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ओशो की सेक्रेटरी व प्रेमिका आनंदशिला के अनुसार क्या था ओशो..?

ओशो की सेक्रेटरी व प्रेमिका आनंदशिला के द्वारा ओशो का खुलासा..?  व्यभिचारी रजनीश या 'ओशो' संभोग व ड्रग्स - वेश्यालय का पंथ चलाने के लिए कुख्यात है। जो कि अनके अनेक देशो द्वारा खदेडा गया । एक जमाने में रजनीश ओशो की सबसे करीबी और प्रिय रहीं, आनंद शीला ने अपनी किताब में उनके बारे में कई बातें लिखी हैं। आनंद शीला ने किताब 'डोंट किल हिम! द स्‍टोरी ऑफ माई लाइफ विद भगवान रजनीश' लिखी। 2013 में आई इस किताब में उन्‍होंने कई दावे किए। मां आनंद शीला ने अपनी किताब में लिखा कि : (१) मुंबई स्‍थित मेरे चाचा के बंगले के ठीक सामने ही रजनीश का घर था। इसलिए उनसे मुलाकात की मेरी इच्‍छा जल्‍द ही पूरी हो गई। जब मैं रजनीश के घर गई तो वह सफेद कपड़ों में बैठे थे। उनके ठीक पीछे एक छोटी सी टेबल थी जिस पर कई किताबें पड़ी थीं। उनकी कुर्सी के सामने दो पलंग थे। वह जब मुझसे मिले तो कुछ क्षणों तक उन्‍होंने मुझे अपने सीने से लगाए रखा। उस समय मुझे एक अद्भुत व आनंद का अनुभव हुआ। इसके बाद आहिस्‍ता-आहिस्‍ता उन्‍होंने मुझे छोड़ा और फिर मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरे सिर को अपनी गोद में रखा। इसके बाद उन्‍होंने मेरे ...

अशोक के इतिहास का फर्जीवाड़ा...

अशोक के इतिहास का फर्जीवाड़ा... काश्मीर के गोनन्द राजवंश का शासक अशोक और मौर्य वंश का अशोक माने कालाशोक दोनो एक ही व्यक्ति केवल इस आधार पर नही हो सकते कि दोनो का शासनकाल बुद्ध के निर्वाण के लगभग 100 वर्ष पश्चात होता है। गोनन्द राजवंश व मौर्य क्या दोनो एक है? गोनन्द और मौर्य दोनो एक है? इतिहासकार वेदवीर आर्य भी दोनो को काल के अनुमानित आधार पर एक मानते हैं, लेकिन दोनो का राजवंश भिन्न, माता पिता भिन्न, राजधानीयां भिन्न-भिन्न, साम्राज्य भिन्न-भिन्न, तो दोनो अशोक एक कैसे हो सकते हैं?  इस संदर्भ इतिहासकार प्रो. आचार्य रामदेव का मत ही सत्य है। जो इनको भिन्न मानते हैं। आचार्य रामदेव का कहना है कि बौद्ध लेखकों ने अशोकादित्य (समुद्रगुप्त) और गोनन्दी अशोक (कश्मीर) दोनों कोमिलाकर एक चक्रवर्ती अशोक की कल्पना कर ली है। (भारतवर्ष का इतिहास, तृतीय खण्ड, प्रथम भाग, पृ.41) ➡️ इतिहासकार सत्यकेतु विद्यालंकार कृत        मौर्यवंश का इतिहास पृ. 77 पढि़ए :-    एक अशोक मौर्य वंश का था ,    जिसका उल्लेख पुराणों में विद्यमान है ।    दूसरा अशोक गुप्त वंश में ह...

शोभनीय वस्त्र धारण करने वाली पत्नी का शरीर पति ही देखते हैं...

