वर्तमान शिक्षा मे अभारतीय शिक्षा पर विमर्श..
वर्तमान शिक्षा....
जुलाई, 2004 को राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने मैकालेइज्म से भारतीय शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता बताई।
~संदर्भ : 📖शिक्षा व्यवस्था तनावग्रस्त क्यों है?
ले. जे. एस. राजपुत . 2008. पी.आर. 33 .
- अमेरिका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डॉ. बेनिडिक्ट लस्टा का कथन है - "पशु अंश जब तक मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा करता है, तब तक वह मनुष्य विशेष महत्वपूर्ण का कार्य कर सकता है।" प्रो0 रावसन ने सम्मति दी है - "ब्रह्मचारी की बुद्धि कुशाग्र और विशद होती है, उनकी वाणी मोहक होती है, उनकी स्मरण शक्ति तीव्र होती है, उनका स्वभाव आनंदी और जोशीला होता है।"
भारतीय मैकालैइज्म की शिक्षा में ब्रह्मचर्य दर्शन का अभाव वामपंथ प्रेरणा का मंत्र है जो वर्तमान में बड़े गहन रूप से सक्रिय हैं। भारत में छात्रों को ब्रह्मचारी कहा जाता था। ब्रह्मचर्य का पालन माने इंद्रियों के संयम की क्षमता है जो अध्ययन में एकाग्रता, ओज, बल और मेधा प्राप्त करता है। वर्तमान शिक्षा में ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले विद्यार्थियों में कम होने के कारण अनेकों का वे सामना कर रहे हैं, स्थापित हो रहे हैं, आत्मदाह कर रहे हैं, कथित प्रेम कर रहे हैं, मर रहे हैं। जो लोग अधिक समय तक आते हैं वे ब्रह्मचर्य को सीखने वाले ही सफल हो जाते हैं। इन्द्रियों के संयम से ही अभ्यास होता है।, इन्द्रियों के संयम से ही अभ्यास नहीं होता। कामविकार : आजकल नाबालिक आयुवर्ग के हाथो में मोबाइल फोन है।, अप्लाईकेशन है, अप्लाईकेशन है, जो कामविकार उत्पन्न कर एकाग्रता स्मरण शक्ति घट जाती है। कामवासना भड़काने वाले, वीर्य नाश से मौत तक हो जाती है ऐसे कुकर्मो यौन अपराध तक ले जाने वाले, कुआचरण का नरक का डायन ये मोबाइल फोन के शोशल अप्लीकेशन बने हुए हैं। वर्तमान सह शिक्षा तो ही है, जो मध्य समस्या उत्पन्न करती है, और एक छात्र जब नष्ट हो जाते हैं तो भटकाव अपना साथ राष्ट्र को भी दे देता है। परमसिद्ध विद्वान आचार्य चाणक्य स्थापित हैं -
कामं क्रोधं तथा लोभम् स्वादं श्रृंगारकौतुकम्। अतिनिद्राऽतिसेवा च मित्र ह्यष्ट वर्जयेत् ॥
~चाणक्य नीति 13/10
उचकता , क्रोध और लोभ , बिना मसाले के लालच की कामना , स्वादिष्ट मसालों के लिए लालच की कामना , बढ़ना - संवर्णा , खेल तमाशे , मन - बहलाव के लिए ताश आदि खेलना , बहुत सोना और भारी सेवा या चापलूसी करना - इन आठ बातों को विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से ही छोड़ना चाहिए।
वर्तमान डिजिटल शिक्षा तो रतिचित्रण देखने के लिए शिखर पर, वीर्य नाश की हानी से अनन्य रखवानी वाली और वीर्य नाश को प्रेरित करने वाली, गर्भनिरोधको की जानकारी 12 वी कक्षा के जीवशास्त्र मे सम्मलित करना सीखना आदि इस अनमोल शिक्षा की पृष्ठभूमि है, भारत के वंशश्रेणि को व्यभिचार और पाश्चात्य कुसंस्कार की ओर ले जाने का महत्व है। भारत की वर्तमान केंद्र सरकार इसपर 0.01% ही कार्रवाई या परिवर्तन कर सकती है। फिल्मों की श्रृंखला में आर्टिस्टिक और कॉलेजियम (कोलेजियम) में विदेशी साजिशों की तूती बोलती है। इनके माध्यम से वह भयंकर स्थिति उत्पन्न होती है। एक साथ एक महाकाव्य में रहस्यमयी अश्लीलता की बाढ़ आ रही है जो विद्या के चित्रों को कोठा बनाने के लिए तुली हुई है। विद्यार्थियों को विद्यालय में वार्षिक स्नेहसम्मेलनो के कार्यक्रम पर क्या आयोजन होता है? केवल अश्लीलता, अश्लीलता, नाच गाना तमाशा और कुछ नहीं। किसी भी सांस्कृतिक शिक्षाविद् को नहीं दी जा रही है। क्लास के पहले बच्चे के घर में सिरियल देखकर क्लास में पढ़ने वाली सहपाठी छात्रा से दोस्त होने की बात कहे तो क्या आश्चर्य। ये कैसा प्रभाव है कि जिन्हें जो समझ में आया न कि उनका भी निष्पाप जिभा पर वही फुहदता नृत्य कर रही है न कि संस्कृत, न कि संस्कृति, न कि संस्कार...!!!
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