरफा वही विचार डाले गए हैं जो वामपंथ कम्युनिस्ट पार्टी के मार्क्स के पाशविक फिलोसोफी पर आधारभूत है।

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