शोभनीय वस्त्र धारण करने वाली पत्नी का शरीर पति ही देखते हैं , दूसरे लोग केवल वस्त्र देखते हैं...  ....      उ॒त त्व॒: पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्व॑: शृ॒ण्वन्न शृ॑णोत्येनाम् ।     उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं१॒॑ वि स॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासा॑: ॥                      ~ ऋग्वेद १०/७१/४    " लिपि का ज्ञान न होने से कोई एक लिपिरूप वाणी को आँख से देखता तो है लेकिन देखते हुए भी मानो वो नही देख रहा , कोई एक इस शब्दरूप वाणी को सुनता तो है लेकिन अर्थज्ञान न होने से वो न सुनने वाले के ही भांति है। और ये वाणी किसी एक के लिए अपने आत्मा को खोल देती है - प्रकट करती है , ज्ञान के कारण से। वैसे ही जैसे अच्छे शोभनीय वस्त्र धारण किये हुए पत्नी , गृहस्थ धर्म की कामना करती हुई केवल अपने शरीर को पति के समक्ष प्रकट करती है। शोभनीय वस्त्र धारण करने वाली पत्नी का शरीर पति ही देखते हैं , दूसरे लोग केवल वस्त्र देखते हैं । " 💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦💦   💥 दुसरे शब्दो मे -  लिपी का ज्ञान न रखने वाला ब...

नशेड़ी ओशो के अनुसार बच्चे खुलकर नशा करें...

सिगरेट और शराब पीने वालों पर कुख्यात व्यभिचारी ओशो के यह विचार जान लीजिए... ओशो कहता है - ❝ सभ्यता दो रोग पैदा करवाती है, एक तरफ अहंकार और एक तरफ अपराध। तुमने किसी बच्चे को कहा, सिगरेट नहीं पीना; महापाप है, नरक में सड़ोगे। तुमने डरवाया। अब अगर पीएगा, तो अपराध-भाव पैदा होगा कि मैंने कुछ पाप किया। मां-बाप से झूठ बोला, छिपाया। वह डरा-डरा घर आएगा। चैकन्ना रहेगा कि कहीं न कहीं से खबर मिलने ही वाली है। कोई न कोई देख ही लिया होगा। कपड़े में बास आ जाएगी मां को। मुंह को पास लाएगा, तो मुंह से पता चल जाएगा। वह पकड़ा ही जाने वाला है। वह अपराध से भरा हुआ है, डर रहा है, घबड़ा रहा है। ❞[1] अब इस कथन पर क्या कहे? कोनसी गाली दे? कोई शब्द ही नहीं बचा। निशब्द। ये कितना मुढ़बुद्धि रहा होगा इसका अनुमान आप लगा सकते हैं। पहला तो इसको समाज में जो असामाजिक तत्व है जो समाज मे अत्यंत निषिद्ध तथा लॉ तथा विज्ञान के विरूद्ध गलत काम करते हैं उनको अपनी ओर आकृष्ट करना था। और अपने आप को उनमे भगवान के रूप में प्रतिष्ठित करना था। इसने अपनी योजना या अभियान की ऐसी ही रूपरेखा गढी है जैसे कयी ढोंगी पाखंडी रचते है लेकिन ये कु...

अजबदे पंवार

अजबदे पंवार  अजबदे स्वतन्त्रता प्रेमी , स्वाभिमानी वीरवर महाराणा प्रताप की रानी थी । तत्कालीन अन्य रियासतों के राजा महाराजा मुगल वादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार कर आराम की जिन्दगी बिता रहे थे परन्तु प्रताप ने अभी तक मुगल सम्राट् को अपना शीश नहीं मुकाया था । हल्दी घाटी में अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करने वाला यह वीर अपने आन मान पर दृढ़ था । मुगलों से निरन्तर आठ वर्ष तक संघर्ष करते रहने के कारण महाराणा प्रताप की सैनिक शक्ति धीरे - धीरे कम होती जा रही थी , ऐसी स्थिति में दुर्ग के भीतर रहकर सशक्त शत्रु का अधिक समय तक डटकर मुकावला करना संभव नहीं था , अतः राणा प्रताप की वीर पत्नी अजवदे पंवार ने राजमहलों का परित्याग कर जगल में प्राथय लेने का सुझाव अपने पति को दिया । राणा प्रताप को अपनी पत्नी अजबदे पंवार का यह समयोचित सुझाव अच्छा लगा और अपने परिवार के सदस्यों , प्रमुख सामन्तों व विश्वासपात्र सैनिकों के साथ जगल में प्रस्थान किया । राणा प्रताप अपनी कोमलांगी रानी द्वारा जंगल में प्रश्रय लेने के स्वैच्छिक विचार से एक बार तो हिचकिचाये और सकुचाते हुए अजबदे की ओर देखते हुए मन में यह विचार किया कि यह ...

