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आपत्तिजनक पँवारी कुल

#आपत्तिजनक_पँवारी_कुल इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना या किसी भी पँवारी कुल पर आक्षेप करने और किसी के मन को ठेस पहुंचाने हेतु नहीं है अपितु ना ही यह दावा करना  है कि उक्त कुल "पँवारी" नहीं हो सकते बल्कि इन कुलों के आपत्तिजनक नामों को सबके समक्ष उजागर करना तथा इस पर सबका लक्ष्य केंद्रीत करना ही इस लेख का सही उद्देश्य है। जिससे इनके उक्त नामों के इतिहास का यथोचित संशोधन और विमर्श हो सकें। तथा उचित निष्कर्ष निकाला जा सकें। एक अवलोकन किया जा सकें। फिर भी यदि किसी का मन इससे विदिर्ण होता है तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।  (१) 6 वीं शताब्दी के बाद जो भाषा आर्यावर्त में म्लेच्छों के साथ चली आयी,, 7 वी शताब्दी में बडे़ मुश्किल से 1% घूल मिल गई। (२) एक एतिहासिक घटना के अनुसार सोलहवीं सदी में मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह ने एक बार दरबार में इब्राहिम खान जो वहां राजपुताना की विख्यात कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए और शत्रु द्वारा आयोजित एक षड्यंत्र के अभियंता के रूप में छद्म वेश लिए आया था, उसे स्वयं पहचान लिया की वह एक दिल्ली से आया पहलवान मात्र नहीं बल्कि एक अफगान ही ...

प्राचीन मां चण्डी का मंदिर "बोरोबुदुर (इंडोनेशिया)" तथा प्राचीन चोल हिंदू शैली से निर्मित श्रीविष्णु मंदिर "अंगकोर वाट (कंबोडिया)"

प्राचीन मां चण्डी का मंदिर "बोरोबुदुर (इंडोनेशिया)"  तथा प्राचीन चोल हिंदू शैली से निर्मित श्रीविष्णु मंदिर "अंगकोर वाट (कंबोडिया)" यह दोनों बौद्ध विहार के रूप में परिवर्तित हो आज पृथ्वी पर विश्व के सबसे बड़े बौद्ध विहार हैं। दोनों "यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल" हैं। 1️⃣ #इंडोनेशिया_का_बौध्द_विहार_चण्डीका_बोरोबुदुर (1) साक्ष्यों के अनुसार इंडोनेशिया के बोरोबुदूर का निर्माण कार्य ९वीं सदी में आरम्भ हुआ और 14 वीं सदी में जावा में हिन्दू राजवंश के पतन और जावाई लोगों द्वारा इस्लाम अपनाने के बाद इसका निर्माण कार्य बन्द हुआ। इसका निर्माण ९वीं सदी में शैलेन्द्र राजवंश के कार्यकाल में हुआ था जहां। यह माता चण्डी का मंदिर था। (ref. Soekmono (१९७६). "Chandi Borobudur: A Monument of Mankind"p. 4.) (2) Soekmono (१९७६). "Chandi Borobudur: A Monument of Mankind" के पृष्ठ १३ पर लिखा भी है,, ''इंडोनेशिया में प्राचीन मंदिरों को चण्डी के नाम से पुकारा जाता है अतः "बोरोबुदुर मंदिर" को कई बार चण्डी बोरोबुदुर भी कहा जाता है।'...

गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर

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#गुजरात_स्थित_सोमनाथ_मंदिर उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार इसका भव्य जिर्णोद्दार तथा महत्वपूर्ण पुनर्निर्माण पँवार चक्रवर्ती नरेश धारेश्वर भोज द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में किया गया था। वह भी तब, जब सोमनाथ को गजनवी ने भग्न किया था - "ठिक उस घटना के पश्चात"..........सन १०२६ के बाद.... #अलबेरूनी लिखता है कि परम राजा अर्थात् " #परमभट्टारक_सम्राट_भोजदेव "  के आने के समाचार मिलते ही सोमनाथ को लूट के साथ ही गजनवी को सिंध से किसी तरह बचकर निकलना पड़ा। उस समय भोजदेव चक्रवर्ती  मालव सम्राट थें । एक लाख सेना के साथ वे महाकाल भक्त,, उस मलेच्छ गजनवी पर हमला बोल चुके थे लेकिन तुर्की लेखक गदरिजी के माने तो वें मार्ग में गजनवी की अपेक्षा ग्यारह दिन पिछे थे,, फिर भी उनकी शत सहस्त्र सेना प्रचंड वेग से आ रही थी। भोज सेना इतने करिब थी कि यदि गजनवी जरा भी देर करता तो जिवीत बच निकलना लगभग असंभव था। हालाँकि गजनवी फिर भी बचकर भागने में सफल रहा। मालवा की राजधानी धार से गुजरात के सोमनाथ का अंतर ७१७.९ किलोमीटर है। उस समय के अनुरूप यह क्रम दिर्घ था, उपर से ग्यारह दिन पिछे... इसलिए ऐसा तो होना ही...

धार का अतित और वर्तमान जिहाद

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#धार_का_अतित_और_वर्तमान_जिहाद .... भारतवर्ष में आज कोई भी ऐसा प्रमुख स्थान, भवन, मंदिर नहीं जहा जिहादियो ने अपनी मस्जिदों को नहीं बनाया है। उन्ही में एक चक्रवर्ती सम्राट राजर्षि भोज की बसाई धारानगरी है। धार संस्कृत नाम है । यह नगरी प्राचीनकाल में समृद्धशाली मालवा साम्राज्य की राजधानी थी । इसलिए इसमें अनेक मन्दिर और राजप्रासाद थे । इनमें से अधिकांश अब मस्जिदों का रूप धारण किए खड़े हैं । उनकी बाह्याकृति ही सभी को यह विश्वास दिला देगी कि इनका मूलोद्गम मन्दिरों के रूप में हुआ था । इससे भी बढ़कर बात यह है कि इस बात का लिखित प्रमाण भी उपलब्ध है । धूल में आच्छादित और दीवारों में गड़े हुए पत्थरों पर संस्कृत भाषा में साहित्य उत्कीर्ण है । एक सुस्पष्ट उदाहरण उस स्मारक का है जो छद्मरूप में कमाल मौला मस्जिद कहलाती है । कुछ वर्ष पूर्व जब उस भवन का कुछ अंश उखड़कर नीचे गिर पड़ा , तब उसमें प्रस्तर फलक दिखाई पड़े जिन पर संस्कृत - नाटकों के पृष्ठ के पृष्ठ उत्कीर्ण किए भरे पड़े थे । अब यह सत्य प्रस्थापित हो चुका है कि ' सरस्वती कण्ठाभरण ' नामक स्मारक संस्कृत - साहित्य के अनूठे पुस्तकालय के में...

राणी दुर्गावती की बहन कमलावती के अपहरण की कहानी.....

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राणी दुर्गावती की बहन कमलावती के अपहरण की कहानी....... अकबर जो एक मलेच्छ विदेशी आक्रांता था और पुरे राजपुताना को साम दाम दण्ड भेद से एक करना चाहता था तथा स्त्री के प्रति आसक्त एक भेड़िया था। उस कायर ने गोंडवाना पर आक्रमण करने के बजाय राणी दुर्गावती को अपने अधिपत्य में लाने के लिए उसकी कमजोरी ढुंढी ताकि बिना युध्द काम बन जाएं। उधर मेवाड़ में राणा प्रताप सिंह ने राजपुताना को एक करने के लिए उदयपुर में समस्त राजपुताना के राजपुत राणी राजाओं को आमंत्रित किया था जिसमें शस्त्र कला स्पर्धा और उदयपुर शस्त्रागारोद्घाटन समारोह भी आयोजित किया गया था। राणा कुंवर प्रताप सिंह उन दिनों महाराणा नहीं हुए थे बल्कि सिंहासन पर उदय सिंह ही थें। उनका का उद्देश्य था कि इस आयोजन के द्वारा विदेशी मलेच्छ आक्रांता मुगल अकबर को भारत से खदेड़ा जाए और उस हेतु सभी राजपुताना एक संगठन एक सुत्र में एकत्र हो जाए जिससे यह महान राष्ट्रीय उद्देश्य पुर्ण हो सकें। हालाँकि इस प्रयास का प्रतिफल देखे तो राणा प्रताप को निराशा ही हाथ आईं। राजपुताना तो एक हुआ नहीं फिर भी कुछ सकारात्मक लाभ मेवाड़ को हुए अवश्य थे। (१) इसी में मारव...

