ह्रदय के ज्ञान विज्ञान व चिकित्सा का उद्भव भारतवर्ष में...
#ह्रदय...
बृहदारण्यकोपनिषद् के एक प्रकरण में कहा गया है –
((एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत् सर्वं तदेतत् त्र्यक्षरँ हृदयमिति । हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद । द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद । यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥ बृहदा० ५।३।१॥))
अर्थात् यह जो हृदय है, यह प्रजापति है, यह ब्रह्म है, यह सब कुछ है । वह तीन अक्षरों वाला है । पहला अक्षर ’हृ’ है क्योंकि यह अभिहरण (हृञ् हरणे से) = लाता है । जो ऐसा जानता है उसको उसके अपने और अन्य भी (धन-धान्य) लाते हैं । ’द’ अक्षर से देने (डुदाञ् दाने से) का ग्रहण है । जो ऐसा जानता है उसको उसके अपने और अन्य भी (धन-धान्य) देते हैं । तीसरा अक्षर ’यम्’ है जो कि गत्यार्थक (इण् गतौ से) है ।
इस प्रकार उपनिषद् प्रत्येक अक्षर के अलग-अलग अर्थ करता है । प्रथम इन अर्थों को रक्तयन्त्र में घटाते हैं । उरस्थ हृदय शरीर से गन्दे रक्त का ग्रहण करता है; वह साफ रक्त को अवयवों में देता है; वह रक्त को सब प्रकार से गति प्रदान करता है । यह हृदय की कितनी सुन्दर व्याख्या है !
💥 आयुर्वेद के अनुसार - हृदय के लक्षण
हृदयं चेतनास्थानमोजसञ्चाश्रयं मतम् ।
अर्थात् हृदय चैतन्यताका स्थान और ( समस्त धातुओं के तेज का ) आश्रय है । यह कमल की कली की नाई किंचित् विकसित और अधोमुख रहा करता है ।
💥 माधवनिदान मे विस्तार से विवेचन है निदान है
यथा अन्य व उक्त कुछ ही श्लोक देखेंगे - -
(१) अथ हृद्रोगनिदानम् : हृद्रोगस्य कारणानि ग्राह
अत्युष्णगुर्वन्नकपायतिक्तश्रमाभिघाताध्यशनप्रसङ्गैः ।
संचिन्तनैवेंगविधारणैच हृदामयः पञ्चविधः प्रदिष्टः ॥ १ ॥
अर्थात् निरन्तर अत्यधिक गरम व अधिक गुरु भोजन करने से , कषाय तथा कड़वे पदार्थों के सेवन से , श्रम , चोट , अध्यशन , अधिक चिन्तन तथा अधारणीय वेगों के धारण करने से पांच प्रकार का हृदयरोग उत्पन्न होता है ॥ १ ॥
(२) गुल्मस्य हृदयं स्थानमुक्तम् , अतो हृदय संकीर्तना हृद्रोगारम्भः । प्रसङ्गः सातत्येन सेवा , अस्युष्णादयो यथायोग्यं वातादीनां क्रिमेश्च निदानमिति बोध्यम् ॥ १ ॥ - -
➡️विमर्श - ' पञ्चैव हृदयामयाः ' चरक के इस वाक्य के अनुसार वातिक , वैत्तिक , श्लैष्मिक , सान्निपातिक तथा कृमिज भेद से हृद्रोग ५ प्रकार के होते हैं । अत्युष्ण आदि कारणों की वातिक आदि हृद्रोगों के साथ यथायोग्य कारणता समझनी चाहिये ।
➡️यथा- अत्यधिक उष्ण पदार्थों का सेवन पैत्तिक हृद्रोग के कारण हैं । गुरु भन्न तथा अध्यशन कफज हृद्रोग तथा शेष सभी कारण वार्तिक हृद्रोग के कारण हैं । त्रिदोषज के पूर्वोक्त कारण मिश्रितरूप में एवं क्रिमिज के किमि और क्रिमिवर्धक अन्न तथा अध्यशन कारण हैं । अधिक चिन्ता करने वाले एवं सम्पन्न व्यक्तियों में चिन्तनजन्य हृदरोग बहुत पाया जाता है ।
➡️आजकल के अधिकांश हृद्रोगियों में यही कारण प्रमुख होता है । बुद्धिजीवी वर्ग इस रोग से अधिक पीडित होता है । अधिकांश राजनैतिक नेता हृद्रोग से पीडित रहते हैं ।
➡️ चरक संहिता में दृढवल ने हृदयरोग के कारणों का संक्षिप्त किन्तु व्यापक वर्णन निम्न लोक में किया है -
व्यायामती चणातिविरेक बस्तिचिन्ताभयत्रा समदाभिचाराः । छुर्यामसन्धारणकर्षणानि हृद्रोगकर्तॄणि तथाऽभिघातः ॥ ( च . चि . अ . २६ )
(४) हृद्रोगस्य सम्प्राप्तिं सामान्यलक्षणं च लक्षयति दूषयित्वा रसं दोषा विगुणा हृदयं गताः । हृदि बाधां प्रकुर्वन्ति हृद्रोगं तं प्रचक्षते ॥ २ ॥ ( सु . उ . ४३ )
अपने कारणों से प्रकुपित हुए बात आदि दोष रस को दूषित करके ( उसके आधार ) हृदय में अवस्थित होकर हृदय में भी विकार उत्पन्न कर देते हैं । इसको हृदयरोग कहते हैं ॥ २ ॥
(५) तस्य संप्राप्ति सामान्यलक्षणं चाहदूषयित्वेत्यादि । दूषयित्वा रसमिति रसस्य हृदयाश्रयस्वात् । विगुणाः कुपिताः । हृद्रोगमिति वाच्ये यद्वाधाग्रहणं , तद्दोषभेदेन बाघावैचित्र्यज्ञापनार्थ ; बाधाशब्देन चात्र नानाविधा पीडेति जेज्जटः , भङ्गवत् पीडेति गयदासः । हृद्रोगमिति ' वा शोकप्यञ् रोगेषु- ' इति रोगे परे हृदयस्य हृद्भावः , अथवा हृदो रोगो हृद्रोगः ॥
विमर्श - रस और रक्त के आधार एवं उन का समस्त शरीर में परिचालन करने वाले यन्त्र विशेष को ही हृदय कहते है । यह अनैच्छिक पेशियों का बना हुआ एक पोला अन्ग है और वृक्ष प्राचीर के अन्दर दोनों फुफ्फुसों के मध्य में अवस्थित रहता है । युवा पुरुष का हृदय लगभग ५३ रख लम्बा ३३ इञ्च चौडा और २३ इन्च मोटा तथा भार में लगभग पाँच छटाँक होता है । स्त्रियों मे इसका आकार तथा भार अपेक्षाकृत कुछ कम होता है । हृदय की आकृति ठीक बन्द की हुई मुट्ठी के समान होती है । हृदय का अधिकाश भाग वृक्ष के वाम भाग में अवस्थित रहता है । इसके दोनों ओर बाम और दक्षिण फुफ्फुस रहते हैं । वाम पार्श्व के फुफ्फुस में इसके अधिक सान्निध्य के कारण एक गर्त बना रहता है । इसे हार्दिक खात या गर्त ( Cardiac notch ) कहते हैं । इसके सामने उरःफलक तथा वाम पार्श्व की द्वितीय , तृतीय , चतुर्थ तथा पञ्चम पर्शुकाओं की तरुणास्थियां ( Costal cartilages) रहती हैं । उसके पृष्ठभाग में पञ्चम , षष्ठ , सप्तम तथा अष्टम कशेरुकाओं के गात्र तथा चक्रिकाये ( Discs ) रहती है पीछे की ओर हृदय और कशेरुकाओं के बीच में बृहद्धमनी ( Aorta ) अवस्थित रहती है ।