श्रीमद्भागवतगीता के वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से ओशो खंडन..

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न्याय दर्शन के ज्ञाता जानते हैं कि सत्य तर्क तो वही है जो सर्वकालिक सार्वभौमिक हो। किसी एक स्थिति पर लागू तो हो लेकिन अन्य पर नही इस प्रकार का कोई सिद्धांत सत्य नही बैठता। अंग्रेज़ी में एक टर्म होता है यूनिवर्सल ट्रुथ अर्थात सार्वभौमिक सत्य, जिस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता। किंतु, हम जिस वर्तमान में जी रहे हैं, यहाँ तो कोई भी सत्य तब तक ही सार्वभौमिक है जब तक वह अपनी कथित विचारधारा से मेल खाता हो। वैदिक दर्शन परस्पर विरूद्ध भी नहीं और एकमात्र सिद्धांत है जो सार्वभौमिक सर्वकालिक सनातन शाश्वत सत्य है। चाहे वो वैज्ञानिक अनुसंधान में देखा जाए, या मनोवैज्ञानिक धरातल पर।  कोई मूर्ख आए, परस्पर विरूद्ध दोहरी बातें करे , शराब सेवन करे , व्यभिचार का पंथ खडा करें , व्यभिचार नग्नता अब्रह्मचर्य पर लेक्चर दे, व अपने लेक्चर का प्रवचन का नाम गीता उपनिषद योग आदि रख दे फिर भी दुर्भाग्य से उसे अद्भुत भगवान मानने वाले अविवेकी लोग है ही । क्योंकि उनकी बुद्धि व विवेक भी गीता के अध्याय 2 के इन दो श्लोकों के अनुरूप ही भ्रष्ट हो चुकी है। तभी तो ऐसो को भगवान बनाने वाले चेले अवश्य विद्यमान है , भले ही कथित गु...

वीराङ्गना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई...

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वीराङ्गना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई... भारत के घोर शत्रु लार्ड मैकाले का कथन है--  “ 𝑨 𝒑𝒆𝒐𝒑𝒍𝒆 𝒘𝒉𝒊𝒄𝒉 𝒕𝒂𝒌𝒆𝒔 𝒏𝒐 𝒑𝒓𝒊𝒅𝒆 𝒊𝒏 𝒕𝒉𝒆 𝒏𝒐𝒃𝒍𝒆 𝒂𝒄𝒉𝒊𝒆𝒗𝒆𝒎𝒆𝒏𝒕𝒔 𝒐𝒇 𝒕𝒉𝒆𝒊𝒓 𝒂𝒏𝒄𝒆𝒔𝒕𝒐𝒓𝒔 𝒘𝒊𝒍𝒍 𝒏𝒆𝒗𝒆𝒓 𝒂𝒄𝒉𝒊𝒆𝒗𝒆 𝒂𝒏𝒚 - 𝒕𝒉𝒊𝒏𝒈 𝒘𝒐𝒓𝒕𝒉𝒚 𝒕𝒐 𝒃𝒆 𝒓𝒆𝒎𝒆𝒎𝒃𝒆𝒓𝒆𝒅 𝒘𝒊𝒕𝒉 𝒑𝒓𝒊𝒅𝒆 𝒃𝒚 𝒕𝒉𝒆𝒊𝒓 𝒅𝒆𝒔𝒄𝒆𝒏𝒅𝒂𝒏𝒕𝒔 . "   ❝ अर्थात् जो लोग अपने पूर्वजों की महान      उपलब्धियों पर गर्व नहीं करते, वे कभी भी      ऐसी कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर पाएंगे      जो उनके वंशजों द्वारा गर्व के साथ याद      किए जाने योग्य हो। ❞ झाँसीकी रानी लक्ष्मीबाई के जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन, प्रस्तुत है श्रीयुत् दत्तात्रय बलवंत पारसनीस कृत "झाँसीकी रानी लक्ष्मीबाई" के कुश अंश जिससे उनके जीवन से कुछ प्रेरक बातो का मनन कर सकें... ▶️ जन्म आदि...  महाराष्ट्र देश में सताराके समीप कृष्णा नदी के किनारे बाई नामका एक ग्राम है । मोरोपंतकी पत्नीका नाम भागीरथी बाई था । यह स्त्री बड़...

