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जून, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जानिए विक्रमादित्य के लोककथाओं के पिछे का सच !

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#विक्रम_की_लोक_कथायें !  "शकवंश का नाश करने वाले मालव ' विक्रमादित्य ' के सम्बन्ध में कथानक में जो वर्णन है उसमें अविश्वास करने का कारण मैं नहीं देखता । बहुत से विद्वान् इस तरह के वर्णन को अविश्वास की दृष्टि से देखते हैं । क्योकि भारतीय अनुमति में उनकी धारणा अविश्वासपूर्ण होती है । कभी कभी वे भारतीय - शास्त्र की अपेक्षा विदेशी लेखकों के अत्यन्त आश्चर्य - जनक वर्णनो को भी अच्छा समझते हैं ? " -डाक्टर ' कोनो ' भारतीय कथा - किंवदन्तियों में ' विक्रमादित्य ' एक महान् दानवीर , महान् परोपकारी के रूप में चित्रित है । उनके राज्य में कोई दुःखी नहीं था , अन्नवस्त्र सभी को सुलभ था । वे विद्याव्यसनी , सत्यनिष्ट , प्रजावत्सल और उदार थे । उनके सम्बन्ध में बहुत - सी बातें ऐसी सुनने को मिलती हैं , जो न तो मनुष्य से हो सकती हैं और न जिनका कहीं आधार मिलता है । इससे विक्रमादित्य के ऊपर दैवी विश्वास करने पाली जनरुचि का पता लगता है । पाठकों के सामने कुछ ऐसी कहा नियाँ लिखी जाती हैं जिनका आधार संस्कृत की प्राचीन कथाओं में है । संस्कृत की लोकोक्ति है ' न ह्यमूला जनश्रुतिः...

वराहमंदिर खजुराहो

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जानना चाहते हो भक्ति क्या होती है ?       आज हम आधुनिक लोग पत्थरों की बड़ी प्रतिमाएं बनाने के लिए कई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं लेकिन इस वराह प्रतिमा पर 674 देवताओं की नक्काशी की गई है ऐसा हमारे पूर्वजों ने एक हजार वर्ष पूर्व किया । अगर टेक्नोलॉजी ही किसी प्रतिमा के वैभव के लिए जिम्मेदार होती तो हम आज ऐसी प्रतिमाएं बना रहे होते लेकिन सच तो यह है कि ऐसी नक्काशियों के लिए हमें अपने पूर्वजों की तरह एकाग्रता और अदम्य भक्ति की जरूरत पड़ेगी । (वराह मंदिर, खजुराहो, मध्यप्रदेश)

चक्रवर्ती राजा भोज का बनाया भोजस्वामिदेव मंदिर चित्तौड़

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भोजस्वामी देव मंदिर अर्थात् समाधीश्वर मंदिर  : यह धारेश्वर चक्रवर्ती सम्राट भोजदेव द्वारा निर्मित असाधारण कलाकृति होने के साथ ही अवन्तिनायक भोज के शिवभक्ती का और एक एतिहासिक साक्ष्य है। महाराज भोजदेव वाग्देवी उपासक होने के बाद बड़े शिवभक्त थें। उन्होंने विशेषकर अनेक शिव मंदिर बनवाये। चित्तौड़ में उन्होंने जो मंदिर बनाया उसे इतिहासकार भोजस्वामिदेव मंदिर कहते हैं जिसे समधिश्वर के नाम से भी जाना जाता है। "भोज स्वामी देव" अर्थात् जो भोज का स्वामी हो आराध्य देव हो। तथा समधिश्वर अर्थात् जहाँ शिव समाधि में लीन हो। #मंदिर_के_शिलालेख_पर_अंकित_है : "शिव को समर्पित इस मन्दिर का निर्माण परमार शासक भोज द्वारा ग्यारहवीं सदी के मध्य में किया था । विक्रम संवत 1485 ( 1428 ई . ) में मोकल ने इस मन्दिर का पुर्ननिर्माण करवाया । क्षैतिज योजना में मन्दिर गर्भगृह . अन्तराल , मण्डप के साथ उत्तर , दक्षिण व पश्चिम में मुखमण्डप से युक्त है । मण्डप की छत पिरामिड आकार है । गर्भगृह में विशाल शिव की त्रिमुर्ति स्थापित है । मंदिर के भीतरी एवं बाहय दीवारें देवी - देवताओं की आकृतियों से सुसज्जित है । स...

