किसने बनाया भरतमाता को सेक्स ओबजेक्ट..

 #भरतमाता....

रामायण हो या महाभारत, मध्यकालीन कवियों से लेकर वर्तमान अभद्र उपन्यासों के रचयिताओ ने काम्यचित्रण को अलंकार कहकर अनेकानेक पात्रों को पलटकर रख दिया है, एवं उन प्रक्षेप से लेकर मध्यकालीन कवियों से लेकर वर्तमान उपन्यासों की परंपरा मे वर्तमान फिल्म भी अव्वल रहेगी ही क्योंकि उनका भी उद्देश्य काम्यचित्रण होता है जिसे वे रोमांटिक शब्द द्वारा अभिव्यक्त करते हैं।

💥 सोचिए भरतमाता शकुंतला (~13475-13400 ईसा पूर्व) है कौन? 

   ऋषि विश्वामित्र (13500 ईसा पूर्व) और मेनका की बेटी शकुंतला वैदिक राजा भरत की गौरवशाली मां थीं। वह अपने काल का महानतम सम्राट था। उन्होंने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।

  दोनो चित्र देखिए, एक ओर नृत्यांगना नचनी अर्धनग्न फुहड काम्य गणिका के रूप में भोग्या कथित शकुंतला दिखाई दे रही है, दुजी ओर भरतकुलवधू एवं भरत की माता शकुंतला एक आदर्श माता भार्या शिष्या एवं क्षत्राणी का चित्रण है... एक तो उपन्यास कविकाम्यचित्रणो का सृजन है तो द्वितीय महाभारत का परिदृश्य है जो पेंटिंग्स मे हमारे पूर्वज परिकल्पित करते आए हैं परंपरागत शैली में... आश्रम ब्रह्मचर्य के पालन के केंद्र थे और ब्रह्मचर्य क्या था वह जानिए...

💥 आयुर्वेद की चरक संहिता , उपनिषद एवं पुराण इनमे ये श्लोक ब्रह्मचर्य व्याख्या के रूप में प्रसिद्ध है -  

   स्मरणं कीर्तनं केलि प्रेक्षणं गुह्य भाषणं ।

   संकल्पो अध्यवसायश्च क्रिया निवृतिरेवच ।। 

 अर्थात् शारीरिक और मानसिक क्षीणता करने वाले ये अष्ट मैथुन हैं - (1) स्त्री का ध्यान करना , स्त्री के बारे में सोचते रहना कल्पना करते रहना । (2) कोई श्रृंगारिक , कामुक कथा का पढ़ना , सुनना । (3 ) अंगों का स्पर्श , स्त्री पुरुषों के द्वारा एक दूसरे के अंगों का स्पर्श करना । (4) श्रृंगारिक क्रीडाएँ करना । (5 ) आलिंगन करना । (6) दर्शन अर्थात नग्न चित्र या चलचित्र का दर्शन करना । (7) एकांतवास अर्थात अकेले में पड़े रहना । (8 ) समागम करना अर्थात यौन सम्बन्ध स्थापित करना । जो इन सभी मैथुनों को त्याग देता है वही ब्रह्मचारी है । यही बाते कन्या गुरूकुलम् /ब्रह्मचर्य आश्रमों पर भी समानतः देख सकते हैं। ऋषि गृहिणी समेत इनका संचालन करते थे। 

    शकुंतला ने निश्चित रूप से स्वयं वर को वरण किया, अग्नि आदि वैदिक देवताओं को साक्षी मानकर विवाह किया। फिर अपने पितातुल्य गुरु से आशिर्वाद लिया। बस यही उनकी पाणिग्रहण कथा थी। फिर विरह हुआ मिलन हुआ, ये कालीदास की लेखनी थी। उसे मान भी लेते हैं लेकिन क्या इसमे इतना फुहड वेशभूषा मे चित्रण दिखाने की आवश्यकता थी? इसमे आश्रम में विचरते दुश्यंत शकुंतला दृश्य में फ्रिडम आॉफ क्रियेटिविटी का दुरुपयोग इतना किया गया है कि आश्रम नही वर्तमान मौजमस्ती वाले पर्यटन होटलों हनीमून के एकांत उद्यान या समदर्शी कोठे का दृश्य हो। 