सती प्रभावती (गुनौर)

सती प्रभावती गुनौर के राजा की रानी थी। [1][2][3]  रानी प्रभावती के रूप, लावण्य और गुणों में उनके समान उस समय बहोत कम ही रूपवान ऐसी थीं। उनकी सुन्दरता की ख्याति पर मुग्ध होकर निकटस्थ यवनाधिपति ने गुन्नौर पर चढ़ाई की। रानी बड़ी वीरता से लढी। बहुत-से राजपूत और यवन सैनिक मारे गये। जब थोड़ी-सी सेना शेष रह गयी, रानी गुन्नौर किले से नर्मदा किले में चली गयी । गुन्नोर पर यवनों का आधिपत्य स्थापित हो गया। यवनसेना ने उनका पीछा किया। रानी ने किले के फाटक बंद करवा लिये। बहुत से राजपूत मारे गये । यवनाधिपति ने रानी को पत्र लिखा कि तुम आत्मसमर्पण कर दो। उसने यह भी लिखा था कि तुम, मेरे साथ विवाह कर लो, मैं राज्य छोड़ दूँगा और दास की तरह रहूँगा। रानी पत्र पाकर क्रोध से जल उठी, पर अन्य उपायों से रक्षा न होती देख कर उसने कूटनीति से उस दुष्ट को उचित शिक्षा देनी चाही । रानी ने उसे लिखा 'कि में विवाह करने के लिये तैयार हूँ, किन्तु विवाह योग्य पोशाक आपके पास तैयार नहीं है। मैं पोशाक भेजती हूँ, आप उसी को पहनकर पधारें।' दुष्ट यवन शादी की पोशाक पहन कर महल में पहुँचा। रानी का दिव्य रूप देखकर बह दुष्ट चिल्...

कैप्टन अजित वडकायिल का ओशो पर खुलासा...

कैप्टन अजित वडकायिल का ओशो पर खुलासा...  कैप्टन अजीत वडकायिल का परिचय : 6640 से अधिक दिनों तक (मुख्य रूप से) रासायनिक टैंकरों की कमान संभाली - 30 वर्षों तक (एक विश्व रिकॉर्ड!)। जहाज के कप्तान थे। (वैसे गुगल सर्च करें तो इनकी जानकारी मिल जाएगी, ये प्रसिद्ध व्यक्ति व बहुआयामी अनुभवी जानकार तथा ब्लागर है।) इनके ओशो संबंधित कुछ खुलासे व तथ्य प्रस्तुत है... (१) कैप्टन अजीत वडकायिल लिखते हैं -        मैं ओशो की तरह कुएं का मेंढक नहीं हूं.. मैंने 40 वर्षों तक इस ग्रह (पृथ्वी) की यात्रा की है। मैंने ओशो से जुड़ी सारी किताबें पढ़ी हैं। मुझे पता है कि उसकी कीमत क्या है. मैं 30 वर्षों से अधिक समय से रजनीश को सुन रहा हूँ.. ईमानदारी से कहूँ तो, वह स्पष्ट रूप से सोच सकते हैं और उनके पास बोलने की क्षमता है.. उन्हें "भगवान" (भगवान) कहना BRAY के समान है । (ब्रे अर्थात् गधे की कर्कश ध्वनि )  वह कोई गुरु भी नहीं हैं.. भारतीय आध्यात्मिकता उनसे परे है.. वह एक पंथ नेता हैं। वह केवल उथली मानसिकता वाले लोगों को ही प्रभावित कर सकता है। ओशो का "डायनेमिक मेडिटेशन" अपने अनुयायियों को...

