फ्रायड और ओशो के मत विज्ञान विरूद्ध...

फ्रायड और ओशो के मत विज्ञान व मनोविज्ञान विरूद्ध... 

💥 नीचे प्रस्तुत लेख १९७० की पत्रिका का है जिसमे लिखा है -

 एक समय था जब फ्रायड ने काम - वासना संबंधी सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुये लिखा था- ' मनुष्य शरीर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष कामुकता की भाप वाला इंजन है । इंजन से जब तक भाप निकलती रहती है तब तक उसे कोई खतरा नहीं रहता पर यदि भाप का निकलना रोक दिया जाये तो इंजन में विस्फोट हो सकता है , वह नष्ट - भ्रष्ट हो सकता है । 

इस सिद्धांत की पुष्टि में फ्रायड ने कई चिड़चिड़े , उद्विग्न , अपराध भावना वाले लोगों की चर्चा की और बताया कि उनकी कामेच्छा को फलीभूत होने का अवसर नहीं मिला , उसी के फलस्वरूप उनमें यह मानसिक विकार उत्पन्न हुये । उन्होंने इस सिद्धांत को बहुत बढ़ा - चढ़ाकर दिखाया और यहाँ तक दलील दे डाली यदि मनुष्य को अपनी काम - वासना की तृप्ति के लिये अवसर नहीं दिया गया तो उसकी प्रवृत्ति हिंसक और समाज विरोधी तक हो सकती है , उससे युद्धों तक की नौबत आ सकती है । '

फ्रायड के अनुयाइयों के प्रचार का परिणाम यह हुआ कि जीवनी शक्ति से संबंधित ' काम भावना ' को पाश्चात्य देशों में नग्न रूप दे दिया गया । आज की सामाजिक विच्छृंखलतायें , विषमतायें , पश्चिमी देशों में बढ़ रहे रोग - शोक और अपराधी मनोवृत्ति उसी का परिणाम हैं । संघर्षपूर्ण सामाजिक परिस्थितियों ने एक बार फिर से मनोवैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों का ध्यान इस ओर खींचा और तब एक नई परिकल्पना को जन्म मिला कि काम - वासना इंजन में भाप जैसी शक्ति तो है पर उसे व्यर्थ नष्ट करने से तो जीवन के मूल स्रोतों के पतन होने की संभावनायें बढ़ जाती है । यदि उस शक्ति को ऊर्ध्वगामी या नियंत्रित उपयोग की दिशा में लगा दिया जाता है तो उससे इंजन से हजारों टन ढोने की क्षमता आ जाती है । भाप निकाला हुआ इंजन तो बेचारा अपना भी भार नहीं ढो सकता ।

फ्रायड की दलील का जितना समर्थन हुआ उससे अधिक विरोध और अब लंदन के एक अन्य मनोविज्ञान शास्त्री ने तो इस सिद्धांत की नींव ही हिला कर रख दी । लिसैस्टर विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के प्राध्यापक श्री डेविड राइट ने अनेक बन्दी - शिविरों , फौजी संस्थानों , खेल - कूद और पर्वतारोहण जैसी सामाजिक सामुदायिक और राष्ट्रीय संधि के कार्यों में भाग लेने वालों के जीवन का विस्तृत अध्ययन करने के बाद पाया कि उनमें से अधिकाँश सामान्य परिस्थितियों में ही संभोग का आनन्द लेते रहे । उन्हें अपने अभियान अथवा उसके बाद विषय - भोग की कभी भी इच्छा नहीं होती जब तक कि वे या तो स्वयं भूतकालीन संभोग का स्मरण नहीं करते या उनके सामने इस तरह की चर्चा के विषय नहीं आते । यदि वे इच्छा न करें अथवा उनके सामने कामुकता भड़काने वाली प्रवृत्तियाँ न आयें तो वे काम वासना के लिये कभी परेशान नहीं होंगे वरन् उनमें मनोविनोद और आह्लाद के स्वभाव का विकास ही होने लगता है । श्री डैविड राइट ने द्वितीय महायुद्ध के दौरान बन्दी बनाये गये जापानियों , साइबेरिया शिविर में बंदी लोगों तथा अस्पतालों के उन लोगों से जाकर भेंट की जो लंबे समय से किसी बीमारी से आक्राँत पड़े थे । उनसे बातचीत करते समय उन्होंने पाया कि उनमें काम - वासना की कोई इच्छा नहीं रह गई थी तो भी वे तो अशाँत थे , न उद्विग्न वरन् उनके अन्तःकरण से एक प्रकार की शाँति और आत्म - विश्वास की झलक देखने को मिलती थी । यह आत्म - विश्वास अच्छे अर्थों में था- कि यदि इन परिस्थितियों से मुक्ति मिले तो अमुक - अमुक अच्छे काम करे । '

