संदेश

अक्टूबर, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भारतीय दर्शन व वैदिक विज्ञान की छाया तले...

चित्र
भारतीय तत्व दर्शन व वैदिक विज्ञान की छाया तले वर्तमान विज्ञान की पुष्टि सृष्टि व विस्तार हुआ..  वैदिक विज्ञान व दर्शन की छाया तले वर्तमान विज्ञान की पुष्टि प्रादुर्भाव व विस्तार हुआ..  अन्तरिक्षे दुन्दुभयो वितना बदन्ति-अधिकुम्भाः पर्यायन्ति । ( जैमिनि 2-404 ) । अर्थात् अन्तरिक्ष में दुन्दुभि के समान विस्तृत और सर्वव्यापी परम वाक् - ध्वनि होती रहती है ।  अब तक यह बात समझ में आने न वाली थी पर जब सूर्य की खोज करते - करते सन 1942 में मक्क्रिय ने इस तरह की ध्वनि सचमुच सुनी तो वह आश्चर्यचकित रह गया । उसने अपनी ' फिजिक्स आफ दि सन एण्ड स्टार्स ' पुस्तक के 83 पेज पर लिखा है कि- ' श्री जे.एस. दे द्वारा वर्णित सूर्य से आने वाली ध्वनि ( सोलर न्वाइज ) गलत नहीं है वरन् सूर्य की ध्वनि की तरह ही और भी तारा - मण्डलों ( ग्लैक्सीज ) से ध्वनि तरंगें आ रही हैं । वह सौर - घोष सोलर न्वाइज के समान ही हैं । उनका अनुसंधान किया जाना बहुत आवश्यक है । ' दर्शन से विज्ञानियों की सहमति अवश्य रही तदुपरांत जैसे कथित पश्चिमी विज्ञान आगे बढा वह प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या ऐसे स्पष्ट हो जाती। एक समय किसी भी क...

ओ३म् 🕉️

 भारतीय तत्व - दर्शन की पुष्टि में साइन्स का सिद्धांत तब बड़ा सहायक सिद्ध हुआ कि आपः में शब्द को आच्छादित किया । अन्तरिक्षे दुन्दुभयो वितना बदन्ति - अधिकुम्भाः पर्यायन्ति । ( जैमिनि 2/404 ) । अर्थात् अन्तरिक्ष में दुन्दुभि के समान विस्तृत और सर्वव्यापी परम वाक् - ध्वनि होती रहती है । अब तक यह बात समझ में आने न वाली थी पर जब सूर्य की खोज करते - करते सन 1942 में मक्क्रिय ने इस तरह की ध्वनि सचमुच सुनी तो वह आश्चर्यचकित रह गया । उसने अपनी ' फिजिक्स आफ दि सन एण्ड स्टार्स ' पुस्तक के 83 पेज पर लिखा है कि- ' श्री जे.एस. दे द्वारा वर्णित सूर्य से आने वाली ध्वनि ( सोलर न्वाइज ) गलत नहीं है वरन् सूर्य की ध्वनि की तरह ही और भी तारा - मण्डलों ( ग्लैक्सीज ) से ध्वनि तरंगें आ रही हैं । वह सौर - घोष सोलर न्वाइज के समान ही हैं । उनका अनुसंधान किया जाना बहुत आवश्यक है । ' इस शताब्दी में सुर्य से ओ३म् की ध्वनि की पुष्टि भी नासा के एक वैज्ञानिक पाडेय ने की है। अमेरिका संस्था NASA ने सूर्य की आवाज रिकॉर्ड की है , किंतु अपने कानों की क्षमता 20 Hz से लेकर 20,000 Hz तक ही होती है , किंतु सूर्...

It is my personal life कहना अवैज्ञानिकता व अज्ञानीपण के लक्षण है..

चित्र
कोई भी पापकर्म कथित निजी वस्तु नहीं है... कोई भी अधर्म पाप या तामसिक राजसी वस्तु को निजी या वैयक्तिक रूप से साझा करके आप बच नहीं सकते। ऐसा तो कम पढ़ा जाता है या जो अज्ञानी है, राष्ट्र या अपनी सभ्यता के इतिहास से अनाभिज्ञ हैं, विज्ञान और अध्यात्म का एक हिस्सा भी नहीं पता तीन पीछे, औपनिवेशिक दास और तंत्र है वही लोग ये कहते हैं हमारे देश में पाए जाते हैं। फिल्मी भांडवर्ग विशेष रूप से ये कहा गया है। पश्चिम में अविद्या आदि दोषों से कुसंस्कारित है। अधिकांश भारतीयों में आत्मा की भावना, राष्ट्र के आयमो में मित्रता की भावना नहीं। आज़ादी का दर्शन नहीं। जिनको ये सब है ही नहीं, बंदर से भी ज्यादा चंचल, जानवरों से हिन दीन, मुर्ख लेवल के ये लोग होते हैं, पहचान के तौर पर जो स्टैप चड्डी पर सच्चाई ढूंढते हैं, वे अक्सर ये व्यक्तिगत वाली बातें कहते पाए जाते हैं। ये कटु सत्य है। अस्तु  (1) कथित निजीपन का वैज्ञानिक दृष्टि से खंडन (2)उसेवाली हानियाँ या परिणाम (3) समाधान व निष्कर्ष या चर्चा  💥निजी जीवन का वैज्ञानिक विश्लेषण खंडन : वैश्याचारी हो, वैश्या, तामसिक आहार वाले, कामी वैश्य कामांध मदांध नर-न...

ओशो एक व्यभिचारी

चित्र
व्यभिचारी ओशो किसी की लेखनी अच्छी होती है, किसी का वक्तव्य अच्छा होता है, किसी की प्रतिभा अच्छी होती है। हो सकता है वो अच्छा बोल पाता हो, या हो सकता है वो अच्छा लिख पाता हो, या वो व्यक्ति हर विषय पर रचनात्मक रूप से वाणी द्वारा जटिल विषय बहोत सरलता से अभिव्यक्त कर सकें व उनको समझे। जाहिर है कि वो एक बुद्धि युक्त व्यक्ति है। उसकी कई बाते आकर्षक लच्छेदार व स्वीकार्य हो सकती है। हो सकता है ऐसे ऐसो मे कोई इंजीनियर हो, कलाकार हो, डॉक्टर हो, निष्णात कोई जज हो। वाणी व लेखन में वो विद्वान हो। लेकिन ऐसा प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने कर्म में व्यवहार में भिन्न हो, उस ने यदि आपके या किसी के निर्दोष बहन बेटी बहु वा भार्या का बलात्कार किया , उसने कोई कोठा खोला, इसी प्रतिभा का जानकारी व बुद्धि का चूड़ान्त दुरुपयोग कर अध्यात्म ज्ञान तंत्र आदि के नामपर अपने दिमागी उपज से यहां वहां से जोड़तोड़ करके कोई कथित दर्शन गढकर के कोई कोठा खोल दिया, व वहा व्यभिचार का रति-संसर्ग का पंथ चला दिया , लोगो को गोनोरिया हो रहा है, यौन रोग हो रहे हैं, कयी व्यभिचारी उसके चेले चपाटे बन गये हैं, हर रोज उसके अड्डे मे ९० स्त्रियों ...

स्वतंत्रता का अर्थ व परिभाषा...

चित्र
#स्वतंत्रता... स्व का तंत्र अर्थात् स्व+तंत्रता... स्व माने मै कौन हुं? सचमे सोचने योग्य बात है कि मै कौन हुं?  प्रत्येक मनुष्य को विचार करना चाहिए... न मै नाम हूं, न रूप न देह , न इन्द्रिय , न मन न बुद्धि हुं..   मैं देह नहीं हूँ , क्योंकि देह जड़ है और मैं चेतन हूँ , देह क्षय , वृद्धि , उत्पत्ति और विनाश धर्म वाला है , मैं इनसे सर्वथा रहित हूँ । इसी तरह मैं बुद्धि भी नहीं हूँ क्योंकि बुद्धि भी और वृद्धि स्वभाव वाली है मैं क्षय वृद्धि से सर्वथा रहित हूँ । बुद्धि में मन्दता , तीव्रता , पवित्रता , मलिनता , विकार , व्यभिचारादि होते हैं परन्तु मैं उसकी इन सब स्थितियों को जानने वाला हूँ । मैं कहता हूँ उस समय मेरी बुद्धि ठीक नहीं थी अब ठीक है । बुद्धि कब क्या विचार रही है और क्या निर्णय कर रही है , इसको मैं जानता हूँ । बुद्धि दृश्य है मैं उसका दृष्टा हूँ । अतएव ' बुद्धि का मुझसे पृथकन्ध सिद्ध है मैं बुद्धि नहीं हूँ । इस प्रकार मैं नाम , रूप , देह , इन्द्रिय , मन , बुद्धि प्रभृति नहीं हूँ । इसका सही उत्तर यह है कि मैं आत्मा हूँ। शरीर और आत्मा की पृथकता की बात हम लोगों ने सुन रखी...

निषिद्ध का सामान्यीकरण ही तो विराष्ट्रियकरण का सुत्र है...

चित्र
OMG 2 exposed..... 1. पहले से ही अत्यंत आपत्तिजनक अर्थात् सहशिक्षा मे लज्जा से मर जावे ऐसी सेक्स एजूकेशन कक्षा दसवीं से बारहवीं मे दी जाती है।  2. फिर भी OMG 2 जैसी एजेंडाबाज फिल्म आचार्य वात्स्यायन के कामसूत्र के हवाले से किस सेक्स एजूकेशन को प्रस्थापित करने की बात करते हैं?  3. आचार्य वात्स्यायन तो विद्या का अध्ययन ब्रह्मचर्य के साथ जब तक पुरा न हो जाए, यानी पुरा प्रमुख एजूकेशन (वर्तमान के अनुसार स्नातक या PG तक PhD तक) पुर्ण न हो, (अर्थात् ब्रह्मचर्याश्रम) तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करने ही कहते हैं। 4. उनके नामपर छोटे बच्चों को अनावश्यक अब्रह्मचर्य युक्त चित्रण व शिक्षा कराने व अमर्यादा युक्त विराष्ट्रियकरण की सोच वात्स्यायन के भी विरूद्ध है। अतः ये दिखाना की हम मैकालेइज्म के विरोधी है और काम मैकाले से भी हानिकारक करना उससे भी गिरा हुआ करना बडी हानिकारक धूर्तता है।  5. अतः इनसे सावधान रहें। ये भ्रामक व हास्यास्पद नेरेटिव है। मात्र धनार्जन व विराष्ट्रियकरण ही इनका उद्देश्य है। #ध्यातव्य : OMG 2 पर ध्यान दिया जावे तो एक बात आगे आती है कि इस फिल्म का उद्देश्य विराष्ट्रियक...

निद्रा...

चित्र
#निद्रा... अन्तर्यात्रा विज्ञान की प्रत्येक कड़ी आपको अपनी सम्भावनाओं से परिचय कराती है । इन्हें साकार और सम्भव करने की विधियाँ सुझाती हैं । इस योग कथा के पाठकों से योगसूत्र का महर्षि पतञ्जलि का कहना है कि सम्भावनाएँ केवल विभु में ही नहीं अणु में भी है । पर्वत में ही नहीं राई में भी बहुत कुछ समाया है । जिन्हें हम तुच्छ समझ लेते हैं , क्षुद्र कहकर उपेक्षित कर देते हैं । उनमें भी न जाने कितना कुछ ऐसा है जो बेशकीमती है । जागरण के महत्त्व से तो सभी परिचित हैं । महर्षि कहते हैं कि निद्रा भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है । इस सूत्र में योग सूत्रकार ने मन की तीसरी वृत्ति ' कल्पना ' के बारे में बताया है । इन कल्पनाओं का यदि कोई ढंग से सदुपयोग करना सीख जाय तो जीवन की डगर में बढ़ते हुए हर कदम पर नए खजाने मिल सकते हैं । अब महर्षि चौथी वृत्ति के स्वरूप और सत्य को समाधिपाद के दसवें सूत्र में उद्घाटित करते हैं   ❛ अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा ❜ ॥ योगसुत्र1/10 ॥ शब्दार्थ - अभाव - प्रत्यय - आलम्बना = अभाव की प्रतीति को आश्रय करने वाली , वृत्ति = वृत्ति , निद्रा = निद्रा है । ❝ अर्थात् मन की यह ...

त्रिया चरित्रं

नृपस्य चित्तं ,कृपणस्य वित्तम;  त्रिया चरित्रं ,पुरुषस्य भाग्यम ; देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥   ~ सम्राट भर्तुहरी का कथन

विराङ्गना नीलदेवी

वीराङ्गना नीलदेवी...   भारत में ही नहीं , अपितु सारे विश्व में नारी शक्ति समझी गयी है । नारीत्व के इतिहास ने ही वीरता का मुख उज्वल कर रक्खा है । देश , कुल और आत्मसम्मान की रक्षा के लिये नारियों ने समय - समय पर अपने कुसुमवत् जीवन की बलि दे दी है । म्लेच्छो के आक्रमण व संघर्षकाल की बात है , पंजाब प्रान्त के नूरपुर राज्य में राजा सूरजदेव की तूती बोल रही थी । उनकी रानी नीलदेवी अपनी सुन्दरता और संगीत - निपुणता के लिये प्रसिद्ध थी । पंजाब उस समय यवन - सेनापति अब्दुलशरीफ खाँ के द्वारा आक्रांत हो रहा था । छलपूर्वक आक्रमण व कब्जे के अनन्तर हिन्दुओं को मुसलमान बना लेना उनकी बहू - बेटियों को धर्मभ्रष्ट कर देना आदि उसकी रणयात्रा का किताबी G-हादी उद्देश्य था । वह बढ़ते - बढ़ते नूरपुर तक आ गया राजा सूरजदेव ने अपनी छोटी - सी सेना लेकर बड़ी शूरता से उसका सामना किया , यवनाधिपति अथवा उक्त मलेच्छ की हार - पर - हार होने लगी । किंतु अन्त में उसने एक दिन धोखे से राजा को कैद कर पिंजरे में डाल दिया । राजपूतों में खलबली मच गयीं । राजकुमार सोमदेव ने प्रण कर लिया कि या तो वह अपनी वीर सेना के साथ वीर गति को प...