  वैदिक साहित्य में स्त्री को प्रथम स्थान प्राप्त था वह आदर्श का प्रतिमान थी । उसका स्वरूप अत्यन्त पवित्र तथा सम्मान युक्त माता के रूप में परिभाषित रहा । वहीं मध्ययुग ( महाभारत के युद्ध से एक सहस्र वर्ष पहले से दयानन्द काल तक ) में स्त्री का स्वरूप मिश्रित व्यवहार का रहा जिसमें उसको कहीं वैदिक तरीके से तथा कहीं विकृत रूप से पेश किया गया । महाभारत के युद्ध के कारण जो विद्रूपता समाज में फैली वह अत्यन्त ही दुःखद रही । किसी भी काल का पूर्ण रूप से अचानक उखड़ जाना संभव नहीं है । वैदिक काल सबसे महान् था जैसा समाज वैसा साहित्य इसीलिए वैदिक साहित्य में स्त्री सर्वोच्च स्थान प्राप्त थी वहीं मध्य काल में वह स्त्री कहीं सर्वोच्च किन्तु अहंकारयुक्त , कहीं युद्ध का कारण , तो कहीं उसका व्यवहार परिवर्तित होने से वह समाज में अपना वर्चस्व खोने लगी । मध्य काल के अन्त तक तो सारी भारतीय सभ्यता ही ध्वस्त हो चुकी थी । मध्यकालीन साहित्य में धीरे - धीरे स्त्री एक माता से विदूषी , विदूषी से पत्नी , पत्नी से स्त्री , स्त्री से विविध प्रकार की संरचना वाली स्त्री , संस्कृत साहित्य में स्त्री के रूप का वर्णन कालिदासादि कवियों ने बड़ा ही सौन्दर्य पूर्ण किया है । यहां से प्राकृत , अपभ्रंश से होता हुआ हिन्दी साहित्य में स्त्री का चरित्र चित्रण उसका स्वरूप ही नखशिखादि से होता हुआ शृंगारिक रचनाओं में घूमने लगा। ¶

   पहली शताब्दी से अठावीं शताब्दी के मध्य तक तो स्त्री का जीवन घोर दुःखों से युक्त बन गया था । कुछ अपवाद रचनाओं को छोड़कर मध्यकाल में हिन्दी साहित्य का स्वरूप स्त्री विमर्श के संदर्भ में केवल और केवल उसका सौन्दर्य वर्णन ही प्रमुख रहा है । सामाजिक महत्व इतना ही था कि स्त्री भोग्य वस्तु है । उसे छुपाकर रखने लग गए थे जैसे दूध , दही को बिल्ली के डर से छुपाकर रखा जाता है उसी प्रकार स्त्री को दूसरा न छीनकर ले जाए इसलिए पर्दे में रखने की प्रथा का आविष्कार हो चुका था ।¶

    मध्यकाल के पूर्वाद्ध में साम्राज्यविस्तार की लड़ाई ने साहित्य प्रदूषित किया तथा उत्तरार्द्ध में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा सम्पूर्ण संस्कृति का सत्यानाश कर दिया इस बीच साहित्य अतिदूषित हो चुका था । स्त्रियों के प्रति मुस्लिमों में यह धारणा प्रबल हो चुकी थी कि स्त्री उस बिना हकी धरती के समान है जिसमें जितना हल चलाओगे उतनी ही उपजाऊ होकर वह अधिक फसल देने के काम आएगी । अन्ततोगत्वा इसका असर हिन्दी साहित्य संस्कृति पर भी आना प्रारंभ हो गया अब स्त्री केवल भोग्या थी ।¶

   " कटि और भारी स्तन आदि हैं जो शारीरिक सुख प्राप्ति के निमित्त ही चुने गये प्रतीत होते हैं । अपनी नायिकाओं का विलासितापूर्ण शब्दों में स्वच्छन्द वर्णन कवियों का प्रिय विषय रहा है ।" [1]



    #संदर्भ : ¶ P. 61 दयानन्द सरस्वती का स्त्री विमर्श तथा उसका आधुनिक हिन्दी साहित्य पर प्रभाव Kota University , Kota 2015.

  [1] (अद्भुत भारत , ए . एल . बाशम , प्रकाशक : शिवलाल अग्रवाल एण्ड कम्पनी , आगरा 1994 , पृ . सं . 142)

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