राजपूत विरांगणा राणी दुर्गावती

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"गोंडवाना की रानी दुर्गावती जी का इतिहास " "परिचय" * बहन :- कुछ इतिहासकारों ने कमलावती को रानी दुर्गावती की बहन होना लिखा है, जबकि कुछ का मानना है कि ये रानी दुर्गावती की सगी बहन नहीं थी | * ससुर :- राजा संग्रामशाह :- ये अमन दास नाम से भी जाना जाता था | इसके अधिकार में 52 दुर्ग थे | ये बाल्यकाल में बड़ा क्रूर था, अपने पिता को मारकर गद्दी पर बैठा | इसने गुजरात के बहादुरशाह को रायसेन की चढ़ाई के समय सहायता पहुंचाई | * सास :- रानी पद्मावती * पति :- राजा दलपतिशाह :- राजा संग्रामशाह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र दलपतिशाह गद्दी पर बैठे | इनका विवाह रानी दुर्गावती से हुआ | ये सिंगोरगढ़ (दमोह) में रहा करते थे | * गुरु :- रानी दुर्गावती के गुरु गोस्वामी विट्ठलदास जी थे, जो वल्लभ संप्रदाय के संपादक वल्लभाचार्य के पुत्र थे | रानी दुर्गावती ने इनको 108 गांव दान में दिए थे, जो गोस्वामी जी ने तेलंग ब्राह्मणों में बांट दिए | * प्रिय हाथी :- रानी दुर्गावती के प्रिय हाथी का नाम सरमन था, जो उस राज्य के सभी हाथियों में सर्वश्रेष्ठ था | युद्ध के समय रानी दुर्गावती इसी हाथी पर सवार हुआ कर...

महाबलीपुरम मंदिर, तमिलनाडु

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महाबलीपुरम मंदिर, तमिलनाडु  यद्यपि महाबलिपुरम का प्राचीन इतिहास अस्पष्ट, संख्यात्मक और युगानुकूल साक्ष्य है और इसके मंदिर बताते हैं कि स्मारकों के निर्माण से पहले यह एक महत्वपूर्ण स्थान था।  यह अनुमान लगाया जाता है कि यह Sopatma का बंदरगाह है जिसका उल्लेख पहली सदी के पेरीपस ऑफ एरीथ्रियन सी या टॉलेमी के पोर्ट ऑफ मेलेंज में उनकी दूसरी शताब्दी के जियोग्रिया में किया गया था।  एक अन्य सिद्धांत बताता है कि 19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से 20 वीं शताब्दी के अंत तक पेरुम्परनुरुपदाई में वर्णित निर्पेयार्वु का बंदरगाह महाबलीपुरम या कांचीपुरम हो सकता है।  उनकी अवंतिसुंदरी कथा में, 7 वीं -8 वीं शताब्दी के संस्कृत विद्वान दाओइन (जो तमिलनाडु में रहते थे और पल्लव दरबार से जुड़े हुए थे) ने मामल्लपुरम में-विष्णु मूर्तिकला की मरम्मत के लिए कलाकारों की प्रशंसा की थी। हालांकि, इस पाठ की Dain की लेखकता विवादित है।  मध्ययुगीन संस्कृत पाठ में ममल्लापुरम स्मारकों, मरम्मत की एक प्रारंभिक परंपरा और वैष्णववाद के महत्व का उल्लेख है  जब मार्को पोलो (1271-1295 CE) दक्षिण-पूर्व एशिया से वे...

महाराणा प्रताप के दरबारी पं. चक्रपाणि मिश्र: ज्ञान विज्ञान के एक विस्मृत एक अपरिचित एतिहासिक पात्र......

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महाराणा प्रताप के दरबारी पं. चक्रपाणि मिश्र: ज्ञान विज्ञान के एक विस्मृत एक अपरिचित एतिहासिक पात्र......  महाराणा प्रताप के दरबार में चक्रपाणि मिश्र एक दरबारी-पंडित थे, साथ ही महाराणा प्रताप के बाल मित्र भी थें।  वह उस समय के एक वास्तुकार और प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी, कृषि विज्ञानी थे। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में विश्ववल्लभ, मुहूर्तमाला, राज्याभिषेक पद्यति आदि शामिल हैं। उन्होंने जल संसाधनों के विकास पर जोर दिया। वे तत्कालीन युध्द कला में भी थोड़े अवगत थे किंतु उनका अधिकार क्षेत्र ज्ञान विज्ञान की विभिन्न शाखाएं थी जिसका वे एक जीवीत कोष थें। मेवाड़ के लिए ग्रंथ रचना करने का प्रेरित आदेश स्वयं महाराणा प्रताप ने ही उन्हें कार्यभार के रूप में सौंपा था ताकि उनके राज्य में अच्छी शिक्षा, ज्ञान, साहित्य तथा कला- सुत्र, का समतोल तंत्र विकसित हो सकें। 'चक्रपाणि मिश्र’ ने कई ग्रंथ रचे किंतु मुख्यतः चार ग्रंथों की रचना की थी। उनके ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं... (१) #विश्व_वल्लभ (२) #मुहूर्त_माला (३) #व्यवहार_दर्श (४) #राज्याभिषेक_पद्धति ‘चक्रपाणि मिश्र’ एक उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने...

गीत : जौहर फिर से है आया.....

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जौहर   जौहर फिर से है आया इतिहास ने स्वयं को दोहराया क्षत्रिय करते युद्ध हुँकौर क्षत्राणी पग आगे चार, अद्भुत है ये विडम्बना सबने स्वयं बलिदान चुना, देख सपूतों का साहस ये काल भी है घबराया.. करे कामना अपने पति की स्वयं पति को दे तलवार, राखे नहीं कोई पाँव भूमि पर वचन मांगती है हर बार, वचन दिया है निभाएंगे हम लाज रखेंगे तुम्हारी, समक्ष इस बलिदान तुम्हारे गर्दन झुकी हमारी , नहीं बने कभी और किसी की जान भले है जानी, पत्नी धर्म निभाने को क्षत्राणी दे कुर्बानी, जलने को तैयार है अग्नि को गले है लगाना, सोचे वीर की कुछ भी हो अब देश है इन्हें बचाना, देश भक्ति का भाव है मेवाड़ के कण कण में है समाया, क्षत्रिय अपने लहु से अंतिम बार मांग भरे, ले आशिष क्षत्रणी जीवन को संपूर्ण करे, चाहे सुख की बरखा हो या दुख की बदली छाए, अश्रु की इक बूंद भी ना आँखों से गिरने पाए, जाते जाते इक दूजे ने दोनों को क्रम कराया, धन्य भाग सत् कर्म हमारे हमने तुमको पाया हाँ हमने तुमको पाया देख सपूतों का साहस ये काल भी है घबराया जौहर फिर से है आया इतिहास ने स्वयं को दोहराया!! जय सना...

