स्वतंत्रता का अर्थ..

#स्वतंत्रता...

स्व का तंत्र अर्थात् स्व+तंत्रता...

स्व माने मै कौन हुं? सचमे सोचने योग्य बात है

कि मै कौन हुं? 

प्रत्येक मनुष्य को विचार करना चाहिए...

न मै नाम हूं, न रूप न देह , न इन्द्रिय , न मन न बुद्धि हुं.. 

 मैं देह नहीं हूँ , क्योंकि देह जड़ है

और मैं चेतन हूँ , देह क्षय , वृद्धि , उत्पत्ति

और विनाश धर्म वाला है , मैं इनसे सर्वथा रहित हूँ ।


इसी तरह मैं बुद्धि भी नहीं हूँ क्योंकि बुद्धि भी और वृद्धि स्वभाव वाली है मैं क्षय वृद्धि से सर्वथा रहित हूँ । बुद्धि में मन्दता , तीव्रता , पवित्रता , मलिनता , विकार , व्यभिचारादि होते हैं परन्तु मैं उसकी इन सब स्थितियों को जानने वाला हूँ । मैं कहता हूँ उस समय मेरी बुद्धि ठीक नहीं थी अब ठीक है । बुद्धि कब क्या विचार रही है और क्या निर्णय कर रही है , इसको मैं जानता हूँ । बुद्धि दृश्य है मैं उसका दृष्टा हूँ । अतएव ' बुद्धि का मुझसे पृथकन्ध सिद्ध है मैं बुद्धि नहीं हूँ । इस प्रकार मैं नाम , रूप , देह , इन्द्रिय , मन , बुद्धि प्रभृति नहीं हूँ ।

इसका सही उत्तर यह है कि मैं आत्मा हूँ। शरीर और आत्मा की पृथकता की बात हम लोगों ने सुन रखी है। सिद्घान्ततः हम सब उसे मानते भी है। शायद कोई ऐसा विरोध करे कि देह से जीव पृथक नहीं है, इस पृथकता की मान्यता सिद्घान्त रूप से जैसे सर्व साधारण को स्वीकार है, वैसे ही व्यवहार में सभी लोग उसे अस्वीकार करते हैं।

इसलिए मैं इन सबसे सर्वथा अतीत , इनसे सर्वथा पृथक , चेतन , साक्षी , सबका ज्ञाता , सत् नित्य , अविनाशी , अधिकारी , अक्रिय सनातन , अचल और समस्त दुःखों से रहित केवल शुद्ध आनन्दमय आत्मा हूँ । यही मैं हूँ ।

"तो इंद्रियों के आसक्ति मे रहना इस तरह परतंत्रता है। अपने नियंत्रण में इंद्रिय मन को रखना स्वतंत्रता है।" 

मै आत्मा हु। यही मेरा सच्चा स्वरूप है । क्लेश , कर्म और सम्पूर्ण पापों से विमुक्त होकर परमशान्ति और परमानन्द की प्राप्ति के लिए ही मनुष्य शरीर की प्राप्ति हुई है । इस परम शान्ति और परमानन्द को प्राप्त करना ही मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य है । मनुष्य शरीर के बिना अन्य किसी भी देह में इसकी प्राप्ति संभव नहीं है । 

इस स्थिति की प्राप्ति तत्वज्ञान से होती है , और वह तत्वज्ञान विवेक , वैराग्य , विचार , सदाचार और सद्गुण आदि के सेवन से दर्शन या वेदज्ञान मे परिणत होने से होता है ।

वेद के अनुसार इस लोक वा परलोक में भी जन्म होता है। National geographical survey के अनुसार व भारतीय शास्त्रीय मान्यता दोनो के अनुसार 84 लाख species है। (geographical survey का आकडा थोडा अधिक है लेकिन approximately है।) अतः नर्क कही पर भी संभव है। इहलोक या परलोक मिलाकर विभिन्न योनियों मे मणुष्य कर्म फल भोगता ही है। इसलिए नर्क व स्वर्ग इहलोक भी है। नर्क स्वर्ग की कोई विशेष स्वतंत्र सत्ता की अवधारणा भारतीय वैदिक दर्शन मे स्वीकृत नहीं है।¶ 