सम्राट भोज प्रथम के उत्तराधिकारी राजा उदयादित्य द्वारा निर्मित महान कलाकृति.....

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सम्राट भोज प्रथम के उत्तराधिकारी राजा उदयादित्य द्वारा निर्मित महान कलाकृति.....  आँखे बंद करके किसी भी हिस्से को स्पर्श कीजिये, हर बार एक शानदार नक्काशी से आपके हाथों का संयोग होगा..                 हमारे पूर्वजों ने इन कलाकृतियों का निर्माण तो किया, लेकिन इनकी सुंदरता का वर्णन करने के लिए शब्द बनाना भूल गए। विदिशा जिले में उदयपुर आज एक छोटा सा स्थान है। यह नीलकंठेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। परमारा राजा उदयादित्य द्वारा निर्मित एक मंदिर। वह महान राजा भोज (1010-1050 ई।) के उत्तराधिकारी थे। मध्य भारत में, सटीक रूप से दिनांकित मंदिरों को देखना मुश्किल है। लेकिन उदयेश्वर मंदिर कुछ में से एक है, जिसकी सटीक तिथि है। मंदिर पर उत्कीर्ण दो शिलालेखों में 1059 से 1080 के बीच परमारा राजा उदयादित्य के दौरान मंदिर के निर्माण का रिकॉर्ड है। (नीलकंठेश्वर मंदिर, मध्यप्रदेश)

चक्रवर्ती मालवगणमुख्य विक्रम संवत् प्रवर्तक प्रमार कुलावतंस विक्रमादित्य महान् !

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सनातन धर्म संरक्षक आर्योत्तम् विक्रमी संवत प्रवर्तक ! महाराजाधिराज परमेश्वर ! राजराजेश्वर !  पृथ्वीपती सिंहासनाधिश्वर मालवगणमुख्य महाचक्रवर्तीय प्रमार क्षत्रियकुलावतंस  आर्यसम्राट अवंतिपती शकारि श्री श्री श्री साहसाङक महाराजा वीर विक्रमादित्य महान् की जय हो ! वीर गंधर्वसेन पुत्र मालवगणमुख्य विक्रमादित्य ने महावीर स्वामी के निर्वाण काल के 470 वर्षों के पश्चात भारत को शक मुक्त कराया और विक्रम संवत् या युग चलाया जो आज भी चल रहा है।  महाकवि कालिदास चक्रवर्ती विक्रमादित्य प्रमार के दरबार में नवरत्न थे, और उनका और चक्रवर्ती विक्रमादित्य प्रमार का समय ईसा पूर्व 56 (प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व) था। [1] [2] नंदसा अभिलेख मालव जाती को इक्वाक्षुवंशीय राजर्षिवंश कहता है। नंदसा अभिलेख यह संकेत करता है कि मालव सुर्यवंशी क्षत्रिय थे। मालवों का प्रारंभिक इतिहास महाभारत में प्राप्त होता है। उसके अनुसार मालव तत्कालीन प्रमुख क्षत्रिय राजवंशों से संबंधित थें।  (१) विराट के श्यालक कीचक की माता मालव राजकुमारी थी। (महाभारत. 5)  (२) मद्रराज अश्वपति की रानी सावित्री की माता मालव राजकुमारी थी...

सम्राट भोज प्रथम का साम्राज्य एक अध्ययन

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सम्राट भोज की राज्य सीमा (१) सी ० पी ० वैद्य ,  विश्वेश्वर रेउ ,  आदि भोज के राज्य को सीमित मानते हैं । सी . इ ० लुार्ड एवं के ० के ० लेले के अभिमत से सहमत होते हुए  रेउ कहते हैं कि मुंज के राज्यक्षेत्र में भोज वृद्धि नहीं कर पाया था । (२) पी ० टी ० श्रीनिवास अय्यंगर भोज का राज्य गोदावरी तथा  यमुना तक विस्तृत स्वीकार करते हैं । (३) डी ० सी ० गांगुली भोज का राज्य उत्तर में बांसवाड़ा तथा डूंगरपुर तक , दक्षिण में गोदावरी तक , खानदेश व कोंकण तक , तथा पश्चिम में आज के करा जिले तक विस्तृत मानते हैं । (४)' #द_स्ट्रगल_फार_एम्पायर ' ग्रन्थ में भोज के राज्य में चित्तौड़ , बांसवाड़ा , डूंगरपुर , भेलसा , खानदेश , कोंकण तथा गोदावरी के उत्तरी तट का क्षेत्र स्वीकार किया गया है । (५) डा ० दशरथ शर्मा के अनुसार  ' गुजरात का कुछ भाग , समस्त मालवा , राजस्थान के अनेक भाग , मध्यभारत के कुछ क्षेत्र और महाराष्ट्र का कुछ अंश उसके साम्राज्य में सम्मिलित था । ' (६) एक भग्न शिलालेख के अनुसार निर्गणनारायण ( भोज ? ) ने साकेत तथा उससे उत्तर में हिमालय तक , दक्षिण में मलय पर्वत तथा पश्चिम में ...

प्रमार वंशीय वंशावली राजा पल्ल के पश्चात

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प्रमार वंशीय राजाओं की वंशावली राजा पल्ल के पश्चात.... परमार वंश में #राजा_पल्ल हुए, उनके बाद की वंशावली (2) राजा वेणु (३) राजा प्रथु (4)  राजा प्रिय व्रत (5) राजा सुरपति (6) राजा मन्मथराय (7) राजा धौम्यपद (8) राजा लघु सुरपति (9) राजा विनयपददेव (10) राजा देव पालग (11) राजा दुनीपाल  (12)  राजा नरपाल  (13) राजा नरसिंहपाल (14) नन्दपाल राजा (15) राजा पंचायन  (16) पुरूखा राजा (17) राजा गंगपाल (18) राजा रत्नकेतु (19) राजा कामजीत (20) राजा तेजराय (21) राजा तुंगपाल (22) राजा गयपाल (23) राजा राजपाल (24) राजा रामपाल (25) राजा धर्माङ्गद  (26) राजा असैराज  (27) राजा सदमतराय (28) राजा सोमपाल (29) राजा दुनीपाल (30) राजा नरसिंह (31) राजा महीपाल (32) राजा विनयराज (33) राजा देवराज  (34) राजा लघु धर्माङ्गद  (35) राजा धरणीवाराह इस राजा #धरणीवाराह के नव भाई और हुये उन्हो के नव कोट प्रसन्न होके दीये थे जिनकी यादगीरी गढ मडोर सावतसिंह को दीया, अजमेर अजैसिंह को दीया, गढ पूगल गजमलजी को दीया, गढ लुद्रवो भाग को दीया जोगराज को धाट दीया...हासू को पारकर दीया, अलसी को पलू ...

विज्ञान संमत् ईश्वरीय अस्तित्व

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#विज्ञान_संमत्_ईश्वरीय_अस्तित्व.... संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई निर्माता होता है तभी वह बनती है । इतने बड़े विश्व का भी कोई न कोई निर्माता होना चाहिए । सृष्टि की विभिन्न वस्तुओं में से प्रत्येक में अपने - अपने नियम क्रम पाये जाते हैं । उन्हीं के आधार पर उनकी गतिविधियां संचालित होती है । यह नियम न होते तो सर्वत्र अस्त - व्यस्तता और अव्यवस्था दृष्टिगोचर होती । इन नियमों का निर्धारणकतां कोई न कोई होना चाहिए । जो भी शक्ति इस निर्माण एवं नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी है वहीं ईश्वर है । वस्तुओं का उगना , बढ़ना जीर्ण होना , मरना और फिर उनका नवीन रूप धारण करना , यह परिवर्तन क्रम भी बड़ा विचित्र किन्तु विवेकपूर्ण है । इस प्रगति चन को घुमाने वाली कोई शक्ति होनी चाहिए । यह जड़ता का स्वसंचालित नियम नहीं हो सकता । विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि संसार का मूल तत्व एक है । एक ही ऊर्जा अपनी विभिन्न चिनगारियों के रूप , विभिन्न दिशाओं में , विभिन्न रंग - रूप में उछल - कूद कर रही है । यहां आतिशबाजी का तमाशा हो रहा है। कुशल शिल्पी बारूद को कई उपकरणों के साथ बनाकर कई प्रकार के बारूदी खिलौने बन...

ईश्वर के अस्तित्व के वैज्ञानिक प्रमाण

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#नास्तिकवाद का कथन यह है कि - " इस संसार में ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं , क्योंकि उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष उपकरणों से सिद्ध नहीं होता । ” अनीश्वरवादियों की मान्यता है कि जो कुछ प्रत्यक्ष है , जो कुछ विज्ञान सम्मत है केवल वही सत्य है । चूंकि वैज्ञानिक आधार पर ईश्वर की सत्ता का प्रमाण नहीं मिलता इसलिये उसे क्यों मानें ? इस प्रतिपादन पर विचार करते हुए हमें यह सोचना होगा कि अब तक जितना वैज्ञानिक विकास हुआ है क्या वह पूर्ण है ? क्या उसने सृष्टि के समस्त रहस्यों का पता लगा लिया है ? यदि विज्ञान को पूर्णता प्राप्त हो गई होती तो शोधकार्यों में दिन - रात माथापच्ची करने की वैज्ञानिकों को क्या आवश्यकता रह गई होती ? सच बात यह है कि विज्ञान का अभी अत्यल्प विकास हुआ है । उसे अभी बहुत कुछ जानना बाकी है । कुछ समय पहले तक भाप , बिजली , पेट्रोल , एटम , ईथर आदि की शक्तियों को कौन जानता था , पर जैसे - जैसे विज्ञान में प्रौढ़ता आती गई , यह शक्तियाँ खोज निकाली गई । यह जड़ जगत् की खोज है । चेतन जगत् सम्बन्धी खोज तो अभी प्रारम्भिक अवस्था में ही है । बाह्य मन और अंतर्मन की गति - विधियों को शोध से ही अभी आ...

नास्तिक दर्शन पर वैज्ञानिक आक्रमण

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#नास्तिक_दर्शन_पर_वैज्ञानिक_आक्रमण......  ईश्वर और उसके अस्तित्व पर विश्वास भारतीय धर्म की महत्त्वपूर्ण आधार शिला है । उसके आधार पर लोग भौतिक आकर्षक से बचें और अपना मनुष्य जीवन सार्थक करने में सफल हुए है । किन्तु अब लोग विज्ञान का युग कहकर इन तथ्यों की अवहेलना करने लगे है । जर्मनी के विद्वान् नीत्से ने नास्तिक दर्शन नाम का एक अलग दर्शन ही तैयार कर दिया और लोगों को इस भ्रम में डाल दिया कि संसार ईश्वर की कोई वस्तु नहीं है । प्रत्यक्ष संसार ही सब कुछ है , इसमें ही जो कुछ इन्द्रिय जन्य सुख है , वही स्वर्ग है । उन्हें ही प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। फ्रायड ने तो काम सुख का ही सर्वस्व सिद्ध करने में अपना सारा जीवन लगा दिया । पोथियाँ रचकर तैयार कर दी और काम स्वेच्छाचार का डटकर प्रचार किया । कहना न होगा कि आज सारा परिश्रम उसके पद चिह्नों पर पूरी तरह चल निकला है । भारतवर्ष भी इस लहर से अछूता नहीं रह सका । यहाँ भी अब आस्तिकता का नाम ही रह गया है , मध्यम श्रेणी के पढ़े लिखे लोग तेजी से नास्तिक होते जा रहे है । नीत्से और फ्रायड के समान ही भारतवर्ष में भी चार्वाक नाम का पण्डित हुआ है , ...

क्या वैदिक ऋषि विज्ञान जानते थे? (1)

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#क्या_वैदिक_ऋषि_विज्ञान_जानते_थे ? भाग - 1 'ऐसा प्रश्न इस समय वारंवार पूंछा जाता है । कुछ समय के पूर्व कई विद्वान ऐसा कह रहे थे कि वैदिक ऋषि करीब करीब अरण्य अवस्थामें थे । पर यह बात अब रही नहीं है। अब विद्वान् लोग मानने लगे हैं कि वैदिक ऋषियों की सभ्यता अच्छी उन्नतिका चिन्ह बता रही है और विज्ञान की प्रागति भी उस समय अच्छी हुई थी । इस विषयमें किसी को कुछ संदेह हो तो उसका निराकरण , प्रो . श्री के . भ . पटवर्धन , एम . एस . सी . इन्दौर निवासीने मंत्र , ब्राह्मण , भारण्यक , उपनिषद , यज्ञ , याग , इष्टि आदि का संशोधन करके , इस लेख के श्रृंखला में अच्छी तरह किया गया है।  ' क्या ऋषि विज्ञान जानते थे ' इस प्रश्नका उत्तर प्रथम देना चाहिये । तो जानिए....  #प्रो०_पटवर्धनजीने इस लेखमाला में इसका यथोचित उत्तर दिया है और बताया है कि वे वैदिक काल के ऋषि अच्छे शास्त्रज्ञ थे । पर इस विषयके प्रमाण और भी हैं और वे यहां मननीय भी हैं इसलिये हम यहां एक दो प्रमाण देते हैं। ◾(१) जलकी उत्पत्ति :- मित्रं हुवे पूतदक्षं , वरुणं च रिशादसम् । धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ऋग्वेद १ । २ । ७ ( पूत - दक्षं ) पवित्रत...

क्या वैदिक ऋषि विज्ञान जानते थे ? (2)

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#क्या_वैदिक_ऋषि_विज्ञान_जानते_थे? : भाग 2 (विगत लेख की लिंक 🔗 नीचे दी गई है।) (६) #स्फोटक_अस्त्र :- युद्धोंमें अस्त्रोंका उपयोग होता था । कई भत्र विज्ञानसे ही बननेवाले थे , इसमें संदेह नहीं है । बाणके नोक पर बम जैसा लगाया जाता था । वह शत्रु सेनामें जाकर गिरता और फट जाता था और वहां आग लगती थी । यह सब विज्ञानसे ही होता था । ये अस्त्र कई ऋषि बनाते थे । विज्ञान न होता तो ये स्फोटक बम या अस्त्र बनते कैसे ? इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऋषि कालमें विज्ञान भी पढाया जाता था । _ _ ◾(७) अब अध्यात्मशास्त्र के विषयमें हम देखते हैं  :-    "द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे , मूर्ते च वामूर्ते च ।"  ____________________________ (बृ . उ . २ । ३ ।१)   ' ब्रह्मके दो रूप हैं एक मूर्त और दूसरा अमूर्त ' दोनों रूप एक ही ब्रह्मके हैं । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अमूर्त रूप तो ब्रह्मका है पर मूर्त रूप भी ब्रह्मका कैसा है ! उपनिषद् कहता है कि दोनों मूर्त तथा अमूर्त ब्रह्मके ही रूप हैं । यूरोपमें इस समय मॅटर ( Matter ) और एनर्जी ( Energy ) ये एक दूसरे रूपमें बदलते हैं अर्थात् दोनों...

चक्रवर्ती सम्राट महाप्रतापी राजा मुंज तथा भोज

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परमार  शासकों , विशेषकर राजा  मुंज  तथा सम्राट   भोज के शासनकाल में मालवा , समस्त उत्तरी भारत में शक्ति तथा गौरव की दृष्टि से चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया था । संदर्भ : 📖 प्राचीन भारत का इतिहास. पांडे, विमल चंद्र. 

आयरलैंड में वैदिक संस्कृति का अतित

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#वैश्विक_वैदिक_संस्कृति_आयरलैंड_में ..... आयरलैण्ड का वैदिक अतीत बताता है कि #आयरलैण्ड आर्यस्थान का यूरोपीय अपभ्रंश है । हो सकता है कि उसे अरण्य स्थान भी कहते हों । उस आयरलैण्ड में वैदिक अवशेष भी विपुल हैं और वहाँ के लोगों के रहन - सहन में वैदिक परम्पराएँ भी दीखती हैं , यद्यपि उन लोगों पर कृस्ती विचार - प्रणाली लादे हुए एक सहस्र वर्ष से अधिक समय बीत गया । #The_Encyclopaedia_of_Ireland नाम के आयरिश ज्ञानकोश ( सन् १ ९ ६८ में Dublin नगर में Allen Figgis द्वारा प्रकाशित ) में पृष्ठ ८२ पर उल्लिखित है कि " आयरिश राज परम्परा धार्मिक होती थी । राजा एक प्रकार से प्रजाजनों का पुरोहित माना गया था । " भारतीय वैदिक परम्परा भी ठेठ वही है । उदयपुर के महाराणा भी अपने आपको परमात्मा का पुरोहित मानते थे । प्राचीन समय में आयरलैण्ड में १५० रियासतें थीं।प्रत्येक राज्य तुअथ ( Tuath ) कहलाता था । राजा को ' राय तुअथ ' ( Ri Tuath ) कहते थे । उन सब में प्रमुख राजा ( राया ) को रायराय ( ruiri ) कहा जाता था । भारत में भी ' राज राज चोल ' , ' राजराजेश्वर ' यो ' राजाधिराज ...

Isle of man अर्थात् मनु प्रदेश

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#Isle_of_man  (#मनु_प्रदेश)  ब्रिटेन में कई प्रदेशों से मनु का नाम जुड़ा हुआ है । एक है Isle of Man ( मनुद्वीप ) , दूसरा है स्कॉटलैण्ड प्रान्त का Slamarnan जिसका अर्थ है ' मनु का पठार ' तथा Checkmannan ( स्कॉटलैण्ड का अल्पतम जिला ) यानि मनुप्रस्तर । प्रोफेसर वाटसन के दिए हुए वे अर्थ हैं । Edinburgh यह स्कॉटलैण्ड प्रान्त की राजधानी का नगर है । उसके सार्वजनिक ग्रन्थालय में सन् १७३१ का जो नक्शा है उसमें लिखा है कि स्कॉटलैण्ड के पश्चिम में जो द्वीप हैं उनमें Islay नाम का द्वीप है । वह वास्तव में Isle of lla का संक्षेप है । मनु की पत्नी का नाम इला था । Sutherlandshire ( सुन्दर स्थानेश्वर ) जिले में Helmsdale नगर तथा Helmsdalc नदी , दोनों से 'इला' का नाम जुड़ा हुआ माना जाता है । 🔥विचार प्रसार🔮🔮🔮🔮🔮 ✍️जय मां भारती 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩

ORIGIN OF LIFE IN VEDAS.

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#जीवन_की_शुरुआत_का_रहस्य -  #आधुनिक_विज्ञान -  जीव की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकार कर प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीव की उत्पत्ति की सर्वप्रथम विवेचना करने का श्रेय चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) को जाता है। उन्होंने अपनी पुस्तक आॅरिजन आॅफ स्पेसीज (Origin of Species) में पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न जीवों की उत्पत्ति को और जैवविकास के सिद्धान्त को समझाया है उसके मिथक झुठ समझने इस पोस्ट को पढे  https://m.facebook.com/groups/1750873528336204?view=permalink&id=2863567987066747 डार्विन ने जीव की उपपत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकारते हुए कहा था कि प्रथम जीव की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई। 01 फरवरी 1871 को उत्पत्ति को लिखे पत्र में चार्ल्स डार्विन ने संभावना प्रकट कि अमोनिया, फास्फोरस आदि लवण घुले गर्म पानी के किसी गढ्ढे में, प्रकाश, उष्मा, विद्युत आदि के प्रभाव से, निर्जीव पदार्थां से पहले जीव की उत्पत्ति हुई होगी। रुसी वैज्ञानिक अलेक्जेण्डर इवानोविच ओपेरिन (Alexander Ivanovich Oparin) ने 1924 में जीव की उत्पत्ति नाम से निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति...