क्या पुरूष इंद्रिय स्वच्छंद है?
शास्त्र में स्त्रियों को अपने पुरुषोंके संरक्षण में रहनेका आदेश दिया है ; परंतु हमारे आदर्शका रहस्य तो यह है कि पुरुष भी सर्वथा इंद्रिय स्वच्छंदता मे नहीं रह सकता । उसे भी धर्म और ईश्वर के अधीन रहने का आदेश है । इंद्रिय-स्वच्छंद तो न स्त्री है , न पुरुष । काल , कर्म , गुण और प्रकृति के अधीन यह पाञ्चभौतिक शरीर धारी मनुष्य इंद्रिय स्वच्छंद कैसे हो सकता है ? क्योंकि इसमें उसके शरीरकी नाडीकी गति , रक्तकी उष्णता और इन्द्रियों की शक्ति भी तो उसके हाथ में नहीं है । इनपर नियंत्रण तो स्वतंत्र अर्थात् योगीजन ही कर सकते हैं।
पुरुष स्त्री की अपेक्षा स्थूल शक्ति और साहस में बड़ा है ; अतः उसको धर्म के अधीन रहकर चलने का आदेश दिया गया । कुटुम्ब - जीवन की एकतानता , सरलता और सुखदता के लिये स्त्री पुरुष के संरक्षण में रक्खी गयी । यह आदर्श जीवन - व्यवस्था की अमोघ और मनोहर भावना है । स्त्री दुष्टों के चंगुल में न पड़ जाय , इसके लिये उसे आत्मीय जनों के अधीन रक्खा गया । नारी पुरुष का अमूल्य जीवन तत्त्व , आनन्द तत्व और प्रजनन - तत्त्व है । अतः वह उसकी परम आत्मीया है । जो जिसके लिये बहुमूल्य और आत्मीय है , उसकी रक्षा के लिये वह स्वाभाविक ही सदा चिन्तित रहता है ।
अतः इंद्रिय स्वच्छंद होना तो परतंत्रता है, क्योंकि स्व+ तंत्र अर्थात् मेरा तंत्र इसमे मै तो आत्मा हुं। विवाह जैसे पवित्र बंधन में, ईश्वर के वैदिक शाश्वत सनातन व्यवस्था मे वो एक संस्कार है जिसमे जाने से पहले अपने कर्तव्यों के प्रति सावधान किया जाता है, एक ऐसा ही सावधान शब्द को सुनकर समर्थ रामदास 12 वर्ष की आयु में मंडप से भाग गये थे। आगे वे रामदास कहलाएं, संन्यासी बनें। (ध्यातव्य : अभिप्राय यह नही कि हर संन्यासी गृहस्थी की जिम्मेदारी से बचने के लिए संन्यास लेता है अपितु संन्यासी तो गृहस्थी सम्हाल ले ये उसकी योग्यता का दशांश होगा इतना उपराम होता है। अर्थात् सक्षम होता है कर्तव्य वहन मे कि गृहस्थी तो आराम से कर लेवे।स्वामी रामदास से ये जनश्रुति जुडी हैं अतः इसलिए प्रासंगिक लगी।) अतः अभिप्राय यही है कि ये कर्तव्यों का दिव्य तपोवन है। अच्छे अच्छे इससे सावधान होना चाहिए, यहां इंद्रिय निग्रह होता है, ये तो तप है। यहां इंद्रियों की गुलामी करने, अधिकार मांगने व नर नारी वाद पैदा करने जैसा जो कि वामपंथी एजेंडा चलाते हैं वैसा तो कुछ कान्सेप्ट या अवधारणा ही नहीं है। ये तो है ही कर्तव्यों का आश्रम जी। यहां गर्भाधान होगा। और आगे आगे वानप्रस्थ मे प्रवेश अर्थात् मुनिवृत्ती भी। अतः यहां पुरूष भी कैसे स्वच्छंद हुआ?
अतः स्व+तंत्र वही है जो इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर कर्म के बंधन से मुक्त हो जाएं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें