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मार्च, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बागेश्वर धाम के कथावाचक के बयान पर सामयिक चिंतन

हम बागेश्वर धाम का संपूर्ण समर्थन करते हैं। शास्त्रार्थ की परंपरा सनातन धर्म की प्राचीन परंपरा रही है। तर्क के कसौटी पर यदि कोई मत मानवता व धर्म के विपरीत हो तब उसका खंडन करना सनातन धर्मीयो का परम धर्म है। कोई भी मत व पंथ धर्म के अनुकूल है वा नही इसको तर्क के कसौटी पर परखा जा सकता है। माननीय विधायक जी मानते वा जानते हैं कि अन्य सनातनी हिंदू उनके कथन का विरोध नही करेंगे। व राजनीति कहती हैं कि ये विरोध वा समर्थन विशेष क्षेत्रीय वोट है, तदनुसार वे अपना बयान दे रहे हैं। राजनेता कोई धर्म के मर्मज्ञ नही। इसलिए सनातनी अपने सनातनी व्यास पीठ की आवाज सुने, क्योंकि वहा जो आवाज आ रही है वो हनुमानजी के कृपापात्र श्रीराम भक्त की आवाज है। वो एकता व संगठितता की आवाज है। वो आवाज सत्य की है। वो आवाज धर्म की है।  विडंबना यह है कि वर्तमान में हिंदू अपनी धार्मिक शिक्षा से 800 वर्ष से संघर्षरत होने से कमसेकम 250 वर्षों से अपनी स्वदेशी व्यवस्था शिक्षा पद्धति आदि से वंचित सा है। राम को न मानकर, रामभक्त को उनसे विलग कर देना व विचित्र संप्रदाय खडा कर देना, इसकी आज से पहले कोई कल्पना भी कर सकते थे? यह इतिवृ...

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 ❝ पतिव्रताओं को देखकर वेश्याएँ     ईर्ष्या से भर उठती हैं....    (... द्वेष्या... वाराङ्गना कुलस्त्रीणां... )            ~चाणक्य (ध्यातव्य : आचार्य चाणक्य के समय न तो कोई वेश्या थी न वेश्यालय थे न वेश्यावृति वैध थी। यदाकदा वाराङणाएं थी जो नृत्य गान करने मे जीवन व्यतीत करती थी, इनके अपने स्तर थे। अस्तु... आज वेश्या विस्तृत हो गयी है। ऊनकी कोई आर्थिक विवशता नही है।)   बालीवुड की वाराङणाओ  की ईर्ष्या ही उनकी तिलमिलाहट है  वे वाराङ्गनाएं उनका विलाप आंदोलन नही है...  केवल वामपंथी राक्षसी प्रवृत्तियों की ईर्ष्या है...  जिस आग में स्वयं जल रही होती है वे उसमे  अपने बराबर दुसरो को ले आना लक्ष्य है उनका...   अंततोगत्वा पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता...   शाश्वत सनातन व्यवस्था पर जड़वाद का प्रहार है ये... वे जो स्वयं असमाजिक अपराधी तत्व है आज स्वयं को कोई विदुषी सफल व समाजशास्त्री दिखाने लगी है... इसे कहते हैं बाहरी चमक-दमक... और यथार्थ मे ये सातवी फेल है... छद्म सम्मान छद्म पुरस्...

वामपंथी ईर्ष्या से उत्पन्न छद्म फेमिनिस्म...

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❝ पतिव्रताओं को देखकर वेश्याएँ     ईर्ष्या से भर उठती हैं....    (... द्वेष्या... वाराङ्गना कुलस्त्रीणां... )            ~चाणक्य  बालीवुड की वाराङणाओ  की ईर्ष्या ही उनकी तिलमिलाहट है  वे वाराङ्गनाएं उनका विलाप आंदोलन नही है...  केवल वामपंथी राक्षसी प्रवृत्तियों का आतंक है.... वे जो स्वयं असमाजिक अपराधी तत्व है आज स्वयं को कोई विदुषी सफल व समाजशास्त्री दिखाने लगी है... छद्म सम्मान छद्म पुरस्कार धन भी है लेकिन सम्मान इज्जत आबरु नही होती इनके पास... कुलीन वर्ग की समाज की श्रेणी से इन्हे भीतरी अशांति भीतरी असंतोष की भावना, भीतरी आसुरी वृत्ती, भीतरी स्वार्थ की लहरें, सब मिलकर के इनको अंदर से एक इस तरह का स्वरूप देती है ईर्ष्या द्वेष विद्वेष का... फिर इनकी वामपंथी साझेदारी, बाहरी झूठी दिखावट एक वस्तु के रूप में उपभोग की वस्तु होना, कुल मिलाकर इनके भीतर न कोई लज्जा होती है न मर्यादा होती है... वामपंथ अपने एजेंडा में इनको समामेलित किये रहता है, इसके इस राक्षसी एजेंडा विखंडन को स्वच्छंदता निरर्थक पावर पाने की नारीवाद की आड मे ...

रूद्र

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 प्रथम पोस्ट : नवीन शैली की...  हर हर महादेव 🙏🚩🕉️

विचार प्रसार के लोगो (logo) आदि

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  ये सभी आज 6: 05 AM पश्चात यथा ब्लॉग पर डाल रहे हैं तथापि ये हमारे अधीनस्थ वा कापीराइट संरक्षित है। Copyrighted. ©

सनी देवोल कि फिल्में...

 सनी देवोल कि फिल्में नैतिकता पर आधारित होती थी। कम से कम उस समय gf /bf जैसे असामाजिक शब्द और सीन्स जैसे कि साऊथ मुवी मे शिक्षिका से लडका कह रहा हैं मॅम आप अपने bf के साथ आ जाना मेरे शादी में, कही पर मां के आयु के स्त्री के साथ लडके का अनैतिक प्रेम चित्रित करने वाली फिल्म बन रही है, ऐसे ही आपत्तिजनक अनेक उदाहरण है आजकल अनैतिकता परोसने वाली घोर वर्जित बाते उनका सामान्यिकरण करने वाली फिल्में 90% बन रही है। जैसे शब्द असंसदीय करार दिए गए वैसे gf /bf जैसे शब्दो को आम करने पर सिनेमा सिरियल्स मिडिया मे रोक लगानी चाहिए। क्योंकि ये नायक नायिका को निरंतर चरित्रहीन दिखा रहे हैं। विवाहिता हो या विवाहित फिल्म में अभद्र अमर्यादित व्यवहार का, चित्रण हो रहा है। जैसे बेटी, पिता के बारे में कहे कि विवाह के पहले उनकी कोई gf थी क्या मां के पहले। ऐसी गंदगी ऐसी अनैतिकता साऊथ के फिल्मो मे और बालीवुड दोनो मे भरमार है। इनका समाज पर बुरा असर पड़ रहा है। अनेकों सीन्स है जो यथार्थ जीवन में मर्यादा यथार्थ आचार विचार आचरण से मेल नही खाते। पहले कि फिल्मों में प्रेमी प्रेमिका होते थे, वे प्रेम ही करते थे, उसको प...

गोमुत्र

 गौमूत्र के उपयोग से हृदय रोग दूर होता है तथा पेशाब खुलकर होता है कुछ दिन तक गौमूत्र सेवन से धमनियों में रक्त का दबाव स्वाभाविक होने लगता हैं , गौमूत्र सेवन से भूख बढती है , यह पुराने चर्म रोग की उत्तम औषधि है  - डॉ . काफोड हैमिल्टन , ब्रिटेन गौमूत्र रक्त में बहने वाले दूषित कीटाणुओं का नाश करता है।    - डॉ . सिमर्स , ब्रिटेन #संदर्भ : Gau Seva कथा पृ. 28 Vijay Singh Yadav, Advocate (Jay Kul Devi Seva Samiti Ratlam) Published:2021
 सम्बन्ध संज्ञाओं का दूषित होना दे दनादन फ़िल्म में शक्ति कपूर अपने से बहुत छोटी उम्र की लड़की को कहते हैं कि तुम चाचा, ताया, मामा कुछ भी कहो पर एक बार मेरे कमरे में आ जाओ, बीवी नम्बर वन में सलमान सुष्मिता सेन का परिचय अपनी आंटी के रूप में करवाते हैं। भागमभाग मूवी में अक्षय कुमार एक लड़की से जबरदस्ती करते हैं पोल खुलने में दीदी दीदी कह शोर करते हैं।  आंटी, भाभी, दीदी, चाची, मौसी शब्द के गलीच निहितार्थ जनरल यूज में आते जा रहे हैं। इन सम्बन्धों के अर्थ गूगल पर सर्च करना महापाप हो गया है। मिर्जापुर जैसे सीरीज जो विशुद्ध घृणा, असामान्य चलन और हिंदू परिवारों में निषेध इंसेस्ट कर्म को दिखाती है। ऐसे चरित्र का महिमामंडन कर समाज को किस दिशा में ढकेला जा रहा है। ऐसे लोग इस तरह के रोल कर लज्जित क्यों नही होते। चीजें कहाँ जाकर रुकेंगी। या हम हिंदू हिंदू करते कुटुंब व्यभिचार समेत उन सभी म्लेच्छ आचरणों को सामान्य बना देंगे जिसे विचार करने का प्रायश्चित भी भयंकर हुआ करता था। एक शब्द है 'बहन जी टाइप' , मतलब बहन होना अभिशाप है। सच्चरित्र लड़का भोंदू, शालीन लड़की बहनजी, गम्भीर बातें करने वाला पकाऊ...

वर्जित का सामान्यीकरण...

 ऐसी फिल्मों को justify करनेवाले लोग निश्चित रूप से व्यभिचारी होते हैं अर्थात् व्यभिचारवादी। और शोशल मिडिया पर इस पर अभी एक पोस्ट में देखा, नीचे कमेंट बॉक्स में कथित भद्र स्त्री पुरुष.. हां आलोचकों को देखकर मन संतोष हुआ कि मानव शेष है अभी। अन्यथा इसे प्रेम शब्द का नाम देकर justify करनेवाले व इसे इसहेतू महानायक बताने वाले गुलाम भी दुर्भाग्य से कम नही है। फिर क्या आश्चर्य ऐसे ही लोगों के द्वारा बलात्कार, अश्लीलता, असामाजिकता क्यो न बढे? मनस तत्व ही दुषीत जो हो चुका है। फलतः विवेक नष्ट हो गए हैं ऐसे लोगों का। ये समाज में अत्यल्प प्रमाण मे कम अधिक होता है इसका अभिप्राय ये तो नही कि जिस घृणित कर्म की कल्पना भी नहीं होनी चाहिए उसको मनोरंजन बनाकर परोसा जाए । उसे प्रेम नाम देकर justify किया जाय। जिसे देखकर दिमाग खराब होता हो वह मनोरंजन? यह वर्जित का सामान्यीकरण करना नही तो और क्या है? मान लिया जनजागृति... वो तो समाचार कर रहे हैं। फिल्म बने लेकिन इससे संदेश क्या जाता है? वर्जित वस्तु को सामाजिक अत्याचार के भांति पेश किया जाता है। वामपंथ आपको नजर नही आएगा इसमे। चालाकी से राष्ट्र की आत्मा पर ...