राजा भोज के बनाए मंदिर

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भोजस्वामीदेव मंदिर  भोज कालिन वास्तुकला का उदाहरण   यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, यह हमारी पहचान का स्त्रोत है, हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद है, हमारी भूली हुई महानता की कहानी है।       इस मंदिर का निर्माण परमार राजा भोज ने आज से लगभग 1000 साल पहले करवाया था, मंदिर का गर्भगृह केवल एक पत्थर को काटकर बनाया गया है । (समाधीश्वरा मंदिर, चित्तौरगढ़ )

कैसे हुई थी मेवाड़ की महाराणी अजबदे पँवार की मृत्यु

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कैसे हुई थी मेवाड़ की महाराणी अजबदे पँवार की मृत्यु? अकबर हल्दीघाटी के युध्द की तैयारी कर रहा था। योजनाएँ बना रहा था तथा उसने मानसिंह को उस युध्द का नेतृत्वकार रखना भी निश्चित कर लिया। उसे पता था कि पठान तोफजी हाकिम खान सुरी और उसके साथी अफगानिस्तान का मिर्जा यदि  हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप का साथ देते हैं तो वह यह जंग कभी नहीं जीत सकता। इसलिए जब उसे पता चलता है कि मिर्जा  महाराणा का ही साथ देगा तब हल्दीघाटी के जंग के पहले ही मीर्जा को अपनी छावनी में बुलाकर उसे छल से मार गिराया और उसके सैनिकों को बच्चों बुढो के साथ बेरहमी से कत्लेआम करवा दिया। और संधि तथा शांति के नाम पर हाकिम खान सुरी को भी छावनी में बुलाकर ही बंदि बनाया। हालांकि हाकिम खान सुरी अकबर के कपट तथा दृष्टता से  पहले से ही पुर्ण परिचित था लेकिन मिर्जा के कहने पर न चाहते हुए भी उसे वहां आना पड़ा था। हाकिम खान सुरी को बंदि बनाकर अकबर ने और एक षड्यंत्र की योजना सोची, की महाराणा प्रताप को शांती का समझौता देने और अमन के नाम एक लकड़ी हाथी का तौहफा दिया जाए जिसमे फैजल नामक एक भयावह जंगली कबिलाई सरदार और उसके साथी ...

रामायण का एशियाई देशों में प्रभाव

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#रामायण_का_एशियाई_देशों_में_प्रभाव :  भाग: 1 वर्तमान समय के विद्वानों की भी यह धारणा है कि रामायण केवल भारत का और हिन्दुओं का ही ग्रन्थ है और वह भक्तिग्रन्थ और धर्मग्रन्थ है । अतः पूर्ववर्ती इण्डोनेशिया आदि देशों में , जहाँ किसी समय भारतीय राजाओं का राज्य था। इस लेख श्रृंखला में में हम यह बताएंगे कि रामायण केवल भारत , का या हिन्दुओं का ही नहीं , अपितु समस्त विश्व के लोगों का मान्यवर इतिहास ग्रन्थ रहा है । अतः विश्व के सारे देशों में रामायण पढ़ी जाती है । यदि कुछ देशों में रामायण का अस्तित्व या ज्ञान लुप्त हो गया है तो उसका कारण यह है कि वहां के लोग ईसाई या इस्लामी बन जाने के कारण उन्होंने रामायण की स्मृति दवा दी है । शोध करने से विश्व के हर देश में रामायण का अस्तित्व अवश्य निखर आएगा । रामायण की विश्वमान्यता और विश्व - प्रसार से एक और मौलिक निष्कर्ष यह निकलता है कि कृतयुग से कौरव - पाण्डवों के महाभारतीय युद्ध तक सारे विश्व के लोग वैदिकधर्मी ही थे । अतः वे रामायण को निजी पूर्वजों का इतिहास मानकर बड़ी श्रद्धा से उसका पठन करते थे । १४०० वर्ष पूर्व जब इस्लाम पंथ नहीं था और १६०० वर...