लेकिन पृथ्वी लोक कर्मभूमि के रूप में विख्यात है। कर्म होते हैं - - पुण्य, पाप व निष्काम कर्म। सकाम शुभ कर्म पुण्य कर्म होगा। अशुभ अधर्म आसक्ति के द्वारा प्रेरित गलत कर्म पाप होगा। ईश्वर वा ज्ञान का संबंध केवल निष्काम वृत्ति से है।

💥 विकासवाद खंडन : यूनान का राजा सेमिटिकल , द्वितीय फ्रेडरिक चतुर्थ जेम्स और अकबर इन राजाओं के आधिपत्य में अनेक विद्वानों ने १०- १० बारह बारह ( अकबर ने ३० बच्चों पर ) छोटे- छोटे नवजात बालकों को शीशों के मकानों में रक्खा और उनकी परवरिश के लिए धाइयाँ रक्खीं और उनको समझा दिया गया कि वे बच्चों को खिला पिला कर प्रत्येक प्रकार से उनकी रक्षा करें ; परन्तु उनको किसी प्रकार की कोई शिक्षा न दें , न उनके सामने कुछ बोलें । उन धाइयों ने ऐसा ही किया । इस प्रकार परवरिश पाकर जब बच्चे बड़े हुए तब जाँच करने से मालूम हुआ कि वे सभी बहरे और गूंगे थे । ((ऐतिहासिक प्रमाण : - Transactions of the Victoria Institute Vol . 15p . 336 .)) यदि बिना शिक्षा दिये स्वयमेव किसी में ज्ञान उत्पन्न हो सका होता तो इन बच्चों को को भी बोलना आदि स्वयमेव आ जाता । इनका बहरा और गुंगा रह जाना साफ़ तौर से प्रकट करता है । कि स्वयमेव ज्ञान न उत्पन्न होता है , न उसकी वृद्धि होती है ।

चेतना पर ईश्वर पर वैज्ञानिकों के विचार विश्लेषण जो शोधपरक है, बाह्य नही है, मुख्य धारा में अनिवार्य मूल विचार के रूप में उद्धृत है। उदाहरण के लिए पदार्थ की उत्पत्ति चेतना से मानकर Quantum Physics मे मैक्स प्लैंक का जो विचार है चेतना पर... ऐसा ही आश्रयभूत मुख्य धारा में उपस्थित विचार है। 20 वीं शताब्दी में आइंस्टाइन के चेतना संबंधित विचारों व मैक्स प्लैंक तथा schrodinger की स्विकरोक्ती से लेकर अनेक भौतिकविद... भौतिकी की चेतनात्मक आयाम की अभिव्यक्ति से भारतीय पाठ्यक्रम आज भी अछूता है। वो यही दौर था जब नोबेल पुरस्कार विजेता फिजिसिस्ट वैज्ञानिक श्री पिपरे दि कोम्ते ने आत्मा को अमर बताया व विश्वात्मा कि ईकाई मानते हुए उसे अमर बताया है।