रचना की दृष्टि से हृदय एक कोष्ठ ही है । यह कोष्ठ अन्दर से एक मांस के पतले परदे से बाम और दक्षिण दो भागों में विभक्त रहता है । इन दोनों कोष्ठों का परस्पर कोई सम्बन्ध नही रहता । प्रत्येक कोष्ठ दो भागों में विभक्त हैं । दक्षिणी ऊपर का भाग रक्त- परिभ्रमण से लौटे हुए अशुद्ध रक्त का ग्रहण करता है अतः उसे दक्षिण ग्राहक कोष्ठ या दक्षिण अलिन्द ( Right auricle ) कहते हैं । यहाँ से रक्त नीचे के भाग द्वारा फुफ्फुसीय धमनी में प्रेरित किया जाता है अतः इसे दक्षिण क्षेपक कोष्ठ या दक्षिण निलय ( Right reutriole ) कहते हैं । ऊपर और नीचे के दक्षिण कोष्ठ पतले त्रिपत्रक कपार्टो ( Auriculo ventricular or Tricuspid valves ) के द्वारा परस्पर दृथक् रहते हैं । ये कपाट सौनिकतन्तु ( Fibrous tissue ) के बने होते हैं और सदा नीचे की ओर निलय में ही खुलते हैं । इस प्रकार रक्त एक ही दिशा में बहता है वह पीछे नहीं लौट पाता । वाम पार्श्व में भी इसी तरह दो कोष्ठ होते हैं । बाम ग्राहक कोष्ठ फुफ्फुसीय सिराओं ( Pulmonary veins ) द्वारा लौटे हुए शुद्ध रक्त का ग्रहण करता है और वह रक्त पुनः वाम अलिन्द निलय मध्यगत द्वार या द्विपत्रक द्वार ( Mitral aperture ) के द्वारा नाम निलय ( Left ventricle ) में चला आता है और वहाँ से वह रक्त हृदय संकोच के द्वारा वृहद् धमनी द्वार में से होकर गृहद् धमनी ( Aorta ) में प्रेरित किया जाता है । इन दोनों द्वारों में भी कपाट लगे रहते हैं । द्विपत्रक कपाट ( Biouspid valve ) निलय की ओर तथा बृहद् धमनी कपाट बृहद् धमनी को ओर ही खुलते हैं । इस प्रकार इनके अविकृत रहने पर रक्त अपनी प्रकृत दिशा की ओर ही गमन करता है , विरुद्ध दिशा में नहीं लौट पाता । हृदय का सम्पूर्ण आन्तरिक भाग एक कला से आच्छादित रहता है इसे हृदन्तः कला ( Endocardium ) कहते हैं । हृदय के उपर्युक्त भङ्गों के प्रकृत रहने पर हृदय तथा शरीर का कार्य भी प्रकृत रहता है । इनमें से किसी के भी विकृत हो जाने से हृदय का कार्य विकृत हो जाता है और इसको ही हृद्रोग कहते हैं । हृदय रस का स्थान है अतः दूषित रस के सम्पर्क से हृदय या उसके अवयव में विकृति होने से हृदय के रोग प्रारम्भ हो जाते हैं । हृद्रोगों का वर्णन चरक ने सूत्रस्थान अध्याय १७ में सुश्रुत के समान ही किया है किन्तु चरक संहिता के चिकित्सा स्थान में त्रिममय चिकित्सा अध्याय में दृढबल ने इनका वर्णन अधिक व्यक्त रूप में किया है ।
(६) यथा वैवर्ण्यमूर्च्छा ज्वरका सहिक्काश्वासास्यवैरस्य तृषाप्रमोहाः । छर्दिः कफोस्क्लेशरुजोऽरुचिश्च हृद्रोगजाः स्युर्विविधास्तथाऽन्ये ॥
ये हृद्रोग के सामान्य लक्षण हैं ।
पाश्चात्य रोग विज्ञान में वर्णित विविध हृद्रोगों में ये लक्षण ठीक इसी रूप में पाये जाते हैं ।
💥वैवर्ण्य ( Discoloration) - इसमें पाण्डुता ( Pallor ) , श्यावता ( Cyanosis ) तथा कपोलारुण्य ( Malar flush ) इन तीनों का समावेश होता है । पाण्डुता रक्ताल्पता की द्योतक है जो कि हत्कपार्टी की विकृति से होती है ।
💥शोणवर्तुलि ( Hemoglobin ) की कमी से श्यावता आती है । इसकी प्रतीनि विशेषतया ओष्ठ , नासाम्र तथा नख सदृश स्थानों में होती है , जहाँ केशिकायें उत्तान ( Superficial ) रहती है । इसका कारण सिरागत रक्तावरोध ( Venous Stasis ) है ।
💥कपोलारुण्य ( Malar flush ) का कारण द्विपत्रक संकोच ( Mitral stenosis ) है । मूर्च्छा – यह हृदयजन्य श्वास ( Cardino asthma ) का विशेष लक्षण ।
💥ज्वर - आमवातजन्य या औपसर्गिक हृदन्तःकला शोथ ( Rheumatic or Septio ) में यह लक्षण प्रधान रहता है । कास , हिक्का तथा श्वास को अवरोधजन्य लक्षण ( Pressure symptoms ) कहते हैं । ये द्विपत्रक प्रत्युद्धिरण ( Mitral regurgitation ) में तथा विशेषतया द्विपत्रक संकोच ( Mitral Stenosis ) में पाये जाते हैं ।
द्विपत्रक संकोच में रक्त का बमन भी होता है । हृदयवाहिनी की घनास्त्रता ( Coronary thrombosis ) में वमन , अरुचि तथा श्वासकृच्छ्रता के लक्षण मिलते हैं । इन्हीं व्याथियों में माधवोक्त वातिक आदि भेदों के विशेष लक्षणों का भी ज्ञान करके विकृति और दोषों के अनुसार चिकित्सा द्वारा सफलता प्राप्त किया जा सकता है ।
(७) वातिकहृद्रोगलक्षणमाह - - आयम्यते मारुतजे मारुतजे हृद्रोगं तुद्यते तथा । निर्मथ्यते दीर्यते च स्फोट्यते पाठ्यतेऽपि च ॥३ ॥ ( सु . उ . ४३ )
वातिक हृद्रोग में हृदय में खिचावट तथा सूचिकावेधनवत् पीडा होती है । रोगी को कभी - कभी प्रतीत होता है कि उसके हृदय को कोई डण्डे से मथ रहा है , दो टुकड़े कर रहा है , अथवा आरे या कुल्हाड़ी से चीर रहा है ॥ ३ ॥
➡️वातिकहद्रोगलक्षणमाह - आयम्यत इत्यादि ।
आयम्यते आकृष्यत इव । तुद्यते सूच्येव । निर्मथ्यते दण्डेनेव । दीर्यते द्विधेव क्रियते । स्फोट्यते आरयेव । पाठ्यते कुठारेणेव ॥ ३ ॥
विमर्श - वातिक हृद्रोग में पीडा की विशेषता रहती है । हच्छूल ( Angna pectoris ) तथा हृदयवाहिनी की घनात्रता ( Coronary thrombosis ) का यह विशिष्ट लक्षण है । उक्त दोनों अवस्थाओं में शूल अनिवार्य रूप में रहता है किन्तु फिर भी दोनों के शूल की प्रकृति तथा अन्य लक्षणों में भिन्नता भी है ।
जब William Harvey की हजारों पिढीयां , पैदा भी नहीं हुई थी , असभ्य पशु थी , तब से ही ह्रदय के वैशिष्ट्यों , संरचना, कार्य व रोग - प्रकारो की भारतवर्ष में आयुर्वेद शास्त्र में विस्तृत चर्चा है । आचार्य माधव विरचित माधवनिदान उल्लेखनीय है । ऐसे में हार्वे को इसका जनक कहना पुरी तरह असत्य व भ्रामक है।
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