श्री डैविड राइट के इस कथन की और भी पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मिल जाती है और इस तरह फ्राइड के सिद्धांत का लगभग अन्त ही हो जाता है । आने वाले समय में लोग फ्रायड के सिद्धांत को तूल देकर अपना न तो मस्तिष्क खराब करेंगे और न शरीर की शक्तियाँ बरबाद करेंगे वरन् शक्तियों के संचय से जीवन की अनेक ऐसी धाराओं का विकास करने में समर्थ हों , जिनका संबंध आध्यात्मिक तत्वों से है और जो यथार्थ में मनुष्य के लक्ष्य हैं । ईश्वर , आत्मा , परलोक , पुनर्जन्म जैसे आध्यात्मिक सत्यों की शोध में ब्रह्मचर्य सबसे अधिक सहायक है । आगे की पीढ़ी का ध्यान ब्रह्मचर्य द्वारा शक्ति संयम और उससे जीवन की प्रसन्नता के लिये नई - नई विधाओं की खोज की ओर कहीं अधिक होगा ।

मेरीलैण्ड ( अमरीका ) के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ चाइल्ड हेल्थ एण्ड ह्यूमन डेवलपमेंट ( अमरीका की एक राष्ट्रीय संस्था जो बच्चों के स्वास्थ्य और मानव विकास की आवश्यकताओं की शोध और शिक्षण करती है ) ने एक खोज में बताया कि मनुष्य शरीर की कोशिकाओं में गुणसूत्रों ( क्रोमोसोम्स - अर्थात् व्यक्ति के शरीर स्वभाव आदि का निर्धारण करने वाले तत्व ) के तेईस जोड़े रहते हैं । प्रत्येक जोड़े में 1 गुण सूत्र पिता का एक माता का होता है । 22 जोड़े ऐसे होते हैं जिनका काम - वासना संबंधी गुणों व विकास से कोई संबंध नहीं होता । अधिकतम 1 ही जोड़ा काम - वासना का रहता है इसी से काम - वासना की प्रवृत्ति का व्यक्ति में निर्धारण होता है किन्तु कुछ मामलों में यह भी देखा गया कि उस एक जोड़े में भी एक गुणसूत्र या तो माता की ओर का या पिता की ओर का था ही नहीं सारे 23 समूहों में केवल एक ही गुणसूत्र था । ऐसे व्यक्तियों में सेक्स अंगों का विकास तो असामान्य होता है किन्तु उनके स्वभाव में काम - वासना संबंधी कोई विशेष रुचि नहीं होती वरन् कई बातों में असाधारण प्रतिभा वाले सिद्ध हुये । बेशक ! कुछ एक ऐसे भी उदाहरण आये जबकि बाईस जोड़े अलिंगी गुणसूत्रों ( आटोसपल क्रोमोसोम ) की जगह 21 जोड़े ही रह गये शेष दो में से 1 तो पूरा ही जोड़ा काम संबंधी गुणसूत्र का था जबकि दूसरे में भी एक गुणसूत्र काम - वासना वाला था । वैज्ञानिकों ने पाया कि इस अतिरिक्त काम वासना के गुणसूत्र वाले सभी व्यक्ति लम्पट , क्रोधी , असामाजिक और खूँखार थे । 

तात्पर्य यह कि काम - वासना पर नियंत्रण न होना व्यक्ति के लिये सुविधा का नहीं पतन का ही कारण हो सकता है । फ्रायड के कामशास्त्र को काटने के लिये इतनी उपलब्धि काफी है पर संभवतः आगे के प्रयोग इस दिशा में और भी प्रभाव डालेंगे और ब्रह्मचर्य की महत्ता के वैज्ञानिक प्रमाण ढूंढ़ निकालेंगे । [[#संदर्भ : (akhandjyoti/1970/November)]]

ओशो नामक एक व्यभिचारी हुआ, वह भी फ्रायड का चेला था। उसने फ्रायड की ही बात का समर्थन किया है। अतः यहां ओशो का भी खंडन हो जाता है।

 ओशो संभोग करने कहता है, उसके आश्रम मे जाने के लिए भी HIV test होती है, व वहां सब नग्न रहते हैं, कथित तौर पर ओशो दार्शनिक था। जो वेश्यावृति चला गया। जिसकी तमाम बाते विज्ञान विरूद्ध सिद्ध हुई। वो कहता है भोग जितना चाहे उतना करो तब तक करते रहो जब तक भोग से तृप्त न होवो, फिर जो है भोगो से आप विरक्त हो जाओगे। ये सिद्धांत ही हास्यास्पद है। ये तो मरने का उपाय बता दिया कथित दार्शनिक ओशो ने। न विज्ञान के धरातल पर न दर्शन के धरातल पर न मनोवैज्ञानिक धरातल पर ये बात टिक पाती है। 

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः.... तृष्णा न जिर्णा वयमेव जिर्णाः।

~ भर्तृहरि, वैराग्यशतक-७

भोग भोगे नही जाते, हम ही भोगे जाते हैं, तथा विषयों के सेवन से भलेही भोगते भोगते मर जावेंगे किंतु तृष्णा कभी नहीं समाप्त होती। उल्टे बढते ही जाती है। यही मनोवैज्ञानिक तथ्य है। जो ओशो का मत खंडित कर देता है। 

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