दरिन्दा ओशो श्रीराम पर क्या कहता है?

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व्यभिचारी दरिंदा ओशो का मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम पर कथन व उसका खंडन... अल्पमती ओशो कहता है -  ❝ शबरी कोई बूढ़ी औरत नहीं थी, जैसा कि रामलीला में दिखलाई जाती है। शबरी अति सुंदर युवा स्त्री थी। और शबरी का राम से प्रेम था। असल में, किसी के जूठे बेर खा लेना प्रेम में ही संभव हो सकता है। तुम्हें कोई आदमी आधा केला खाकर और तुम्हें दे दे। जूता निकाल लोगे--कि तूने समझा क्या है! लेकिन प्रेम अंधा होता है। प्रेमी एक-दूसरे की जूठी चीजें खा सकते हैं, प्रेमियों में ऐसी संभावना है। और कोई जूठी चीज नहीं खा सकता। राम भी नहीं खा सकते थे। साफ देखते कि शबरी पहले खुद चख रही है, इनकार कर दिया होता। शबरी सुंदर स्त्री थी, राम के प्रेम में थी।❜❜ खंडन :  बुढी तपस्वीनी शबरी माता इस दरिंदे का ऐसा कथन उसकी अल्पमति दर्शती है - सारा का सारा श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का अरण्यकाण्डम् चतुःसप्ततितमः सर्गः ( सर्ग 74 ) जिसमे श्रीराम और लक्ष्मण का पम्पासरोवर के तट पर मतङ्गवन में शबरी के आश्रम पर जाना , शबरी का अपने शरीर की आहुति दे दिव्यधाम को प्रस्थान करना आदि है, वो ज्यो का त्यो प्रस्तुत है... तौ कबन्धेन तं मा...

रामराज्य पर लम्पट ओशो के कथन...

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राम राज्य पर ओशो... देखिए ओशो निराधार शस्त्र प्रमाण बकवाद कैसे करता था और पशुबुद्धि थी उसकी अधमता की पराकाष्ठा देखिए: राम राज्य पर वो है -  (1) राम के राज्य में आदमी गुलाम की तरह बिकते थे। (2) औरतें बिकती रहीं! (3) राम के समय में, और राम के पहले भी-वधू का अर्थ हुआ था, स्त्री बनी! पति पत्नी के साथ व्यवहार करने का हक तो है, लेकिन उनके बच्चों को संपत्ति खरीदने का कोई अधिकार नहीं होगा! पत्नी और वधू में यही बात थी। सभी पत्नियां वधु नहीं थे, और सभी वधु पत्नियां नहीं थे। वधू नंबर दो की पत्नी थी। जैसे नंबर दो की भी होती है न, जिसमें चोरी-चपाती का सब कुछ होता है! ऐसे नंबर दो की पत्नी थी वधू। (4) ​राम राज्य कभी नहीं आना चाहिए                           —–ओशो यदि इन घटिया निराधार बात में वाल्मिकी रामायण या उसके अतिरिक्त किसी अन्य रामायण या रामकथा में भी उल्लेख किया गया है तो भी मान लें कि ये ओछा कुछ पढकर बोलता है या निराधार नहीं बोलता है। ना जाने कौनसा नशा फंकर इस बुद्धिहीन ने अंड-बंद गपोड़ेबाजी की है। आपको लगता है, इस नरपशु...