फ्रांस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और दर्शनवेत्ता

फ़्लैमेरियनने आत्मा और उसके मृत्युके पश्चात्

जन्म के सम्बन्ध में आधी सदी से अधिक

वैज्ञानिक अनुसन्धान किया है ।

उसके कुछ शब्द निम्नलिखित हैं - - -

 ❛ 𝑬𝒕𝒆𝒓𝒏𝒂𝒍 𝒍𝒊𝒇𝒆 𝒄𝒂𝒏 𝒃𝒆 𝒖𝒏𝒅𝒆𝒓𝒔𝒕𝒐𝒐𝒅 𝒐𝒏𝒍𝒚 𝒂𝒄𝒄𝒐𝒓𝒅𝒊𝒏𝒈 𝒕𝒐 𝒕𝒉𝒆 𝒑𝒓𝒊𝒏𝒄𝒊𝒑𝒍𝒆 𝒐𝒇 𝒓𝒆𝒏𝒊𝒆𝒊𝒓𝒏𝒂𝒕𝒊𝒐𝒏 𝒍𝒂𝒊𝒅 𝒅𝒐𝒘𝒏 𝒃𝒚 𝑷𝒚𝒕𝒉𝒂 𝒈𝒐𝒓𝒂𝒔 , 𝑶𝒓𝒊𝒈𝒆𝒏 . 𝑮𝒆𝒂𝒏 𝑹𝒆𝒚𝒏𝒂𝒏𝒅 , 𝒂𝒏𝒅 𝒔𝒐 𝒎𝒂𝒏𝒚 𝒐𝒕𝒉𝒆𝒓 𝒑𝒉𝒊𝒍𝒐𝒔𝒐𝒑𝒉𝒆𝒓𝒔 ... 𝑻𝒉𝒆 𝒅𝒐𝒄𝒕𝒓𝒊𝒏𝒆 𝒐𝒇 𝒓𝒆𝒊𝒏𝒄𝒂𝒓𝒏𝒂𝒕𝒊𝒐𝒏 𝒊𝒔 𝒕𝒉𝒆 𝒐𝒏𝒍𝒚 𝒐𝒏𝒆 𝒘𝒉𝒊𝒄𝒉 𝒓𝒆𝒎𝒂𝒊𝒏𝒔 𝒂𝒅𝒎𝒊𝒔𝒔𝒊𝒃𝒍𝒆 𝒂𝒇𝒕𝒆𝒓 𝒘𝒆 𝒉𝒂𝒗𝒆 𝒑𝒐𝒏𝒅𝒆𝒓𝒆𝒅 𝒂𝒍𝒍 𝒎𝒆𝒕𝒂𝒑𝒉𝒚𝒔𝒊𝒄𝒂𝒍 𝒄𝒐𝒏𝒔𝒊𝒅𝒆𝒓𝒂𝒕𝒊𝒐𝒏𝒔 , 𝒂𝒏𝒅 𝒊𝒕 𝒊𝒔 𝒕𝒉𝒆 𝒐𝒍𝒅𝒆𝒔𝒕 𝒐𝒇 𝒅𝒆𝒇𝒊𝒏𝒊𝒕𝒆 𝒓𝒆𝒍𝒊𝒈𝒊𝒐𝒖𝒔 𝒃𝒆𝒍𝒊𝒆𝒇𝒔 . 𝑻𝒉𝒆𝒓𝒆 𝒎𝒖𝒔𝒕 𝒃𝒆 𝒃𝒐𝒕𝒉 𝒂 𝒑𝒓𝒆𝒗𝒊𝒐𝒖𝒔 𝒆𝒙𝒊𝒔𝒕𝒆𝒏𝒄𝒆 𝒂𝒏𝒅 𝒂𝒏 𝒂𝒇𝒕𝒆𝒓 𝒍𝒊𝒇𝒆 ..........

𝑶𝒖𝒓 𝒍𝒊𝒇𝒆 𝒂𝒇𝒕𝒆𝒓 𝒅𝒆𝒂𝒕𝒉 𝒘𝒊𝒍𝒍 𝒗𝒂𝒓𝒚 𝒂𝒄𝒄𝒐𝒓𝒅𝒊𝒏𝒈 𝒕𝒐 𝒐𝒖𝒓 𝒑𝒓𝒆𝒑𝒂𝒓𝒂𝒕𝒊𝒐𝒏𝒔 𝒇𝒐𝒓 𝒊𝒕 . 𝑾𝒆 𝒂𝒓𝒆 𝒘𝒉𝒂𝒕 𝒘𝒆 𝒎𝒂𝒌𝒆 𝒐𝒖𝒓𝒔𝒆𝒍 𝒗𝒆𝒔 . 𝑻𝒉𝒆 𝑻𝒉𝒆𝒐𝒔𝒐𝒑𝒉𝒊𝒔𝒕'𝒔 𝑲𝒂𝒓𝒎𝒂 𝒊𝒔 𝒓𝒆𝒂𝒍 ❜( 𝑭𝒍𝒂𝒎𝒏𝒂𝒓𝒊𝒐𝒏'𝒔 𝑫𝒆𝒂𝒕𝒉 𝒂𝒏𝒅 𝒊𝒕𝒔 𝑴𝒚𝒔𝒕𝒆𝒓𝒚 ( 𝒊𝒊𝒊 ) 𝑽𝒐𝒍 . 𝑷𝒂𝒈𝒆 338. ) 

💥 संक्षेप से इस उद्धरण का अभिप्राय यह है कि :-

   ❛ नित्य जीवन समझमें नहीं सकता जब तक

      कि पुनर्जन्म को न माना जाए । सब दार्शनिक

      बातों पर विचार किया जाए तो केवल पुनर्जन्म

      का सिद्धान्त ही मानने योग्य रह जाता है । ❜

💥 इस प्रसिद्ध वैज्ञानिक की कुछ युक्तियां

      नमूने के लिखते हैं जो इसने पुनर्जन्म के पक्ष में दी है :

  “ पुनर्जन्म के पक्ष में बड़ी युक्ति यह है कि लोग जन्म से ही

     एक जैसे नहीं होते । बचपन से ही बुद्धि विद्याओं और

     कला प्रवृत्ति तथा रुचि की विभिन्नता होती है । इसका

     कारण न तो मां बाप और न परिस्थितियां ही हो सकती हैं

     । एक और युक्ति यह है कि कई लोगों को इस जन्म में

     पहली बार होने वाले अनुभवों दृश्यों और शब्दों आदि

     के विषय में ऐसा मालूम होता है कि इनको पहले भी

     देखा या सुना हुआ है । इसका कारण पुनर्जन्म के

     अतिरिक्त कुछ नहीं हो सकता । प्रत्येक मनुष्य की

     जन्म से ही कुछ विशेषताएं होती हैं , इनका कारण मां

     बाप नहीं हो सकते । मैं एक खान्दान को जानता हूँ

     जिसमें एक ही मां बापके पाँच लड़के हैं जो आपस में

     इतने भिन्न हैं मानो वे अलग - अलग जातियों के हों ।

     इस प्रकारके हजारों दृष्टान्त दिये जा सकते हैं । मेरे

     एक मित्र की पत्नी है जो हमेशा खुश रहनेवाली है ,

     लेकिन उसके स्वप्न इतने दुःखभरे होते हैं कि प्रायः वह

     रो पड़ती है । हमारे शौक़ व मज़ाक़ पर , प्रेम और घृणा

     पर , स्वप्न व अंतर्दृष्टि ( Intuition ) पर, पूर्वजन्म की

     स्मृति का असर होता है , जो हमारी उपचेतना

     ( Subconscious self ) अथवा स्मृतिकी गहराइयों

     में विद्यमान होती है । हमारे अन्दर स्मृतिकी दो धाराएं

     होती हैं जो प्राय : मिली हुई होती हैं , लेकिन

     कभी - कभी अलग भी हो जाती हैं । यदि प्रश्न किया

     जाए कि हमें पूर्वजन्म की स्मृति क्यों नहीं होती तो

     इसका उत्तर यह है कि इस जन्म में भी हमें सब

     घटनाओं के हज़ार वें हिस्से की स्मृति भी शेष

     नहीं रहती । इसके अतिरिक्त उपचेतना में पूर्वजन्मों

     की स्मृति होती भी है | असाधारण योग्यता के व्यक्ति

     पुनर्जन्म का एक और प्रमाण हैं । "

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि आधुनिक युग के

असभ्य पाश्चात्य जगत् में भी पुनर्जन्म , दर्शन के

सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्तों में से एक माना जाता है ,

उच्चतम बुद्धि के विद्वानों में से कई इसमें विश्वास

रखते हैं और बहुत से जो इसे स्वीकार नहीं करते ,

इसे एक मान्य सिद्धान्त अवश्य समझते हैं और

उनमें से कई तो कहते हैं कि यदि आत्मा और

नित्य जीवन आदि के सम्बन्ध में कोई सिद्धान्त

मानना हो तो पुनर्जन्म ही एक सिद्धान्त है

जो माना जा सकता है

एक व्यक्ति ने 6 वर्ष तक उसने पार्कों , थियेटरों , छविग्रहों और दूसरे - दूसरे सार्वजनिक स्थानों के चक्कर काट, एक नहीं हजारों फोटोग्राफ लिये और जिस जिस के फोटोग्राफ लिये उन - उन के व्यक्तिगत जीवन का परिचय और अध्ययन किया । सोचते होंगे होगा कोई व्यर्थ के कामों में समय गंवाने वाला फक्कड़ , पर नहीं वह हैं लन्दन के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक - श्रीनेक हेराल्ड जिन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन से महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला कि वेष - भूषा का मनुष्य के चरित्र , स्वभाव , शील और सदाचार से गहनतम सम्बन्ध है । पुरुषों की तरह की वेष - भूषा धारण करने वाली नवयुवतियों का मानसिक चित्रण और उनके व्यवहार की जानकारी देते हुए श्री हेराल्ड लिखते हैं - ऐसी युवतियों की चाल - ढाल , बोल - चाल , उठने बैठने के तौर तरीकों में भी पुरुष के से लक्षण प्रकट होने लगते हैं । वे अपने आप को पुरुष सा अनुभव करती हैं जिससे उनके लज्जा आदि नारी सुलभ गुणों का ह्रास होने लगता है । स्त्री जब स्त्री न रह कर पुरुष बनने लगती है तब वह न केवल पारिवारिक उत्तरदायित्व निबाहने में असमर्थ हो जाती है वरन् उसके वैयक्तिक जीवन की शुद्धता भी धूमिल पड़ने लगती है । पाश्चात्य देशों में दाम्पत्य जीवन में उग्र होता हुआ अविश्वास उसी का एक दुष्परिणाम है । ”

श्री हेराल्ड ने अपना विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय आचार्यों ने वेष - भूषा के जो नियम और आचार बनायें वह केवल भौगोलिक अनुकूलता ही प्रदान नहीं करते वरन् स्त्री - पुरुषों की शारीरिक बनावट का दर्शक पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सूक्ष्म विज्ञान को दृष्टि में रखकर भी बनाये गये हैं वेष - भूषा का मनोविज्ञान के साथ इतना बढ़िया सामंजस्य न तो विश्व के किसी देश में हुआ न किसी संस्कृति में , यह भारतीय आचार्यों की मानवीय प्रकृति के अत्यन्त सूक्ष्म अध्ययन का परिणाम था । आज पाश्चात्य देशों में अमेरिका में सर्वाधिक भारतीय पोशाक - साड़ी का तो विशेष रूप से तेजी से आकर्षण और प्रचलन बढ़ रहा है दूसरी ओर अपने देश के नवयुवक और नवयुवतियां विदेशी और सिनेमा टाइप वेष - भूषा अपनाती चली जा रही हैं । यह न केवल अन्धानुकरण की मूढ़ता है वरन् अपनी बौद्धिक मानसिक एवं आत्मिक कमजोरी का ही परिचायक है ।

यदि इसे रोका न गया और लोगों ने पैंट , कोट , शूट , बूट , हैट , स्कर्ट , चुस्त पतलून सलवार आदि भद्दे और भोंडे परिधान न छोड़े तो और देशों की तरह भारतीयों का चारित्र्यक पतन भी निश्चित ही है । श्री हेराल्ड लिखते हैं - कि सामाजिक विशेषताओं को इस सम्बन्ध में अभी विचार करना चाहिये अन्यथा वह दिन अधिक दूर नहीं जब पानी सिर से गुजर जायेगा । भारतीय दर्शन में आत्म कल्याण के लिये बहुत उपाय हैं सैकड़ों योग साधनायें हैं वैसे ही लोक - कल्याण के लिए भी अनेक परम्परायें मान्यतायें और आचार - विचार प्रतिस्थापित किये गये हैं उन सबका उद्देश्य जीवन को सशक्त और संस्कारवान बनाना रहा है अब जो परम्परायें विकृत हो चुकी हैं उनमें वेष - भूषा भी कम चिन्ताजनक नहीं हमें अनुभव करके ही नहीं इस मनोवैज्ञानिक खोज से भी सीखना चाहिये कि अपनी वेष - भूषा ओछापन नहीं बड़प्पन का ही प्रतीक है । हां काले अंग्रेज और काली मैम बनना हो तब तो कुछ भी पहना और ओढ़ा जा सकता है ।

     ((#पुनर्जन्म #rebirth #विज्ञान #दर्शन #धर्म))

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